शनिवार, 20 अप्रैल 2019

लाइन का जीवन


लाइन का जीवन

देश मे मध्यम वर्ग को जीवन यापन के लिये पग-पग पर कठिन  संघर्ष करना पड़ता हैं। एक ओर तो जहां इन परिवारों को अपनी सामाजिक हैसियत बनाये रखने के लिये  अपने रहन सहन के लिये  आर्थिक हालातों से जूझना और समझौता करना पड़ता हैं बही दूसरी ओर आये दिन के होने बाले खर्चों को पूरा करने के लिये पूरा जीवन आर्थिक अभावों और ऋण लेकर जीवन यापन करने मे विताना पड़ता हैं। हम या हमारे जैसे अधिकतर परिवारों की कमोवेश यही स्थिति जीवन के शुरुआती समय मे रही हैं।
झाँसी मेरा जन्म स्थान हैं। यहाँ जीवन मे लाइन से पहला साक्षात्कार मुझे हमेशा याद हैं।  बचपन के उन दिनों मे सस्ता राशन कंट्रोल की दुकानों मे मिलता था। हमारे बार्ड की राशन की दुकान सागर गेट स्कूल के पास थी जिसके मैनेजर निगम बाबू हुआ करते थे। एक पक्के चबूतरे के सामने रखी लकड़ी की टेबल पर अपने लंबे चौड़े रजिस्टर पर लिखा पड़ी करते। बही बगल मे 2x2 फुट की खिड़की से बो बाहर खड़ी जनता को उनकी बारी पर सम्बोधन कर बुलाते।  बही टेबल के दूसरी ओर सैकड़ो की संख्या मे रखे राशन कार्ड के ढेर पड़े रहते, राशन की दुकान मे जहां एक ओर बड़ी से तराजू दुकान की छत्त से लटकी हुई थी। तराजू के बगल मे छोटे-छोटे 1, 2, 5 किलो के  बाँट के साथ  10, 20, 50 किलो के बड़े बाँट भी पड़े थे। बही दुकान के आधे से ज्यादा हिस्से मे गेहूं, चीनी, चावल के बोरे एक के उपर एक रखे रहते थे। दुकान के अंदर कम  और बाहर पचासों आदमी-औरते अपनी बारी की प्रतीक्षा करते, बच्चों के रूप मे मैं अपने घर का प्रतिनिधित्व करता भीड़ मे अपनी बारी का इंतज़ार करता। निगम बाबू के मुह लगे कुछ लोग राशन के कार्डों को उपर-नीचे कर  हेर-फेर, कर अपना नंबर आगे कर लेते  बाहर लोगो को इसका इल्म भी नहीं होता। उस समय हमे लगता था कंट्रोल की दुकान का मैनेजर, निगम बाबू ही दुनियाँ का सबसे बड़ा आदमी हैं उसकी एक आवाज से खड़े पचासों आदमी सहम जाते थे। उस समय मेरी उम्र 10-11 साल रही होगी। जैसे ही अंदर दुकान से राशन कार्ड मे घर के मुखिया का नाम बुलाया जाता बह या उसके परिवार का सदस्य चेहरे पर राशन मिलने की खुशी लिये अपने झोले-थैले के साथ अंदर दुकान की ओर बढ़ता। अंदर निगम बाबू रजिस्टर मे आवश्यक औपचारिकता के बाद आवाज लगा कर तौलने बाले व्यक्ति को आदेश देता। ऐसे ही जब  मेरी बारी आती  और मेरा नाम बुलाया तो मैं भी कभी अकेले या कभी भाई के साथ राशन की लाइन मे लग जाता उस भीड़ मे राशन के झोले-थैले, के साथ राशन के पैसे को सम्हालना एक बड़ी ज़िम्मेदारी होती। इन रोज के संघर्ष ने हमे हमारी उम्र से ज्यादा परिपक्व बना दिया था। राशन लेते समय बचपन से ही कुछ अतिरिक्त सावधानी हम वर्तते थे, जैसे राशन तौलते वक़्त तौलने बाले की हरकतों को ध्यान से देखना कि बह सही-सही तौले, कोई दांडी मारकर कम राशन न तौले और राशन के सही पैसे निगम बाबू ले,  खुले पैसे के बहाने कही ज्यादा पैसे न ले ले। क्योंकि उनके दुवारा लिये गये ज्यादा  पैसे हमारे पॉकेट खर्चे मे कमी कर देते थे। उस भीड़ मे किसी के पैसे खोने या गिरने की शिकायत प्रायः सुनने मे आती रहती थी। शुरू शुरू मे रजिस्टर की औपचारिकता के बाद जब निगम बाबू रजिस्टर मे हस्ताक्षर के रूप मे पास रखे इंक पैड से हमारा अंगूठा लगवाते थे। क्योंकि अधिकतर लोग रजिस्टर मे अंगूठा लगाते थे। जब एक बार हमने कहा मैं तो हस्ताक्षर कर सकता हूँ और तब से मैं राशन लेते समय हस्ताक्षर करने लगा। क्योंकि ये सब हर महीने का कार्य था। राशन की दुकान की लाइन से साक्षात्कार हर महीने मे 3-4 बार की बात थी। राशन की दुकान खुलने-बंद होने का कोई निश्चित समय तो था नहीं, कई-कई चक्कर तो यूं ही लग जाते दुकान पर एक बोर्ड लटका रहता "राशन लेने गये हैं"। शायद कानूनी बचाव का एक जरिया था ताकि इस बोर्ड से समय के अनुपालन को उचित ठहराया जा सके।
एक अन्य लाइन जो मुझे याद हैं बह थी मिट्टी के तेल लेने के लिए लाइन। उन दिनो केरोसिन ऑइल का उपयोग कुछ उन्नतशीलता का प्रतीक हुआ करता था। पर मिट्टी के तेल लेने  के लिये भी राशन की तरह बड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी। दुकानदार द्वारा तेल कम नापना तेल बालों का  राष्ट्रीय चरित्र था। कभी लीटर को टेड़ा कर कम नापना या लीटर की पैंदी को अंदर की तरफ ठोक कर आयतन को कम कर कम तेल नापना  दूकानदारों का जन्मसिद्ध अधिकार था। ऐसा नहीं कि ये कार्य मिट्टी के तेल नापने बाले करते थे बल्कि दूध नापने बाले, खाध्य तेल और अन्य तरल पदार्थ बेचने बाले भी ये तरक़ीब आजमाते थे। गेहूँ का आटा पिसवाने मे भी तौल मे घट-बढ़ आम बात थी।  शिकवे-शिकायत का तो कोई नियम नहीं था आप खुद ही यदि संघर्ष करने मे सक्षम हैं तो ठीक अन्यथा लूट के इस कारोबार मे मौन हो कर पिस्ते रहे बस।
बचपन से जवानी तक जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा विभिन्न लाइनों मे लग कर बीता। हद तो तब हो गई एक बार जमाखोरी करते हुए वनस्पति घी डालडा के लिये भी लाइन लगानी पड़ी। कोई जैन की दुकान थी गंज मे माठू लाल मार्केट, झाँसी  मे।  घंटो की लाइन बंदी के बाद एक किलो डालडा घी का डिब्बा लेकर ऐसे घर पहुंचे जैसे कोई बहुत बड़े शेर का शिकार कर लाये हों।
घर मे कुछ निर्माण का कार्य होना था पर सीमेंट की उपलब्धता इतनी सरल एवं सहज नहीं थी। सीमेंट के लिये सप्लाइ ऑफिस के  दलालों के माध्यम से ही मिलना संभव था। बगैर रिश्वत के कोई भी कार्य संभव नहीं था, पर विध्यार्थी जीवन का जोश हर समय संघर्ष के लिये तत्पर रहता। जेल चौराहे के पास सप्लाइ ऑफिस था हर ऑफिस मे लालफ़ीताशाही का दरबार लगा रहता था। अफसरों के चापलूस कर्मचारी और चाटुकार दलालों की फौज इन अफसरों को घेरे रहती। जब मैंने ऑफिस मे जाकर सीधे ही दरबार लगाये अफसर से कार्यालय मे हो रहे भ्रष्टाचार से सीमेंट के परमिट मिलने मे हो रही परेशानी का जिक्र किया तो हमे तुरंत ही 5-6 सीमेंट बोरी का परमिट मिल गया।
उस समय झाँसी मे रसोई गैस की शुरुआत हो गई थी जैसे तैसे लाइन लगा कर गैस का कनैक्शन तो मिल गया पर हर एक डेढ़ महीने मे गैस की रिफिल कराना एक दुष्कृत कार्य था। खुली लूट कर रहे थे गैस वितरक। कोई नियम कानून नहीं था। घरों पर गैस सप्लाइ तो बहुत दूर की बात थी। भरा सिलेंडर लेने के लिये हमेशा वितरक के गोडाउन जाना पड़ता था या शहर मे आज के पुराने बस अड्डे के पास झिरने बाला गेट के पास  बाली जगह पर गैस का सिलेंडर लिये गैस वितरक का ट्रक खड़ा रहता। तीन चार सौ लोगो की लाइन सिलेंडर लिये खड़ी रहती। एक दो घंटे मे सिलेंडर खिसकाते-खिसकाते नंबर आता। गैस वितरक का मोटा भद्दी शक्ल लिये मैनेजर बगैर खुल्ले पैसे बापस किये सिलेंडर देता, होम डिलिवरी चार्जेस कम करने का तो सवाल ही नहीं। बड़े-बड़े पढे-लिखे उपभोक्ता कभी मुंह के थूक से या पास बह रही नाली के पानी से सिलेंडर का लीकेज चेक करते। सिलेंडर पर सील कभी नहीं देखी। सिलेंडर को तौलने का तो प्रश्न ही नहीं, सिलेंडर मिल गया ये ही बड़ी बात थी। निश्चित तौर पर सिलेंडर मे गैस की तौल मे कमी रहती थी। मैंने एक बार यमुना गैस ऐजन्सि की शिकायत तत्कालीन पेट्रोलियम मिनिस्टर स्व॰ श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से की थी। पूर्व मे भी कई बार शिकायत की, पर कोई कार्यवाही नही होती थी। अंधेर नगरी के हालात थे। इन हालातों मे एक मध्यम वर्गीय परिवार को इस भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ना एक कठिन कार्य रहा। पूरा सरकारी तंत्र और व्यापारी तंत्र जो सरकारी योजनाओं को लागू करने मे सरकार का सहयोग करता था आम जनता को लूटने मे कोई कसर नहीं छोड़ता था। कम तौलना या कम देना और नियत दाम से ज्यादा पैसे ले कर आम और गरीब जनता को धोखा दे कर जनता की गाढ़ी कमाई को लूटना इन दोनों भ्रष्ट तंत्रों की मिलीभगत का एक अटूट उदाहरण था। उक्त लूट-खसूट की परंपरा अखिल भारतीय स्तर से लेकर प्रदेश, जिले, शहर और ग्राम पंचायत तक समान रूप से व्याप्त थी, और ये सब तत्कालीन सरकार के गरीबी हटाओ-भ्रष्टाचार मिटाओ नीति और कार्यक्रम के तहत हो रहा था। सस्ते कपड़े के लिये भी लाइन सहकारी समिति के स्टोर जो माठू लाल मार्केट गंज मे था लगानी पड़ती थी।  
बीजली का बिल हो या पानी का बिल बगैर लाइन लगाये कोई काम मुमकिन ही न था। हर महीने बिजली का बिल रानी महल के सामने स्थित पावर हाउस मे जमा करने के लिये लाइन मे घंटो लगना पड़ता था। बाबू ऐसे मरे-मरे हाथ चलाता जैसे शरीर मे जान ही न हो। 99 रूपये का बिल हैं तो भी रुपये खुल्ले लाओ अन्यथा 100 का नोट हिसाब बराबर। जब कभी सिनेमा देखने जाओ तो सिनेमा हाल का बुकिंग बाबू और गेट कीपर अपने आपको जिला कलेक्टर से कम नहीं समझते थे। सिनेमा हाल मे हर सीट का नंबर और लाइन टिकिट पर लिखी रहती पर गेट कीपर अपनी आदत से कभी बाज़ नहीं आता, चाहे अनपढ़ हो या पढ़ा लिखा सभी को कहेगा चौथी लाइन मे सात सीट छोड़ कर या किसी को बोलेगा पाँचवी लाइन मे कोने की सीट छोड़ कर आदि आदि।
रेल से यदि कभी रिज़र्वेशन कराना हो तो आप किसी भी समय जाये  लंबी लाइन हमेशा लगी रहती। आप घंटो लाइन मे लगकर जब खिड़की पर पहुँचते तो सिर्फ और सिर्फ "न" मे ही उत्तर मिलता रिज़र्वेशन नहीं हैं। दलालों की सेटिंग से या जान पहचान से  किसी भी गाड़ी मे किसी भी तारीख का टिकिट आसानी से उपलब्ध हो जाता। रेल्वे और टेलीफ़ोन विभाग मे भ्रष्टाचार कूट-कूट कर समाया था। कहीं झाँसी से बाहर दिल्ली, लखनऊ कानपुर कॉल लगाना हो तो सिफ़ारिश के लिये जान पहचान निकालनी पढ़ती थी अन्यथा कॉल लगाना संभव ही नहीं था। स्कूल मे फीस की लाइन, बस और ट्रेन मे टिकिट की लाइन, हर साल स्कूटर का टैक्स जमा कराने की लाइन, घर का हाउस टैक्स, वॉटर टैक्स की लाइन, रोजगार कार्यालय मे पंजीकरण के लिये लाइन, टायपिंग टेस्ट के लिये रोजगार कार्यालय मे लाइन,  मार्क शीट या प्रमाण पत्र के सत्यापन की लाइन,  ऐसी अनेकों तरह की लाइनें थी इनमे से कुछ मासिक लाइनें तथा कुछ वार्षिक लाइनें थी। इनमे भी गैस सिलेंडर और राशन की लाइनें सबसे घिनोनी और कष्टप्रद थी जिनकी टीस या दर्द आजतक याद हैं।           
ऐसा नहीं था कि ये संघर्ष अकेले हम लड़ रहे थे। हमारे साथ उस मध्यम वर्गीय की जमात मे हिन्दू, मुसलमान, अगड़े-पिछड़े, अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग भी उस संघर्ष मे साथ थे। पूरे बचपन के इस संघर्ष को हम आज भी याद करते हैं, क्या वे सभी भी जो हर मोर्चे पर उस समय ये लड़ाई अपने स्तर पर अलग-अलग या साथ साथ लड़ रहे थे, क्या उनको भी वो संघर्ष याद हैं??
विजय सहगल        

2 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

sir aapki lekhani utkristh hai.aaj ke samay me itana badhiaya lekh hamara margdardhan avam prerit karti hair.


Bheeshm sahu

विजय सहगल ने कहा…

भीष्म साहू जी, आपके प्रेरक विचार हमे लिखने का हौसला एवं ऊर्जा देते हैं। ध्न्यवाद।