शैलेंद्र सिंह गोड़
जी
हाँ उस अधीनश्त स्टाफ का नाम शैलेंद्र
सिंह गोंड था। अति चुप रहने बाला। लाल खैनी खाने का बेहद शौकीन। बड़ी तन्मयता से
काम करने बाला बेहद मेहनती एवं इन सबसे बढ़
कर ईमानदारी की पराकाष्ठा का प्रतीक वह आदिवासी समाज से आता था। कलेक्ट्रेट और
जिला न्यायालय रायपुर के लगभग हर विभाग के
सबस्टाफ और अन्य लिपिक स्टाफ से उसने अपनी अच्छी जानपहचान बनाली थी। जिसका बैंक के व्यवसाय को बढ़ाने मे बड़ा योग दान रहा। कलेक्टर कार्यालय रायपुर की शाखा मे शैलेंद्र की पोस्टिंग से हम हमेशा उस
को दिये गए कार्य की तरफ से निश्चिंत रहे।
कुछ
दिनों से शाखा मे नगदी जमा मे कुछ कैश शॉर्ट होने की शिकायत आ रही थी जिससे बैंक
की छवि मे धब्बा लग रहा था। एक दो ग्राहकों ने मुझे व्यक्तिगत तौर पर कहा कि उन
दिनों जब भी उन्होने कैश खाते मे जमा कराने गये तो कैश कुछ कम बताया। एक दिन अपरहान कलेक्टर के स्टेनो
शाखा मे कुछ नगदी जमा कराने आये उन्होने स्लिप भरकर नगदी के साथ स्लिप स्टाफ के माध्यम से कैश कैबिन की तरफ जमा करने हेतु
कैशियर के पास बढ़ा दी। उस समय शाखा मे हम 4-5 स्टाफ एवं श्री झा के अलावा कोई और व्यक्ति नहीं था अतः हम सभी
कुछ रिलैक्स मूड मे थे यहाँ बहाँ की बातों मे मशगूल हो गये, अफ़सोस इसी बीच जमा स्लिप मे से रुपये गायब थे और मात्र जमा स्लिप ही वहाँ
पर पड़ी थी। शुरू मे तो मामले को हल्के मे लेकर
मज़ाक मे लिया गया। जब गंभीरता पूर्वक कैश की पूंछताछ हुई तब भी कैश नहीं
मिला। शाखा मे सारी जगह छानबीन करने पर भी
कैश नहीं मिला। यध्यपी श्री झा ने मामले को यूं ही छोड़ने की बात कही लेकिन ये बैंक
की छवि का सवाल था? हमे जिन स्टाफ पर शक था किन्तु बिना किसी
पुख्ता सबूत को उन पर दोष नहीं मढ़ा जा सकता था।
एक
अन्य घटना मे एक महिला ग्राहक ने एक दिन हमे शिकायत कर बताया कि उसने खाते मे
600/- रुपये जमा कराये हैं, जिसका नगदी विवरण उसने अपनी जमा
पर्ची के पीछे लिखा हैं, पर गलती से उसने जमा पर्ची पर शब्दो और अंकों मे 400 रुपये
लिख दिये थे पर वास्तव मे उस महिला ने बताया कि उसने 600/- रुपये जमा किये हैं। जब
उसने पास बुक को अपडेट कराया तो पता चला कि उसके खाते मे 400/- रूपये ही जमा हुए
हैं। उस महिला की बात सुनकर हमने कहा कोई
विशेष समस्या नहीं हम उस जमा पर्ची की जांच कर कार्यवाही करेंगे इस आशय का भरोसा
हमने उस महिला को दिया। पर अफ़सोस उसदिन के वाउचर मे जांच करने पर पता चला कि उस
दिन के वाउचर मे वह जमा स्लिप नहीं थी।
हमने आगे-पीछे के दिनों के वाउचर भी चेक
किये पर उक्त वाउचर नहीं मिला तब हमे कुछ शंका हुई कि मामले मे कुछ गड़बड़ हैं। उन
दिनों शाखा की कार्यप्रणाली मैनुअल थी, शाखा कम्प्योट्रीकरण नहीं हुआ था। फिर हमने उस लेजर को मंगाया जिसमे उक्त
महिला का खाता था। हमने देखा कि लेजर से उस विवादित नगदी वाउचर को तत्कालीन कैशियर
ने अपने हस्ताक्षर से पास कर निकाला था जिसकी एंट्री भी 400/- रूपये के रूप मे
थी। कैश प्राप्ति रजिस्टर और कैश बुक मे भी वाउचर की प्रीविष्टि 400/- रुपये के रूप मे कैशियर ने दर्ज की थी।
जब हमने इस बारे मे कैशियर से पूंछा तो उसने बताया कि वह उस दिन विशेष सहायक की ओफिसियेटिंग
कर रहा था इसलिए खुद ही पोस्टिंग कर खुद ही चेक कर वाउचर को रिलीस किया था। लेकिन वाउचर कहाँ हैं उसको नहीं पता था। हमे
उक्त कैशियर महोदय पर कुछ शक हो रहा था। उस दिन शाम तक वाउचर की खोजबीन हुई पर व्यर्थ, वाउचर नहीं मिला। पर कहते है झूठ के पैर नहीं होते,
हमने इस बारे मे अपने सव-स्टाफ से इस मामले मे विचार किया जिनकी ईमानदारी और
कर्तव्यनिष्ठा पर हमे हमेशा पूरा भरोसा रहा।
उन दोनों स्टाफ ने शाम के एकत्रित कचरे मे उस वाउचर की ढूंढाई शुरू कि और आश्चर्य
उस कचरे मे उक्त वाउचर कई छोटे-छोटे टुकड़ों मे मिल गये। उन सभी टुकड़ो को जोड़ कर
पुनः आरिजिनल फोरम मे लाना एक दुरूह एवं
कठिन कार्य था क्योंकि उस वाउचर को अनेक टुकड़ो मे किसी ने फाड़ कर दुकड़े-टुकड़े कर
दिया था। बड़ी मेहनत के बाद जब सभी टुकड़ों को जोड़ा गया तो स्पष्ट था कि वह महिला
सही कह रही थी पीछे नगदी का विवरण सही दर्ज 600/- रूपये था पर उसने गलती से शब्दो
और अंको मे भूलवश 400/- रूपये लिख दिये अर्थात राशि दो सौ रुपये से कम लिख दिये थे, और उक्त 200/- की राशि को कैशियर ने अपने पास रख लिया था। बाद मे हमे उक्त
स्टाफ ने बताया कि बे बैंक मे निकले कागजों के कचरे को एकत्रित कर एक-दो हफ्ते बाद
ही जला कर नष्ट करते हैं न कि हर रोज जला
कर नष्ट करना। हमे उनकी बुद्धिमानी और दूरद्र्ष्टि पर बड़ा गर्व हुआ। प्रादेशिक प्रबन्धक ने भी उक्त स्टाफ को सख्त
लहजे मे चेतावनी दे कर सुचारु रूप से कार्य करने की नसीहत दी। हमारे दो साथी
कर्मचारियों श्री लोमेश और श्री शैलेंद्र ने अपने कौशल और बुद्धिमत्ता से न केवल एक बार फिर बैंक की छवि को टूटने से
बचाया बल्कि उस सक्स को उसकी गलती का
अहसास कराया।
हम
सभी उस महिला खाताधारी को पिछले लगभग 2 साल से जानते थे क्योंकि उसका वेतन खाता हमारी
शाखा मे था। हमे उस महिला के साथ हुए इस कृत पर काफी दु:ख और ग्लानि थी। सबसे
आश्चर्य और दु:ख इस बात का था कि उक्त शिकायतकर्ता महिला के दोनों हाथ किसी
दुर्घटना मे कंधे से नीचे कट गये थे और वह महिला बिना हाथों के अपना कार्य और सारा
लिखत पढ़त का कार्य अपने पैर से करती थी और कलेक्टर स्थित आदिवासी विकास विभाग द्वारा संचालित स्कूल मे अध्यापक के पद पर
कार्यरत थी।
विजय सहगल
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें