"टीआरपी" (टेलिविजन
रेटिंग पॉइंट) घोटाला
दिनांक 19 अक्टूबर 2020 मे श्री विभूति नारायण राय (पूर्व आईपीएस अधिकारी) का लेख "भारत क्यों न जाने टीआरपी घोटाले का सच" नवभारत टाइम्स मे प्रकाशित हुआ था। उस लेख के बारे मे मैंने अपनी प्रतिक्रिया संपादक के नाम पत्र मे भेजी थी जिसे समाचार पत्र ने दिनांक 20 अक्टूबर 2020 को रीडर्स मेल मे प्रकाशित किया था लेकिन शायद प्रितक्रिया पत्र बड़ा होने के कारण उसके कुछ ही अंश प्रकाशित हुए। मै अपनी पूर्ण विचार यहाँ आप लोगो के साथ सांझा कर रहा हूँ। हाँ एक बात और आज कल तकनीकि पर निर्भरता इतनी अधिक हो गई है कि इसके बिना एक कदम आगे नहीं बढ़ा जा सकता है ऐसा ही कुछ इस हफ्ते मेरे साथ हुआ कि घर से बाहर लेपटोप के बिना ब्लॉग लेखन/प्रेषण मे विलंब हुआ। -विजय सहगल॰
मै
श्री राय जी के श्री अर्णव गोस्वामी एवं उनके रिपब्लिक टीवी चैनल के बारे मे उनके
विचारों से पूर्णत: सहमत हूँ। न केवल
रिपब्लिक टीवी अपितु देश के प्रायः सभी टीवी चैनल्स विशेषतः हिन्दी टीवी चैनल्स की
गैर जिम्मेदार व्यवहार व आचरण वास्तव मे "मीडिया जगत को शर्मसार" करने
वाला है।
समाचार वाचन और पाठन मे जब पत्रकार के दिल की भावनाएं उसके चेहरे पर परलक्षित होने लगे तो उसकी पत्रकारिता के प्रति निष्ठा और निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा होता है? उस दिन रिपब्लिक टीवी के विरुद्ध टीआरपी की खबर की प्रतिक्रिया स्वरूप ऐसी ही कुछ रहस्यमय और कुटिल हंसी और मुस्कान देश के सारे मुख्य टीवी चैनल्स के पत्रकारों के चेहरों पर दिखाई दी जिसे सराहा नहीं जा सकता और जो दुःख, चिंता एवं वेदना देने वाली है। श्री अर्णव गोस्वामी के रिपब्लिक चैनल के टीआरपी कांड मे शामिल होने की खबर के वाचन मे कुटिल और कपट पूर्ण मुस्कान एनडीटीवी के श्री रवीश कुमार और इंडिया टीवी के श्री रजत शर्मा सहित ज़ी टीवी के श्री चौधरी जी सहित आजतक एवं एबीपी सहित अन्य टीवी चैनल्स पर देखने को मिली जो दुर्भाग्य पूर्ण है। उस दिन और आगे के दिनों मे भी टीवी चैनल्स की टीआरपी पर टीवी चैनल्स की कतर व्योन्त उनके आपस मे गहरे मतभेद के बाबजूद एक स्वर मे रिपब्लिक टीवी के विरुद्ध कूकर थुक्का-फजीती इनके वास्तविक चरित्र को दर्शाती है। श्री रवीश कुमार के चेहरे का विधवा विलाप तो आश्चर्य चकित करने वाला था। उन्हे दुःख इस बात का नहीं था कि एक टीवी चैनल ने अपनी टीआरपी क्यों बढ़ा ली उन्हे दर्द और चिंता इस बात की थी कि उनके टीवी चैनल की टीआरपी क्यों और कैसे कम कर दी गई। उनका छद्म रुदन कुछ ऐसे पिता की तरह था जिसे अपने बेटे के फ़ेल होने की दुःख और वेदना नहीं था अपितु कष्ट इस बात का था कि पड़ौसी का बेटा पास क्यों हो गया? टीआरपी मुद्दे पर आर्थिक लाभ के लिए विज्ञापन पाने की होड़ मे एक दूसरे की छीछा-लेदर करना टीवी चैनल्स के अंदर के घाव की पीप और मवाद से भरे नासूर को दर्शाती है। दुर्भाग्य है आज सभी टीवी चैनल्स कहीं न कहीं किसी राजनैतिक दल की विचारधारा और प्रभाव से प्रभावित हो समाचार का प्रसारण कर रहे है। पर खेद और अफसोस तो तब होता है जब कोई चैनल देश का हित और सुरक्षा त्याग कर आस्तीनों के साँप बन द्रोह पर उतारू हो। इनके लिये देश और समाज की प्राथमिकता दूसरी पायदान पर है।
देश की स्वतन्त्रता के पश्चात आईएएस/आईपीएस संवर्ग मे वो माद्दा व ताकत थी और मेरा मानना है कि वह आज भी है, कि वह देश के निरीह, निर्बल एवं वंचित लोगो के उन्नति एवं विकास के लिये काम करते या असामाजिक तत्वों गुंडे बदमशों के अत्याचार, अनाचार से समाज और विशेषकर महिलाओं की रक्षा कर उनसे बचा सकते थे, पर देश का दुर्भाग्य रहा इस काडर के अधिसंख्य लोगो ने अपने निजी स्वार्थों के वशीभूत "निर्लज्ज राजनैतिकों" के कृपा पात्र बनने या उनकी "प्रिय कृपा पात्रों की सूची" मे आने की होड़ मे अपने कर्तव्यों को तिलांजलि दी जिसके कारण आज देश के सामने ऐसी अप्रिय स्थिति का निर्माण हुआ। मुंबई पुलिस कमिश्नर श्री परमवीर सिंह जी भी कहीं न कहीं इसी मानसिकता से प्रभावित रहे अन्यथा पटना पुलिस के एसएसपी द्वारा अपने कर्तव्य पालन पर उनके साथ मुंबई पुलिस का इतना निर्लज्ज व्यवहार क्यों होता? कानून को अपना कार्य करने देना चाहिये पर टीआरपी की शिकायत मे रिपब्लिक टीवी के नाम शिकायत मे आने पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उसके विरुद्ध टीका टिप्पड़ी करना एवं देश के एक अन्य ख्याति प्राप्त टीवी चैनल् को बख्श देने का कदम पूर्वाग्रह से ग्रसित अति उतावलेपन मे उठाया गया प्रतीत होता है जो कतई पक्षपात रहित नहीं कहा जा सकता है।
आज के तकनीकि युग मे जहां हर व्यक्ति के मोबाइल की बातचीत का मिनटों और सेकोण्डों, व्यक्ति, स्थान आदि का एक एक रेकॉर्ड जब उपलब्ध हो वहीं इसके विपरीत यदि टीआरपी की गणना का निर्धारण गली मुहल्ले के कुछ छुटभैयों द्वारा टीआरपी गणना बॉक्स कुछ लोगो के घर पर लगा कर गणना मे हेरफेर-चालबाजी किसी चैनल्स को टीवी पर 24 घंटे चालू रख किया जाता हो तब ऐसी टीआरपी प्रणाली को कचरे के डिब्बे मे डालना ही श्रेयस्कर है। बड़ा ही हास्यास्पद एवं आश्चर्यजनक विषय है कि ऐसी सड़ी-गली प्रणाली के आधार पर लाखों करोड़ो रूपये के टीवी विज्ञापन व्यापार का निर्धारण होता है? घोर आश्चर्य!!!!
देश के राजनैतिक परिदृश्य के अधोपतन के बीच आज भी देश की जनता को न्याय पालिका के बाद सिर्फ आईएएस/आईपीएस संवर्ग से ही अब ऐसी अपेक्षा है कि वे निष्पक्ष, निर्भीक, निडरता एवं ईमानदारी से यदि अपने कार्य एवं कर्तव्यों को निष्पादन और पालन करते तो देश का कदाचित ही ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से गुजरना पड़ता?
विजय
सहगल


1 टिप्पणी:
[4:32 PM, 10/29/2020] Jha Sahab RPR: सहगल जी आपको अति सुन्दर सटीक लेख के लिए साधुवाद बहुत आपने आईएएस आईपीएस एवं अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकांश अधिकारियो की मानसिकता इतनी दूषित हो गई है आश्चर्य होता है सिर्फ और सिर्फ लूट खसोट और सुर्यंमुखीफूल की तरह अपने मूल कर्तव्य और अपने अधिकारों का दुरोपयोग करते हुए जो सत्ता मे है उसकी चाटुकारिता करने अपना ध्यान केंद्रित करते है आजकल
[4:40 PM, 10/29/2020] Jha Sahab RPR: आजकल कुछ अधिकारी बहुत जिम्मदारी से ईमानदारी से अपने कर्तव्य मे लगे है ऐसे अधिकारियो को अपना बोरिया बिस्तर हमेशा तैयार रखना होता है देखने और पढ़ने मे आता है 20साल की सेवा मे 15-20 ट्रांसफर झेलना पड़ा पुनः आपके साहसिक लेख के लिए धन्यवाद
विजय झा, रायपुर व्हाट्सप्प पर
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