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स्कूल या कॉलेज स्तर पर पढ़ाई करने के साथ काफी समय
खाली रहता था। हमारे घर के बगल मे एक तरफ एक टेलर मास्टर कि दुकान थी और दूसरी तरफ
एक इलैक्ट्रिक का काम करने बाले की दुकान
थी। यूं ही बैठे बैठे उन लोगो को मै काम करते देखता था और टेलर मास्टर को सिलाई
मशीन मे तेल डालते या मशीन को ठीक ठाक करते अथवा मशीन चला कर सिलाई करते देखता था।
कभी खाली बैठे-बैठे मै भी उनकी मशीन मे तेल डालने या सिलाई करने का काम कर थोड़ा-थोड़ा
काम सीख गया। मै आज भी घर पर सिलाई के छोटे-मोटे काम या मशीन को सुधारने के
हल्के-फुल्के काम कर लेता हूँ। सीखने कि इसी आदत के कारण ही बिजली की दुकान पर
बैठते हुए काफी काम जैसे छोटे बल्बों की झालर बनाना, सीलिंग या टेबल पंखा की छोटी-छोटी खराबियों या
अन्य बिजली के उपकरण, मिक्सी, ट्यूब लाइट आदि कार्य मै आज भी कोशिश भर खुद ही करता हूँ जब तक
की कोई बड़ा काम जैसे मोटर वाइंडिंग आदि का कार्य न हो। आज कल तो यू-ट्यूब का जमाना
है जिसकी सहायता से मैंने विंडो एसी की
सर्विस भी खुद ही की हैं। इस शौक के चलते
हमारे पास काफी सारे टूल्स औज़ार जो बिजली के कार्य या प्लंबर या बढ़ई के कार्य मे
इस्तेमाल होते हैं उपलब्ध है। जिनको हम खाली समय या छुट्टी के समय इस्तेमाल कर घर
के छोटे छोटे रिपइरिंग आदि के काम कर लेता हूँ। इस बहाने कुछ नया सीखने मिलता
हैं और टाइम पास भी अच्छा हो जाता हैं। पर
कभी कभी अपनी हद से बाहर कोई ऐसा काम पकड़ा जिसमे असफल हुए तो घर पर श्रीमती जी से
जो लानत-मलानत सुननी पड़ती तब बड़ा अफसोस जनक पछतावा होता हैं।
उन दिनों मेरी पदस्थपना रायपुर (छत्तीसगढ़) मे थी।
छुट्टी बाले दिन पूर्णतया: आराम का दिन होता हैं। खाली बैठे खुराफात करने का कभी
दिल होता तो कोई न कोई काम लेकर बैठ जाता हूँ। मेरे पास उन दिनों बजाज कंपनी
का एक "प्रिया" स्कूटर हुआ करता
था। यध्यपि उसको खरीदे 8-9 साल ही हुए थे, देखने मे इतना खराब भी नहीं लगता था, न जाने क्यों मेरे दिल मे
उसे पेंट करने की धुन सवार हो गई। दरअसल उन दिनों मैंने यूरेका फोर्ब्स कंपनी का
वैक्युम क्लीनर लिया था। सेल्स मैन ने उसकी बड़ी-बड़ी खूबियाँ गिनाई थी उसमे से घर की
साफ सफाई के अलावा पेंट आदि का काम भी कर सकते हैं। मैंने सोचा क्यों न इससे
स्कूटर पेंट कर दिया जाये? अब जबकि दिमाक मे स्कूटर पेंट करने का निश्चय मैं कर चुका था
तो इसके लिये आवश्यक सामान भी जुटाने शुरू कर दिये। टैगोर नगर स्थित मेरे घर के
पास पचफेढी नाका पर एक पेंट की दुकान थी "अलीगढ़ पेंट हाउस" मैंने पता कर
लिया था कि स्कूटर आदि के लिये ऑटो पेंट आते हैं जिनसे स्कूटर, कार आदि पेंट किए जाते
हैं। पेंट को पतला करने के लिये "थिन्नर" और ऑटो पेंट का एक लिटर का डिब्बा भी मै ले
आया। थोड़ा अंदर से डर था मामला गड़बड़ न हो इसलिये बही पेंट लिया जो स्कूटर पर पहले
से था, यानि हल्का
हरा। शनिवार को आधे दिन कि छुट्टी रहती थी। जोखिम को कम करने के लिये मैंने उस दिन
अगले पहिये के उपर के कवर यानि मड-गार्ड के छोटे हिस्से पर प्रयोग के तौर पर पेंट
करने का निश्चय किया। मड-गार्ड को अच्छी तरह साफ कर सुखा कर मैंने थोड़ा पेंट
वैक्युम क्लीनर के डिब्बे मे डाला थोड़ा से पतला करने के लिये थिन्नर डाला और
वैक्युम क्लीनर को स्टार्ट कर पेंट किया, परिणाम उत्साह जनक था। इसे देख कर मेरी हिम्मत और बढ़ गई। मुझे मेरे
वैज्ञानिक दिमाक पर गर्व हुआ और लगा अब
मंजिल आसान हैं। अगले दिन रविवार था मैंने सुबह की चाय के बाद अपनी मंजिल हासिल
करने के लिये तैयारी शुरू करदी। सीट, नंबर प्लेट, हैड लाइट, बैक लाइट को खोल कर अलग कर दिया ताकि उन पर पेंट
के छींटे न पड़े। दाये बाये की डिक्की को अलग कर दिया ताकि उन पर पेंट कर के उनको अलग
रखा जा सके। जल्दी जल्दी नाश्ता भी
निपटाया ताकि पूरी तन्मयता से स्कूटर पेंट का काम कर सके। दोनों तरफ के हैंडल कवर
को अखबार से लपेट दिया ताकि उस पर भी कलर के छींटे न आये। पूरी तरह से ध्यान और
सावधानी पूर्वक हर काम को अंजाम दे रहा था। पेंट करने के पूर्व की सारी तैयारी
पूरी कर दोपहर मे लगभग 12 बजे हमने वैक्युम क्लीनर मे पेंट डाल कर स्कूटर को पेंट करना
शुरू किया। चूकीं एयर प्रैशर से पेंट तेजी से हो रहा था। दायें और बाएँ पैनल को
पेंट कर सूखने रख दिया सूखने मे थोड़ा वक्त लग रहा था तब तक स्कूटर के सामने बाले
हिस्से मे भी पेंट हो गया पर पता नहीं क्यों स्कूटर देखने मे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। बाकी हिस्से
मे भी पेंट शीघ्र हो गया। लगा शायद एक कोट
से चमक काम आ रही हो थोड़ी देर बाद हमने दूसरी कोट भी पेंट कर दी, कि शायद इसके बाद
फिनिशिंग और चमक आ जाये। लेकिन निराशा हाथ लगी। अब लग रहा था कि प्रयोग पटरी से
उतर रहा हैं। जब मैंने देखा कि जगह-जगह आँखों से टपकते आंसू जैसी बूंदे कई जगह बन गई तो मेरा माथा ठनका। खतरा
साफ नज़र आ रहा था कि किस मनहूसियत मे स्कूटर की पेंटिंग के काम मे हाथ डाला। तब
अचानक मेरी नज़र पेंट पतला करने बाली थिन्नर की बोतल पर पड़ी जो बैसी की बैसी पड़ी थी।
ये क्या पेंट मे थिन्नर मिलना तो मै भूल ही गया जिस बजह से पेंट गाढ़ा होने के कारण
जगह जगह बह कर आसुओं की तरह टपक कर गोल बूंदों की तरह जम गया था और जो पेंट तीन स्कूटर
को पेंट करने के लिये पर्याप्त था बो एक स्कूटर के पेंट करने मे ही भेंट चढ़ गया।
अब तो बड़ी कोफ्त और अपने आप पर अंदर ही अंदर गुस्सा आ रहा था। श्रीमती जी ने भी
लानत-मलानत की। बैसे भी बो ये सब करने के लिये मना कर रही थी। जैसे तैसे सभी अन्य
उपकरणो जैसे सीट, पैनल, पहिये आदि फिट किये तो उस बदसूरत स्कूटर को देख कर बहुत दुःख हुआ, इससे तो पुराना स्कूटर ही
देखने मे अच्छा लग रहा था। अपनी प्रयोग
धर्मिकता और स्यानपन पर पर बहुत अफ़सोस हो
रहा था। "चौबे जी छब्बे जी बनने गये और दुबेजी बन कर आये" बाली कहाबत
याद हो आयी। लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था।
चलो यहाँ तक भी कोई बात नहीं थी मन मे वैज्ञानिकों
बाली सोच आयी जिससे मन को कुछ तसल्ली दी कि
कुछ नया करने मे कई बार असफलता हाथ लगती हैं। "गिरते है सहसबार
ही मैदाने जंग मे, बो क्या..........."।
लेकिन जब दूसरे दिन शाखा मे स्कूटर से पहुंचे तो पहुँचते ही क्ल्लेक्टरेट शाखा के
हमारे ग्राहक जो क्ल्लेक्टर कार्यालय मे ही कार्यरत थे स्कूटर को देख कर हँसे और
कहा "किस मूर्ख से स्कूटर पेंट कराया" सहगल साहब और बगैर रुके
पेंटर को भला-बुरा कर लानत लगाते रहे। अब हमरी हालत "काटो तो खून नहीं"
जैसी थी। बोले तो क्या बोले। किसी तरह उन श्रीमान से पीछा छुड़ाया पर अब स्कूटर से कैसे पीछा छुड़ाये? स्कूटर पर
बदसूरत पेंट किया ये समस्या छोटी लगने लगी, पर स्कूटर के पेंट पर लोगो की प्रतिक्रिया और
पेंटर को भला बुरा कहना एक नयी और बड़ी
समस्या लगने लगी। हमने अगले दिन से ही स्कूटर से बैंक जाना बंद कर दिया और समस्या
के समाधान तक कार से जाना शुरू कर दिया। स्कूटर को घर पर ही रख कर बाज़ार मे स्कूटर
पेंट करने बालों की जानकारी लेना शुरू कर दिया। पर दुर्भाग्य कहाँ पीछा छोड़ रहा था
हमारे एक घरेलू मित्र श्री देशपांडे जी जो टेलीफ़ोन विभाग से सेवानिव्रत थे एक अन्य
मित्र श्री अक्षय श्रीवास्तव के साथ उनके
गृह प्रवेश का निमंत्रण देने मेरे घर पर पधारे और सामने ही स्कूटर को देख कर भड़क गये, नाराजी भरे लहजे मे बोले
किस वेअक्ल मूर्ख पेंटर से पेंट कराया? मैं कुछ बोलता उसके पूर्व ही लाल-पीले होकर बोले, "उस गधे को चार
तमाचे जड़ना चाहिये थे, कैसा भद्दा पेंट किया"।
चलो हमारे साथ उस बेबकूफ को अभी ठीक
करता हूँ। अब उनके कौन समझाये ये पैंट एक पढे-लिखे बैंक मैनेजर ने खुद ही किया हैं।
किसी तरह उन्हे चाय पानी पिला कर आमंत्रण पत्र को स्वीकार कर दोनों को बिदा किया
और तुरंत ही स्कूटर को घर के पिछवाड़े मे रखा ताकि घर आने-जाने बाले किसी भी मेहमान की नजर स्कूटर पर न पड़े। अब
दौड़ भाग कर स्कूटर पेंट बाले की तलाश कर बात की और एक दिन सुबह-सुबह ही स्कूटर
लेकर उसकी दुकान पहुंचे। स्कूटर देख कर पेंट करने बाला भी कुछ उपदेश देने के मूड
मे था तभी मैंने उसे रोकते हुए अपनी
बेबकूफी भरी स्कूटर को पेंट करने का सच्चा किस्सा कह सुनाया बरना बो भी मुझे
अपरोक्ष रूप से गरियाने के लिये उताबला था।
इस पूरे प्रकरण मे मैं एक बात सोचता रहा कि घर से
लेकर कार्यालय, मित्र पड़ौसी से लेकर अपरचित लोगो ने स्कूटर के पेंट पर खूब आग
उगली और आलोचनात्मक टिप्पड़िया की इन्ही सब कारणों से हिंदुस्तान मे कभी कोई नवीन मौलिक खोज नहीं हुई और
न ही इसी कारण हिंदुस्तान मे कभी कोई बड़ी
वैज्ञानिक सकसियत पैदा हुई।
विजय सहगल

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