शनिवार, 5 जनवरी 2019

स्व. श्री अनिल सामधिया – एक अधूरी श्रद्धांजलि


स्व. श्री अनिल सामधिया – एक अधूरी श्रद्धांजलि
स्व॰ श्री  अनिल समधिया हमारे मित्र नहीं, घनिष्ठ मित्र नहीं अभिन्न मित्र थे। वे कब मित्र से शुरू होकर घनिष्ठ होते हुए  अभिन्न मित्र की श्रेणी मे आ गये समय के इस अंतराल का हमे  भान ही नहीं हुआ। हमारी मित्रता को  समय ने अपनी हर कसौटी पर कसा होगा लेकिन हमे कभी अहसास नहीं कराया। इस अभिन्नता का अहसास भी उन लोगो दुवारा कराया गया जिनको  हम लोग देवतातुल्य मानते हैं। हमे याद हैं जब कभी हम अनिल के घर पर जाते और उन के घर पर कोई अन्य मेहमान या अन्य कोई रिश्तेदार होता तो अनिल के पिताजी हमारा परिचय अनिल के मित्र के रूप मे नहीं बल्कि बेस्ट फ्रेंड या क्लोज़ फ्रेंड या अभिन्न मित्र के रूप मे कराते थे। उस बेस्ट-क्लोज़ और अभिन्न शब्द कहते समय जो  चमक  हम उन की आँखों मे देखते थे तो हमारा सिर गर्व और खुशी से ऊंचा हो जाता था। हमारे परिवार मे भी हमारी माँ-पिता, बहिन-भाइओं या बाद मे बच्चों  ने भी  सदा हम लोगो को इस  अभिन्न मित्रता का अहसास हमे कराया। हर किसी व्यक्ति के जीवन मे कुछ सबसे अहम रिश्ते होते हैं। माता-पिता तो उनमे सर्वोपरि हैं ही लेकिन मामा, मौसी और बुआ का रिश्ता भी उनके समतुल्य पीढ़ी मे गिना जाता हैं। समान पीढ़ी मे भाई बहन चाहे बे सगे, ममेरे-मौसेरे या फुफेरे हों और अगली पीढ़ी मे सभी भतीजे-भतीजी, भांजे-भांजी आते हैं। यहाँ ये सब लिखने का एक विशेष अभिप्राय हैं। हमारे और अनिल के इन रिश्ते मे एक गहरी समानता थी बो यह कि इन सभी एक दूसरे के रिशतेदारों मे हम दोनों  समान रूप से जुड़े  थे  सिवाय हम लोगो के चाचा के क्योंकि हम दोनों के पिता अपने पिताओं की इकलौते पुत्र थे।  हम लोगो की  3 पीढ़िया हमारे  इस मित्रता के रिश्ते से जुड़ी थी।  1973 मे  क्लास 9वी से हमारी मित्रता शुरू हुई जो समय के साथ प्रगाढ़ से प्रगाढ़तम होती गई। हम लोगो ने लखनऊ मे नौकरी की शुरुआत की और जहां पर अविवाहित जीवन के सुनहरे और मस्त जीवन को जिया, साथ साथ एक साइकल पर लखनऊ भ्रमण करना, फिल्मे देखना, खाना बनाना उनमे मुख्य था। इस हेतु अनेकों बार मिट्टी के तेल के लिया चारबाग और पान दरीबा  के आसपास भटकना तो आए दिन की बात थी। स्व॰ श्री राजेंद्र अगीहोत्री जी जो उस समय झाँसी के विधायक थे, के उस छोटे से किराए के मकान मे बिताये सघर्षपूर्ण जीवन के  सुनहरे पल की यादें आज भी ताजा है। वैवाहिक जीवन मे प्रवेश करने पर  कुछ नए रिश्तों के रूप मे भी हम समान रूप से पहचाने जाते।  बच्चो के साथ रायपुर, भुवनेश्वर, जग्गनाथ पुरी, भोपाल,ग्वालियर, मुरेना भ्रमण मे बिताये क्षण और अनेक यादे  चारों बच्चो को आज भी याद हैं।            
आज जब  तुम इस असमय हमसे अभिन्न मित्र से भिन्न हो गये इस दु:खद  अहसास को हम  रह रह कर महशूस कर रहे हैं।  आज जब लोग तुम्हें श्रद्धा सुमन अर्पित कर नमन कर  रहे हैं हम कैसे तुम्हें मित्रता के इस टूटे रिश्ते और टूटे मन से पुष्पांजलि अर्पित करें। ये अधूरी श्रद्धांजलि हम तुम्हारी यादों की  पोटली मे अपने पास तब तक सँजो रख अर्पित करेगे जब हम तुम से भिन्न होंगे।
तुम्हारा अ–भिन्न मित्र
विजय सहगल    

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