वर्षगाँठ
आज
बेबी वानप्रस्थ की उम्र मे प्रवेश पर अपनी
पुरानी यादों मे खोया हुआ था। रह-रह कर उसके मन मे बारबार बुआ की याद कौंध रही थी।
"माँ के प्रति इतना समर्पण और
कर्तव्यनिष्ठा का ऐसा उदहारण कम ही देखने के मिलता हैं जब माँ जाया एक पुत्र अपनी
वृद्ध माँ को प्रति माह एक निश्चित रकम देता हो जबकि दोनों एक ही छत्त के तले रहते
हैं। लेकिन इस दी जा रही धनराशि को......... "।
अचानक
वह अपने ख्यालों और यादों के खोल से बाहर आता हैं क्योंकि आज उसका जन्मदिन था। संयुक्त परिवार के छः भाई बहिनों
बाले घर मे भाई बहनों को अपना या दूसरे भाई बहिनों का जन्मदिन शायद ही याद रहता हो।
माँ-पिता को भी अपनी संतानों का जन्मदिन याद रखना
कठिन बात थी। आज की तरह मोबाइल या टेलीफ़ोन का जमाना तो था नहीं जिसके रिमाइंदर द्वारा महत्वपूर्ण
दिनों की सूचना को याद रखा जा सके। पर बेबी
के साथ बात कुछ और थी उसकी बुआ को उसका
जन्मदिन हमेशा याद रहता। हर साल "बाबू की दोज" त्योहार पर शाम को जब बुआ
गरमा-गर्म इमरती मिठाई लेकर आती तब घर मे
एक खुशी के माहौल मे पता चलता कि आज बेबी की वर्षगाँठ हैं। फौरन ही मंदिर मे तिलक
की थाली तैयार की जाती जिसमे रोली, अक्षत/चावल सजाये
जाते। मंदिर मे भगवान के सामने उसको बैठा कर दीपक जलाया जाता और बुआ, बेबी को तिलक लगा, इमरती खिला कर वर्षगांठ का आशीर्वाद
देती। बेबी भी सभी बड़ो के पैर छू कर उन्हे प्रणाम करता। आज के समय के विपरीत बर्थडे केक काटने की प्रथा तो उन दिनों नहीं थी। सभी भाई-बहिन भी खुश होते पर बेबी वर्षगाँठ से
ज्यादा अपनी पसंदीदा इमारती मिठाई खाकर खुश होता। उम्र के इस पढ़ाव मे आज उसे एकाएक
बुआ की याद आ गई कि वो उसे कितना प्यार
करती थी। आज यदि वर्षगांठ के दिन वे होती
तो निश्चित ही गरम-गरम इमरती लेकर जरूर आती और वर्षगांठ पर तिलक लगा कर ढेरों
आशीर्वाद देती। बुआ उसके घर की एक अटूट
अंग तउम्र रही। जब से बेबी ने होश सम्हाला
उसने देखा कि बुआ रोज रात मंदिर की आरती के बाद प्रसाद लेकर घर आती, बेबी अपने भाई-बहिनों के साथ पढ़ने से कम पढ़ने का नाटक ज्यादा कर रहा
होता। उसका मन पढ़ने से ज्यादा माँ-बुआ-पिता और चचेरी बहिन, दादा
की बातों मे ज्यादा रमता। बाते घर परिवार, रामायण-महाभारत की कहानियों से होती हुई भूत-प्रेत की कहानियों, गांधी-नेहरू के किस्सों तक कहीं से
किसी भी दिशा तक जा सकती थी। आंखों मे नींद भरी होने के बाबजूद नींद को
भगाने की भरसक कोशिश होती। इस प्रिक्रिया मे कभी बेबी सफल और कभी असफल होता। इस
दिनचर्या मे मौसम की भी अपनी एक अलग पर
अहम भूमिका रहती। गर्मी के मौसम मे सभी लोग घर की खुली छत्त पर चारपाई बिछा लेटते
थे। अड़ौस-पड़ौस मे भी यही स्थिति होती। दूर-दूर तक सभी की छत्तों पर लाइट जल रही
होती। रात मे कही कहानियों के भूत-प्रेत, डाकू-बदमाश, खब्बीस-डायन के पात्र कही रात की नींद मे न आ जाए इस डर की बजह से बेबी
की यही कोशिश होती कि वह किनारे की चारपाई छोड़ कर बीच की चारपाई पर सोये, ताकि इन खलनायकों से बचा रहे। पर
सर्दियों मे जब सभी लोग खपरैल की अटारी मे कंबल-रज़ाई ओढ़ कर सोते तो बेबी, उक्त भूत-प्रेतों
के डर की बजह से अटारी के दरवाजे के सामने, सोने से बचने की भरसक कोशिश करता।
बेबी ने कभी अपने फूफाजी को नहीं देखा था, सुना था उनका देहांत असमय हो गया था जबकि बुआ का एक मात्र पुत्र की उम्र 1-2 वर्ष की रही होगी।
बुआ की ससुराल शहर के एक प्रभावशाली राजनैतिक परिवार मे हुआ करती थी। उनके जेठ स्वतंत्र भारत मे प्रदेश के पहले
विधायक थे। उनके सयुक्त परिवार ने न केवल बुआ
और उनके पुत्र को परिवार का एक अभिन्न सदस्य माना बल्कि बुआ को घर के मुखिया की
तरह उनका हमेशा सम्मान किया। यहाँ तक कि
उक्त परिवार ने एक अलग मकान लेकर बुआ के नाम किया ताकि उन्हे या उनके बेटे को ये न
लगे कि भविष्य मे उनको संयुक्त परिवार के घर से वेघर कर दिया, क्योंकि अब तक बुआ के बेटे कि
शादी हो चुकी थी, परिवार एक से दो और दो से तीन-चार होकर बड़ा हो गया था। पर बक्त कुछ ऐसा बदला, बड़े हुए
परिवार मे बुआ के लिये जगह कुछ कम होती चली गई और आखिर बुआ उम्र के अंतिम पढ़ाव मे
पुनः उसी परिवार मे बापस आने को मजबूर हो गई। पर धन्य थे उस परिवार के लोग जिन लोगों ने चाची
का पहले से ज्यादा मान सम्मान देकर अपने परिवार के मुखिया की तरह
प्रतिष्ठित कर उनका स्वागत किया। इसे समय
का फेर ही कहेंगे जब अपने जाये, इतने दूर हो गये कि सड़क पार, पुत्र, प्रपौत्रों की आवाज सुनने को वे
तरस गई। भावनात्मक दूरी इतनी हो गई कि माँ-बेटे को एक दूसरे की आवाज सड़क के पार न कानों को सुनाई देती, न
आँखों को दिखाई देती।
बात
ये नहीं थी कि बुआ को किसी आर्थिक या सामाजिक सम्मान की कमी थी या उनके परिवार के
लोग चाची का ध्यान नहीं रख रहे थे। बस एक माँ के
स्वाभिमान का प्रश्न था और हो भी क्यों न बहुत कष्टों और तकलीफ़ों के बाद
पाला था उसने अपने लाडले बेटे को। वैधव्य के दु:खों और संकटों को अपने हिस्से मे
समेटे उसने अपने बेटे के हिस्से मे सदा प्यार और खुशियाँ उड़ेली थी, फिर क्यों कर एक बेटा शादी के बाद अपनी माँ के साथ ऐसा व्यवहार कर सकता था
कि माँ को अपने भरण-पोषण के खर्च के लिए
न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़े। पर हे केशव!, हे बासुदेव!
ऐसा दुर्योग शायद अवश्यसंभावी था अतः होनी को नहीं टाला जा सका!! समय स्थिर था काल
की चित्कार और करुण रुंदन वातावरण मे चारों ओर व्याप्त। एक अवला अपने सम्मान के
लिये लाठी टेक कर धीरे-धीरे न्याय के लिये
कचहरी की चौखट की तरफ बढ़ रही थी। ये दु:ख उसकी छोटी बहन से देखा न गया वह भी अपनी
बड़ी बहन के साथ उनके संघर्ष मे साथ हो ली। जज को देख छोटी बहन की आँखों मे आंसुओं
की अविरल धारा बहने लगी। शायद कभी ऐसे
दुर्भाग्य की कल्पना दोनों बहनो ने नहीं की थी? जज साहब ने
दोनों बहिनों की ओर इशारा करते हुए एक छोटी लेकिन तीखी टिप्पड़ी की, जो गहरे ज़ख्म देने बाली थी, कहा "तुम लोग क्यों रोती हो
रोना तो उन्हे चाहिये जो इस कृत के लिये दोषी हैं? और इस तरह
न्यायालय के आदेशानुसार पुत्र को एक निश्चित रकम की अदायगी ताउम्र माँ के भरण-पोषण के लिये प्रति माह देना
निश्चित हुआ।
"माँ
के प्रति इतना समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा का ऐसा उदहारण कम ही देखने को मिलता हैं जब
माँ जाया एक पुत्र अपनी वृद्ध माँ को प्रति माह एक निश्चित रकम देता हो जबकि दोनों
एक ही छत्त के नीचे रहते हों। लेकिन इस दी जा रही धनराशि को...... मनीऑर्डर के
माध्यम से प्रेषित किया जाता था ताकि न्यायालय को मनीऑर्डर की रसीद प्रति माह
प्रेषित की जा सके। "सनद रहे, ताकि वक्त पर काम
आवे।"
अंतिम
दिनों मे बुआ को अपने संयुक्त परिवार के साथ, पेशागत कारणो से घर से बहुत दूर
जाना पड़ा। जहां उनका निधन हुआ। उनके परिवार के बेटों ने उनका अंतिम संस्कार अपनी
दादी समझते हुए किया और शोक मनाया।
और
इस तरह मनी ऑर्डर बन्द करने की खबर की ज़िम्मेदारी बुआ की छोटी बहन ने फोन कर कुछ
इस तरह निभाई कि सोते हुए इंसान के पैरों के नीचे से भी जमीन खिसक जाये। उन्होने
कहा "जिज्जा अब इस दुनियाँ मे नहीं
हैं, बेटा अब तुम्हें माँ के बोझ से
मुक्ति मिल गई"।
विजय सहगल
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