"प्रिय मित्र अनिल रस्तोगी"
आज तुम्हारी सेवानिव्रति हैं इस अवसर पर तुम्हारे साथ बिताये
पल रह-रह कर याद आ रहे हैं। हम पांचों लोगो की मित्रता के भी 37 बर्ष हो रहे हैं। 1982 मे मैने
हज़रत गंज शाखा मे जॉइन किया था तुम्हारे सहित दिनेश महरोत्रा, श्याम टंडन, संजीव टंडन और मैं एक-एक कर लड़ी मे
कैसे जुड़ते गये पता नहीं चला। हम पांचों को जब शाखा के अन्य स्टाफ ने "पाँच पांडव" कहना शुरू किया तब इस
बात का अहसास हुआ कि हमारी मित्रता प्रगाढ़ होकर एक मजबूत आपसी रिश्ते का रूप ले
चुकी हैं। लंच मे एक साथ चाय पीने जाना, लाल बाग के "चाय
और बंद मक्खन" ने इसे और मजबूती प्रदान कर दी थी। शर्मा स्वीट कि दुकान पर
आलू की टिक्की, रसगुल्ला और सोनपापड़ी का स्वाद तो जीव पर आज
भी चढ़ कर बोलता हैं। लंच टाइम मे हज़रत गंज
मे चहल कदमी करना और ऑफिस टाइम के बाद
बैंक के बाहर स्कूटर पर या फूटपाथ पर
शाम को निरुद्देश्य घंटो गपशप करना या घूमते रहना दिनचर्या का हिस्सा हो
गया था। इस दिनचर्या मे शनिवार शामिल नहीं होता था क्योंकि इस दिन श्याम को कानपुर
जाना होता था और दिनेश और संजीव को घर
निकलना होता था पर लगभग प्रत्येक शनिवार
हमारा-तुम्हारा किसी न किसी थिएटर मे फिल्म देखना कभी नहीं छूटता। जितनी फिल्मे उन
दिनों हमने तुम्हारे साथ देखी आगे इतनी फिल्मे देखना कभी संभव नहीं हो पाया।
ग्रुप मे सबकी अपनी अपनी अलग
पहचान थी। दिनेश भैया मुझे बुंदेलखंडी मे बोलने पर हड़काते पर खुद लक्ख्नवी अंदाज
मे बातचीत मे अवधी के शब्द "कहीस, रहीस, बोलहीस" का इस्तेमाल करते। श्याम और
मुझे टी शर्ट की दीवानगी थी जो प्रायः एक
दूसरे की टी शर्ट बदल कर पहन लेते, संजीव भाई का अलग ही स्टाइल था काम को समाप्त करने के बाद स्टाइल से धूप का चश्मा
पहनने का निराला अंदाज और इस बात का संकेत कि आज का बैंकिंग कार्य समाप्त पर
तुम्हारी शांत धैर्य पूर्वक मौन बिल्कुल छोटे भाई की तरह बगैर कुछ बोले हम चारों
को आवश्यक संदेश दे देता।
तुम्हें लखनऊ का वो मेला तो याद
ही होगा जिसमे हम पांचों एक साथ घूमने गये थे और मिट्टी के उस देशी फ्रिज़ मे तीन दिन पुराना सेव देख कर मै अनायास उसको अपने हाथ मे लेकर उसकी प्रशंसा करने
से अपने आप को नहीं रोक पाया और स्टाल पे बैठा वह युवक कुछ बोल पता उसके पहले ही
उस सेव को मैंने मुंह से खा लिया था और खुशी से चीखते हुए कहा "वाह तीन दिन
बाद भी इतना ताजा"!! उस युवक के बोलते ही हमने सोर्री बोलते हुए सेब के दोनों टुकड़े उसे बापस करते हुए हाथ बढाया पर तब
उसने रोकते हुए सेव खा लेने के लिये बोल दिया। दरअसल ये शैतानियाँ दोस्तों के साथ
होने पर अपने आप हो ही जाती हैं। हमे भी इस चीज का अहसास था कि "सामने
अकेले हम हैं, पर हमारे पीछे चार खड़े हैं"। दिनेश के देखरेख मे एक बार हमारे
अलीगंज स्थित घर मे सभी का रात रुकना बही
खाने का इंतजाम आदि कर लगभग सारी रात गपशप करना हमे अब तक याद हैं जिसमे हम पांचों
के अलावा श्री विपिन गर्ग भी थे जिनसे हम पांचों लोगो कि अच्छी जमती थी। कितने बार
गर्ग साहब के नरही स्थित घर पर भाभी जी के हाथ के चाय पकौड़े हम लोगो ने खाये। शाखा
मे श्री सतीश शर्मा, आचार्या जी, सुबोध
आनंद जी, योगेश एरन जी, सुरेंदर शर्मा
जी, फरहत इकबाल, मैडम देव, के के अग्रवाल, बीडी सिंह, ऋषि
मुनि पांडे, शरद शुक्ला, जोस
सेवेस्टियन आदि कितने लोगो के साथ एक खुशनुमा माहौल था। उस दौरान शानदार बिदाई या
वैल्कम पार्टियां हुआ करती थी। क्रिकेट क्लब का अलग ही जुनून था। श्री बी॰डी॰ सिंह
के साथ एआईबीईए यूनियन के झंडे तले आए दिन होने बाले बैंक के प्रदर्शन, नारे बाजी भी दिनचर्या के अंग थे।
तुम्हारे और संजीव के साथ बैंक की पहली एलटीसी मुंबई और गोवा, खजुराहो की यादगार रही थी। मुंबई मे एक हफ्ते ठहरना और पूरी मुंबई को
लोकल और बेस्ट की बसों से नापना न भूलने बाली यात्रा रही थी। मुंबई पहुँच कर पहले
दिन ठहरने मे काफी जद्दो-जहद करनी पड़ी थी। मुंबई मे ठहरने कि व्यवस्था शाखा के एक
सदस्य द्वारा कर दी गई थी पर जब उस स्टाफ का
संदर्भ लेकर पूर्व सूचना के मुताबिक हम
तीनों बैंक के फ्लैट मे उस मित्र के यहाँ मिठाई लेकर पहुंचे तो फ्लैट का ताला लगा मिला। काफी इंतजार
के बाद भी जब उनके मित्र नहीं आये तो पड़ौसी को उन तक मिठाई पहुंचाने का निवेदन कर
बापस आये तब महा नगर की आपा-थापी और रहने की समस्या, एकाकी जीवन मे पराभाव
से पहली बार रुबरु हुए। पर जल्दी ही ट्रेन मे मिले सहयात्रियों की जानकारी के आधार
पर एक धर्मशाला मे बड़ी अलमारी मिली जिसमे आश्रय लेकर हम लोग मस्ती से 6-7 दिन
रुके। सुबह-सुबह मुंबई की हल्की सर्दी मे नहाना, स्टील के
छोटे गिलास मे गर्म-गर्म 2-3 कप स्वादिष्ट चाय पीना, घरों से
बने बनाये नाश्ते का सुबह-सुबह नाश्ता कर घूमने निकलना और देर शाम बापस आकार "दिल्ली
रेस्टुरेंट" मे गर्म रोटी, दाल,
कड़ी पापड़, खिचड़ी के
साथ भोजन खाना दिन भर की थकावट को समाप्त कर सुबह फिर तैयार रहने की ऊर्जा प्रदान कर देता था। अलग
अलग दिन चौपाटी, मुंबई सबर्ब टूर, संजय
गांधी राष्ट्रीय ओपेन ज़ू, हैंगिंग गार्डेन, नारीमन पॉइंट, गेट वे ऑफ इंडिया, ताज होटल इस्कॉन टैम्पल, अलीफेंटा केव, मछ्ली घर आदि अनेक स्पॉट बहुत ही मस्ती और उल्लास के साथ घूमे। तुम्हें
याद है जब हम लोग दूर से अभिताभ बच्चन का बंगला देखने जाना चाहते
थे जिसमे मेरी कोई दिलचस्वी नहीं थी पर सबके
साथ मै इस शर्त पर तैयार हुआ था कि हम उनके घर चल उनसे मिलने का प्रयास करेंगे, खाली दूर से खड़े होकर बंगला नहीं देंखेंगे, और ऐसा
हमने किया भी था जब हम लोग सीधे उनके बंगले के दरवाजे तक पहुँचे। जब मैंने गार्ड से कुछ इस स्टाइल मे
पूंछा कि वह हँसे बिना नहीं रहा। मैंने पूंछा था कि,
"हमे मालूम है आप न मे जबाब देंगे फिर भी मै पूंछ रहा हूँ" "अभिताभ
जी घर पर हैं??" उसका जबाब "नहीं" मे ही था।
मैंने कहा "हमे मालूम था आप यही बोलेंगे"। गार्ड हंस दिया था। प्लान के मुताबिक हम लोगो को मुंबई से गोवा पानी
के जहाज से जाना था और बापसी मे गोवा से मुंबई हवाई जहाज से आना था। हवाई जहाज की
टिकिट बुकिंग तो याद होगी ही। हम दोनों ही नारीमन पॉइंट स्थित एयर इंडिया के ऑफिस
मे टिकिट बुक कराने गये थे। संजीव भाई साथ मे ऑफिस इसलिये नहीं गये थे क्योंकि
उन्होने रबर चप्पल पहनी हुई थी और चप्पल पहन के बुकिंग काउंटर पर बैठी हुई खूबसूरत
एयर होस्टेज के सामने जाना संजीव भाई को कतई गवारा नहीं था।
पानी के जहाज से मुंबई से गोवा कि
यात्रा बड़ी यादगार रही थी जो लगभग 20-22
घंटे की थी। पानी के जहाज से वह अब तक पहली और अंतिम अविस्मरणीय यात्रा रही। इससे
पहले कभी शिप से यात्रा नहीं की थी उसके नियम आदि नहीं मालूम थे, अप्पर डेक का टिकिट था। बन्दरगाह के गेट
खुलते ही दूसरों को देख कैसे हम लोग समान लेकर डेक पर दौड़ कर पहुंचे। लोगो ने अपने-अपने चादर फैला कर
जगह घेर ली थी, बैसे ही जैसे ट्रेन के सामान्य डिब्बे मे सीट
को घेरने के लिये रुमाल, सामान, बैग या
पेपर खिड़की से फेंक कर सीट रोक दिया करते
थे। अपना सब सामान तो पैक था फिर हम तीनों ही सामान के साथ प्रवेश द्वार के बायें
बाली जगह पर सामान के साथ फैल कर बैठ गये थे। बड़ा अजीब द्रश्य था। कुछ लोगो और
कुली से जगह के लिये कुछ कहा-सुनी भी हुई थी। फिर शिप मे ही मोटे गद्दे किराये से
मिलने की बात पता चली तो हम लोगो ने तुरंत ही तीन गद्दे किराये से लिये जिससे यात्रा
सुगम और आरामदायक हो गई थी। शिप की यात्रा जरूर थी पर नियम कानून और दृश्य पूरी
तरह रेलवे के प्लेटफार्म जैसा ही था। टीटीई
द्वारा टिकिट की चैकिंग, बेंडर द्वारा फेरी लगा कर चाय व बिस्कुट-नमकीन को चिल्ला-चिल्ला कर
बेचना, रात के खाने की बुकिंग एडवांस मे करना, टॉइलेट के लिये लाइन आदि। दिन मे हम तीनों ने जहाज का पूरी तरह बृहद भ्रमण
किया। नीचे बाले डेक को देख कर हालत बड़े दयनीय लगे यात्री भेड़-बकरियों की तरह बैठे थे जैसे तलघर के घुप्प अंधेरे मे बैठे हों।
किचिन यात्रियों के हिसाब से छोटी थी जिसमे रात का खाना खाया। कॉमन लेटरीन-बाथरूम
थे। अप्पर डेक से समुद्र का पूरा नज़ारा दिखाई देता था। शिप के अगले हिस्से को देख
कर सिहरन हुई कितनी तेजी से समुद्र की लहरों को चीरता हुआ जहाज तीव्र गति से आगे बढ़ता जा
रहा था। समुद्र से तेज गर्जना के साथ डराबनी आवाज आ रही थी। जहाज का पिछला हिस्सा उतना ही शांत था। जहाज लगभग 300 मीटर लंबा था। जहाज का इंजिन हाउस भी
देखा जिसमे जेनरेटर के शोर से असहनीय आवाज आ रही थी। अप्पर डेक के उपर छोटी छोटी
फ़र्स्ट क्लास कैबिन थी जिसमे विस्तर के साथ अटैच लेटरीन-बाथरूम भी था। जिसका किरया
हवाई जहाज से ज्यादा था। पूरे दिन तो समुद्र के नजारे जिसके एक तरफ समुद्र तट के
जंगल और पहाड़ दूर से दिखाई दे रहे थे जबकि पश्चिम मे दूर दूर तक समुद्र-ही-समुद्र
दिखाई दे रहा था। सूरज के डूबते समय अप्पर डेक पर चहल कदमी बड़ गई थी। सन-सेट की
फोटो लेने बालों की होड़ जो लगी थी। सूरज
अस्त होने के बाद समुद्र से आती ठंडी हवाओं ने और मोटे-मोटे फॉर्म के आराम दायक गद्दों के कारण कब नींद के आगोश मे सो गये पता ही न चला। पानी के जहाज की वो यात्रा अविस्मरणीय रही।
सुबह 6-7 बजे गोवा पहुँच कर हम लोग होटल के लिये प्रस्थान कर गये। बस के द्वारा
नॉर्थ गोवा और साउथ गोवा के टूर भी यादगार रहे। सुंदर-सुंदर सी-बीच देखने लायक थे।
रात मे वोट पर गोवा के सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने लायक थे। जब बापसी मे हवाई जहाज
यात्रा के दौरान सीट देखी तो बड़ी कोफ्त हुई कि हवाई जहाज कि पहली यात्रा मे निवेदन
के बाबजूद उस काउंटर पर बैठी महिला ने एक भी खिड़की बाली सीट नहीं दी। उस एयर
होस्टेज पर बड़ा गुस्सा आया। अनिल तुमने मुंबई से बापसी मे जलगांव मे ब्रेक जर्नी
कर अगले 24 घंटे बाद पुनः ट्रेन का कन्फ़र्म टिकिट कि
व्यवस्था की, रेल्वे की इस सुविधा की जानकारी हमे नहीं थी
जबकि हमारे पापा रेल्वे मे गार्ड थे। इस जर्नी ब्रेक मे हम लोगो ने अजंता की
गुफाएँ घूम ली थी। अब अपनी इस यात्रा
संबंधी योग्यता का उपयोग सेवनिवृत्त पांचों लोगो को साल मे एक-दो बार किसी जगह
एकत्रित कर यात्रा का कार्यक्रम बनाने मे जरूर करना ताकि एकसाथ पांचों मित्रों का, परिवार
सहित यात्रा सेवानिवृत के बाद जारी रखी जा सके। अनिल आज तुम्हारे रिटायरमेंट पर वो
घटना सहज ही याद आ रही है जिसमे तुम ने एक सच्चे दोस्त की भूमिका निभा कर हमे
सहयोग किया था। मुझे याद है अनिल जब मेरे दायें
हाथ के पंजे मे फ्रेक्चर हुआ था और लगभग 3 हफ्ते का प्लास्टर कलाई तक बांधा हुआ था उस दौरान हम दोनों डे-बुक सीट पर बैठते थे तुमने प्लास्टर कटने और स्थिति
सामान्य होने तक हर रोज लगभग पूरा काम दुगनी मेहनत और समय लगा कर अकेले ही किया था
और हमसे छोटे-मोटे वाउचर छाँटने और लॉन्ग बुक लिखने, टोटल
लगाने के हल्के-फुल्के काम कराये। ऐसे आड़े वक्त तुमने
खुद कष्ट उठा कर हमारी सहायता की इस घटना को हम कैसे भूल सकते हैं, ये
थी तुम्हारी निस्वार्थ निश्छल दोस्ती।
तुम्हारी इस सफल बेदाग
सेवानिवृत्ति पर हम अपने और अपने परिवार की तरफ से हार्दिक शुभकामनाये और बधाई प्रेषित करते हैं।
हम आपके और भाभी जी के दीर्घ और स्वस्थ जीवन की भी कामना करते हैं। आशा हैं नौकरी
के दौरान समयाभाव के कारण जो सामाजिक और परवारिक रिश्तों को आप समय न दे सके हों
उन्हे पूरे मन से अपना पूरा समय दे और
जो कार्य या शौक ऑफिस कार्यों के कारण पूरे
न कर पाये हों उन्हे पूरा समय देकर पूरे मन से एंजॉय करना। इन्ही शुभकामनाओं के साथ।
तुम्हारा
मित्र,
विजय सहगल







