शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

प्रिय मित्र अनिल रस्तोगी



"प्रिय मित्र अनिल रस्तोगी"





आज तुम्हारी  सेवानिव्रति हैं इस अवसर पर तुम्हारे साथ बिताये पल रह-रह कर याद आ रहे हैं। हम पांचों  लोगो की मित्रता के भी 37 बर्ष हो रहे हैं।  1982 मे  मैने  हज़रत गंज शाखा मे जॉइन किया था तुम्हारे सहित दिनेश महरोत्रा, श्याम टंडन, संजीव टंडन और मैं एक-एक कर लड़ी मे कैसे जुड़ते गये  पता नहीं चला।  हम पांचों को जब शाखा के अन्य स्टाफ ने  "पाँच पांडव" कहना शुरू किया तब इस बात का अहसास हुआ कि हमारी मित्रता प्रगाढ़ होकर एक मजबूत आपसी रिश्ते का रूप ले चुकी हैं। लंच मे एक साथ चाय पीने जाना, लाल बाग के "चाय और बंद मक्खन" ने इसे और मजबूती प्रदान कर दी थी। शर्मा स्वीट कि दुकान पर आलू की टिक्की, रसगुल्ला और सोनपापड़ी का स्वाद तो जीव पर आज भी चढ़ कर बोलता हैं।  लंच टाइम मे हज़रत गंज मे चहल कदमी करना और ऑफिस टाइम के बाद  बैंक के बाहर स्कूटर पर या फूटपाथ पर  शाम को निरुद्देश्य घंटो गपशप करना या घूमते रहना दिनचर्या का हिस्सा हो गया था। इस दिनचर्या मे शनिवार शामिल नहीं होता था क्योंकि इस दिन श्याम को कानपुर जाना होता था और दिनेश और संजीव को  घर निकलना होता था पर  लगभग प्रत्येक शनिवार हमारा-तुम्हारा किसी न किसी थिएटर मे फिल्म देखना कभी नहीं छूटता। जितनी फिल्मे उन दिनों हमने तुम्हारे साथ देखी आगे इतनी फिल्मे देखना कभी संभव नहीं हो पाया।

ग्रुप मे सबकी अपनी अपनी अलग पहचान थी। दिनेश भैया मुझे बुंदेलखंडी मे बोलने पर हड़काते पर खुद लक्ख्नवी अंदाज मे बातचीत मे अवधी के शब्द  "कहीस, रहीस, बोलहीस" का इस्तेमाल करते। श्याम और मुझे  टी शर्ट की दीवानगी थी जो प्रायः एक दूसरे की टी शर्ट बदल कर  पहन लेते, संजीव भाई का अलग ही स्टाइल था काम को  समाप्त करने के बाद स्टाइल से धूप का चश्मा पहनने का निराला अंदाज और इस बात का संकेत कि आज का बैंकिंग कार्य समाप्त पर तुम्हारी शांत धैर्य पूर्वक मौन बिल्कुल छोटे भाई की तरह बगैर कुछ बोले हम चारों को आवश्यक संदेश दे देता।
      
तुम्हें लखनऊ का वो मेला तो याद ही होगा जिसमे हम पांचों एक साथ घूमने गये थे और मिट्टी के उस देशी फ्रिज़ मे  तीन दिन पुराना सेव देख कर मै  अनायास उसको अपने हाथ मे लेकर उसकी प्रशंसा करने से अपने आप को नहीं रोक पाया  और  स्टाल पे बैठा वह युवक कुछ बोल पता उसके पहले ही उस सेव को मैंने मुंह से खा लिया था और खुशी से चीखते हुए कहा "वाह तीन दिन बाद भी इतना ताजा"!! उस युवक के बोलते ही हमने सोर्री बोलते हुए सेब के  दोनों टुकड़े उसे बापस करते हुए हाथ बढाया पर तब उसने रोकते हुए सेव खा लेने के लिये बोल दिया। दरअसल ये शैतानियाँ दोस्तों के साथ होने पर अपने आप हो ही जाती हैं। हमे भी इस चीज का अहसास था कि "सामने अकेले  हम हैं, पर हमारे पीछे चार खड़े हैं"। दिनेश के देखरेख मे एक बार हमारे अलीगंज स्थित घर मे सभी का  रात रुकना बही खाने का इंतजाम आदि कर लगभग सारी रात गपशप करना हमे अब तक याद हैं जिसमे हम पांचों के अलावा श्री विपिन गर्ग भी थे जिनसे हम पांचों लोगो कि अच्छी जमती थी। कितने बार गर्ग साहब के नरही स्थित घर पर भाभी जी के हाथ के चाय पकौड़े हम लोगो ने खाये। शाखा मे श्री सतीश शर्मा, आचार्या जी, सुबोध आनंद जी, योगेश एरन जी, सुरेंदर शर्मा जी, फरहत इकबाल, मैडम देव, के के अग्रवाल, बीडी सिंह, ऋषि मुनि पांडे, शरद शुक्ला, जोस सेवेस्टियन आदि कितने लोगो के साथ एक खुशनुमा माहौल था। उस दौरान शानदार बिदाई या वैल्कम पार्टियां हुआ करती थी। क्रिकेट क्लब का अलग ही जुनून था। श्री बी॰डी॰ सिंह के साथ एआईबीईए यूनियन के झंडे तले आए दिन होने बाले बैंक के प्रदर्शन, नारे बाजी भी दिनचर्या के    अंग थे।
          
तुम्हारे और संजीव के  साथ बैंक की पहली एलटीसी मुंबई और गोवा, खजुराहो की यादगार रही थी। मुंबई मे एक हफ्ते ठहरना और पूरी मुंबई को लोकल और बेस्ट की बसों से नापना न भूलने बाली यात्रा रही थी। मुंबई पहुँच कर पहले दिन ठहरने मे काफी जद्दो-जहद करनी पड़ी थी। मुंबई मे ठहरने कि व्यवस्था शाखा के एक सदस्य द्वारा कर दी गई थी पर जब उस  स्टाफ का संदर्भ लेकर  पूर्व सूचना के मुताबिक हम तीनों  बैंक के फ्लैट मे उस  मित्र के यहाँ मिठाई लेकर  पहुंचे तो फ्लैट का ताला लगा मिला। काफी इंतजार के बाद भी जब उनके मित्र नहीं आये तो पड़ौसी को उन तक मिठाई पहुंचाने का निवेदन कर बापस आये तब महा नगर की आपा-थापी और रहने की  समस्या, एकाकी जीवन मे पराभाव से पहली बार रुबरु हुए। पर जल्दी ही ट्रेन मे मिले सहयात्रियों की जानकारी के आधार पर एक धर्मशाला मे बड़ी अलमारी मिली जिसमे आश्रय लेकर हम लोग मस्ती से 6-7 दिन रुके। सुबह-सुबह मुंबई की हल्की सर्दी मे नहाना, स्टील के छोटे गिलास मे गर्म-गर्म 2-3 कप स्वादिष्ट चाय पीना, घरों से बने बनाये नाश्ते का सुबह-सुबह नाश्ता कर घूमने निकलना और देर शाम बापस आकार "दिल्ली रेस्टुरेंट" मे गर्म रोटी, दाल, कड़ी पापड़, खिचड़ी  के साथ भोजन खाना दिन भर की थकावट को समाप्त कर सुबह फिर  तैयार रहने की ऊर्जा प्रदान कर देता था। अलग अलग दिन चौपाटी, मुंबई सबर्ब टूर, संजय गांधी राष्ट्रीय ओपेन ज़ू, हैंगिंग गार्डेन, नारीमन पॉइंट, गेट वे ऑफ इंडिया, ताज होटल इस्कॉन टैम्पल, अलीफेंटा केव, मछ्ली घर आदि अनेक स्पॉट बहुत ही मस्ती और उल्लास के साथ घूमे। तुम्हें याद है जब हम  लोग  दूर से अभिताभ बच्चन का बंगला देखने जाना चाहते थे  जिसमे मेरी कोई दिलचस्वी नहीं थी पर सबके साथ मै इस शर्त पर तैयार हुआ था कि हम उनके घर चल उनसे मिलने का प्रयास करेंगे, खाली दूर से खड़े होकर बंगला नहीं देंखेंगे, और ऐसा हमने किया भी था जब हम लोग सीधे उनके बंगले के दरवाजे तक  पहुँचे। जब मैंने गार्ड से कुछ इस स्टाइल मे पूंछा कि वह हँसे बिना नहीं रहा। मैंने पूंछा था कि, "हमे मालूम है आप न मे जबाब देंगे फिर भी मै पूंछ रहा हूँ" "अभिताभ जी घर पर हैं??" उसका जबाब "नहीं" मे ही था। मैंने कहा "हमे मालूम था आप यही बोलेंगे"। गार्ड हंस दिया था।  प्लान के मुताबिक हम लोगो को मुंबई से गोवा पानी के जहाज से जाना था और बापसी मे गोवा से मुंबई हवाई जहाज से आना था। हवाई जहाज की टिकिट बुकिंग तो याद होगी ही। हम दोनों ही नारीमन पॉइंट स्थित एयर इंडिया के ऑफिस मे टिकिट बुक कराने गये थे। संजीव भाई साथ मे ऑफिस इसलिये नहीं गये थे क्योंकि उन्होने रबर चप्पल पहनी हुई थी और चप्पल पहन के बुकिंग काउंटर पर बैठी हुई खूबसूरत एयर होस्टेज के सामने जाना संजीव भाई को कतई गवारा नहीं था।

पानी के जहाज से मुंबई से गोवा कि यात्रा बड़ी यादगार रही थी जो  लगभग 20-22 घंटे की थी। पानी के जहाज से वह अब तक पहली और अंतिम अविस्मरणीय यात्रा रही। इससे पहले कभी शिप से यात्रा नहीं की थी उसके नियम आदि नहीं मालूम थे, अप्पर डेक का टिकिट था। बन्दरगाह के गेट  खुलते ही दूसरों को देख कैसे हम लोग समान लेकर डेक पर  दौड़ कर पहुंचे। लोगो ने अपने-अपने चादर फैला कर जगह घेर ली थी, बैसे ही जैसे ट्रेन के सामान्य डिब्बे मे सीट को घेरने के लिये रुमाल, सामान, बैग या पेपर खिड़की से फेंक  कर सीट रोक दिया करते थे। अपना सब सामान तो पैक था फिर हम तीनों ही सामान के साथ प्रवेश द्वार के बायें बाली जगह पर सामान के साथ फैल कर बैठ गये थे। बड़ा अजीब द्रश्य था। कुछ लोगो और कुली से जगह के लिये कुछ कहा-सुनी भी हुई थी। फिर शिप मे ही मोटे गद्दे किराये से मिलने की बात पता चली तो हम लोगो ने तुरंत ही तीन गद्दे किराये से लिये जिससे यात्रा सुगम और आरामदायक हो गई थी। शिप की यात्रा जरूर थी पर नियम कानून और दृश्य पूरी तरह रेलवे के प्लेटफार्म जैसा ही था। टीटीई  द्वारा टिकिट की चैकिंग, बेंडर द्वारा फेरी  लगा कर चाय व बिस्कुट-नमकीन को चिल्ला-चिल्ला कर बेचना, रात के खाने की बुकिंग एडवांस मे करना, टॉइलेट के लिये लाइन आदि। दिन मे हम तीनों ने जहाज का पूरी तरह बृहद भ्रमण किया। नीचे बाले डेक को देख कर हालत बड़े दयनीय लगे यात्री भेड़-बकरियों की तरह  बैठे थे जैसे तलघर के घुप्प अंधेरे मे बैठे हों। किचिन यात्रियों के हिसाब से छोटी थी जिसमे रात का खाना खाया। कॉमन लेटरीन-बाथरूम थे। अप्पर डेक से समुद्र का पूरा नज़ारा दिखाई देता था। शिप के अगले हिस्से को देख कर सिहरन हुई कितनी तेजी से समुद्र की  लहरों को चीरता हुआ जहाज तीव्र गति से आगे बढ़ता जा रहा था। समुद्र से तेज गर्जना के साथ डराबनी आवाज आ रही थी। जहाज का पिछला हिस्सा  उतना ही शांत था। जहाज  लगभग 300 मीटर लंबा था। जहाज का इंजिन हाउस भी देखा जिसमे जेनरेटर के शोर से असहनीय आवाज आ रही थी। अप्पर डेक के उपर छोटी छोटी फ़र्स्ट क्लास कैबिन थी जिसमे विस्तर के साथ अटैच लेटरीन-बाथरूम भी था। जिसका किरया हवाई जहाज से ज्यादा था। पूरे दिन तो समुद्र के नजारे जिसके एक तरफ समुद्र तट के जंगल और पहाड़ दूर से दिखाई दे रहे थे जबकि पश्चिम मे दूर दूर तक समुद्र-ही-समुद्र दिखाई दे रहा था। सूरज के डूबते समय अप्पर डेक पर चहल कदमी बड़ गई थी। सन-सेट की फोटो लेने बालों की होड़ जो लगी थी।  सूरज अस्त होने के बाद समुद्र से आती ठंडी हवाओं ने और मोटे-मोटे फॉर्म के आराम दायक  गद्दों के कारण कब  नींद के आगोश मे सो गये पता ही न चला।  पानी के जहाज की वो यात्रा अविस्मरणीय रही। सुबह 6-7 बजे गोवा पहुँच कर हम लोग होटल के लिये प्रस्थान कर गये। बस के द्वारा नॉर्थ गोवा और साउथ गोवा के टूर भी यादगार रहे। सुंदर-सुंदर सी-बीच देखने लायक थे। रात मे वोट पर गोवा के सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने लायक थे। जब बापसी मे हवाई जहाज यात्रा के दौरान सीट देखी तो बड़ी कोफ्त हुई कि हवाई जहाज कि पहली यात्रा मे निवेदन के बाबजूद उस काउंटर पर बैठी महिला ने एक भी खिड़की बाली सीट नहीं दी। उस एयर होस्टेज पर बड़ा गुस्सा आया। अनिल तुमने मुंबई से बापसी मे जलगांव मे ब्रेक जर्नी कर अगले 24 घंटे बाद पुनः ट्रेन का कन्फ़र्म टिकिट कि व्यवस्था की, रेल्वे की इस सुविधा की जानकारी हमे नहीं थी जबकि हमारे पापा रेल्वे मे गार्ड थे। इस जर्नी ब्रेक मे हम लोगो ने अजंता की गुफाएँ घूम ली थी। अब अपनी  इस यात्रा संबंधी योग्यता का उपयोग सेवनिवृत्त पांचों लोगो को साल मे एक-दो बार किसी जगह एकत्रित कर यात्रा का कार्यक्रम बनाने मे जरूर करना ताकि एकसाथ  पांचों मित्रों का, परिवार सहित यात्रा सेवानिवृत के बाद जारी रखी जा सके। अनिल आज तुम्हारे रिटायरमेंट पर वो घटना सहज ही याद आ रही है जिसमे तुम ने एक सच्चे दोस्त की भूमिका निभा कर हमे सहयोग किया था।  मुझे याद है अनिल जब मेरे दायें हाथ के पंजे मे फ्रेक्चर हुआ था और लगभग 3 हफ्ते का प्लास्टर कलाई तक बांधा हुआ  था उस दौरान हम दोनों डे-बुक सीट  पर बैठते थे तुमने प्लास्टर कटने और स्थिति सामान्य होने तक हर रोज लगभग पूरा काम दुगनी मेहनत और समय लगा कर अकेले ही किया था और हमसे छोटे-मोटे वाउचर छाँटने और लॉन्ग बुक लिखने, टोटल लगाने   के हल्के-फुल्के काम कराये। ऐसे आड़े वक्त तुमने खुद कष्ट उठा कर हमारी सहायता की इस घटना को हम कैसे भूल सकते हैं, ये थी तुम्हारी निस्वार्थ निश्छल दोस्ती।

तुम्हारी इस सफल बेदाग सेवानिवृत्ति पर हम अपने और अपने परिवार की तरफ से  हार्दिक शुभकामनाये और बधाई प्रेषित करते हैं। हम आपके और भाभी जी के दीर्घ और स्वस्थ जीवन की भी कामना करते हैं। आशा हैं नौकरी के दौरान समयाभाव के कारण जो सामाजिक और परवारिक रिश्तों को आप समय न दे सके हों उन्हे पूरे मन से अपना पूरा  समय दे और जो  कार्य या शौक ऑफिस कार्यों के कारण पूरे न कर पाये हों उन्हे पूरा समय देकर पूरे मन से एंजॉय करना।  इन्ही शुभकामनाओं के साथ।

तुम्हारा मित्र,

विजय सहगल


                     

शनिवार, 24 अगस्त 2019

खुशिओ का सांझाकरण


खुशियों का सांझाकरण


आज श्री कृष्ण जनष्टमी पर नोएडा, आलोक विहार निवासी के श्री मयंक और अंजु द्वारा क्लास के बच्चों के साथ अपनी खुशियों को सांझा किया गया। इन दोनों युवाओं द्वारा प्रत्येक बच्चे के लिये एक कॉपी, पेंसिल, रबर, कट्टर और एक चोकलेट के साथ हर बच्चे के लिये लंच वितरित किया मयंक और अंजु को सभी बच्चों ने बड़े उत्साहित होकर सुंदर गिफ्ट और स्वादिष्ट भोजन के लिये एक स्वर मे दोनों को बहुत बहुत धन्यवाद दिया। इन दोनों युवाओं ने आवश्यकता पड़ने पर क्लास के बच्चों को पढ़ाने के लिये समय देने का भी आश्वासन दिया। इस अवसर बच्चों का उत्साह और खुशी देखते ही बनती थी। हम बच्चों की ओर से प्रतिबोधक शिक्षा समिति की ओर से और व्यक्तिगत अपनी ओर से इन दोनों उत्साही युवाओं मयंक और अंजु को बहुत बहुत धन्यवाद ज्ञापित करते हैं।

विजय सहगल

गुरुवार, 22 अगस्त 2019

"पूर्व मंत्री की गिरफ्तारी"



"पूर्व मंत्री की गिरफ्तारी"





घंसु - भैया कितना जुल्म, बेइंसाफ़ी, हो रही एक ईमानदार देशभक्त  पूर्व गृह और वित्त मंत्री पर। कानून का सच्चा पालन करने बाला, देश को कई वित्तीय नीतियाँ देने बाले बेचारे को पहले की  पद और प्रतिष्ठितता को छोड़ भी देते तो वर्तमान का ध्यान तो रखना ही था वो एक सांसद भी था ।  ऐसी कौन सी आफ़त आन पड़ी थी या ऐसा कौन से पहाड़ टूट पड़ता यदि उसे दो दिन बाद न्यायालय का निर्णय आने के बाद सीबीआई या ईडी उस निरअपराधी को गिरफ़्तर कर लेती? भैया बहुत ज्यादती है जब इतने बड़े आदमी के साथ ऐसा हो रहा हैं तो हम आदमी की क्या बिसात?? घंसु अर्थात देश का एक साधारण और आम आदमी अर्थात "घंसु कबाड़ी"। आज तो भारत की राजनीति पर नॉन स्टॉप टिप्पड़ियाँ करे जा रहा था। "दीदी" जैसे तुम और तुम्हारी पूरी पार्टी सच के साथ खड़ी है बैसे ही अपन भी आप लोगो के साथ खड़ा हैं। अरे हम भी तो कबाड़ी का धंधा करके कमाई के अलावा  दो पैसे यहाँ वहाँ मार लेते है और ये भी भूलने का नहीं की अपन भी इकॉनमी मे कंट्रीब्यूट करता है फिर वे तो बहुत बड़े वित्त मंत्री थे। एक छोटे उदाहरण से स्पष्ट है कि वो कानून का कितना सम्मान करता है।  सोचिये कितनी दूरद्रष्टि से अपने घर मे दरबाजे जिनमे  वेशक ताला लगा के बंद कर रखा, पर घर की दीवारें कितनी छोटी रखी ताकि शरीफ आदमी भी दीवार फांद के आसानी से उसे गिरफ्तार कर सके। वो चाहता तो घर की दीवारे और गेट तिहाड़ जेल से भी ऊंची बनवा देता तो फिर सीबीआई या ईडी के अफ़सरान कैसे अंदर आते?? इतना कानून का सम्मान करने का इतिहास मे कोई दूसरा उदाहरण कभी देखा है भैया आपने? 

मैंने सवाल किया -: पर घंसु उन्हे जिम्मेदार मंत्री और नागरिक के नाते समर्पण कर देना चाहिये था?
घंसु आज तो बिल्कुल अपने लय और स्वर मे था -: अरे अपना वो क्या कहते है पूर्व फ़ाइनेंस मिनिस्टर ने साफ-साफ कहा है कि  "ज़िंदगी और आज़ादी" मे से मै आज़ादी चुनूँगा! ऐसे भाषण तो 1947 स्वतन्त्रता की लड़ाई मे भी सुनने को नहीं मिलता।   है कोई दूसरा मंत्री इस पोलटिक्स मे जो इतनी साफगोई से अपनी देशभक्ति पूर्ण राय दे? इसकी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी। अरे अपन भी कबाड़ा लेने  मे भी कभी ऊंचा नीचा करते हैं, पुलिस आती है, पूंछ-तान्छ करती हैं बैठके होती है, चाय पानी होता है पर अपना तो कभी कोर्ट-कचहरी होता ही नहीं, अपन भी तो इकॉनमी चलाता है, फिर बो तो इकॉनमी को चलाने के साथ उसकी पॉलिसी भी बनाता हैं, कुछ तो ध्यान रखने का? जब पुलिस एक साधारण कबाड़ी का इतना ध्यान रखता है तो बो तो एक भौत बड़ा आदमी है पुलिस को जरूर उसका ध्यान रखना चइये।


पर अचानक आकाशवाणी होती है -: "उन्हे मत सराहो जिन्होने अनीति                                                  पूर्वक सफलता पाई या संपत्ति कमाई"। 

मैंने कहा  घंसु पर एक पूर्व गृह मंत्री को बहादुर तो होना ही चाहिये? घंसु बोला इसमे कोई शक नहीं बो कितना बहादुर था। सीबीआई के  लोगो की  गिरफ्तारी के बाद बह अकेला ही  बहादुरी से सारी रात उनके पास काटा। मै बोला रात तो काटी पर ऑफिस मे कैदखाने की कोठरी मे नहीं क्योंकि उनका कहना था उन्हे अंधेरे से डर लगता हैं। एक पूर्व गृह मंत्री अंधेरे से डरे तो निडर होकर निर्णय कैसे कर सकता है?? मैंने घंसु से कहा-:  "भगवान जो करता है अच्छी ही करता है"। "ये तो अच्छा हुआ वे रक्षा मंत्री नहीं थे बर्ना बड़ी भद्द पिटती", जो अंधेरे से अपनी रक्षा नहीं कर सकता वो देश की रक्षा कैसे करता?

घन्सू से मैंने कहा -: उन पर रिश्वत के आरोप भी "बड़े" और "गंभीर" लगे है तुम्हें मालूम हैं उन्होने एक सौदे मे 305 क॰ रुपये की रिश्वत ली है। तो घंसु तमक कर बोला 305 रुपये कौन सी बड़ी रकम है।  मै 305 रुपये तो मिनटों मे कमा के फेंक सकता हूँ। और ताव मे आकार सौ के तीन और पाँच का एक नोट सामने फेंकते हुए कहा लो अभी ले लो ये 305 जो उसने लिए थे। अब मै भो-चक्का था मुझे पक्का यकीन हो गया कि घंसु ने आज अँग्रेजी ठेके से दबाई ली है!! मैंने कहा, तुम समझते हो 305 क॰ अर्थात 305 करोड़  रूपये कितने होते है? तुम्हें मालूम है, करोड़ मे कितनी ज़ीरो  होते हैं। जब मैंने कहा इसे  ऐसे समझो कि  2000 रुपये के 100  नोट की एक गड्डी और ऐसी ऐसी 152500 गड्डियाँ तुझे मिल जाये तो सोच तू कितना बड़ा आदमी हो जायेगा??

सुन कर आंखे फाड़ कर पगलाया सा बोला  "भैया अपन तो अंगूठा टेक गरीब आदमी हूँ",  "सारी ज़िंदगी गणित मे कच्चा रहा, सबसे बड़ा नोट भी 100 का ही देखा" उसका जबाब सुन कर हम दोनों की आँखों मे आँसू थे।  उसकी आँखों मे अपनी लाचारी और निर्धनता के आँसू थे। अब उसका नशा कफूर था। मैंने उसकी निश्चल  ईमानदारी सुन कर उसे अपनी बाहों मे लेते हुए कहा "घंसु अच्छा है तूँ अनपढ़ है तुझे नहीं मालूम 305 करोड़ कितनी बड़ी रकम है और मेरे आँखों मे निर्झर आँसुओ की धारा इसलिए बह रही  थी कि मै पढ़ा लिखा हूँ और समझ सकता हूँ कि 305 करोड़ की रकम कितनी बड़ी है?? आज अब हम दोनों ही गरीब थे।  

ये 305 करोड़ की  रकम  आम गरीब  आदमी  के हिस्से के निवाले छीन कर, उनके बच्चों के हिस्से का  पेट काट कर कमाई गई। देश का  एक ईमानदार नागरिक अपनी सारी ज़िंदगी मे काम करके भी इस राशि का एकांश भी नहीं कमा सकता। निर्धन लोगो के कफन को बेच कर की गई इस  कमाई को उन महान देशभक्त, ईमानदार पूर्व  मंत्री  ने अपने हिस्से मे लिया है। हम सोचने को मजबूर थे और चिंतित भी थे कि देश कि स्वतन्त्रता के लिए हमे  कितनी बड़ी कीमत अदा करनी पड़ रही हैं।  उक्त रिश्वत की रकम देश के नागरिकों को सोचने के लिए अपने पीछे अगणित सवालों को  छोड़ गयी ????

विजय सहगल                     
   

रविवार, 18 अगस्त 2019

रैन कोट




"बरसाती"



आज सुबह भ्रमण के पश्चात जैसे ही मै नोएडा स्थित अपनी सोसाइटी आम्रपाली ईडन मे अपनी नियमित व्यायाम के लिये पार्क मे पहुंचा बरसात शुरू हो गई थी, लोग बरसात से बचने यहाँ-वहाँ दुबक रहे थे। मुझे यकायक बचपन मे पापा द्वारा मेरे लिये खरीदी बरसाती की याद आ गई और मैं व्यायाम करते हुए बरसात मे भीगने का आनंद लेते हुए  अपनी एक्सर्साइज़ करता रहा बिना ये जाने हुए कि कितने  लोग पार्क के सामने स्थित फ्लैट्स की  बाल्कनी मे  खड़े हो कर बरसात का आनंद लेते हुए मुझ जैसे दीवाने को भी देख  रहे होंगे।

उन दिनों मै राजकीय आदर्श विध्यालय झाँसी मे कक्षा 3 या 4 मे पढ़ता था। हमारे घर से स्कूल लगभग  4-5 किमी॰  दूर था। उसी स्कूल मे मुझसे बड़े भाई प्रदीप और मेरे दो  ममेरे भाई दिलीप और गोपाल भी पढ़ते थे। बरसात का मौसम था। पापा ने हम दोनों भाइयों को बरसात  से बचने के लिये बरसाती दिला दी थी। रोज कॉपी-किताबों के साथ बरसाती भी स्कूल मे ले जाते थे पर बरसात नहीं होती थी। ऐसे ही सोच कर एक दिन मैंने तो स्कूल बस्ते मे बरसाती रख ली पर मेरे भाई ने बरसाती नहीं रक्खी। लेकिन उसी दिन  छुट्टी के बाद बापसी मे बरसात होने लगी। मै और मेरे भाई अपने ममेरे भाइयों के साथ स्कूल से बापस आ रहे थे। मेरे पास तो बरसाती थी मैंने झट से बरसाती खोली और पहिन ली। बरसाती घुटनों के नीचे तक आ गई। हाल्फ पैंट बाली यूनीफ़ोर्म थी जो पूरी तरह बरसाती से ढक गई। मेरे भाई प्रदीप और ममेरे भाई दिलीप और गोपाल के पास  उस दिन बरसाती नहीं थी। तो सबने तय किया कि हमलोग बेशक पानी मे भीग जाए कोई बात नहीं पर बस्ते मे रक्खी कॉपी-किताब नहीं भीगना चाहिये।  अतः ऐसा  करते है कि हम तीनों अपना बैग विजय को दे देते हैं चूंकि विजय के पास बरसाती हैं तो बरसाती से विजय भी नहीं भीगेगा और हम तीनों के बैग भी बचे रहेंगे। हम सबमे छोटे थे स्वीकृति मे हाँमी भर दी। अब क्या था एक हमारा बस्ता, तीन और बस्ते यानि कि चार बैग हमारे कंधों मे टांग दिये गये, दो दाहिनी तरफ और दो बायीं तरफ। तीनों भाई  तो मस्त  खाली हाथ मौज करते भीगते चल रहे थे, मैं गधों की तरह चार बस्तों का बोझा ढोते हुए मरे-मरे चल रहा था। बरसात की मौज-मस्ती मे ये तीनों भाई  तेज कदमों से कब आगे निकल गये पता ही नहीं चला, मै बोझ से  दबा धीरे-धीरे चल पा  रहा था। कुछ देर बाद बरसात भी  बंद हो गई और धूप निकाल आयी अब तो पसीने से तर-बतर मेरा बुरा हाल था। ये तीनों भाई मुझे दूर दूर तक दिखाई नहीं दिये, शायद दिख जाते तो बस्तों का बोझ कुछ कम हो जाता। ये लोग बगैर मेरा इंतज़ार किये सीधे घर निकल गये।  मामा का घर रास्ते मे  मेरे घर से पहले पड़ता था।  उन दोनों ममेरे भाइयों के बैग भी मुझे ही उनके घर पहुंचाने पड़े। मै अपने भाई और मेरा बस्ता लिये जब घर पहुंचा तो भाई बड़े मजे से कपड़े बदल कर भोजन कर रहे थे। हमे बड़ी कोफ्त हुई कि  बरसाती के चक्कर मे न तो हम बरसात का मजा ले सके और न ही घर सबके साथ जल्दी पहुँच सके बल्कि बरसाती की  बजह से हमे चार बस्तों का बोझ उठा कर 4-5 किमी॰ पैदल चलना  पड़ा। उस दिन से हमने मन ही मन तय कर लिया कि  बरसात का मजा लेने का अब आगे कोई भी मौका नहीं चूकेंगे और इस तरह उस दिन के बाद से हमने बरसाती को नमस्ते कह दिया। बरसात के  उस  दिन से आज तक मैंने कभी बरसाती नहीं पहनी यहाँ तक की नौकरी मे आने के बाद भी मैंने आज तक न कभी बरसाती खरीदी और न ही पहनी सिवाय पिछले वर्ष 2018 मे श्री अमरनाथ यात्रा के जहां बरसाती की अत्यंत आवश्यकता थी।

स्कूल और कॉलेज के समय मे भी बरसात का आनंद लेने का हम कोई मौका नहीं चूकते। कॉलेज जाते समय तो टेंपो या ऑटो से कॉलेज पहुँच जाते और बापसी मे पैदल ही भीगते हुए आते रहे। जब नौकरी मे प्रथम बार लखनऊ पहुंचे और बरसात का मौसम शुरू हुआ तो हमारे बड़े भाईसाहब श्री शरद  भी जो उन दिनों लखनऊ मे ही साथ साथ थे, ने उस समय की प्रसिद्ध "डक बैग" कंपनी की दो बरसाती लेने की चर्चा करी पर  मैंने उन्हे हमारे लिये उक्त बरसाती खरीदने के लिये मना कर दिया और कहा "कि मै अपने हिसाब से बरसाती पसंद कर ले लूँगा"। जब कभी ऑफिस जाने के टाइम पर बरसात आई तो मैंने प्लास्टिक के बैग मे एक कपड़ों का पूरा सेट तौलिया के साथ साइकल की आगे हैंडल मे लगी "डलिया" मे रख लिया और सही समय घर से  कार्यालय के लिये निकल लिये। बरसात का भरपूर आनंद लेते हुए जब हम आलम बाग से हज़रत गंज जाने के लिये निकले तो उस दिन की मस्ती को जब याद करते हैं तो आज भी रोमांचित हो कर खुश हो जाते है। जब बरसात की फुहारों मे  भीगते हुए हम आलम बाग रेल्वे कॉलोनी और चर्च की ढलान से मवैया के  रेल पुल के नीचे भरे पानी मे साइकल को सरपट दौड़ा कर निकलते, तो  साइकल, पानी को तेजी से दो भागों मे चीरती हुई   दोनों ओर  दूर दूर तक पानी को उछालती दौड़ी चली जाती। सामने से कभी कोई तेज टेम्पो या बस जब करीब से गुजरती तो उससे निकली लहरों के छीटें पूरी शरीर को पानी से समुद्र की  लहरों की तरह सराबोर कर देते। आगे जब हम  चारबाग होते हुए हुसैन गंज के पार विधान सभा को पीछे छोड़ते हुए कभी दारुलसफा के अंदर  से होते हुए बसंत टांकीज, लालबाग से और कभी एलाहबाद बैंक चौराहे से हज़रत गंज हलवासीय कोर्ट  स्थित ब्रांच पहुंचते। ब्रांच मे जहां एक ओर सारा स्टाफ बरसाती या छाते के बाबजूद आधा अधूरा भीगता हुआ अपने कपड़े सुखाता तब मै बड़े मजे से पूरे कपड़े, स्टेशनरी रूम मे चेंज  कर ठाट से अपनी सीट पार बैठ कर गर्म जोशी से हाथ मिलाता जबकि अन्य लोग भीगे हाथों को सिकोड़ कर हाथ बढ़ाते। जब कार्यालय बंद होने पर कभी बरसात होती तब तो कोई चिंता करने का सवाल ही नहीं क्योंकि तब तो मस्ती से भीगते हुए सीधे घर ही पहुँचना होता। लखनऊ प्रवास के दौरान कार्यालय के आने या जाने के समय जब जब बरसात हुई  मेरी यही दिनचर्या रही। ग्वालियर, रायपुर और भोपाल के  प्रवास मे चूंकि कार आ चुकी थी तो  मै पुनः बरसात के इस सुख से बंचित हो गया। एक बार भोपाल मे ऐसी ही कुछ परिस्थिति बनी जब कार शायद पंचर थी मैंने मोटर साइकल की सेवाये ली पर बापसी मे बहुत तेज बारिस हो रही थी मैं प्रादेशिक कार्यालय भोपाल मे पदस्थ था। प्रादेशिक कार्यालय सड़क की ढलान के मुहाने पर होने के कारण अक्सर कार्यालय की गैलरी मे 6-8 इंच पानी तुरंत भर जाता था। जब हम कार्यालय की समाप्ती पर बाहर जाने के लिये निकले तो देखा गैलरी मे 6-7 इंच पानी बह रहा हैं। लेदर के जूते के बारे मे मै सोच के बरसात मे निकलने मे संकोच कर रहा था। अचानक हमारे कार्यालय के एक साथी श्री दास जी भी उसी समय घर जाने के लिये निकले उन्होने अपने बैग से एक पोलिथीन का बैग निकाल कर उसमे जूते उतार कर रक्खे, एक छोटी पोलिथीन मे पर्स व मोबाइल डाला और बरसात के बीच बहते पानी मे घर के लिये निकल लिये । मुझे भी उनका आइडिया पसंद आया मैंने भी जूते निकाल प्लास्टिक बैग मे रक्खे और नंगे पाव मोटरसाइकल स्टार्ट की और घोर बरसात का आनंद लेते हुए घर की तरफ निकल लिया। सच मे उस दिन जो मजा आया उसने वर्षो बाद लखनऊ के पुराने दिनों की याद ताजा कर दी।

हम जैसे जैसे उम्र दराज़ होते जाते हैं ये  पद, प्रतिष्ठता के  छद्म आवरण, आडंबर ओढ़ लेते हैं, कोई क्या कहेगा?, दूसरे लोग  देख कर मेरे बारे मे  क्या सोचेंगे? सब मज़ाक बनायेंगे? आदि  जो मन के अंदर उठ रही बरसात मे भीगने जैसी  छोटी-छोटी खुशियो को रोक लेते हैं। आइये जहां भी खुशी के कुछ क्षण भी  मिले तो  भूल जाइये दूसरे क्या सोचेंगे? क्या कहेंगे? कही कोई कुछ नहीं सोच रहा और  न ही आपको कोई देख रहा है। सभी अपने को देख कर मंत्रमुग्ध है। बच्चे बन जाइये और आगे बढ़ कर  मन मे आ रही प्रसन्नताओं और खुशियों  के साथ दौड़ लगाइए।
           
विजय सहगल

रविवार, 11 अगस्त 2019

MP-15/1177

MP-15/1177


 

स्कूल या कॉलेज स्तर पर पढ़ाई करने के साथ काफी समय खाली रहता था। हमारे घर के बगल मे एक तरफ एक टेलर मास्टर कि दुकान थी और दूसरी तरफ एक इलैक्ट्रिक का काम करने बाले की दुकान थी। यूं ही बैठे बैठे उन लोगो को मै काम करते देखता था और टेलर मास्टर को सिलाई मशीन मे तेल डालते या मशीन को ठीक ठाक करते अथवा मशीन चला कर सिलाई करते देखता था। कभी खाली बैठे-बैठे मै भी उनकी मशीन मे तेल डालने या सिलाई करने का काम कर थोड़ा-थोड़ा काम सीख गया। मै आज भी घर पर सिलाई के छोटे-मोटे काम या मशीन को सुधारने के हल्के-फुल्के काम कर लेता हूँ। सीखने कि इसी आदत के कारण ही बिजली की दुकान पर बैठते हुए काफी काम जैसे छोटे बल्बों की झालर बनाना, सीलिंग या टेबल पंखा की छोटी-छोटी खराबियों या अन्य बिजली के उपकरण, मिक्सी, ट्यूब लाइट आदि कार्य मै आज भी कोशिश भर खुद ही करता हूँ जब तक की कोई बड़ा काम जैसे मोटर वाइंडिंग आदि का कार्य न हो। आज कल तो यू-ट्यूब का जमाना है जिसकी सहायता से मैंने  विंडो एसी की सर्विस भी  खुद ही की हैं। इस शौक के चलते हमारे पास काफी सारे टूल्स औज़ार जो बिजली के कार्य या प्लंबर या बढ़ई के कार्य मे इस्तेमाल होते हैं उपलब्ध है। जिनको हम खाली समय या छुट्टी के समय इस्तेमाल कर घर के छोटे छोटे रिपइरिंग आदि के काम कर लेता हूँ। इस बहाने कुछ नया सीखने मिलता हैं  और टाइम पास भी अच्छा हो जाता हैं। पर कभी कभी अपनी हद से बाहर कोई ऐसा काम पकड़ा जिसमे असफल हुए तो घर पर श्रीमती जी से जो लानत-मलानत सुननी पड़ती तब बड़ा अफसोस जनक पछतावा होता हैं।  
  
उन दिनों मेरी पदस्थपना रायपुर (छत्तीसगढ़) मे थी। छुट्टी बाले दिन पूर्णतया: आराम का दिन होता हैं। खाली बैठे खुराफात करने का कभी दिल होता तो कोई न कोई काम लेकर बैठ जाता हूँ। मेरे पास उन दिनों बजाज कंपनी का  एक "प्रिया" स्कूटर हुआ करता था। यध्यपि उसको खरीदे 8-9 साल ही हुए थे, देखने मे इतना खराब भी नहीं लगता था, न जाने क्यों मेरे दिल मे उसे पेंट करने की धुन सवार हो गई। दरअसल उन दिनों मैंने यूरेका फोर्ब्स कंपनी का वैक्युम क्लीनर लिया था। सेल्स मैन ने उसकी बड़ी-बड़ी खूबियाँ गिनाई थी उसमे से घर की साफ सफाई के अलावा पेंट आदि का काम भी कर सकते हैं। मैंने सोचा क्यों न इससे स्कूटर पेंट कर दिया जाये? अब जबकि दिमाक मे स्कूटर पेंट करने का निश्चय मैं कर चुका था तो इसके लिये आवश्यक सामान भी जुटाने शुरू कर दिये। टैगोर नगर स्थित मेरे घर के पास पचफेढी नाका पर एक पेंट की दुकान थी "अलीगढ़ पेंट हाउस" मैंने पता कर लिया था कि स्कूटर आदि के लिये ऑटो पेंट आते हैं जिनसे स्कूटर, कार आदि पेंट किए जाते हैं। पेंट को पतला करने के लिये "थिन्नर"  और ऑटो पेंट का एक लिटर का डिब्बा भी मै ले आया। थोड़ा अंदर से डर था मामला गड़बड़ न हो इसलिये बही पेंट लिया जो स्कूटर पर पहले से था, यानि हल्का हरा। शनिवार को आधे दिन कि छुट्टी रहती थी। जोखिम को कम करने के लिये मैंने उस दिन अगले पहिये के उपर के कवर यानि मड-गार्ड के छोटे हिस्से पर प्रयोग के तौर पर पेंट करने का निश्चय किया। मड-गार्ड को अच्छी तरह साफ कर सुखा कर मैंने थोड़ा पेंट वैक्युम क्लीनर के डिब्बे मे डाला थोड़ा से पतला करने के लिये थिन्नर डाला और वैक्युम क्लीनर को स्टार्ट कर पेंट किया, परिणाम उत्साह जनक था।  इसे देख कर मेरी हिम्मत और बढ़ गई। मुझे मेरे वैज्ञानिक दिमाक पर गर्व हुआ और  लगा अब मंजिल आसान हैं। अगले दिन रविवार था मैंने सुबह की चाय के बाद अपनी मंजिल हासिल करने के लिये तैयारी शुरू करदी। सीट, नंबर प्लेट, हैड लाइट, बैक लाइट को खोल कर अलग कर दिया ताकि उन पर पेंट के छींटे न पड़े। दाये बाये की डिक्की को अलग कर दिया ताकि उन पर पेंट कर के उनको अलग रखा जा सके।  जल्दी जल्दी नाश्ता भी निपटाया ताकि पूरी तन्मयता से स्कूटर पेंट का काम कर सके। दोनों तरफ के हैंडल कवर को अखबार से लपेट दिया ताकि उस पर भी कलर के छींटे न आये। पूरी तरह से ध्यान और सावधानी पूर्वक हर काम को अंजाम दे रहा था। पेंट करने के पूर्व की सारी तैयारी पूरी कर दोपहर मे लगभग 12 बजे हमने वैक्युम क्लीनर मे पेंट डाल कर स्कूटर को पेंट करना शुरू किया। चूकीं एयर प्रैशर से पेंट तेजी से हो रहा था। दायें और बाएँ पैनल को पेंट कर सूखने रख दिया सूखने मे थोड़ा वक्त लग रहा था तब तक स्कूटर के सामने बाले हिस्से मे भी पेंट हो गया पर पता नहीं क्यों स्कूटर  देखने मे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। बाकी हिस्से मे भी पेंट शीघ्र हो गया। लगा  शायद एक कोट से चमक काम आ रही हो थोड़ी देर बाद हमने दूसरी कोट भी पेंट कर दी, कि शायद इसके बाद फिनिशिंग और चमक आ जाये। लेकिन निराशा हाथ लगी। अब लग रहा था कि प्रयोग पटरी से उतर रहा हैं। जब मैंने देखा कि जगह-जगह आँखों से टपकते आंसू  जैसी बूंदे कई जगह बन गई तो मेरा माथा ठनका। खतरा साफ नज़र आ रहा था कि किस मनहूसियत मे स्कूटर की पेंटिंग के काम मे हाथ डाला। तब अचानक मेरी नज़र पेंट पतला करने बाली थिन्नर की बोतल पर पड़ी जो बैसी की बैसी पड़ी थी। ये क्या पेंट मे थिन्नर मिलना तो मै भूल ही गया जिस बजह से पेंट गाढ़ा होने के कारण जगह जगह बह कर आसुओं की तरह टपक कर गोल  बूंदों की तरह जम गया था और जो पेंट तीन स्कूटर को पेंट करने के लिये पर्याप्त था बो एक स्कूटर के पेंट करने मे ही भेंट चढ़ गया। अब तो बड़ी कोफ्त और अपने आप पर अंदर ही अंदर गुस्सा आ रहा था। श्रीमती जी ने भी लानत-मलानत की। बैसे भी बो ये सब करने के लिये मना कर रही थी। जैसे तैसे सभी अन्य उपकरणो जैसे सीट, पैनल, पहिये आदि फिट किये तो उस बदसूरत स्कूटर को देख कर बहुत दुःख हुआ, इससे तो पुराना स्कूटर ही देखने मे अच्छा लग रहा था।  अपनी प्रयोग धर्मिकता और स्यानपन  पर पर बहुत अफ़सोस हो रहा था। "चौबे जी छब्बे जी बनने गये और दुबेजी बन कर आये" बाली कहाबत याद हो आयी। लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था।

चलो यहाँ तक भी कोई बात नहीं थी मन मे वैज्ञानिकों बाली सोच आयी जिससे मन को कुछ तसल्ली दी कि  कुछ नया करने मे कई बार असफलता हाथ लगती हैं। "गिरते है सहसबार ही   मैदाने जंग मे, बो क्या..........."। लेकिन जब दूसरे दिन शाखा मे स्कूटर से पहुंचे तो पहुँचते ही क्ल्लेक्टरेट शाखा के हमारे ग्राहक जो क्ल्लेक्टर कार्यालय मे ही कार्यरत थे स्कूटर को देख कर हँसे और कहा "किस मूर्ख से स्कूटर पेंट कराया" सहगल साहब  और बगैर रुके  पेंटर को भला-बुरा कर लानत लगाते रहे। अब हमरी हालत "काटो तो खून नहीं" जैसी थी। बोले तो क्या बोले। किसी तरह उन श्रीमान से  पीछा छुड़ाया पर अब स्कूटर से कैसे पीछा  छुड़ाये?  स्कूटर पर बदसूरत पेंट किया ये समस्या छोटी लगने लगी, पर स्कूटर के पेंट पर लोगो की प्रतिक्रिया और पेंटर को भला बुरा कहना एक नयी और बड़ी  समस्या लगने लगी। हमने अगले दिन से  ही स्कूटर से बैंक जाना बंद कर दिया और समस्या के समाधान तक कार से जाना शुरू कर दिया। स्कूटर को घर पर ही रख कर बाज़ार मे स्कूटर पेंट करने बालों की जानकारी लेना शुरू कर दिया। पर दुर्भाग्य कहाँ पीछा छोड़ रहा था हमारे एक घरेलू मित्र श्री देशपांडे जी जो टेलीफ़ोन विभाग से सेवानिव्रत थे एक अन्य मित्र श्री अक्षय श्रीवास्तव के साथ उनके  गृह प्रवेश का निमंत्रण देने मेरे घर पर पधारे  और सामने ही स्कूटर को देख कर भड़क गये, नाराजी भरे लहजे मे बोले किस वेअक्ल मूर्ख पेंटर से पेंट कराया? मैं कुछ बोलता उसके पूर्व ही लाल-पीले होकर बोले, "उस गधे को चार तमाचे जड़ना चाहिये थे, कैसा भद्दा पेंट किया"।  चलो हमारे साथ उस बेबकूफ को  अभी ठीक करता हूँ। अब उनके कौन समझाये ये पैंट एक पढे-लिखे बैंक मैनेजर ने खुद ही किया हैं। किसी तरह उन्हे चाय पानी पिला कर आमंत्रण पत्र को स्वीकार कर दोनों को बिदा किया और तुरंत ही स्कूटर को घर के पिछवाड़े मे रखा ताकि घर आने-जाने  बाले किसी भी मेहमान की नजर स्कूटर पर न पड़े। अब दौड़ भाग कर स्कूटर पेंट बाले की तलाश कर बात की और एक दिन सुबह-सुबह ही स्कूटर लेकर उसकी दुकान पहुंचे। स्कूटर देख कर पेंट करने बाला भी कुछ उपदेश देने के मूड मे था तभी  मैंने उसे रोकते हुए अपनी बेबकूफी भरी स्कूटर को पेंट करने का सच्चा किस्सा कह सुनाया बरना बो भी मुझे अपरोक्ष रूप से गरियाने के लिये उताबला था।  

इस पूरे प्रकरण मे मैं एक बात सोचता रहा कि घर से लेकर कार्यालय, मित्र पड़ौसी से लेकर अपरचित लोगो ने स्कूटर के पेंट पर खूब आग उगली और आलोचनात्मक टिप्पड़िया की इन्ही सब कारणों से  हिंदुस्तान मे कभी कोई नवीन मौलिक खोज नहीं हुई और न ही  इसी कारण हिंदुस्तान मे कभी कोई बड़ी वैज्ञानिक सकसियत पैदा हुई।   

विजय सहगल

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

"धारा"-370


"धारा"-370



सात दशक से दूर पर प्यारा।
हुआ कश्मीर नज़दीक औ न्यारा॥ 
लुप्त  हो चली  बाजी पत्थर।
अंत हो गई "तीन-सौ-सत्तर"॥
अब कश्मीरी  जान  चुका हैं।
कुटिल नीति पहचान चुका हैं॥
गुरबत मे जो खाते पीते।  
नेता उनके "ऐश" मे जीते॥
झूठी "मेह" बूबा  से बू आती।
फ़रेब  "फ़ा" रुख से घबड़ाती॥
बेनकाब घाटी के नेता।  
भ्रष्ट-लूट के ये प्रणेता॥
आतंकबाद की जो है खान।
समझ ले तूँ ओ पाकिस्तान॥   
भारत का अब कोई न शानी।  
बरना मुंह की पड़ेगी खानी॥     
अब "नापाक" होश मे आओ।
जल्दी "पीओके"  लौटाओ॥

विजय सहगल

शनिवार, 3 अगस्त 2019

"हरि"-"जन" की व्यथा


"हरि"-"जन" की व्यथा 










दूर किनारे एक छोर पर ।
पीपल नीचे क्यों मेरा घर॥
वस्ती का सब कचरा-कूड़ा।
क्यों घर-किनारे, मेरे घूरा॥
भरें नीर पनिहारी सारी।
नहीं गगरिया उसमे म्हारी॥
डगर  डोलता ढ़ोर और  खूटा।
पनघट फिर क्यों मेरा अछूता॥   
गले मिले खेले सब बच्चे।
अधम हम, वे सब सुच्चे॥
आलय गाँव की शिक्षा शक्ति ज्यों ।   
छुआ - छूत की  अलग पंक्ति क्यों॥
देव एक देवालय एक है।
मेरा इसमे दखल शेष है?
हर पल, हर दिन, हरि का मन।
याद दिलाता, "हरि-जन" जीवन॥   
खुद के मैले, खुद  घृणा होती।
उसको "सिर" माँ, मेरी  ढोती॥
नियति एक  "मानव" की  जाना ।
फिर ऊंच-नीच का भेद क्यों माना॥
वर्ष हजारों का अन्याय।
कैसे करके दोगे न्याय?
"ईश" विधान से क्या डर सकते?
जाति-भेद का अंत  कर सकते?
मेरे जीवन का कुछ हिस्सा।
बांटो, गढ़ो नया कुछ किस्सा॥  
उठो, चुनौती तुम स्वीकारों।
तोड़ के जाति भेद दीवारों॥  
देकर स्वाभिमान के दो क्षण।
रक्षण दो,  ले-लो  आरक्षण॥
रक्षण दो,  ले-लो ..............

विजय सहगल