"पूर्व मंत्री की गिरफ्तारी"
घंसु
- भैया कितना जुल्म, बेइंसाफ़ी, हो
रही एक ईमानदार देशभक्त पूर्व गृह और
वित्त मंत्री पर। कानून का सच्चा पालन करने बाला, देश को कई
वित्तीय नीतियाँ देने बाले बेचारे को पहले की पद और प्रतिष्ठितता को छोड़ भी देते तो वर्तमान
का ध्यान तो रखना ही था वो एक सांसद भी था । ऐसी कौन सी आफ़त आन पड़ी थी या ऐसा कौन से पहाड़
टूट पड़ता यदि उसे दो दिन बाद न्यायालय का निर्णय आने के बाद सीबीआई या ईडी उस
निरअपराधी को गिरफ़्तर कर लेती? भैया बहुत ज्यादती है जब इतने
बड़े आदमी के साथ ऐसा हो रहा हैं तो हम आदमी की क्या बिसात??
घंसु अर्थात देश का एक साधारण और आम आदमी अर्थात "घंसु कबाड़ी"। आज तो
भारत की राजनीति पर नॉन स्टॉप टिप्पड़ियाँ करे जा रहा था। "दीदी" जैसे
तुम और तुम्हारी पूरी पार्टी सच के साथ खड़ी है बैसे ही अपन भी आप लोगो के साथ खड़ा
हैं। अरे हम भी तो कबाड़ी का धंधा करके कमाई के अलावा दो पैसे यहाँ वहाँ मार लेते है और ये भी भूलने
का नहीं की अपन भी इकॉनमी मे कंट्रीब्यूट करता है फिर वे तो बहुत बड़े वित्त मंत्री
थे। एक छोटे उदाहरण से स्पष्ट है कि वो कानून का कितना सम्मान करता है। सोचिये कितनी दूरद्रष्टि से अपने घर मे दरबाजे जिनमे
वेशक ताला लगा के बंद कर रखा, पर घर की दीवारें कितनी छोटी रखी ताकि शरीफ आदमी भी दीवार फांद के आसानी
से उसे गिरफ्तार कर सके। वो चाहता तो घर की दीवारे और गेट तिहाड़ जेल से भी ऊंची
बनवा देता तो फिर सीबीआई या ईडी के अफ़सरान कैसे अंदर आते??
इतना कानून का सम्मान करने का इतिहास मे कोई दूसरा उदाहरण कभी देखा है भैया आपने?
मैंने
सवाल किया -: पर घंसु उन्हे जिम्मेदार मंत्री और नागरिक के नाते समर्पण कर देना
चाहिये था?
घंसु
आज तो बिल्कुल अपने लय और स्वर मे था -: अरे अपना वो क्या कहते है पूर्व फ़ाइनेंस
मिनिस्टर ने साफ-साफ कहा है कि "ज़िंदगी
और आज़ादी" मे से मै आज़ादी चुनूँगा! ऐसे भाषण तो 1947 स्वतन्त्रता की लड़ाई मे भी
सुनने को नहीं मिलता। है कोई दूसरा मंत्री इस पोलटिक्स मे जो इतनी साफगोई
से अपनी देशभक्ति पूर्ण राय दे? इसकी हिम्मत की दाद देनी
पड़ेगी। अरे अपन भी कबाड़ा लेने मे भी कभी
ऊंचा नीचा करते हैं, पुलिस आती है,
पूंछ-तान्छ करती हैं बैठके होती है, चाय पानी होता है पर अपना
तो कभी कोर्ट-कचहरी होता ही नहीं, अपन भी तो इकॉनमी चलाता है, फिर बो तो इकॉनमी को चलाने के साथ उसकी पॉलिसी भी बनाता हैं, कुछ तो ध्यान रखने का? जब पुलिस एक साधारण कबाड़ी का
इतना ध्यान रखता है तो बो तो एक भौत बड़ा आदमी है पुलिस को जरूर उसका ध्यान रखना
चइये।
पर
अचानक आकाशवाणी होती है -: "उन्हे मत सराहो जिन्होने अनीति पूर्वक सफलता पाई या संपत्ति कमाई"।
मैंने
कहा घंसु पर एक पूर्व गृह मंत्री को बहादुर
तो होना ही चाहिये? घंसु बोला इसमे कोई शक नहीं बो
कितना बहादुर था। सीबीआई के लोगो की गिरफ्तारी के बाद बह अकेला ही बहादुरी से सारी रात उनके पास काटा। मै बोला रात
तो काटी पर ऑफिस मे कैदखाने की कोठरी मे नहीं क्योंकि उनका कहना था उन्हे अंधेरे
से डर लगता हैं। एक पूर्व गृह मंत्री अंधेरे से डरे तो निडर होकर निर्णय कैसे कर
सकता है?? मैंने घंसु से कहा-: "भगवान जो करता है अच्छी ही करता है"।
"ये तो अच्छा हुआ वे रक्षा मंत्री नहीं थे बर्ना बड़ी भद्द पिटती", जो अंधेरे से अपनी रक्षा नहीं कर सकता वो देश की रक्षा कैसे करता?
घन्सू
से मैंने कहा -: उन पर रिश्वत के आरोप भी "बड़े" और "गंभीर"
लगे है तुम्हें मालूम हैं उन्होने एक सौदे मे 305 क॰ रुपये की रिश्वत ली है। तो
घंसु तमक कर बोला 305 रुपये कौन सी बड़ी रकम है। मै 305 रुपये तो मिनटों मे कमा के फेंक सकता
हूँ। और ताव मे आकार सौ के तीन और पाँच का एक नोट सामने फेंकते हुए कहा लो अभी ले
लो ये 305 जो उसने लिए थे। अब मै भो-चक्का था मुझे पक्का यकीन हो गया कि घंसु ने
आज अँग्रेजी ठेके से दबाई ली है!! मैंने कहा, तुम समझते हो 305
क॰ अर्थात 305 करोड़ रूपये कितने होते है? तुम्हें मालूम है, करोड़ मे कितनी ज़ीरो होते हैं। जब मैंने कहा इसे ऐसे समझो कि 2000 रुपये के 100 नोट की एक गड्डी और ऐसी ऐसी 152500 गड्डियाँ
तुझे मिल जाये तो सोच तू कितना बड़ा आदमी हो जायेगा??
सुन
कर आंखे फाड़ कर पगलाया सा बोला "भैया
अपन तो अंगूठा टेक गरीब आदमी हूँ", "सारी ज़िंदगी गणित मे कच्चा रहा, सबसे बड़ा नोट भी 100 का ही देखा" उसका जबाब सुन कर हम दोनों की आँखों
मे आँसू थे। उसकी आँखों मे अपनी लाचारी और
निर्धनता के आँसू थे। अब उसका नशा कफूर था। मैंने उसकी निश्चल ईमानदारी सुन कर उसे अपनी बाहों मे लेते हुए कहा
"घंसु अच्छा है तूँ अनपढ़ है तुझे नहीं मालूम 305 करोड़ कितनी बड़ी रकम है और
मेरे आँखों मे निर्झर आँसुओ की धारा इसलिए बह रही
थी कि मै पढ़ा लिखा हूँ और समझ सकता हूँ कि 305 करोड़ की रकम कितनी बड़ी है?? आज अब हम दोनों ही गरीब थे।
ये
305 करोड़ की रकम आम गरीब
आदमी के हिस्से के निवाले छीन कर, उनके बच्चों के हिस्से का पेट
काट कर कमाई गई। देश का एक ईमानदार नागरिक
अपनी सारी ज़िंदगी मे काम करके भी इस राशि का एकांश भी नहीं कमा सकता। निर्धन लोगो
के कफन को बेच कर की गई इस कमाई को उन
महान देशभक्त, ईमानदार पूर्व मंत्री ने
अपने हिस्से मे लिया है। हम सोचने को मजबूर थे और चिंतित भी थे कि देश कि स्वतन्त्रता
के लिए हमे कितनी बड़ी कीमत अदा करनी पड़ रही
हैं। उक्त रिश्वत की रकम देश के नागरिकों को
सोचने के लिए अपने पीछे अगणित सवालों को छोड़
गयी ????
विजय सहगल


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