"धारा"-370
सात दशक से दूर पर प्यारा।
हुआ कश्मीर नज़दीक औ न्यारा॥
लुप्त हो चली
बाजी पत्थर।
अंत हो गई "तीन-सौ-सत्तर"॥
अब कश्मीरी जान चुका
हैं।
कुटिल नीति पहचान चुका हैं॥
गुरबत मे जो खाते पीते।
नेता उनके "ऐश" मे जीते॥
झूठी "मेह" बूबा से बू आती।
फ़रेब "फ़ा"
रुख से घबड़ाती॥
बेनकाब घाटी के नेता।
भ्रष्ट-लूट के ये प्रणेता॥
आतंकबाद की जो है खान।
समझ ले तूँ ओ पाकिस्तान॥
भारत का अब कोई न शानी।
बरना मुंह की पड़ेगी खानी॥
अब "नापाक" होश मे आओ।
जल्दी "पीओके" लौटाओ॥
विजय सहगल

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