बुधवार, 29 मई 2019

SURYA NAMASKAR


"सूर्य नमस्कार"




जो हैं जगत का पालन हारा।
फैला के जग को उजियारा॥
करते तिमिर का शमन है।
ॐ मित्राय को नमन हैं॥

भोर की वो लालिमा।
प्रतीक प्रातः अरुणिमा॥
कलरव पक्षियों का गमन हैं।
ॐ रवेय को नमन हैं॥
    
मेघ का घर वेध कर।
किरण फूटी तेज धर॥
घुप्प अंधेरे मे छुपि,
उम्मीद  की वो इक किरण है। 
  सूर्याय  को   नमन  हैं॥

जगत सोने सा सजा।
अक्षय अलौकिक ऊर्जा॥
"गति" जीव की अक्षय अमन हैं।
 भानवे  को  नमन  हैं॥  

चरम पर जब तेज पुंज।
जगत तब निस्तेज शुन्य॥   
अति ऊष्मा का परिवहन हैं।
ॐ खगाय को नमन हैं॥

अस्तान्चल का कदम पहला।
जीव नभ मे "पर" फैला॥
चहुं ओर करता भ्रमन हैं।
ॐ पूष्णे को नमन है॥

सांझ के पहले का नीरव।  
फिर परिंदों का कलरव॥
इंगित घरौंदों को  गमन हैं।  
ॐ हिर्णयगर्भाय नमन हैं॥

गायों के अल्हड़ ये बछड़ें।
रंभा कर फिर मिले- बिछुड़े॥
गौधूलि वेला स्मरन हैं।
ॐ मरीचये नमन है॥

नदी का ये बहना निर्झर।
सप्त रंगी धनुष बनकर॥
धनुष बीच फिर, भूमि-रन हैं॥
ॐ आदित्याय नमन है॥

हिम से आच्छादित ये चोटी।
किरने  सुनहरी  कोटि-कोटि॥
चोटी पर  भंडार  स्वर्न है॥ 
ॐ सवित्रे को नमन है॥

सागर की अपार  जलनिधि।
विखेर आभा अनंत चहुदिशि॥
लहरों पर बहता कांचन है।
ॐ अर्काय को नमन है॥
   
नयी ऊर्जा, आभा,  तेज से।
फिर उदय कल, नये वेग से॥
गिर कर उठना, पुनरागमन है।
ॐ भास्कराय  को नमन हैं॥

विजय सहगल
    







शुक्रवार, 24 मई 2019

बसई



"बसई"




गर्मियों की छुट्टी मे प्रायः सभी बच्चे अपने मामा, चाचा, बुआ या मौसी के घर छुट्टियाँ बिताने जाते थे। बचपन मे मेरा अपने बड़े भाई प्रदीप के साथ मध्य प्रदेश के जिला दतिया के एक छोटे से गाँव बसई आना जाना बहुत रहा। बसई मे मेरे फूफाजी  स्व॰ श्री भगवत नारायण कंचन वहाँ के सरकारी विध्यालय मे प्राचार्य थे और बसई मे ही छोटे से मकान मे किराये से  रहा करते थे। आज का तो पता नहीं पर  उस समय बसई एक बहुत छोटा सा गाँव ही था। उन दिनों वहाँ पर बिजली भी नहीं थी। रात के नितांत अंधेरे मे डूबा छोटा गाँव बहुत शांत और सुंदर लगता था। फूफा जी को शतरंज खेलने का बहुत शौक था। वे अपने मित्र के साथ स्कूल से आने के बाद दिन या रात को फुर्सत के खाली समय मे शतरंज खेला करते। उनको देखा देखी हमने भी थोड़ा बहुत शतरंज खेलना सीख लिया था। शौचालय के लिये घर से 60-70 कदम दूर जाना पड़ता था। दिन मे तो कोई बात नहीं पर रात मे अकेले जाने मे अंधेरे से डर लगता था इसलिये अपने बड़े भाई को साथ ले जाया करता। जब तक हम शौचालय मे होते लगातार थोड़ी-थोड़ी देर मे आवाज लगाते रहते "तुम हो न"?? अगर उत्तर देने मे कुछ भी विलंब हुआ तो आधा-अधूरा शौच निपटा कर तुरंत बाहर भागते, कहीं ऐसा तो नहीं भाई खुद डर कर घर आ गये हों। सुबह सुबह कभी बर्फ के साथ और कभी बिना बर्फ के रूह अफ़जा या दही या दूध की लस्सी पीने मिलती क्योंकि बर्फ की उपलब्धता बढ़े लोगो या यूं कहे एक विलासता की वस्तु होती थी। उस समय मे 10-20 पैसे मे एकाध पाव बर्फ मिलती थी। लस्सी ग्रहण करने के बाद अपने अपने कपड़े-लत्ते लेकर हम लोग बुआ के साथ रहट पर नहाने निकल जाया करते, जो घर से 1-1.5 कि॰मी॰ दूर खेतों के किनारे आमों के पेड़ों के बीच  हुआ करती थी। बुआ जी अपने कपड़े के गट्ठर को धोने मे लग जाती तब तक हम लोग एकाध घंटे रहट के पानी से मस्ती करते हुए खूब नहाते। रहट के पानी से नहाते और नहरों से बहते हुए पानी को  दूर खेतों के बीच से रेल गाड़ी का आना-जाना देखना बड़ा अच्छा लगता था। यात्री गाड़ी हो तो लोगो को डिब्बों मे बैठा देखना, हाथ हिलाते देखना कौतुहल का बिषय होता और यदि मालगाड़ी होती तो उसके डिब्बों को गिनना और गार्ड साहब को हरी झंडी हिलाते देखना एक शगल होता। रहट से बापस आने के बाद कड़क भूख  लगती और प्रायः पराठे के साथ सब्जी का नाश्ता कम खाना एक साथ हो जाता। कड़ी धूप और गर्मी मे निकलने का तो कोई सवाल ही नही "जाये तो जाये कहाँ जायें" इसलिये हाथ का पंखा झलते हुए नीचे दालान मे पड़े रहते। नींद तो आती नही थी लेकिन उस समय का देशी टी॰वी॰ की खोज कर उसको देखा करते। आप हैरान होंगे कि गाँव मे जब लाइट ही नही थी तो टी॰वी॰ का क्या मतलब? उस समय बसई मे क्या हिंदुस्तान मे भी टी॰वी॰ नहीं आया था। होता इस तरह था। कि सड़क के गेट को बंद कर जब कोई तेज धूप मे सड़क से निकलता तो उसकी ब्लैक एंड व्हाइट या कभी कभी गहरे रंग के कपड़े होने पर रंगीन परछाई दरवाजे के उपर की  दरांचो से दरवाजे के उपर  दीवार पर हू-ब-हू बनती एवं चलती-फिरती  दिखाई देती! जिसे देख कर खूब उत्साहित होते। कभी कोई व्यक्ति साइकिल से निकलता तो बड़ी सुंदर चलती फिरती फिल्म देखकर विज्ञान की दुनियाँ मे खो जाते। चूंकि गाँव छोटा था हर समय कोई आता जाता नही दिखता तो हम दोनों भाइयों मे से ही कोई भरी दोपहरी मे दरवाजे के बाहर फिल्म का हीरो बन कर एक्टिंग करते हुए  यहाँ से वहाँ निकलता फिर एक दूसरे से पूंछते की तुम क्या बनते हुए या करते हुए निकले थे ताकि परछाई से बनी फिल्म की सत्यता की पुष्टि की जा सके। उन दिनों रात मे घरों मे रोशनी के लिये मिट्टी के तेल का  दीपक जिन्हे हम लोग ढिवरी भी कहते थे जलाये जाते थे। कपड़े की बाती को मिट्टी के तेल मे भिगो कर जलाते थे। एक रात शतरंज खेलते समय "मिट्टी के तेल का दिया" लुढ़क गया बोरी-फट्टी जिस पर बैठ कर शतरंज खेल रहे थे उसमे आग लग गई बड़ी मुश्किल से  आग पर काबू पाया तब तो बुआ-फूफाजी की खूब डांट लगी। एक बार शाम का खाने के बाद पैदल घूमते घामते बसई रेल्वे स्टेशन तक रात के घुप्प अंधेरे मे सन्नाटे के बीच फूफाजी के साथ "चालक बंदर और धूर्त मगरमच्छ को मीठे जामुन खिलाने" की कहानी सुनते हुए गये।  वह यादगार कहानी और निस्तब्ध स्याह काली रात मुझे आज भी अच्छे से याद है। रात मे छत्तों पर जमीन मे लाइन लगाकर विस्तर लगा कर सोना का एक अलग ही सुख का अहसास कराता  था। निपट अंधेरी रात मे आसमान मे बिखरे लाखों तारों की चमकती रोशनी को  देखना एक अलग ही सुखद और यादगार अहसास देता। टिमटिमाते तारों से भरे अंतहीन आकाश मे अपने अस्तित्व के बारे मे सोच कर एक अल्पता भरा आभास होता  ऐसा लगता मानो इतने बड़े   तारों भरे स्याह आकाश मे अदने से आदमी क्या अस्तित्व हैं।

मैं 11-12 साल का रहा हूंगा अपनी दोनों छोटी बहिनो के साथ स्कूल की छुट्टियों मे  पुनः बसई जाना हुआ। वहाँ पहुँच कर पड़ौसियों से पता चला बुआ-फूफाजी तो अपने घर तालवेहट गये हुए हैं। उन दिनों संचार संपर्क के इतने आम सुलभ साधन नही थे। झाँसी से बसई के लिये भी सुबह शाम की ही बस सेवा थी। अब तो बड़ी मुश्किल, क्या किया जाए? जैसे आये थे उल्टे पाँव बापस जाने को  सोच कर बस स्टैंड की तरफ जैसे ही कदम बढ़ाये फूफाजी के पड़ौस मे रह रहे एक परिवार की महिलाओं ने हम तीनों छोटे-छोटे बच्चो के बारे मे पूंछ परख की। जब उन्हे पता चला मास्टर साहब (बसई मे फूफाजी को लोग इसी नाम से संबोधित करते थे) और बहिन जी (मेरी बुआ) के भतीजे भतीजी हैं तो उन लोगो ने हमे अपने घर बुला लिया और बापस ये कहते हुए नहीं जाने दिया कि क्या हुआ तुम्हारी बुआ नहीं हैं हम भी तुम्हारी बुआ की तरह हैं जब तक बहिन जी नहीं आ जाती तुम लोग यही रुको। बहिन जी को जब मालूम पड़ेगा कि बच्चे आये थे और हमारे न होने की बजह से बापस चले गये  तो हमसे नाराज होंगे। उस अपनत्व और ममतामयी माँ का आग्रह मैं न ठुकरा सका। ये सोच कर शायद अगले दिन बुआ आ जाएंगी हम तीनों बच्चे उनके घर रुक गये। बड़ी सी हवेली नुमा वो घर काफी बड़ा था। घर के बाहर लंबा चौड़ा चबूतरा उस घर कि संपन्नता को बयां कर रहा था। घर के बड़े आँगन मे एक ओर रसोई थी जिसमे सुबह शाम का खाना होता।  उस दिन बालमन पर बुआ के घर बसई मे उन को न पाकर जो संकट सा  लग रहा था  उसे उस घर के सारे सदस्यों ने अपने प्यार और अपनेपन के व्यवहार से बुआ के बसई मे न होने की  कमी को  दूर कर दिया था। हमे कुछ कुछ याद हैं उस परिवार का बसई मे बस स्टैंड के पास बड़ी दुकानों मे अच्छा  व्यवसाय था। वे कौन लोग थे नहीं जानता  पर संयुक्त परिवार के सभी लोग बहुत ही स्नेहिल और अच्छे लोग थे। इन 50 साल मे दुबारा बसई जाना नहीं हुआ। हम तीनों लोग उस परिवार से ऐसे हिल-मिल गये कि बुआ के  अगले दिन-अगले दिन  आने की बाठ जोहते रहे और उस परिवार ने हमे आग्रह पूर्वक रोके रखा। 3-4 दिन निकल गये पर बुआ-फूफाजी का आना नहीं हुआ और हम उन श्रेष्ठ जनों के  परिवार मे ही 3-4 दिन रुके रहे। आखिरकार चौथे या पांचवे दिन हम लोग बिना बुआ के बसई आये और बिना मिले अपने घर बापस झाँसी पहुंचे।

आज लगभग 48-50 साल बाद कभी सोचता हूँ कि बसई जैसी छोटी से जगहों या अन्य ऐसे छोटे कस्बों  मे आपसी भाई-चारा, रिश्ता, दूसरों के सुख-दुःख मे सांझेदारी, या दूसरों के रिश्तों को इतनी संजीदगी से निभाया जाना, जिसकी कल्पना भी  बड़े शहरों या महानगरों नहीं की जा सकती। बसई मे  जिस परिवार मे अविस्मरणीय बचपन के  4-5 दिन व्यतीत किये अब सेवानिव्रत जीवन मे उस परिवार के बारे मे और अधिक जानने या मिलने की उत्कंठा हमे अवश्य ही पुनः एक दिन  बसई ले कर जायेगी ऐसी हमारी आशा हैं।      

विजय सहगल         

सोमवार, 20 मई 2019

खोया बचपन


"खोया बचपन"

ये कुछ पंक्तियाँ उन बच्चों को समर्पित जो भवन-निर्माण कार्यों मे लगे अपने मजदूर माँ-बाप के जीविकोपार्जन के कारण गाँव के अपने स्कूल को छोड़ कर महानगरों परिवार के साथ यूं ही दर-दर भटक कर अपना बचपन खो चुके हैं या धीरे-धीरे ऊसे खोने की कगार पर हैं, उनकी व्यथा-कथा!!



नहीं हैं शिकायत मुझे इस जहाँ पर।
जमाने को खुशियाँ! मुझे गम यहाँ पर?

बच्चों को आँगन तुमने दिया था।
बचपन-लड़कपन सबने जिया था॥
मखमल की चादर चाँदी का  खिलौना।
धूल भरा रस्ता  फटा  सा बिछौना ॥
मेरे हिस्से आया,  मुझको बयाँ  कर?
नहीं हैं शिकायत मुझे इस जहाँ पर।

सुंदर सी वर्दी, बस्ते-किताबें।
इठलाके जाना लड़कपन बतावें॥ 
प्यारा मदरसा, मोहब्बत के किस्से।
निरक्षर जवानी, मुफ़लिसी मेरे हिस्से॥
चढ़ा आसमां वो, सरजमीं मै कहाँ पर?
नहीं हैं शिकायत  मुझे  इस जहाँ पर॥  

रहने को उनके हवेली सजाना।
कच्चा घरौंदा तब खुद बनाना॥
रहने को जब वे हवेली मे आये।
उजड़ा घरौंदा वतन फिर पराये॥
देकर उन्हे घर,
मेरा घर फिर एक-खुले आसमां पर।
नहीं हैं शिकायत मुझे इस जहाँ पर॥

नेकी ख़ुशी और बरक्कत बनादो।
दो जून की बस रोटी खिला दो॥
स्कूल का गम-बचपन का रोना।
तसल्ली दिलाना यादों मे खोना॥
बचपन भुला कर उसे तूँ जवाँ कर।
नहीं हैं शिकायत मुझे इस जहाँ पर॥
   

विजय सहगल
    

गुरुवार, 16 मई 2019

जीवन की कश्ती



जीवन की कश्ती








भंवर मे फ़सी कश्ती, भगवान तुम उबारो।
जीवन भरा अंधेरा, रौशन  कर  सँवारो॥

पथ मे है बड़े कांटे,  लोभों का  बड़ा   डेरा। 
चलना है बड़ा मुश्किल, तृष्णा ने  है जो घेरा॥
पथ को सुपथ बना कर, जीवन सुगम  सँवारो।    
भंवर  मे  फ़सी  कश्ती, भगवान  तुम उबारो॥
 
कमजोर सी कश्ती पर, सितम लहरों का बड़ा भारी।
दुर्बल सी मेरी काया, मन-विषयों मे भटक हारी॥     
मन को गमन बना कर, सद् मार्ग पर विचारों।
भंवर  मे  फ़सी  कश्ती  भगवान तुम  उबारो॥

छिद्र लोभ के है, पानी से भरी नैया।      
डूब रही कश्ती के, अब तुम्ही खिवैया॥
जीवन रूपी नैया, भवतार  कर  उतारो।
भंवर मे फ़सी कश्ती भगवान तुम उबारो॥
  
लोभ मोह माया मे जन्म व्यर्थ  बीता।
शेष बचा जीवन, हो पथ प्रदर्शक गीता॥
जीवन अनंत यात्रा, के  चक्र से निवारो।  
भंवर मे फ़सी कश्ती भगवान तुम उबारो॥

धर्म-सत्य, प्रभा-पथ पर आगे कदम बढाना।
नर-नारी के उत्थान का संदेश है बताना॥      
सद् भावना बढ़ा कर, दुर्भावना उतारो।
भंवर मे फ़सी कश्ती भगवान तुम उबारो।

धन धान्य कमाने मे सारा जनम  गवाया।
अंत समय "हरि बिना" ये काम न आया॥
ये तो यूं ही बीता, अगला जनम सँवारो।  
भंवर मे फ़सी कश्ती भगवान तुम उबारो॥

विजय सहगल



बुधवार, 8 मई 2019

KHADAGPUR, खड़गपुर




"खड़गपुर"



 

कभी कभी कुछ यात्राएं कुछ खास बन जाती हैं जिसे भुलाया जाना कभी मुमकिन नहीं होता। 20 मई 1991 का दिन मुझे अच्छी तरह याद हैं। शायद यात्रा की शुरुआत कुछ अच्छी नहीं रही थी। उस दिन हम अपनी पत्नी और बेटे के साथ जग्गनाथ पुरी की तीर्थ यात्रा पर जा रहे थे। उत्कल एक्स्प्रेस मे झाँसी  से हमारा आरक्षण था। रात  को  08-09 के बीच का समय थाइस ट्रेन का झाँसी से चलने का। लगभग 40 घंटे की यात्रा थी तो हमने सोचा कुछ समय पास करने का समान जैसे लूडो या साँप सीढ़ी ले ली जायेये सोच कर मैं अपने 4 साल के बेटे के साथ प्लेटफॉर्म पर स्थित दुकान या ठेले की खोज करने लगा इसी बीच कोई अन्य  ट्रेन प्लेटफॉर्म पर  आ गई और बेटा का हाथ छूट गया वह भीड़ मे कहीं आगे पीछे हो गया। मैं बापस पत्नी के पास पहुंचा कि शायद बेटा वहाँ पहुँच गया होगापर जब वो  वहाँ नहीं पहुंचा तो मैं  घबड़ा कर चिंतित हो गया कि इस भीड़ मे उसे कैसे तलाश करें। गाड़ी भी जो सामने खड़ी थी5-7 मिनिट मे छूट जायेगीयदि बेटा  गाड़ी पर कही चढ़ गया तो मामला गंभीर हो सकता था। जो कुछ भी करना था तुरत-फुरत  करना था। मैंने बगैर कुछ सोचे समझे बेटे का नाम लेकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए आगे से पीछे प्लेट फॉर्म पर भागना शुरू किया! अपने गृह नगर मे होते हुए भी अपने आपको  इतना असहायनिसक्त और कमजोरअकेला कभी नहीं पाया था। भाग्य कुछ अच्छा था एक फौजी सिपाही बेटे को लेकर हमे तलाश कर रहा था। मेरी आवाज सुन कर बेटे ने हमे देख लिया था। वह फौजी सज्जन वास्तव मे भगवान के रूप मे सहायता करने साक्षात आ  गये थे। वे भी चिन्तित थे कि बच्चे के पेरेंट सामने खड़ी ट्रेन के अंदर हैं या प्लेटफॉर्म पर हैं। मैं उनका पूरी तरह धन्यवाद भी नहीं दे पाया उनका नाम या परिचय भी नहीं पूंछ सका कि सामने खड़ी गाड़ी चल दी और वह फौजी सज्जन जो उसी गाड़ी से यात्रा कर रहे थे अपनी गाड़ी मे चढ़ गये। मैं आज भी उस अंजान-अनाम फौजी को याद करता हूँ जिसे हम अच्छी तरह कृतज्ञता भी नहीं प्रकट कर सके थे

 

कुछ देर बाद हमारी ट्रेन आयी  हम लोग अपनी सीट पर पहुँच कर बैठ गये परंतु सारी रात इस घटना को याद कर हम चैन से सो न सके। अगले दिन सुबह हम बिलासपुर पर जब जागे तो चाय नाश्ता कर कुछ सहज़ और सामान्य हुए पर घटना रह रह कर याद आती रही। यात्रा जारी रही।  21 मई की शाम को खाना खाकरथक कर हम लोग सो गये बैसे भी यात्रा मे खाने और सोने के अलावा कोई काम तो रहता नहीं। रात के ऐसा लगा कि गाड़ी बड़ी देर से कहीं खड़ी हैं। हमारा  रिज़र्वेशन सेकंड वातानुकूलित डिब्बे मे थासोच कर कि कुछ तकनीकि मामला होगा  अपने आप चल पड़ेगी पुनः सो गये। बहुत सुबह 4-5 के बीच जब एसी बंद हो गया तो मेरे सहित अन्य यात्री भी उठ गये कि क्या मामला हैं गाड़ी क्यों कई घंटे से एक ही स्टेशन पर खड़ी हैं। डिब्बे के बाहर आए तो पता चला खड़गपुर स्टेशन पर गाड़ी 5-6 घंटे से खड़ी हैं। जब कुछ यात्रियों ने आपस मे पूंछ-ताछ की तो पता चला तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी की हत्या तमिल उग्रवादियों द्वारा चेन्नई के पास रात मे कर दी गई हैं। काँग्रेस द्वारा अखिल भारतीय बंद का आह्वान के कारण ऐतिहातन सभी गाड़ियों को रोक दिया गया हैं। खड़गपुर काफी बड़ा जंक्शन है वहाँ भी 12-15 गाड़ियों को अलग अलग प्लेटफॉर्म पर रोक दिया गया था। अब तक सुबह 8 का समय हो रहा था। प्लेटफॉर्म पर चाय की तलाश की पर कही भी चाय नहीं मिली। हजारों यात्री थे चाय की कमी हो गई। जो भी चाय वाला जैसे तैसे चाय लेकर आता लेने बालों की लंबी लाइन लग जाती। हम टहलते हुए मुख्य कैंटीन पर पहुंचे तो लाइन मे लगकर जैसे तैसे चाय मिली। बेटे के लिये दूध का तो इंतजाम किसी भी कीमत पर नहीं हुआ। उसको भी चाय पिला कर तसल्ली दी। अबतक 9 बजे से उपर टाइम हो गया था। नाश्ते का भी कोई इंतजाम नहीं दिखाई दे रहा था। इस समय तक पीने का पानी भी समाप्त हो रहा था। ठंडे पानी के लिये लंबी लाइन देख कर एक स्टाल पर बिक रही बर्फ खरीदी जिससे कुछ ठंडा पानी बनाया।  हर जगह खाने की खोज कर रहे यात्री यहाँ वहाँ परेशान नज़र आ रहे थे। ट्रेन के इंजिन के सामने काँग्रेस का झण्डा हर गाड़ी के सामने लगा हुआ था। कुछ काँग्रेसी कार्यकर्ता नारे बाजी करते हुएकुछ इंजिन के उपर और कुछ रेल लाइन पर इंजिन के सामने खड़े होकर समाचार पत्रों के लिये फोटो खिचवा रहे थेअपने नेता के प्रति सम्मान करते हुए अपनी वफादारी प्रकट कर रहे थे पर परेशान हो रहे हजारों बच्चोंस्त्री-पुरुष के प्रति उन की कोई सहानुभूति नज़र नहीं आ रही थी। ये तो भारतीय सांस्कृति या सभ्यता की अच्छाई हैं कि अपने साथ कुछ बना बनाया नाश्ता या सूखा खाना लेकर चलते हैं ऐसे समय बो नाश्ता बड़े कम आया।  सभी सहयात्रियों ने आपस मे एक दूसरे का सहयोग कियाकिसी भी तरह नाश्ता का जुगाड़ तो हो गया।  

 

अब कैंटीन मे खाने कि लंबी लंबी लाइन नज़र आ रही थी। रेल तंत्र की आंखे भी धीरे खुल रही थी। लेकिन इसी बीच एक उम्मीद की एक किरण आरएसएस के कार्यकर्ताओं एवं स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया के कार्यकर्ता  के रूप मे नज़र आईशहर मे कुछ खबर पहुँच गई थी कि खड़गपुर स्टेशन पर हजारों यात्री खाने-पीने के लिये परेशान हो रहे हैं। आरएसएस के इन स्वयं सेवकों और स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया के कार्यकरताओं ने निशुल्क चाय-विस्कुटटोस्ट एवं पानी का वितरण शुरू कर दिया था। कुछ लोग बच्चों के लिये दूध का इंतजाम भी कर रहे थेफल का वितरण भी कुछ छोटे स्तर पर हो रहा था। आरएसएस के कार्यकर्ताओं एवं स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया के कार्यकर्ता द्वारा  चायनाश्ते के वितरण से स्थिति काफी कुछ सामान्य हो गई थी। दोपहर मे पूड़ी सब्जी की आपूर्ति से खाने संबंधी समस्या तो  दूर हो गई थी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उन कार्यकर्ताओं और स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया के  प्रति हमारा परिवार सहित सभी यात्री अपनी कृतज्ञता प्रकट कर उन लोगो की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे। लगभग 24 घंटे के बाद हमारी गाड़ी आगे गंतव्य पुरी के लिये प्रस्थान की। श्री राजीव गांधी की निर्मम हत्या पर हम सभी शोक मग्न थेपर क्या खड़गपुर या देश के अन्य भागों मे काँग्रेस के स्थानीय नेताओं या  कार्यकर्ताओं के दिल मे अपने स्वर्गीय नेता के प्रति जो  आदर सम्मान था उस के एकांश  आदर-सम्मान भी उस दिन हजारों हजार परेशान हो रहे  बच्चेबूढ़े महिला-पुरुषों के प्रति नहीं होना चाहिये था??  केरल मे आई बाढ़अभी हाल ही मे उड़ीशा मे आए चक्रवाती तूफान मे या 22 मई 1991 मे अखिल भारतीय बंद मे देश के अन्य शहरों या  खड़गपुर मे आरएसएस हमेशा आम जन की सहायताबगैर जातीय या धार्मिक भेदभाव  के करने के लिये तत्पर रहा हैं।    क्या कभी ऐसा संभव हो पाएगा जब काँग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता या इनके सेवा दल के कार्यकर्ता आम जनता के दुख: दर्द को अपना दुख:-दर्द  समझ कर राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ के सेवकों या स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया के कार्यकर्ता की तरह आम जनता की सेवा के लिये तन-मन से आगे आएंगे??????????

 

विजय सहगल

 

 

       

शनिवार, 4 मई 2019

रेल गाड़ी


रेल गाड़ी




छुक छुक करती रेल गाड़ी।
शोर मचाती रेल गाड़ी॥
घर से जब स्टेशन आया।
लाइन लगा कर टिकिट कटाया॥
स्टेशन पर रेल खड़ी थी।
भीड़-भाड़, आवाज बड़ी थी॥
गर्म समोसे कोई बेंचे।  
बड़ा पाव संग मिर्ची खेंचे॥
पूड़ी-सब्जी, गर्म कढ़ाई।
मुसाफिरों ने जी भर खाई॥ 
गर्मा-गरम चाय चढ़ी थी।
रेल भी, जाने-तैयार खड़ी थी॥ 
नल को देख पानी को दौड़े।
लोटे ज्यादा, पानी थोड़े॥
सीटी देकर धुआँ उड़ाती, आगे बढ़ती रेल गाड़ी।
छुक छुक करती रेल गाड़ी, शोर मचाती रेल गाड़ी।।  

सफेद ड्रेस में गार्ड जी आते।
लाल-हरी झंडी दिखलाते॥
काली ड्रेस में टी.सी. आता।
टिकट चैक कर अकड़ दिखाता॥  
लाल ड्रेस के कुली बुलाते।
हम सब का सामान उठाते॥
इंजन आया डिब्बा आया।
डिब्बे में सामान चढ़ाया।।
झंडी हरी दिखा कर रेल, धीरे-धीरे बढ़ी अगाड़ी। 
छुक छुक करती रेल गाड़ी, शोर मचाती रेल गाड़ी॥   

बच्चों के संग नाना-नानी।
खिड़की पर इनकी मन-मानी॥
ताक-झांक कर देखे  इंजन।
खम्बे-खेत, पेड़ मनोरंजन॥
धरा घूमती, चक्कर खाती।
आँखे बंद, रेल उल्टी जाती॥
रेल किनारे बच्चे खेलें ।
हाथ हिला कर" टाटा" बोलें॥
सन्न से गुजरी  मेल गाड़ी।
छुक छुक करती रेल गाड़ी,
शोर मचाती रेल गाड़ी॥

पटरी कभी पास मे आती।
कभी दूर आवाज़ लगाती॥
हंसी ठिठोली खिल्लम-खिल्ली।
पहुँच गये थे अब हम दिल्ली॥ 
मामा-मामी दिये दिखाई। 
खिड़की से आवाज लगाई॥  
मामाजी का नौकर आया।
डिब्बे से सामान उठाया॥
खत्म हुई थी खेल गाड़ी।
छुक छुक करती रेल गाड़ी,
शोर मचाती रेल गाड़ी॥

विजय सहगल