बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

दिल्ली के दंगे


दिल्ली के दंगे



अब  तक दिल्ली मे 24  लोगो की मौत हो चुकी है। इन लोगो की मौत कोई कोरोना वाइरस या  स्वाइन फ्लू से नहीं हुई इनमे से अधिकतर दिल्ली के बेकसूर नागरिक थे जिनको इस देश के राजनैतिक नेताओं के बिष वमन से उपजी हिंसा की बलि चढ़ गये। इन सभी का कसूर बस इतना था कि बे मेहनत और ईमानदारी से अपने परिवार के साथ जीवनयापन कर रहे थे। अब तक इन  राजनैतिक दलों के दोगले नेताओं ने अपने दल को छोड़ दिल्ली के सभी राजनैतिक दल एक दूसरे  को हिंसा और अराजकता के लिये दोषी ठहरा रहे है। अब आम जनता के सामने विचारणीय प्रश्न ये है जब सभी राजनैतिक दल और उनके नेता पाक-साफ है तो आखिर दोषी कौन है??

मैंने अपने पिछले ब्लॉग "शाहीन बाग का सच" (https://sahgalvk.blogspot.com/2020/01/blog-post_11.html) मे लिखा था की वेशक ये आंदोलन महिलाओं, दादियों, बच्चों द्वारा किया जा रहा प्रत्यक्षतः  शांति प्रदर्शन है पर वस्तुतः  परोक्ष रूप से हिंसक प्रदर्शन ही  है।  कुछ लोगो द्वारा रस्तों को रोक कर उन  लाखों लोगो पर की जा रही उस हिंसा की तरह ही  है जो लाखों मजदूरों, व्यापारियों द्वारा उस रास्ते का इस्तेमाल अपनी रोजी रोटी के लिये या विध्यार्थी अपनी पढ़ाई लिखाई के लिये करते है। इन सीधे साधे महिलाओं, नासमझ बच्चों का इस्तेमाल अशांति और अराजकता फैलाने बालों ने ढाल के रूप मे किया। जब किसी संस्था या व्यक्ति का अस्तित्व ही खतरे मे पड़ जाये तो वह अपने अस्तित्व को बचाने के लिये किसी भी हद तक जाकर इस तरह के कुकृत्य करेगा फिर भले ही  देश मे अराजकता और अशांति की स्थिति उत्पन्न करनी पड़े। काँग्रेस के बड़े नेता मणि शंकर अय्यर, शशि थरूर, चिंदंबरम  जैसे अनेक नेताओं ने इस आंदोलन को आग देने उपद्रव भड़काने  मे कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी।

भाजपा के कपिल मिश्रा, परवेश वर्मा, या अनुराग ठाकुर जैसे लोगो ने भी इस माहौल मे गैर जिम्मेदार भूमिका अदा की जिनसे सरकार का हिस्सा होने के कारण अधिक गंभीर और उत्तरदायित्व भूमिका की ज़िम्मेदारी थी। "देश के गद्दारों......" जैसे नारों ने भड़काने का ही कार्य किया। केंद्र शासन के  एक अहम  मंत्री के नाते श्री अनुराग ठाकुर से इस तरह के टुटपुंजिये व्यवहार की कदापि उम्मीद नहीं थी। कपिल मिश्रा जैसे नेता जो "आप पार्टी" से निकलने के बाद अपनी जड़े क्षेत्र मे मजबूत करने के लिये दुश्मन देश पाकिस्तान को अपने ही देश मे बनाने को हम क्या कहे देश भक्ति या देश द्रोह?    

पिछले दिनों एआईएमआईएम के नेता वरिश पठान ने जो प्रतीत होता  है गणित के प्रखांड विद्वान है। उन्होने 100 करोड़ पर 14 करोड़ का अनुपात का फॉर्मूला पेश किया। इनके दल के अध्यक्ष आसुद्दीन ओवैसी जो अपने भड़काऊ ब्यान  के लिये प्रसिद्ध है जिनके भाषण से प्रभावित एक लड़की ने पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाये। ये दोनों मौत के ही नहीं  लाशों के सौदागर है। ये लाशों का व्यापार करके अनुपात और समानुपात के फॉर्मूला लगा कर लाशों को हिन्दू और मुसलमान की तराजू पर रख कर अपना गणित का आनुपातिक सूत्र पर शोध करते है।  इनकी ही पार्टी के एक अन्य प्रवक्ता जो विषधर नाग से भी ज्यादा  विषैले बोल बोलने बाले अकबरुद्दीन ओवैसी जो 15 मिनिट के लिये "पुलिस हटाने" के पक्षधर इनके अनुनायियों  ने दिल्ली पुलिस के जबाज़ सिपाही श्री रतन लाल को अपनी इसी घिनौनी सोच के तहत हत्या कर  हमेशा के लिये हटा दिया। आईबी अधिकारी अंकित शर्मा और राहुल सोलंकी की दंगाइयों द्वारा हत्या वारीश पठान अपनी तराजू का पलड़ा भारी देख के खुश होंगे क्योंकि ये हिन्दू थे। मुदस्सिर और शाहीद की क्रूर हत्या पर वारीश पठान इन्हे  कौम पर कुर्बान की तराजू पर रखेंगे। पठान और ओवैसी बंधु जैसे लोग मुसलमान तो  है पर सच्चे मुसलमान नहीं है। मुहर्रम पर अपनी सबसे प्यारे को कुर्बान करना एक सच्चे मुसलमान अपना फर्ज मानता है। पठान और ओवैसी जैसे नापाक मुस्लिम  दूसरों के नौनिहालों को इस तरह कुर्बान कर इसमे अपनी खुशी तलाशेंगे और अपने घर परिवारों के बच्चों को अपने घरों की लौह दीवारों  के पीछे   छुपा कर रखेंगे ताकि उन्हे जमाने की कोई खरोंच भी न लगे।  

क्या कभी वारीश पठान या इन के  राजनैतिक दलों के आकाओं ने  दंगों की अकाल भेंट चढ़े दिल्ली पुलिस के श्री रतन लाल, श्री मुदस्सिर, आईबी अफसर अंकित शर्मा, राहुल सोलंकी या श्री शाहीद के परिवार के लोगो की हालात जानने की कोशिश की होगी? दंगों मे हताहत ये सभी किसी माँ के बेटे थे।  उनके कलेजे के टुकड़ों की जघन्य हत्या के दर्द  और आँखों के सूखे आसुओं का दर्द ये जहर उगलने बाले नेता अनुराग ठाकुर, कपिल मिश्रा या ओवैसी  कभी महसूस कर सकेंगे? कभी परवेश वर्मा उस पत्नी का दर्द इस जीवन मे  कभी रत्ती भर भी कम करा सकेंगे जो दंगों की सूली पर टांग दिया गया और  जिसकी पत्नी ने  अपने पति के साथ सुख-दुःख मे जीने मरने की कसमें खाई होंगी। आसुद्दीन ओवैसी जैसे पाशविक सोच के लोग  उस बच्चे के संताप को दूर कर सकेंगे जो बच्चे अपने पिता की बाहों मे जैसा सुरक्षित महसूस करता था। लेकिन यहाँ लिखना या कहना इन राजनैतिक दलों के दैत्यों से कहना व्यर्थ होगा क्योंकि रिश्तों की अहमियत का अंदाजा सिर्फ और सिर्फ  दुनियाँ के जीवित प्राणियों मे एक मात्र आदमियों मे  होता है पशुओं मे नहीं।   
         
विजय सहगल



रविवार, 23 फ़रवरी 2020

आत्मघाती कदम


"आत्मघाती  कदम"




कई बार हम बगैर सोचे समझे अपनी सीमा लांघ कर एक अजीब स्थिति उत्पन्न कर देते है जो हमे बड़ी उलझन मे डाल सकता है। कुछ ऐसी ही स्थिति से हमे एक शाखा मे दो-चार होना पड़ा। प्रबन्धक पद पर आसीन रहते हुए मैंने लगातार काफी प्रयास के बाद  हमारी शाखा मे "मोटर न्यायालय दुर्घटना अभिकरण" का अति महत्वपूर्ण खाता खोला था। इसी संबंध मे प्रायः न्यायालय के सम्मानीय न्यायधीशों  एवं अन्य कार्यालीन स्टाफ से मिलना जुलना होता रहता था। सारे स्टाफ के वेतन का वितरण भी हमारे शाखा से होने के कारण न्यायालय के सभी स्तर और वर्ग के स्टाफ से भी हमारे बैंक स्टाफ का परस्पर मिलना जुलना होता रहता था। हमने पहली बार महसूस किया था न्यायिक कार्यों के कारण प्रायः न्यायधीशों का सामाजिक दायरा काफी सीमित रहता है उनमे से हम एक  बैंक मे सेवारत स्टाफ सौभाग्यशाली थे जिसको माननीय लोग बड़ा सम्मान करते थे। इसी कारण महीनों मे यदा कदा ही वे शाखाओं मे आते थे अन्यथा प्रायः उनके स्टाफ के लोग ही उनके  खाते  का  भुगतान चैक आदि के माध्यम से लेने  के लिये आते थे। हमारा भी न्यायालय मे एमएसीटी खातों के संबंध मे आना जाना होता रहता था जिसके कारण न्यायालय का सभी स्टाफ मेरे सहित अन्य स्टाफ का बड़ा सम्मान करता था। न्यायालय और कलेक्ट्रेट के अधिकारियों और कर्मचारियों से मिले इस सम्मान को  मै हमेशा वेतन के अतरिक्त बैंक की नौकरी के कारण मिल रहा बोनस मानता था बरना माननीय न्यायधीशों या कलेक्टर सहित एडीएम, एसडीएम सहित अन्य अधिकारियों की सामाजिक प्रतिष्ठा के सामने हम बैंक कर्मी कहीं दूर दूर तक नहीं टिकते। जब कभी जिला न्यायधीश और  अन्य माननीय जज या जिला कलेक्टर हमे गणतन्त्र दिवस या स्वतन्त्रता दिवस पर अपने समकक्ष बैठा जो इज्ज़त बख्शते उसकी कल्पना तो हम जीवन मे  कर ही नहीं सकते थे, मेरा ऐसा मानना था ये सिर्फ बैंक की नौकरी के कारण ही संभव था  बरना मै प्रायः ऐसे मौकों पर मन ही मन उस मुहाबरे को याद करता रहा "कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली"।

पर एक दिन हमारे शाखा के एक स्टाफ के बेबकूफी पूर्ण कृत्य के कारण बहुत बड़ी मुसीबत मे फंस गया। एक दिन प्रातः 11 बजे लगभग न्यायालय का चपरासी हमारी शाखा मे मेरी कैबिन मे आया और कहा कि जज साहब ने हमे अभी याद किया है। प्रायः इस तरह के बुलावे बैंक के कार्य के लिये आते थे ये ही सोच मै बड़े ही सहज ढंग से उनके कार्यालय मे उनसे मिलने गया। वे न्यायपीठ पर अपने कार्यों का निष्पादन कर रहे  थे। मेरे पहुँचने पर स्टाफ ने मुझे उनके निजी कक्ष मे बैठने को कहा। जब माननीय जज साहब न्यायपीठ से  कक्ष मे आये तो सामान्य शिष्टाचार अभिवादन के बाद मैंने उनसे बुलाने का मंतव्य जानना चाहा तो उन्होने एक विजिटिंग कार्ड देते हुए मुझसे पूंछा ये कौन शख़्स  आपकी शाखा मे है? मैंने कार्ड देख कहा जी हाँ ये हमारी शाखा का स्टाफ है। जज साहब के चेहरे के भाव पढ़ मुझे लगा मामला कुछ गड़बड़ है। मैंने हल्की आवाज मे निवेदन की मुद्रा मे प्रश्न किया सर क्या  बात है? सब कुशल तो है? तभी जज साहब ने बताया ये श्रीमान ने मुझसे मिलने के लिये अपना विजिटिंग कार्ड मेरे  पास भेजा। उनके नाम से तो वे परिचित नहीं थे पर कार्ड पर बैंक और शाखा का नाम होने के कारण जज साहब ने उन्हे अपने कक्ष मे बुला लिया। वे बोले आपका ये स्टाफ मेम्बर  हमारे पास आये थे अपने बेटे के एक मित्र के विरुद्ध दहेज प्रकरण के  केश मे जमानत करवाने के बारे मे बात करने जो कि मेरे न्यायालय मे लंबित है। सुनकर मेरे को "काटो तो खून नहीं" जैसी स्थिति थी कि फकत बैंक मे कार्यरत एक व्यक्ति सीधे जज साहब से किसी प्रकरण मे जमानत कराने हेतु  इतना दुस्साहस कैसे  कर सकता  है?? मै हैरान था और उनसे बोला  इस अदने से मूर्ख स्टाफ ने कैसे एक जज से ये कहने की  इतनी गुस्ताखी की? इसको कोर्ट की ताकत का अंदाज नहीं? बड़े से बड़े कलेकटर और अधिकारी की भी ये हिम्मत नहीं होती कि इस तरह जज से कोई बात करे? आगे जज साहब ने जो कहा उस को सुनकर मुझे मामले की गंभीरता का और  अहसास हुआ कि मामला कितना नाजुक और कष्टप्रद हो सकता था। उन्होने कहा कि मैंने आपके बैंक की   बजह से  उनको छोड़ दिया अन्यथा गिरफ्तार करा  जेल भेज देता!!  जज साहब ने  तुरंत ही उस स्टाफ को खड़े होकर कोर्ट चैंबर से बाहर जाने को कह मुझ को  बुला  भेजा ताकि उस स्टाफ की धृष्टता से  मुझको  अवगत करा सकूँ। मैंने हाथ जोड़कर उनसे स्टाफ की मूढ़ता  के लिये माफी मांगी। और उसकी बेअक्ली के लिये अनेकों बार अफ़सोस जाहिर किया। ये जज साहब की  विशाल हृदयता थी कि स्टाफ की बेअदबी और गलती को बैंक से जुड़ाव के कारण माफ कर दिया अन्यथा एक पीढ़ादायी अप्रिय  अनहोनी घटना  हो सकती थी। मैंने उन्हे इस "दया" के लिये अनेकों धन्यवाद दिया।

मन ही मन सोचता हुआ शाखा मे बापस आया कि कैसे एक कम बुद्धिमान भी  कदापि  ही न्यायालय  के गरिमा पूर्ण प्रतिष्ठित पद पर बैठे व्यक्ति को  हल्के मे लेने की मूर्खता कर सकता है?

विजय सहगल                       

बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

टीम ऑफ होशियारपुर



"टीम ऑफ होशियारपुर"






संस्थायें जीवंत आत्मा के समान होती है जिनमे कार्यरत व्यक्ति के कार्यकलापों या कार्यव्यव्हार  से संस्थाओं के नाम मे यश या अपयश अनायास जुड़ जाता है। ऐसा ही कुछ अहसास आज हमे हुआ जब शाखा होशियार पुर, नोएडा  के शाखा प्रबन्धक श्री सौरव ने ओबीसी के 78वे स्थापना दिवस पर आने का आमंत्रण हेतु फोन किया। हमे देख कर सुखद आश्चर्य हुआ श्री सौरव ने उनकी शाखा मे प्रायः आने बाले सभी सेवानिव्रत साथियों को इस अवसर पर आमंत्रित किया था। कितना अंतर हो जाता है किसी एक शाखा के अलग अलग  प्रबन्धक के कार्यव्यभार से।  तय समय से पूर्व मेरे सहित  सेवानिवृत्त वरिष्ठ साथी श्री आरबी जैन, श्री नरेंद्र मोहन, श्री जीआर  मित्तल, श्री एसके  बंसल, श्री अरुण कोहली शाखा परिसर मे पधारे जिनका श्री सौरव जी ने स्वागत किया। तत्पश्चात बैंक के 78वे स्थापना दिवस पर होशियारपुर शाखा के समस्त स्टाफ ने केक काट कर अपनी खुशियों का इज़हार किया। सभी सदस्यों ने एक दूसरे को बैंक के स्थापना दिवस की बधाई दी।  उपस्थित सभी लोगो ने केक एवं  चाय का पान किया। कार्यक्रम पश्चात सभी उपस्थित लोगो को शाखा की तरफ से  मिष्ठान का वितरण किया गया। शाखा  के सभी स्टाफ ने कार्यक्रम मे आये सेवानिवृत्त स्टाफ एवं अन्य आंगन्तुकों का धन्यवाद ज्ञापित किया।
आज सौरव जैसे नौजवानों के नेतृत्व बैंक की बागडोर देख कर खुशी होती है। पिछले लगभग दो साल मे "गैंग ऑफ होशियारपुर" से "टीम ऑफ होशियारपुर" का यह सुखद बदलाव देख कर हार्दिक प्रसन्नता हुई। (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/10/blog-post_21.html ) (ctrl+click to follow link)
Thank you Team Hoshiyarpur

विजय सहगल  
    

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

ओखला पक्षी अभ्यारण


"ओखला पक्षी अभ्यारण"














आज आप जब नोएडा या दिल्ली मे  अपने मिलने बाले मित्र, पड़ौसी, या रिश्तेदार से बात करे तो उनसे अवश्य पूंछना कि आपने ओखला पक्षी विहार देखा है तो हम दावे के साथ कह सकते है कि इस शहर के नब्बे प्रतिशत रहवासियों ने ओखला पक्षी विहार नहीं देखा होगा। अभी तक मै भी इसी श्रेणी मे था पर आज 16 फरवरी  2020 से मै इस श्रेणी से बाहर हो गया। अब मै दावे के साथ कह सकता हूँ "जी हाँ मैंने ओखला पक्षी विहार देखा है।" प्रायः ऐसा होता है हम दुनियाँ मे एक से बढ़ कर एक पर्यटन स्थल या धार्मिक स्थल देख लेते है पर अपने शहर मे या आसपास के प्रसिद्ध स्थलों को देखने मे अक्सर वंचित रह जाते है।

मै जबसे मै नोएडा आया कई बार ओखला पक्षी विहार जाने का कार्यक्रम बनाया पर किसी न किसी बजह से पक्षी विहार देखने से वंचित रहा। पर आज अचानक सुबह मैंने पक्षी विहार जाने का निश्चय कर लिया क्योंकि पिछले दिनों हमने अपना स्कूल खो दिया था  इस लिये इस दोपहर को ओखला पक्षी अभ्यारण चल दिया। पक्षी विहार हमारे नोएडा स्थित घर से बमुश्किल 4-5 किमी होगा। पिछले 65-66 दिनों से  अपृहृत इस सड़क पर  बैसे भी आजकल  बहुत ज्यादा ट्रैफिक नहीं था। मै लगभग प्रातः 11 बजे ओखला पक्षी विहार पहुँच गया। बैसे पक्षी विहार मौसम के हिसाब से प्रातः 7.30 से 8.00 बजे खुल जाता है। गहमा गहमी से दूर राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र स्थित इस पक्षी विहार मे नितांत शांति, कोलाहल रहित प्रकृतिक जंगल से परिपूर्ण यमुना नदी के किनारे बने खादरों मे बारहमास बहते पानी से परिपूर्ण जल मे लगभग 300 से अधिक प्रकार के नभ चरों का आश्रय स्थल देखने का एक अलग ही सुख है। 30 रूपये के साधारण प्रवेश शुल्क देकर आप शाम 5.00 बजे तक प्रवेश कर सकते है। कालिंदी कुंज मार्ग के गेट संख्या 1 से मैंने इस पक्षी विहार मे प्रवेश किया जो पिंक लाइन मेट्रो स्टेशन से नजदीक है पर बेहतर होगा यदि आप अपने वाहन से जा रहे है तो आप मयूर विहार रोड पर स्थित गेट संख्या 2 से प्रवेश करे जहां सभी तरह के वाहन पार्किंग की निशुल्क व अच्छी  व्यवस्था है। गेट संख्या 1 से गेट संख्या 2 के बीच बना पक्षी विहार लगभग 2 किमी लंबी सड़क के दोनों ओर आच्छादित पेड़ो से ढकी सड़क पर फैला है। सड़क के एक ओर पेड़ों के किनारे किनारे यमुना नदी के जल से परिपूर्ण जलराशि, वेराज के किनारे बड़ा मनमोहक और प्रकृतिक द्रश्य प्रदर्शित करती है, जहां पर देशी और प्रवासी पक्षियों का सुखद  कलरव मन को मोह लेता है। प्रवेश द्वार के निकट नाव की आकृति मे नदी के किनारे बने बैठने का स्थान बड़ा ही आकर्षण का केंद्र था जिस पर बैठ कर नदी मे विचरते पक्षियों को देखना बड़ा सुकून देने बाला था। नदी के किनारे जगह जगह विश्राम के लिए लोहे और सीमेंट की बेंच पर बैठ कर नदी के जलचरों को निहारना अच्छा लग रहा था। कुछ दूर तक सड़क से हट के कच्चे रास्ते पर पैदल ट्रैकिंग करना जंगल ट्रैकिंग की याद  करा रहा था। एक जगह कच्ची सड़क पर गिरा पेड़ जंगल सफारी का अहसास करा रहा था। वन विभाग द्वारा नदी के बीच-बीच मे पक्षियों को जल क्रीडा से विश्राम देने के लिये बांस-बल्ली के सहारे मंच बनाये गये थे जिन पर पक्षी पंख फैला कर आराम कर रहे थे। 

दूर दूर तक यमुना नदी मे विभिन्न प्रकार के जलचर पानी मे अठखेलियाँ करते नज़र आ रहे थे। कुछ सफ़ेद हंस से दिखने बाले बड़े एगरेट, सफ़ेद, सुनहरे, काले बतख़ सैकड़ो की संख्या मे जल क्रीड़ा करते नज़र आये। जगह जगह पक्षियों का नाम लिखे पेंटिंग के बोर्ड पर्यटकों का मार्ग दर्शन कर रहे थे। तमाम पक्षी प्रेमी बड़े बड़े कैमरे लेकर पक्षियों के फोटो निकालने मे मशगूल थे। लगभग 2.00-2.50 किमी के बाद गेट संख्या 2 था। इस गेट से भी लगभग 1.00-1.50 किमी और आगे कच्चे रास्ते पर पक्षियों को निहारने के लिये वॉच टावर संख्या 1 व 2 पर जाने का रास्ता था। लकड़ी के टुकड़ों से एक सुंदर सा पुल बना कर वॉच टावर तक जाने के लिये सुंदर सा पुल बनाया गया था जिस पर होकर आप प्रकृतिक लंबी लंबी घनी  घास के सूखे पत्तों से बनी  पगडंडी से होकर आगे रास्ते पर बढ़ सकते है। दल दल से बनी इन जंगली घास के बीच इन पक्षियों के घोसलों को आप इनके प्रकृतिक आवास को मे देख सकते है। इस निपट सुनसान और शांत जगह से होकर हम वॉच टावर 2 पर पहुंचे। लोहे लकड़ी कि सहायता से बने लगभग 30-40 फुट ऊंची टावर पर चढ़ कर पक्षी अभ्यारण का नज़ारा  देखने बाला था। दूर दूर तक जल के बीच बने इन टापू नुमा धरातल पर पक्षी जल क्रीड़ा कर कुछ देर धूप मे विश्राम करते नज़र आए। टावर पर कुछ समय व्यतीत कर उन्ही रस्तों से बापस गेट नंबर 2 पर बापस आये। अबतक लगभग 5 किमी की यात्रा पैदल पैदल हो चुकी थी। पुनः पैदल चल कर 1 नंबर गेट तक चलने की हिम्मत जबाब दे चुकी थी अतः वहाँ उपलब्ध ई-रिक्शा सेवा  का लाभ उठाया।  कुछ इंतज़ार के बाद ई-रिक्शा की सहायता से हम पुनः गेट संख्या 1 पर 30/- रूपये किराया देकर बापस आये। और इस तरह एक लंबे समय से लंबित यात्रा का सुखद और यादगार यात्रा का समापन किया।

अतः सभी एनसीआर विशेषतः नोएडा के निवासियों से अनुरोध है एक बार इस पक्षी विहार मे परिवार और मित्रों के साथ यहाँ अवश्य  जाये साथ मे कुछ हल्का खाना एवं पानी ले जाना न भूले क्योंकि अंदर कुछ भी उपलब्ध नहीं है। और हाँ आपका कोई रिश्तेदार, मित्र या पड़ौसी फोन पर कभी पूंछे कि आप ओखला पक्षी अभ्यारण गये है? तो गर्व के साथ चौड़ा सीना कर उन्हे अवश्य बताये कि हम ओखला पक्षी विहार गये है।

विजय सहगल             

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

लॉस्ट स्कूल


"लॉस्ट स्कूल"



आज 13 फरवरी 2020 को ग्वालियर से छः दिन बाद नोएडा स्थित  बच्चों के स्कूल जाने के लिये जल्दी नाश्ता कर बैग और स्कूल के चार्ट लेकर मै जब कक्षा स्थल पर पहुंचा तो एक बारगी लगा मै कोई गलत जगह आ गया हूँ। लेकिन लगभग एक साल से आ रहे इस जगह को कैसे भूल सकता हूँ!! पर कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर थी। हमारी क्लास के निशान तो थे पर मजदूरों की झुग्गी बस्ती कहीं भी नज़र नहीं आ रही थी। जब बस्ती नहीं थी तो बस्ती के वाशिंदे  भी कहीं नज़र नहीं आये, और नज़र न आये राकेश, धर्मेन्द्र, तेजपाल और न ही नज़र आई नन्ही नीतू, परवीन, खुशी  या निशा  जो हमारे क्लास के विध्यार्थी थे। हमारा सारा उत्साह गायब था। पेड़ के नीचे खड़े हो एक टक मै उजड़ी बस्ती और वीरान कक्षा को देखता रहा। चारों तरफ नज़र दौड़ाई सिर्फ और सिर्फ उजड़ी बस्ती से निकले टीन शेड के ढेर नज़र आये। मेरी आँखों मे रह रह  कर लखनऊ मे देखी साठ के दशक की  प्रसिद्ध फिल्म "कागज के फूल" का वो सीन याद आ  रहा था जब तब के मशहूर कलाकार गुरुदत्त पर "देखी जमाने की यारी, बिछुड़े सब बारी बारी" गाने का द्रश्य का फिल्माया गया था। मै हतप्रभ हो किनारे पर खड़ा एक टक उजड़े मैदान को देख कर स्कूल की यादों मे खोया था तभी सामने बन रही सोसाइटी का गार्ड जो मेरे आते ही पिछले एक साल से  कुर्सी लेकर आता था आज नमस्ते कर बोला "सारी बस्ती खाली हो गया", "सारे बच्चे यहाँ से चला गया", "सभी मजदूर कंपनी के सैक्टर 115 सूरखा गाँव मे चला गया"। जब मैंने पूंछा कब गये? 3-4 दिन हुआ। बोला नोएडा अथॉरिटी ने सारी जगह खाली करा लिया। अब यहाँ मार्केट बनेगा। एक साल पूर्व क्लास शुरू करने पर जिस का अंदेशा था वही हुआ "विकास हमेशा गरीब और गरीबी  की बुनियाद के उपर ही होता है", पर इस तरह इतनी जल्दी बस्ती उजड़ेगी ऐसा आभास न था। सोसाइटी का काम पूरा होने के बाद ऐसा होगा इस का तो हमे मालूम था पर अचानक स्कूल के बच्चों से जुदा होंगे इसका अंदेशा नहीं था। बिछुड़ना था ये तो सच  था पर बगैर सुखद भविष्य की कामना बच्चों को दिये वे अचानक गायब हो जाएंगे ऐसा सोचा न था। पर मै भी कहाँ हार मानने बाला था। "एकला चलो रे" के सिद्धांत पर  गार्ड से पते की विस्तृत जानकारी ले कर अंततः मै खोये स्कूल और उसकी कक्षा के छात्रों की खोज मे निकल पड़ा। लोगो से पूंछते पांछते लिंक रोड से होकर मै जैसे तैसे सूरखा गाँव पहुंचा। पूरे रास्ते कंक्रीट के जंगलों मे  ऊंची-ऊंची  गगनचुंबी निर्माणाधीन इमारतों के बीच झुग्गी बस्ती की तलाश मे उन बच्चों को खोजने के लिये जो हमारे स्कूल और हमारे कक्षा या यूं कहे हमारे जीवन के एक हिस्सा थे। एक जगह टीन शेड से घिरे मैदान को देख खुशी  से ऐसा लगा शायद हमे हमारी मंजिल मिल गई पर निराशा हाथ लगी वह मैदान पूरी तरह खाली था। फिर एक बंदे से पता करने पर उसने आगे का रास्ता सुझाया। आगे बढ़ा तो पर उन  बहुमंजिला इमारतों के जंगल मे कार को एक जगह रख कर पैदल पैदल आगे बढ़ना श्रेयस्कर लगा  क्योंकि ऊबड़ खाबड़ रास्ते और नाले कार के रास्ते मे अवरोध बन रहे थे। गली दर गली, प्लाटों के बीच बहती नाली और उढ़ती धूल के साथ लगभग आधा घंटे की पैदल यात्रा भी निरर्थक साबित हुई।  दो चार जगह पूंछ-तांछ करने पर किसी ने गाँव सूरखा मे  टावर के पास स्थित एक मैदान मे बनी नई झुग्गी बस्ती का रास्ता दिखलाया। थकावट अब चेहरे पर साफ दीख रही थी। निराशा के बीच आखरी प्रयास को मान मैंने कार को सूरखा गाँव के अंदर बढा  दिया। पतली लेकिन पक्की गली मे एक दुकान के पास मैंने कार को रोक पिछले चार-छः दिन मे बसी झुग्गी झोपड़ी के बारे मे पूंछा तो दुकानदार ने  गाँव मे और अंदर जाने का संकेत दिया। कार को अंदर  ले जाने के मेरे संकोंच को उन महाशय ने दूर करते कार ले जाने मे किसी भी परेशानी न होने की तरफ इशारा किया। जैसे तैसे अंदर गाँव मे गाड़ी को एक घर के सामने पार्क कर और पूंछा पांछी की तो किसी सज्जन ने गाँव के सरकारी स्कूल के पहले गली मे बनी झुग्गी बस्ती का हवाला दिया। पैदल पैदल गलियों मे जाकर झुग्गी बस्ती तो मिली पर वहाँ पर बो बच्चे या उनके माता पिता न मिले जो हमारे स्कूल के सदस्य थे। एक बार मैंने, जैसे अपने खोये चश्मे को भोपाल शताब्दी ट्रेन से अथक प्रयास के बाद पा लिया था (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/09/blog-post_30.html) बैसे ही बच्चों की खोज के  इस  काम को मै बड़ा आसान  समझ शुरू किया था पर दो घंटे यहाँ वहाँ भटकने के बाद भी शून्य परिणाम देख काफी दुःख, हताशा  और निराशा ने  मन को हीन  भावना से ग्रसित कर दिया।

बैसे तो मैंने बहुत कम उपन्यास या स्टोरी पड़ी है पर कॉलेज के जमाने मे श्री मुल्क राज आनंद की "लॉस्ट चाइल्ड" कहानी आज  रह रह कर याद आई, बस फर्क सिर्फ इतना था उनकी कहानी मे बच्चा सारी दुनियाँ के सुख छोड़ सिर्फ और सिर्फ अपने माता पिता को  ढूँढना चाहता था और यहाँ आज  मै उसी बच्चे की तरह  अपने खोये स्कूल को ढूँढना चाह  रहा था।

मै कह नहीं सकता उन बच्चों से फिर कभी मुलाक़ात हो या  न हो पर ईश्वर से ये  प्रार्थना   अवश्य करूंगा कि अनजान राहों पर मिले उन बच्चों की  हर ईक्षा को पूर्ण करना और उन सभी के भविष्य को सुखद और उज्ज्वल बनाना।

विजय सहगल               


सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

जन्मभूमि डॉ॰ भीमराव अंबेडकर-महू (म॰प्र॰)


"जन्मभूमि डॉ॰ भीमराव अंबेडकर-महू (म॰प्र॰)"









29 दिसम्बर 2019  को शाम लगभग 4 बजे हम अब माहेश्वर से  महू आ चुके थे। एक रास्ता महू शहर होकर जा रहा था जबकि दूसरा बाइपास होकर महू शहर के बाहर से होकर  इंदौर रोड को जोड़ रहा था। मैंने अपने स्वार्थ वश  बाई पास का रास्ता अपनाया  क्योंकि ये रास्ता डॉ॰ भीम राव अंबेडकर की जन्म भूमि से होकर निकल रहा था। मेरी हार्दिक ईक्षा भी थी कि मै देश की उस महान विभूति की जन्मस्थान से ही होकर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर वहाँ से  निकलूँ  जिनके बारे मे मैंने कॉलेज जीवन मे युग निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित लघु पुस्तिका मे पढ़ा था। उन दिनों मे लक्ष्मी व्यायाम शाला जाया करता था जहां पर एक भाई साहब जिनका नाम मै भूल रहा हूँ शायद जगत भाई साहब था, जो उन दिनों वर्क शॉप  रेल्वे मे सेवारत थे और  जो व्यायाम का प्रशिक्षण देने के साथ  युग निर्माण योजना, मथुरा  का झोला पुस्तकालय भी चलाते थे। उनके पास  भारत के महा पुरुषों की अनेकों लघु पुस्तिकायेँ भी हुआ करती थी जो हम जैसे अन्य प्रशिक्षार्थियों को निशुल्क पढ़ने को दिया करते थे। उस पुस्तिका मे डॉ॰ अंबेडकर के जीवन संघर्ष के बारे मे पढ़ा था किस तरह उन्होने बचपन मे छुआ-छूट ऊंच-नीच के दंश को झेल  शिक्षा,  और सामाजिक कार्यक्रमों मे जाति- पाँति के  होने बाले भेदभाव का सामना और संघर्ष करते हुए शिक्षा ग्रहण कर एक अनुपम, अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। ऐसी कठिनाइयों भरे जीवन संघर्ष पर शिक्षा रूपी अस्त्र-शस्त्रों के साथ विजयी पाकर सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने के उदाहरण बिरले ही देखने को मिलते है।  बचपन  मे पढ़ी उस पुस्तक मे डॉ॰ अंबेडकर की जीवन संघर्ष यात्रा से मै काफी प्रभावित था।  ऐसे महा पुरुष की जन्म भूमि पर मै लगभग डेढ़  घंटे रहा। दो मंज़िला सफ़ेद संगमरमर से बनी गोलाकार इमारत मे प्रवेश द्वार पर ही  डॉ॰ अंबेडकर कि आदम कद प्रतिमा बनी थी। जिसके दोनों ओर सीढ़ियों से ऊपरी मंजिल पर जाने आने का रास्ता था। बगल से ही निचली मंजिल मे जाने का रास्ता था। निचली मंजिल के भव्य विशाल हाल मे डॉ॰ अंबेडकर की कुर्सी पर बैठी प्रतिमा के अगल बगल उनके माता-पिता के चित्र और उनकी पत्नी की  मूर्ति थी बगल मे ही देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान  "भारत रत्न" की प्रतिकृति लगी हुई थी। हाल के केंद्र मे एक लकड़ी का माडल रखा था जो  उनकी पुण्य भूमि की इमारत का था जिसे चैत्य भूमि के नाम से जानते है। उपर की मंजिल मे भगवान बुद्ध की प्रतिमा के साथ बौद्ध गुरु और डॉ॰ अंबेडकर की प्रतिमा थी।  आकृतियों के साथ उनके पुराने राजनैतिक जीवन, बचपन और युवा अवस्था एवं उनके मित्र, परिवार के सदस्यों के  पुराने चित्र प्रस्तुत किये गये थे। पूरे परिसर का रख-रखाब बहुत ही साफ सुथरे ढंग से किया गया था। परिसर के भ्रमण के बाद मै ऊपरी मंजिल पर जाने बाली सीढ़ियों पर लगभग एक घंटे बैठा रहा जहां पर काफी संख्या मे लोग दर्शन हेतु आ, जा रहे थे।  
  
अब हमने प्रस्थान करने के पूर्व लघु शंका से निवृत्त होकर चलने की सोची। शौचालय, जो कि  परिसर के पिछले भाग मे था।  शौचालय की दशा देख कर मैंने प्रवेश द्वार पर लगे बैनर से श्री मोहन राव वाकोड़े, व्यवस्थापक जी के मोबाइल नंबर पर फोन लगाया। बैसे  शायद मै फोन न लगाता पर बाहर लगे सूचना पट जिसमे लिखा था "बाहर से आने बाले श्रद्धालू असुविधा होने पर संपर्क करें" अतः मैंने श्री वाकोड़े जी को फोन लगाया। मैंने उन्हे जन्मभूमि परिसर की सुंदर और साफ रखरखाब हेतु साधुवाद दिया पर  उनका ध्यान शौचालय की दुर्दशा की ओर आकर्षित किया। उन्होने असुविधा हेतु खेद प्रकट किया और कुछ व्यवस्था संबंधी खामियों का उल्लेख किया। समस्या के ध्यानाकर्षण हेतु भी मेरा शुक्रिया कहा। फिर हमारी उनसे 15-20 मिनिट यूं ही चर्चा होती रही उन्होने व्यक्तिगत तौर पर मिलने की ईक्षा भी बताई पर  न आ सकने पर खेद प्रकट किया और कभी नोएडा आने पर मुलाक़ात का आश्वासन दिया। श्री मोहन राव जी से बातचीत कर अच्छा लगा।
इस तरह हम डॉ॰ अंबेडकर जी की जन्मभूमि के दर्शन कर इंदौर के लिये प्रस्थान कर गये। जो हमारे लिये एक अविस्मरणीय यात्रा थी।     

विजय सहगल        



शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

नगदी रहित बीमा यात्रा


"नगदी रहित बीमा यात्रा"





पिछले  कुछ समय से  कुछ तकलीफ थी सोचा क्यों न डॉक्टर को दिखा कर सलाह ले ली जाये। बैसे न भी दिखाने जाता तो भी चल जाता क्योंकि ऐसी कोई भारी तकलीफ नहीं थी जिसकी बजह से दिनचर्या मे कोई समस्या हो पर सेवानिवृत जीवन के पश्चात बीमा लिया ही था  तो सोचा क्यों ने इस का लाभ ले बीमा को परीक्षा की कसौटी पर कस लिया जाये, ऐसा सोच कर मैंने अपोलो हॉस्पिटल की राह पकड़ी। प्रातः 11.00 "शाहीन बाग का सच" जानने के  लगभग 3.00 घंटे बाद  अपोलो हॉस्पिटल चिकित्सकीय सलाह हेतु डॉक्टर के पास पहुंचा। दिल्ली मे नौकरी मे रहते तीन साल से लगातार वार्षिक चिकित्सा सुविधा का लाभ लेते हुए अपोलो जाने का अभ्यस्त तो था ही तो सीधा डॉक्टर के पास हाजिर हो गया। डॉक्टर ने जांच के बाद उम्र के साथ होने बाली परेशानी का जिक्र कर ऑपरेशन की सलाह दे डाली। यध्यपी "ऑपरेशन" भारतीय सांस्कृति मे एक अपने आप मे बड़ा ही गंभीर शब्द है जिसे मै बहुत ही साधारण तरीके से लेता हूँ और मानता हूँ कि ये भी एक तरह अन्य समस्याओं की तरह एक समस्या है जिसका निदान सिर्फ चिकित्सक ही कर सकता है तो अपने आराध्य को याद कर क्यों न अपने आपको  चिकित्सक के हवाले कर निश्चिंत हुआ जाये।  लेकिन ऑपरेशन की चर्चा परिवार को बगैर बताये तो संभव नहीं थी। अचानक इस मुद्दे पर इस चर्चा से घर का माहौल कुछ भय मिश्रित  तनाव मे  होना स्वाभिक था पर डॉक्टर से हुई चर्चा के बारे मे बमुश्किल सबको समझा सका कि ये एक मामूली ऑपरेशन है चिंता जैसी कोई बात नहीं। परिवार जनों की भिन्न भिन्न राय जैसे कि क्यों न  दूसरे डॉक्टर की सलाह ले? कब से तकलीफ थी? पहले क्यों नहीं दिखाया? आदि ऐसे सबाल जो स्वाभाविक थे ने मेरे द्रढ़ निश्चय को हिलाने का स्थिति उत्पन्न कर दी पर जब समस्या का निदान देश के एक प्रसिद्ध हॉस्पिटल के प्रिसिद्ध डॉक्टर श्री सुशील जैन  को करना है तो इस मुद्दे पर घर मे अनावश्यक इतना विचार विमर्श क्यों? एक बारगी लगा कोई ऐसा स्थान या परिस्थिति होती कि घर मे बगैर किसी को बताये इलाज़ करा बापस आ जाता, पर क्या ऐसा करना संभव हो पाता? हमे याद है एक बार लखनऊ मे मेरे बायें हाथ की अंगुली   के फैक्चर को हज़रत गंज, लखनऊ  स्थित जिला  हॉस्पिटल मे दिखाने गया था जहां पर हमारे एक रिश्तेदार डॉक्टर थे तुरंत ही एक्सरे कर उन्होने प्लास्टर चढ़ाने का निर्णय लिया और शीघ्र ही साथी डॉक्टर से मिल कर प्लास्टर की तैयारी के तहत बगैर वेहोश किये ही हड्डी सेट कर प्लास्टर चढ़ा  डाला। बाप रे बाप ऐसा  दर्द और ऐसी वेदना मैंने ज़िंदगी मे कभी महसूस नहीं की थी जिससे होकर उस दिन मै गुजरा था। वस  प्राण ही नहीं निकले थे उस दिन। जब कभी उस दिन को सोचता हूँ तो डर के मारे रोंगटे खड़े हो जाते। लगभग 2 घंटे तक मै हॉस्पिटल की कुर्सी पर ही निढाल, वदहाल पड़ा दर्द को सामान्य होने का इंतज़ार करता रहा। हमे याद है उस दिन भी घर पर भाई साहब-भाभी को बगैर बताये बैंक से सीधे हॉस्पिटल पहुँच गया था।

आज जब डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह लिखते पर्चा बना दिया तो हमने भी सोचा लगे हाथ नगदी रहित बीमा स्कीम के अंतर्गत टीपीए से जानकारी ले कर उसको नगदी रहित  स्वीकृति  प्राप्त कर ली जाये। जब हॉस्पिटल स्थिति टीपीए कार्यालय से संपर्क किया तो उन्होने एक फ़ॉर्म भर कर बापस करने को कहा। फ़ॉर्म का एक भाग डॉक्टर से भरबा  कर तथा दूसरा खुद भरकर नियमानुसार अनुमानित खर्च बनवाने हेतु हम संबन्धित विभाग मे पहुंचे तो उन्होने भी बमुश्किल 5 मिनिट मे अनुमानित खर्च बना हमे दे दिया। तब लगे हाथ हमने ऑपरेशन की तारीख़ स्वयं निश्चित कर प्रिक्रिया को टीपीए के पास प्रस्तुत किया। अब समस्या थी कि इन्श्योरेंस से संबन्धित कोई आईडी या पॉलिसी संख्या आदि उस समय वहाँ हमारे पास  नहीं थी। लेकिन टीपीए सहायता डेस्क ने बड़ी तत्परता से केवल  बैंक का नाम और पीएफ़ नंबर पूंछ कर सारी डिटेल उपलब्ध करा दी। आधार की प्रति लेकर  एवं अन्य छोटी-मोटी पूंछ-तांछ कर फ़ॉर्म को स्वीकार कर लिया और स्वीकृति एसएमएस के जरिये 1-2 घंटे मे जारी करने  का आश्वासन दिया। अगले दिन रविवार होने के कारण टीपीए के  कुछ प्रश्नों के जबाब हॉस्पिटल से विलंब के कारण नगदी रहित स्वीकृति मिलने मे कुछ देर हुई। सोमवार को एक नई तरह की समस्या आन पड़ी टीपीए से जो स्वीकृति मिली बो मात्र चालीस हजार के लिए थी जबकि अस्पताल ने अनुमानित बिल 1.05 लाख का दिया था। अब हमे शंका हुई कि 1.05 के विरुद्ध 0.40 की स्वीकृति मे कही ऐसा तो नहीं कि अंतर की राशि 0.65 लाख हमे अपनी जेब से वहन करना पड़े। इस शंका के समाधान हेतु हमने अस्पताल, ओबीसी मेडिकल समाधान व्हाट्सप्प मे  श्री आर के भसीन, श्री विनय मल्होत्रा एवं सेफवे टीपीए से इस संबंध मे पूंछ तांछ की सभी ने यही बताया टीपीए स्वीकृति अनुमानित बिल के 40-50 प्रतिशत ही स्वीकृत  करता है फ़ाइनल बिल के समय शेष राशि का भुगतान कंपनी सीधे हॉस्पिटल को करेगी।

उक्त स्पष्टीकरण के बाद हमने दिनांक 15 को हॉस्पिटल मे दाखिल होकर ऑपरेशन कराया दो दिन के अस्पताल मे दाखिले के बाद 17 जनवरी को हॉस्पिटल मे सफल ऑपरेशन के बाद मुक्त करने का निर्णय लिया।  नगदी रहित भुगतान प्रिक्रिया  पूरी करने मे कुछ अधिक समय लग रहा था श्री आरके भसीन जी की सलाह पर हमने मेडम एंजिलिना को फोन कर साहायता करने को कहा उन्होने आधा घंटे मे स्वीकृति भेजने का आश्वासन दिया और मुश्किल से 20 मिनिट मे 1.22 लाख के भुगतान हॉस्पिटल को प्राप्त  हो गया हमारे द्वारा प्रारम्भिक जमा राशि से लगभग 3 हजार का भुगतान को काट कर शेष राशि हमे नगद बापस कर दी गई। इस तरह नगदी रहित बीमा का पहला अनुभव सेफवे टीपीए के साथ अच्छा रहा। यहाँ यह लिखना आवश्यक है कि  सेफवे टीपीए की मेडम एंजिलिना सहित अन्य कर्मचारी  जिन्हे मै नहीं जनता कि वे कौन है या  किस पद पर कार्यरत है लेकिन उनकी तत्पर ग्राहक सेवा उस  संस्थान की गरिमा को ग्राहकों के मन मे बढ़ाता और दिलों मे गहरा सम्मान दिलाता है जिसके लिए मेडम एंजिलिना और उनकी टीम को हार्दिक साधुवाद।

यहाँ इस अनुभव लिखने का मकसद अपना चिकित्सकीय अनुभव लिखना तो है ही साथ ही   अपने ऐसे मित्रों, रिशतेदारों, शुभचिंतकों, सहचरों, जानने बालों खास तौर पर नौजवान साथियों  को ये संदेश देना है कि वे सभी आकस्मिक समय मे आने बाली चिकिसकीय समस्यों के निदान के लिये अपने परिवार की सुरक्षा हेतु यदि कोई अन्य चिकित्सकीय सुरक्षा कवच उपलब्ध नहीं है तो मेडिकल इंश्योरेंस पॉलिसी अवश्य ले।   

विजय सहगल