"हरि"-"जन" की व्यथा
दूर किनारे एक छोर पर ।
पीपल नीचे क्यों मेरा घर॥
वस्ती का सब कचरा-कूड़ा।
क्यों घर-किनारे,
मेरे घूरा॥
भरें नीर पनिहारी सारी।
नहीं गगरिया उसमे म्हारी॥
डगर डोलता ढ़ोर
और खूटा।
पनघट फिर क्यों
मेरा अछूता॥
गले मिले खेले सब बच्चे।
अधम हम,
वे सब सुच्चे॥
आलय गाँव की शिक्षा शक्ति ज्यों ।
छुआ - छूत की
अलग पंक्ति क्यों॥
देव एक देवालय एक है।
मेरा इसमे दखल शेष है?
हर पल,
हर दिन, हरि का मन।
याद दिलाता,
"हरि-जन" जीवन॥
खुद के मैले,
खुद घृणा होती।
उसको "सिर" माँ,
मेरी ढोती॥
नियति एक "मानव"
की जाना ।
फिर ऊंच-नीच का भेद क्यों माना॥
वर्ष हजारों का अन्याय।
कैसे करके दोगे न्याय?
"ईश" विधान से क्या डर सकते?
जाति-भेद का अंत
कर सकते?
मेरे जीवन का कुछ हिस्सा।
बांटो,
गढ़ो नया कुछ किस्सा॥
उठो,
चुनौती तुम स्वीकारों।
तोड़ के जाति भेद दीवारों॥
देकर स्वाभिमान के दो क्षण।
रक्षण दो,
ले-लो आरक्षण॥
रक्षण दो, ले-लो ..............
विजय सहगल

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