रविवार, 18 अगस्त 2019

रैन कोट




"बरसाती"



आज सुबह भ्रमण के पश्चात जैसे ही मै नोएडा स्थित अपनी सोसाइटी आम्रपाली ईडन मे अपनी नियमित व्यायाम के लिये पार्क मे पहुंचा बरसात शुरू हो गई थी, लोग बरसात से बचने यहाँ-वहाँ दुबक रहे थे। मुझे यकायक बचपन मे पापा द्वारा मेरे लिये खरीदी बरसाती की याद आ गई और मैं व्यायाम करते हुए बरसात मे भीगने का आनंद लेते हुए  अपनी एक्सर्साइज़ करता रहा बिना ये जाने हुए कि कितने  लोग पार्क के सामने स्थित फ्लैट्स की  बाल्कनी मे  खड़े हो कर बरसात का आनंद लेते हुए मुझ जैसे दीवाने को भी देख  रहे होंगे।

उन दिनों मै राजकीय आदर्श विध्यालय झाँसी मे कक्षा 3 या 4 मे पढ़ता था। हमारे घर से स्कूल लगभग  4-5 किमी॰  दूर था। उसी स्कूल मे मुझसे बड़े भाई प्रदीप और मेरे दो  ममेरे भाई दिलीप और गोपाल भी पढ़ते थे। बरसात का मौसम था। पापा ने हम दोनों भाइयों को बरसात  से बचने के लिये बरसाती दिला दी थी। रोज कॉपी-किताबों के साथ बरसाती भी स्कूल मे ले जाते थे पर बरसात नहीं होती थी। ऐसे ही सोच कर एक दिन मैंने तो स्कूल बस्ते मे बरसाती रख ली पर मेरे भाई ने बरसाती नहीं रक्खी। लेकिन उसी दिन  छुट्टी के बाद बापसी मे बरसात होने लगी। मै और मेरे भाई अपने ममेरे भाइयों के साथ स्कूल से बापस आ रहे थे। मेरे पास तो बरसाती थी मैंने झट से बरसाती खोली और पहिन ली। बरसाती घुटनों के नीचे तक आ गई। हाल्फ पैंट बाली यूनीफ़ोर्म थी जो पूरी तरह बरसाती से ढक गई। मेरे भाई प्रदीप और ममेरे भाई दिलीप और गोपाल के पास  उस दिन बरसाती नहीं थी। तो सबने तय किया कि हमलोग बेशक पानी मे भीग जाए कोई बात नहीं पर बस्ते मे रक्खी कॉपी-किताब नहीं भीगना चाहिये।  अतः ऐसा  करते है कि हम तीनों अपना बैग विजय को दे देते हैं चूंकि विजय के पास बरसाती हैं तो बरसाती से विजय भी नहीं भीगेगा और हम तीनों के बैग भी बचे रहेंगे। हम सबमे छोटे थे स्वीकृति मे हाँमी भर दी। अब क्या था एक हमारा बस्ता, तीन और बस्ते यानि कि चार बैग हमारे कंधों मे टांग दिये गये, दो दाहिनी तरफ और दो बायीं तरफ। तीनों भाई  तो मस्त  खाली हाथ मौज करते भीगते चल रहे थे, मैं गधों की तरह चार बस्तों का बोझा ढोते हुए मरे-मरे चल रहा था। बरसात की मौज-मस्ती मे ये तीनों भाई  तेज कदमों से कब आगे निकल गये पता ही नहीं चला, मै बोझ से  दबा धीरे-धीरे चल पा  रहा था। कुछ देर बाद बरसात भी  बंद हो गई और धूप निकाल आयी अब तो पसीने से तर-बतर मेरा बुरा हाल था। ये तीनों भाई मुझे दूर दूर तक दिखाई नहीं दिये, शायद दिख जाते तो बस्तों का बोझ कुछ कम हो जाता। ये लोग बगैर मेरा इंतज़ार किये सीधे घर निकल गये।  मामा का घर रास्ते मे  मेरे घर से पहले पड़ता था।  उन दोनों ममेरे भाइयों के बैग भी मुझे ही उनके घर पहुंचाने पड़े। मै अपने भाई और मेरा बस्ता लिये जब घर पहुंचा तो भाई बड़े मजे से कपड़े बदल कर भोजन कर रहे थे। हमे बड़ी कोफ्त हुई कि  बरसाती के चक्कर मे न तो हम बरसात का मजा ले सके और न ही घर सबके साथ जल्दी पहुँच सके बल्कि बरसाती की  बजह से हमे चार बस्तों का बोझ उठा कर 4-5 किमी॰ पैदल चलना  पड़ा। उस दिन से हमने मन ही मन तय कर लिया कि  बरसात का मजा लेने का अब आगे कोई भी मौका नहीं चूकेंगे और इस तरह उस दिन के बाद से हमने बरसाती को नमस्ते कह दिया। बरसात के  उस  दिन से आज तक मैंने कभी बरसाती नहीं पहनी यहाँ तक की नौकरी मे आने के बाद भी मैंने आज तक न कभी बरसाती खरीदी और न ही पहनी सिवाय पिछले वर्ष 2018 मे श्री अमरनाथ यात्रा के जहां बरसाती की अत्यंत आवश्यकता थी।

स्कूल और कॉलेज के समय मे भी बरसात का आनंद लेने का हम कोई मौका नहीं चूकते। कॉलेज जाते समय तो टेंपो या ऑटो से कॉलेज पहुँच जाते और बापसी मे पैदल ही भीगते हुए आते रहे। जब नौकरी मे प्रथम बार लखनऊ पहुंचे और बरसात का मौसम शुरू हुआ तो हमारे बड़े भाईसाहब श्री शरद  भी जो उन दिनों लखनऊ मे ही साथ साथ थे, ने उस समय की प्रसिद्ध "डक बैग" कंपनी की दो बरसाती लेने की चर्चा करी पर  मैंने उन्हे हमारे लिये उक्त बरसाती खरीदने के लिये मना कर दिया और कहा "कि मै अपने हिसाब से बरसाती पसंद कर ले लूँगा"। जब कभी ऑफिस जाने के टाइम पर बरसात आई तो मैंने प्लास्टिक के बैग मे एक कपड़ों का पूरा सेट तौलिया के साथ साइकल की आगे हैंडल मे लगी "डलिया" मे रख लिया और सही समय घर से  कार्यालय के लिये निकल लिये। बरसात का भरपूर आनंद लेते हुए जब हम आलम बाग से हज़रत गंज जाने के लिये निकले तो उस दिन की मस्ती को जब याद करते हैं तो आज भी रोमांचित हो कर खुश हो जाते है। जब बरसात की फुहारों मे  भीगते हुए हम आलम बाग रेल्वे कॉलोनी और चर्च की ढलान से मवैया के  रेल पुल के नीचे भरे पानी मे साइकल को सरपट दौड़ा कर निकलते, तो  साइकल, पानी को तेजी से दो भागों मे चीरती हुई   दोनों ओर  दूर दूर तक पानी को उछालती दौड़ी चली जाती। सामने से कभी कोई तेज टेम्पो या बस जब करीब से गुजरती तो उससे निकली लहरों के छीटें पूरी शरीर को पानी से समुद्र की  लहरों की तरह सराबोर कर देते। आगे जब हम  चारबाग होते हुए हुसैन गंज के पार विधान सभा को पीछे छोड़ते हुए कभी दारुलसफा के अंदर  से होते हुए बसंत टांकीज, लालबाग से और कभी एलाहबाद बैंक चौराहे से हज़रत गंज हलवासीय कोर्ट  स्थित ब्रांच पहुंचते। ब्रांच मे जहां एक ओर सारा स्टाफ बरसाती या छाते के बाबजूद आधा अधूरा भीगता हुआ अपने कपड़े सुखाता तब मै बड़े मजे से पूरे कपड़े, स्टेशनरी रूम मे चेंज  कर ठाट से अपनी सीट पार बैठ कर गर्म जोशी से हाथ मिलाता जबकि अन्य लोग भीगे हाथों को सिकोड़ कर हाथ बढ़ाते। जब कार्यालय बंद होने पर कभी बरसात होती तब तो कोई चिंता करने का सवाल ही नहीं क्योंकि तब तो मस्ती से भीगते हुए सीधे घर ही पहुँचना होता। लखनऊ प्रवास के दौरान कार्यालय के आने या जाने के समय जब जब बरसात हुई  मेरी यही दिनचर्या रही। ग्वालियर, रायपुर और भोपाल के  प्रवास मे चूंकि कार आ चुकी थी तो  मै पुनः बरसात के इस सुख से बंचित हो गया। एक बार भोपाल मे ऐसी ही कुछ परिस्थिति बनी जब कार शायद पंचर थी मैंने मोटर साइकल की सेवाये ली पर बापसी मे बहुत तेज बारिस हो रही थी मैं प्रादेशिक कार्यालय भोपाल मे पदस्थ था। प्रादेशिक कार्यालय सड़क की ढलान के मुहाने पर होने के कारण अक्सर कार्यालय की गैलरी मे 6-8 इंच पानी तुरंत भर जाता था। जब हम कार्यालय की समाप्ती पर बाहर जाने के लिये निकले तो देखा गैलरी मे 6-7 इंच पानी बह रहा हैं। लेदर के जूते के बारे मे मै सोच के बरसात मे निकलने मे संकोच कर रहा था। अचानक हमारे कार्यालय के एक साथी श्री दास जी भी उसी समय घर जाने के लिये निकले उन्होने अपने बैग से एक पोलिथीन का बैग निकाल कर उसमे जूते उतार कर रक्खे, एक छोटी पोलिथीन मे पर्स व मोबाइल डाला और बरसात के बीच बहते पानी मे घर के लिये निकल लिये । मुझे भी उनका आइडिया पसंद आया मैंने भी जूते निकाल प्लास्टिक बैग मे रक्खे और नंगे पाव मोटरसाइकल स्टार्ट की और घोर बरसात का आनंद लेते हुए घर की तरफ निकल लिया। सच मे उस दिन जो मजा आया उसने वर्षो बाद लखनऊ के पुराने दिनों की याद ताजा कर दी।

हम जैसे जैसे उम्र दराज़ होते जाते हैं ये  पद, प्रतिष्ठता के  छद्म आवरण, आडंबर ओढ़ लेते हैं, कोई क्या कहेगा?, दूसरे लोग  देख कर मेरे बारे मे  क्या सोचेंगे? सब मज़ाक बनायेंगे? आदि  जो मन के अंदर उठ रही बरसात मे भीगने जैसी  छोटी-छोटी खुशियो को रोक लेते हैं। आइये जहां भी खुशी के कुछ क्षण भी  मिले तो  भूल जाइये दूसरे क्या सोचेंगे? क्या कहेंगे? कही कोई कुछ नहीं सोच रहा और  न ही आपको कोई देख रहा है। सभी अपने को देख कर मंत्रमुग्ध है। बच्चे बन जाइये और आगे बढ़ कर  मन मे आ रही प्रसन्नताओं और खुशियों  के साथ दौड़ लगाइए।
           
विजय सहगल

कोई टिप्पणी नहीं: