शनिवार, 3 अक्टूबर 2020

बाटा के जूते

"बाटा के जूते"




दैनिक यात्रा मे सहचर दैनिक यात्रियों के संपर्क एवं संगत से उनके ज्ञान, अनुभव, योग्यता के  अनोखे किस्से आदि  सुनने को मिलते है जिससे आप के ज्ञान कोष मे भी अच्छी ख़ासी वृद्धि होती है क्योंकि एक  निश्चित भरपूर समय आपको यात्रा के दौरान मिल जाता है बगैर किसी तनाव या चिंता के एकदम फ्री विंदास। ऐसे ही एक दिन एक साथी दैनिक यात्री ने एक किस्सा सुनाया जिनका नाम तो नहीं मालूम उपनाम यादव जी कहते थे शायद आगरा मे रेल्वे मे कार्यरत थे। उनके अनुसार घटना सच्ची थी जिसे उन्होने खुद अपनी आँखों से देखा था। मै घटना की सत्यता के बारे मे पुष्टि नहीं करता पर हाँ घटना की रोचकता और रौनकता की 100% गारंटी लेता हूँ। यूं तो ट्रेन के एक टीसी से एक बार मुलाक़ात हुई थी जिसका विवरण हमने "हीराकुंड एक्स्प्रेस" (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/11/blog-post_15.html) मे किया था। पर यहाँ टीसी के एक नये रूप मे दर्शन हुए। 

यात्रा का विवरण देते हुए उन्होने बताया कि एक बार मै  ट्रेन मे यात्रा कर रहे थे। स्लीपर क्लास मे मेरा  रिज़र्वेशन था। रात होने को थी। टिकिट निरीक्षक महोदय अन्य डिब्बों को चैक करके हमारे डिब्बे मे आये। ये ही आखिरी डिब्बा था जो यात्रियों के टिकिट चैक करने से रह गया था। टिकिट चैक करने के बाद वह टिकिट निरीक्षक के लिये अपनी आवंटित सीट पर कुछ राहत पा आराम करने के लिये बैठ गये। वही पास की बर्थ मुझे आवंटित थी। कुछ लोग कोच मे सो चुके थे कुछ सोने की तैयारी मे थे। अब तक रात के नौ बज चुके थे। कुछ निशाचर स्वभाव के प्राणी खाना खाने मे लगे थे टिकिट निरक्षक महोदय ने भी हाथ मुंह धोकर अपनी सीट पर बैठ कर भोजन किया और अपने हिसाब किताब जोड़, लिखा पढ़ी की और अपने यात्री चार्ट को अंतिम रूप दे सभी कागजातों को लपेट कर अपने बैग मे रख दिया। रात के 10 बज चुके थे कोच की गैलरी पूरी तरह से खाली थी क्योंकि अधिकतर यात्री निद्रा के आगोश मे सो चुके थे। मै भी कुछ ऊँघता हुआ अपनी बर्थ पर सोने की कोशिश करने लगा जो टिकिट निरीक्षक की सीट के ही पास  बाली बर्थ थी। गाड़ी तेज गति से दौड़ अपनी मंजिल की तरफ बड़ी जा रही थी। सुपरफास्ट गाड़ी थी लंबे लंबे स्टोपिच थे। हिलती डुलती ट्रेन मे कब नींद के आगोश मे  समा गया पता नहीं चला।

प्रायः ऐसा होता है सभी आराम तलब सुविधाओं के बाबजूद घर के बाहर नींद अच्छी तरह नहीं आती, रात मे अचानक नींद खुली तो टिकिट निरीक्षक महोदय को जो करते देखा तो सहसा विश्वास नहीं हुआ। मैंने देखा कि टिकिट चैकर महोदय ने अचानक बर्थ के नीचे रखे अपने जूते झुक कर उठाए और चलती ट्रेन मे खिड़की से बाहर फेंक दिये। टीसी ने ऐसा क्यों किया मै कुछ समझ तो नहीं पाया और  इसी उधेड्बुन मे फिर से कब आँख लग गई पता नहीं चला। घंटे-डेढ़ घंटे बाद एक बार आँख फिर खुली तो टिकिट चैकर महोदय चादर ओढ़े खर्राटे मार चैन की नींद सो रहे थे।

अचानक अल सुबह डिब्बे मे कुछ हल-चल हुई और लोग आपस मे खुसुर-फुसुर करते नज़र आये। कुछ हल्ला-गुल्ला सुन  मेरी भी आँख खुल गई मैंने भी सह एक यात्री से इस गहमा गहमी का कारण जानना चाहा? पर कुछ पता नहीं चला।

अब तक खबर उड़ते उड़ते टिकिट निरीक्षक तक भी पहुंची जो गहरी नींद के बाद शोर-शराबा सुन आँखें मलते हुए अभी-अभी उठे थे। उन्होने भी जिज्ञासा बस एक यात्री से पूंछा उसने उन्हे बताया कि कोच से किसी यात्री का सामान चोरी हुआ है। पीढ़ित यात्री भी तब तक टिकिट निरीक्षक को खोजते खोजते उन तक आ पहुँचा था। टिकिट निरीक्षक द्वारा पूंछे जाने पर उसने बताया कि उसके नये जूते रात मे  कोच से चोरी हो गये।  टिकिट निरीक्षक ने पूंछा - जूतों को कहाँ रखा था? यात्री ने बताया अपनी बर्थ के नीचे ही उतार के रखे थे। टिकिट निरीक्षक ने एक प्रौढ़ अनुभवी व्यक्ति की तरह कहा- यही तो गलती करते है आप सब, मैंने अपने तीस साल की ट्रेन की नौकरी मे यही सीखा कि हम लोग अपने सामान को तो ताला लगा कर रखते है पर जूते चप्पल यूं ही लापरवाही से कहीं भी रख देते है। मैंने रेल के सफर मे एक बात सीखी है, मै कभी जूते उतार कर नहीं सोता बल्कि हमेशा जूते पहन कर ही सोता हूँ! इस तरह कहते हुए उसने अपने उपर ओढ़ी चादर को उपर खींचते हुए पैरों मे पहने जूते दिखाते हुए कहा। कभी भी जूते यूं ही नीचे उतार कर नहीं रखना चाहिये? आज कल की महंगाई के समय जूते कोई सस्ते थोड़ी न आते? उसने यात्री को उपदेशात्मक लहजे मे डांटते हुए कहा। अचानक यात्री के मुंह से निकला "बिलकुल ऐसी ही थे"? टिकिट निरीक्षक ने भी बड़ी बेशर्मी से कौतूहल पूर्ण तरीके से पूंछा तो क्या तुम्हारे जूते भी "बाटा" कंपनी के थे? यात्री ने कहा- "जी हाँ", "जी हाँ"। तब तो तुम निरे बेअक्ल हो?  तब तो तुम्हें और भी सावधानी रखनी थी! न समझ हो! लगता है कभी कभार ही रेल्वे मे यात्रा करते हो। रेलों मे आये दिन चोरी चपाटी के बारे मे नहीं पढ़ा-सुना?  मेरी बात अपने दिमाक मे गांठ बांध कर रख लो! कभी भी रेल यात्रा मे जूते यूं ही उतार कर बर्थ के नीचे नहीं रखना।  या तो मेरी तरह पहन के ही सो या जूतों को भी अपने सिराहने या बगल मे रख कर ही सोना चाहिये!! यात्री की नजरे चाहते हुए भी जूतों से नही  हट रही थी पर कुछ भी कहने की उसकी हिम्मत भी न हुई। अपने आप को कोसता हुआ मन मारकर और टिकिट चैकर महोदय की सीख को गांठ बांध कर  अपनी सीट पर बैठ गया।   

अगला स्टेशन आने बाला था इस स्टेशन पर ट्रेन का विराम भी पंद्रह मिनिट का था टिकिट निरीक्षक महोदय को भी यही उतरना था क्योंकि उनकी ड्यूटि यहीं तक थी। गाड़ी के प्लेटफोरम पर रुकते ही मै भी टिकिट निरक्षक के पीछे लपक लिया, उनके साथ प्लेटफार्म   पर उतर कर रात को उनके द्वारा जूते फेंकने की सारी घटना को उनको कह सुनाया। अब तो टी॰सी॰ महोदय, के हाथ पैर फूल गये? उनकी चोरी पकड़ी गयी? इज्जत का जो  फ़लूदा बनता सो अलग। किसी अनिष्ट की आशंका के पूर्व ही उन्होने  चौंक कर तुरंत मेरा हाथ पकड़ कर किनारे ले गये और अनुनय-विनय कर चाय, नाश्ता कराया। पान सिगरेट भी पिलाई और सिगरेट की बड़ी डिब्बी भी जेब मे रखते हुए पीठ थप थपा कहा, "आगे काम मे आयेगी"। जब तक ट्रेन खड़ी रही उन्होने हमारे आदर सत्कार मे कहीं कोई भी कमी नहीं होने दी। प्लेटफोरम पर उपलब्ध सभी तरह के स्वल्प आहार, ठंडा जूस एवं पेय आदि  लेकर खिड़की से हमारी सीट पर रख दिया। ट्रेन के छूटने तक मेरी सेवा करते रहे और ट्रेन के चलने पर हाथ जोड़ कर ध्यान रखने का निवेदन किया।       

कुछ देर बाद ट्रेन चल दी, टिकिट निरीक्षक द्वारा रात मे अपने जूतों को फेंकने का दृश्य मेरी आँखों के सामने  बार बार घूम रहा था। उनकी "बाटा के जूते" पहन कर सोने की नसीहत भी रह रह कर मन मे याद आ रही थी।

 

विजय सहगल

  


5 टिप्‍पणियां:

N K Dhawan ने कहा…

बहुत सुंदर

P.c.saxena ने कहा…

आपने मजे हुए लेखक की तरह धारा प्रवाह तरीके से कहानी बयान कर दी आप मैं एक अच्छे लेखक के सभी गुण समाहित हैं

P.c.saxena ने कहा…

आपने मजे हुए लेखक की तरह धारा प्रवाह तरीके से कहानी बयान कर दी आप मैं एक अच्छे लेखक के सभी गुण समाहित हैं

हमारी खुशी ने कहा…

अत्यंत रोचक वर्णन

विजय सहगल ने कहा…

सहगल जी,
'बाटा के जूते' की घटना वाला ब्लाॅग पढ़कर ऐसा लगा जैसे सब कुछ आपकी आंखों के सामने हो रहा हो। यह सच्ची घटना है या आपकी लिखी हुई एक कहानी?
अच्छे लेखक की यही पहचान है कि जिस घटना का जिक्र किया जाए वह घटना पढ़ने वाले को ऐसे लगे जैसे उसके सामने ही घटित हो रही हो। मुंशी प्रेमचंद जो भी लिखते थे पढ़ने वाला पढ़कर कहानी के चरित्र में अपने आपको कहीं न कहीं फिट कर देता था। उनकी लिखी हुई बड़े भाई साहब, ईदगाह, बड़े घर की बेटी आदि कई कहानियां हैं जिनमें ऐसे लगता है जैसे दृश्य आपके आंखों के सामने घूम रहे हों।
बाबू देवकीनंदन खत्री के लिखे तिलिस्म व ऐयारी के उपन्यास पढ़ने पर पढ़ने वाला तिलिस्मी दुनिया में खो जाता था। वे जब उपन्यास लिखते थे उस समय वो उपन्यास रोजाना लखनऊ में निकलने वाले अखबार में छपता था और प्रतिदिन क्रमशः करके अगली कड़ी लिखी जाती थी। सुबह 5:00 बजे से अखबार के दफ्तर के आगे लोग लाइन लगाकर खड़े हो जाते थे ताकि अखबार छपने के बाद वितरण होते ही उनको अगली कड़ी पढ़ने को मिल जाए। इनके लिखे उपन्यासों में चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, व भूतनाथ उपन्यासों के 24 खंड थे, प्रत्येक खंड में लगभग 300 पेज की एक पुस्तक होती थी। इनमें से एक बार मुझे चंद्रकांता संतति पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ और 24 किताबें मैं तीन-चार दिन में पढ गया। एक बार पढ़ने बैठता था तो वापस छोड़ने की इच्छा ही नहीं होती थी, रात को 3:00 बजे तक पढ़ता रहता था, इतना ज्यादा इंटरेस्टिंग व रोचक था। बाबू देवकीनंदन खत्री के लिखे उपन्यास गूगल या किसी अन्य साइट पर अगर मिलते हो तो आप डाउनलोड करके अवश्य पढ़ना, बहुत आनंद मिलेगा।
S L KHATTRI on whatsapp 4oct. 2020

बात जूतों से निकल कर जब घर तक पहुंचती है जब बच्चा आपकी ही जेब मे हाथ डालकर बटुए मे से कुछ रुपये निकाल ले तो आप उसे punish करते हैं तो क्यों भूल जाते हैं कि आपने भी तो ऐसे ही हरकत की थी शायद नज़रिये का फर्क है...
लघु कहानियां समय अभाव और रुचि अनुसार अक्सर पढ़ ली जाती हैं और उसका impact ज्यादा होता है...
सहगल जी आप अच्छे लेखक हैं...👏🏽👏🏽👏🏽
By Kulbir Singh on whatsapp on 4 oct.2020