सोमवार, 30 दिसंबर 2019
शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019
माहेश्वर -2
-:माहेश्वर
-2:-
29 नवम्बर 2019 को तय कार्यक्रमानुसार सुबह
6 बजे उठ कर नर्मदा नदी के तट की ओर प्रस्थान किया। घाट पर बहुत कम लोग थे। प्रसार
भारती के ऐप पर विविध भारती के दिल्ली
केंद्र से सुंदर सुंदर मनभावन भजनों का श्रवण करते हुए मै भी घाट की बुर्ज पर बैठ सूर्योदय
का इंतज़ार करने लगा। घाट साफ सुथरा था एक-दो स्थानीय व्यक्ति नहा रहे थे। यध्यपि
मै भी नहाने का विचार ले कर ही होटल से निकला था,
पर मन मे ये सोचा था कि अपरचित नदी तट के
किनारे पहले दूसरों को नहाता देख नदी की गहराई और खतरे का अध्यन कर लिया जाये,
यदि परिस्थिति अनुकूल हुई तभी डुबकी लगाने उतरेंगे। जब खतरे का न्यूनतम अनुमान लगा
लिया तभी बैग से तौलिया,
अंडर बीयर बनियान निकाल पास की सीढ़ियो पर रख नर्मदा मैया को प्रणाम कर पानी मे
उतरे। मै समझता था हरिद्वार मे गंगा नदी
की तरह पानी ठंडा बर्फ की तरह होगा पर
हमारी सोच के विपरीत पानी सद्द सा हल्का गुनगुना था। तुरंत ही दो -तीन
सीढ़ी उतर कर शरीर को पानी के अनुकूल ढाल पानी मे छलांग लगा दी। थोड़ा तैरना आने के कारण
नदी मे 8-10 कदम तैरते हुए, पानी मे डुबकी
लगा कर बापस आये। ठंड का कोई अहसास नहीं था। अब तो एक के बाद एक पाँच-छह डुबकी लगा नर्मदा स्नान किया और तब नर्मदा नदी और उगते सूरज को प्रणाम कर
नदी से बापस आये। शरीर मे एक नई शक्ति और ऊर्जा को महसूस कर कपड़े बदल कर नर्मदा तट
के घाटों का प्रातः कालीन भ्रमण शुरू किया। सूर्योदय के कुछ चित्र ले घाट पर आगे
बढ़ा। अब तक श्रद्धालुओं का नदी के तट पर आना भी शुरू हो गया था। बड़ी संख्या मे
ग्रामीण महिला पुरुष एक डंडी और पानी का कड़ीदार स्टील का डिब्बा लिये नज़र आये। ये
वो श्रद्धालु थे जो नर्मदा नदी की पैदल परिक्रमा करने के पुण्य उद्देश्य लेकर महीनों की
यात्रा नदी के किनारे किनारे करने के लिये निकले थे। नर्मदा नदी की परिक्रमा लगभग
600 किमी लंबी होती है जो एक कठिन व्रत और तप की तरह होती है। इसके करने बाले बड़े
ही जीबट बाले साहसी और कठिन व्रतधारी होते है।
अब तक सूरज भी आसमान मे तेज चमक के साथ अपनी
उपस्थिती दर्ज़ करा चुका था। चाय की तलब हमे मोहन चाय बाले की दुकान पर ले आई। जो
अभी अभी ही चाय की पतेली चढ़ा चुका था और जिसे बगैर चीनी की चाय देने मे कोई हर्ज़
नहीं था। बढ़िया चाय वो भी पाँच रुपए मे। .....और क्या चाहिये.............. !! एक
बार फिर से हम अहिल्याबाई घाट से होते हुए विश्वनाथ मंदिर के रास्ते होटल पहुंचे।
10 बज चुके थे। सामान पैक कर "कृष्णा होटल" के कोम्प्लीमेंट्री नाश्ते
के लिये ऑर्डर किया। मालिक नहीं था उसके छोटे भाई ने हमसे पैसे ले कर बाज़ार से लाकर
नाश्ता कराया और पैसे को बापस करने का आश्वासन दिया पर पैसे की बापसी का हमे अभी भी इंतज़ार है।
11
बजे तक सामान लेकर होटल से विदा लेकर हम पुनः गिरीश पंडित जी के सावंरिया
रेस्टुरेंट मे पहुंचे ताकि सुबह का भोजन कर माहेश्वर से प्रस्थान किया जाये। कुछ
समय इंतज़ार के बाद एक बार यहाँ पुनः गरमा गरम खाना खा कर कुछ कदम दूर तट पर पहुँच नर्मदा मैया को प्रणाम कर एक बार पुनः आने की आशा
लिये बापस इंदौर के लिये निकले। लोगो ने महू-माहेश्वर मार्ग से इंदौर जाने की सलाह
दी। लोगो ने बताया कि ये रास्ता अच्छा और कम ट्रैफिक बाला है,
और ऐसा था भी। हमको मंडलेश्वर होकर ही महू जाना था। कुछ लोगो के बताये अनुसार हमने मंडलेश्वर मे भी नर्मदा के घाट का भ्रमण
करने का निश्चय किया लेकिन निराश हुआ क्योंकि मंडलेश्वर के घाट माहेश्वर के घाटों
के सामने दूर दूर तक मुक़ाबले मे नहीं थे। अब हमारी मोटरसाइकल महू की तरफ दौड़ने लगी
लेकिन अपनी मंथर गति से। रास्ता शांत खेत खलिहानों से होकर गुजर रहा था। यहाँ से
जामगेट 35 किमी था जो पहाड़ की ऊंचाई पर बना था और 8-10 किमी पहले नीचे घाटी से उपर
पहाड़ी पर दूर से नज़र आ रहा था। इस रास्ते से हम घाट की चढ़ाई पर चढ़ते हुए पहुंचे।
दूर बहुत दूर किले नुमा इमारत जो जाम गेट
थी हमे नीचे से दिखाई दे रही थी। घाट की चढ़ाई चढ़ते हुए हम जाम गेट की ऊंचाई पर
पहुंचे। जहां पर लंगूरों की फौज हमारे स्वागत के लिये तैयार थी। एक छोटा नमकीन का
पैकेट मेरे पास था जिसे मेहमानवाजी वश मैंने उन लंगूरों को अर्पित किया उनमे से कुछ ने हमारी मोटरसाइकल पर
बैठ मेरे हाथ से नमकीन उठा-उठा कर एक अच्छे मेहमान की तरह ग्रहण किया। जाम गेट कुछ
इस तरह बना था कि इसके एक ओर पहाड़ और दूसरी ओर खाई है और एक मात्र रास्ता गेट के
अंदर से होकर ही जाता है। हमे लगता है राज्य या जागीर की सुरक्षा के खातिर ही इसका निर्माण तत्कालीन
राजा या नाबाबों द्वारा कराया गया होगा ताकि कोई भी व्यक्ति बगैर अनुमति के प्रवेश
या निकासी नहीं कर सके। कुछ मिनिट दरबाजा पार कर मैंने पहाड़ और खाई के बीच दरबाजे
को देखा एक सेलफ़ी भी ली। आसपास चाय नाश्ते के स्टाल भी लगे थे। आने जाने बाले कुछ रुक कर सेलफ़ी आदि
ले गहरी घाटी को बड़े गौर से निहार रहे थे। सूरज का प्रकाश अनुकूल न होने के बाबजूद
हमने एक फोटो घाटी की ली जो बहुत ज्यादा अच्छी नहीं आई। आगे रास्ता खेतों,
खलिहानों के आसपास सड़क के दोनों ओर बसे ग्रामीण आवासों से होकर जा रहा था। अगले
20-25 किमी ऐसे ही शांत रास्ते से गुजर कर हम महू की ओर बढ़े। इस तरह महू मे डॉ॰ अंबेडकर की जन्मस्थली के
दर्शन पश्चात हम लगभग 6 बजे हमारे मित्र विजय गुप्ता जी के इंदौर स्थित कार्यालय
से साथ साथ उनके आवास पर पहुंचे जहां पर हमारे एक अन्य मित्र श्री विनोद अग्रवाल
के साथ 2-3 घंटे गपशप और यात्रा व्रतांत की चर्चा
कर भोजन उपरांत रात्रि विश्राम किया।
(महू
स्थित डॉ॰ अंबेडकर जन्मभूमि विवरण अगली पोस्ट मे)
विजय सहगल
शनिवार, 21 दिसंबर 2019
माहेश्वर
-:"माहेश्वर":-
मांडू से लगभग 12.30 बजे सुबह 28 नवम्बर 2019 को एकाध घंटे की झपकी के साथ अब हम माहेश्वर यात्रा के लिये पूरी तरह तैयार थे। मांडू से माहेश्वर की दूरी लगभग 45 किमी थी। मोटर साइकल पर बैठ बैग को पीछे पीठ पर लाद कर माहेश्वर यात्रा के लिये प्रस्थान किया। चतुर्भुज मंदिर चौराहे पर एक दो लोगो से आगे का रास्ते का मार्ग दर्शन लेकर आगे बढ़े। रास्ता थोड़ा ऊबड़-खाबड़ जरूर था पर खुशी इस बात की थी सड़क पर हल्के वाहन ही नज़र आ रहे थे वे भी न के बराबर। सुनसान सड़कों पर ऐसे खुशनुमा माहौल मे मोटरसाइकल की सवारी अच्छी लग रही थी। मांडू विंध्याचल के पहाड़ो पर होने के कारण अब घाटी मे पेडों और जंगलों के बीच से उतरना था बगैर स्पीड के भी गाड़ी तेजी से नीचे जा रही थी। पीछे छूटते पहाड़ों को देखने का लोभ बार-बार हमे पीछे मुड़-मुड़ कर पहाड़ देखने को मजबूर कर रहा था। घाटी के नीचे पहुँचने तक इसी कारण 3-4 बार रास्ते मे गाड़ी रोक कर फोटो ली फिर भी संतुष्टि नहीं मिली। पहाड़ और सड़क के बीच मे बनी घाटी के तल को देखना घने जंगलों के कारण मुमकिन नहीं था। जगह जगह पहाड़ों से पानी रिस-रिस कर सड़क के साथ चलता रास्ता मिलने पर घाटियों मे उतर जाता।
अब तक हम मैदानी इलाके मे आ चुके थे। पहाड़ पीछे छूटने के बाद रास्ता खेतों के बीच होकर गुजरने लगा। खेतों मे इस समय कपास लगी थी। दूर दूर तक कपास के सफ़ेद फूल नज़र आ रहे थे। इससे पहले हमने कपास की खेती नहीं देखी थी। एक खेत के किनारे गाड़ी रोककर कपास के फूल को एवं कपास खिलने के पूर्व उसके बंद कैप्सुल को देखा। खेतों के किनारे जगह जगह कुछ रुई देखने मिली जो हवा चलने के कारण फूलों से झड़ी होगी। आगे जाने पर अब हम एबी रोड पर कुछ किमी आगे बड़े जहां से सड़क के आरपार लगे सोचना पट एबी रोड को छोड़ बाये धामनौद की तरफ जाने का इशारा कर रहे थे। धामनौद के बाज़ार और लोगो को देख कर इस शहर और आसपास के के ग्रामीण कस्बों, गाँवों के संपन्नता की कहानी कह रहे थे। धामनौद से माहेश्वर 11 किमी शेष था।
हम लगभग 2.30 पर माहेश्वर पहुँच चुके थे। चौराहे से नर्मदा नदी के घाट का रास्ता पता कर शहर के अंदर प्रवेश किया। बाज़ार पूरी तरह बंद था। ज्ञात करने पर पता चला गुरुवार को बाज़ार की साप्ताहिक छुट्टी होती है। माहेश्वर किले के नीचे एक होटल मे कमरा लेकर बिना समय गँवाये सामान रख कर नदी के घाटों पर प्रस्थान किया। घाट के लिये ये रास्ता माहेश्वर किले से हो कर गुजरता था, जो नर्मदा नदी के तट पर ही बना है और जो नदी की सतह से लगभग 500 फूट ऊंचा रहा होगा। किले के प्रवेश द्वार सामने ही अहिल्याबाई होल्कर की 10-11 फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित थी। सामने ही प्राचीन महल जिसका काफी हिस्सा लकड़ी का बना हुआ था और जो दूर से देखने मे बहुत सुंदर लग रहा था। महल के अंदर अहिल्या बाई होल्कर के राजदरबार को उसी तरह सजाकर रखा गया था जैसे उनके राज्य मे रखा जाता था। महल मे राज्य मे इस्तेमाल होने बाली पालकी, गाड़ी और अन्य राजशी सामान रखा हुआ था। महल के बाहर आने पर अहिल्या बाई होल्कर का मंदिर था जिसमे सोने के झूले पर लड्डू गोपाल की सुंदर मूर्ति विराजमान है। अन्य अलग अलग आकार के बेशकीमती चाँदी से जड़ित शिवलिंग भी विराजमान थे। मंदिर के पूर्व एक छोटे से कमरे मे एक विलक्षण कार्य नित्य नर्मदा मिट्टी से शिव लिंग की स्थापना मंदिर मे कार्यरत विप्रो द्वारा किया जाता है और संध्या के समय उन शिवलिंगों को नर्मदा मे विधिवत पूजा अर्चना के बाद विसर्जित किया जाता है। ये नित्य क्रम हर रोज 5-6 पुरोहितों द्वारा किया जाता है। मै उक्त शिव लिंगों का बनना बाहर से देख रहा था वहाँ कार्यरत पुरोहित ने हमे अंदर आकर उक्त पुण्यक्रत को अंदर आकार देखने के लिये आमंत्रित किया जिसे सहर्ष स्वीकार कर मै 10-15 मिनिट शिवलिंग निर्माण के कार्य को एक टक निहारता रहा। उक्त कार्य की प्रथा अहिल्या बाई होल्कर के समय से अनवरत आज भी जारी है। ये अनुपम तरह का नित्य शिवलिंग स्थापना मैंने सिर्फ माहेश्वर के इस किले मे ही पहली बार देखी।
किले के दर्शन के बाद हमने नर्मदा नदी के घाटों की ओर रुख किया। किले के ही दूसरे गेट से नदी तट का रास्ता था। गेट के पास ही जगदीश द्वारा मात्र 30/-रूपये मे गरी बाला मीठा नारियल पानी पी कर अच्छा लगा। इसकी दुकान पर कल सुबह फिर आने का वादा कर मै घाट की तरफ बढ़ा। अहिल्या बाई घाट को देख कर मन प्रफ़्फुलित हो गया। अनेक वर्षो से फोटो विडियो पर ही घाट की शोभा देखी थी। आज साक्षात अपने आपको घाट के समक्ष पाकर अति उत्साहित था। चमकदार दोपहरी मे घाट का वस्तु एवं बारीक नक्काशी दार दरबाजे का शिल्प देखते ही बनता था। आधा-पौना घंटे घाट पर भ्रमण के पश्चात नाव से नर्मदा दर्शन का कार्यक्रम बनाया। कम श्रद्धालुओं के कारण कुछ समय इंतज़ार करना पढ़ा। अन्य श्रद्धालुओं के साथ बोट मे सांझा सबारी शुरू की। नर्मदा का तट बोट से बड़ा मनोरम और मनोहारी था। दूर से नर्मदा के घाटों, माहेश्वर किला, घाटों पर बने प्राचीन मंदिर, घाटों पर बनी लंबी लंबी सीढ़ियाँ, बीच बीच मे सीढ़ियों पर बने बुर्ज बहुत ही नयनभिराम और सुंदर लग रहे थे। नर्मदा नदी की विशाल जल राशि से परिपूर्ण तट पर नदी अपने शांत वेग से बह रही थी। बोट से नर्मदा दर्शन के पश्चात अहिल्या बाई घाट की सीढ़ियों पर चढ़ कर उपर मंदिर मे प्रवेश करने का निश्चय किया। मंदिर के लिये घाट की सीढ़ियाँ का आकार नीचे से उपर घटते हुए आकार मे क्रम से बना था जो दूर से देखने मे बहुत ही सुंदर दिखाई दे रहा था। मंदिर की आखिरी सीढ़ी पर एक विशाल नक्काशी दार सुंदर दरबाजा घाट की सुंदरता को सुनहरी धूप मे और भी निखार ला रहा था। दरबाजे के दोनों ओर उपर मुंडेरों पर पत्थरों की बहुत सुंदर बारीक वास्तु शिल्प की नक्काशी अनगिनत मूर्तियों पर की गई थी। दरबाजे के उपर की मंजिल के झरोखों से नदी का विशाल तट का विहंगम द्रश्य अविस्मरणीय छवि प्रकट कर रहा था, जो देखने लायक था। आयताकार विशाल आँगन मे पूर्वी और पश्चिमी छोर पर सीढ़ियो से जुड़े सुंदर मंदिर थे। जिसमे एक अहिल्या बाई और दूसरा शिव मंदिर था जो मंदिर प्रांगण मे खुले आँगन मे स्थित थे। मंदिर प्रांगण के चारों ओर खुली दालन नुमा बरामदे बने है जिनका मुह नदी की तट पर खुलता है। नदी का जल भी अन्य नदियों के मुक़ाबले काफी साफ और शांत वेग से बह रहा था। घाट की साफ सफाई भी ठीक थी इसमे और भी सुधार किये जाने की गुंजाईस से इंकार नहीं किया जा सकता था। शाम के छ: बजने को थे अब हमने कुछ आराम करने के लिये होटल की तरफ रुख किया।
होटल मे एकाध घंटे आराम के बाद मै बापस नर्मदा तट पर आया जहां पर शाम की नर्मदा आरती देखने का कार्यक्रम था। आरती का समय रात्री 8.30 का था इससे बीच हमने रात्री भोजन ग्रहण करने की सोच घाट के पास ही साँवरिया भोजनालय पहुंचे जिसके बारे मे एक दो लोगो ने अनुशंसा की थी। भोजन वास्तव मे बड़ा ही सात्विक, स्वादिष्ट एवं एक दम गरमा-गरम ताज़ा परोसा जा रहा था वह भी बिलकुल भारतीय सांस्कृतिक परिवेश मे, जमीन पर लगी छोटी छोटी लकड़ी की चौकी पर थाली मे लगा कर। अलति-पालथी मार कर बैठ चौकी पर भोजन करना बहुत अच्छा लगा। होटल के मालिक श्री गिरीश पंडित जी से उनके भोजन की प्रशंसा कर मै पुनः तट की ओर नर्मदा आरती दर्शन हेतु नदी के किनारे चल पड़ा। तभी ध्यान आया गिरीश जी को भोजन के बिल का भुगतान तो किया ही नहीं। चूंकि आरती का समय हो रहा था अतः आरती के बाद भोजन के बिल का भुगतान करने का निश्चय किया।
आरती शुरू ही होने बाली थी। तैयारियां पूर्ण हो चुकी थी। नर्मदा जी की आरती हरिद्वार या वाराणसी की तरह चकाचौंध भरी तो नहीं थी पर आरती मे शामिल होने बाले श्रद्धालूओं और स्थानीय रहवासियों की भावनाए और श्रद्धा समर्पण संख्या मे कम होने के बाबजूद किसी भी तरह वहाँ से कम न थी। दो-तीन पुरोहितों ने विधिवत मंत्रोचारों के बीच आरती शुरू की। नर्मदा माँ की स्तुति, वंदना और स्तोत्र का वाचन हुआ। कुछ भक्ति गीत नर्मदा मैया की शान मे गाए गये। आरती ग्रहण दर्शन कर रात्रि मे लगभग 9.30 बजे एक घंटे बाद कार्यक्रम समाप्त हुआ। श्री शर्राफ़ जी जो स्थानीय निवासी थे ने बताया कि यह आरती कार्यक्रम 2007 से निरंतर किया जा रहा है। नर्मदा आरती और दर्शन मन को सुकून और सुख देने बाला था। प्रसाद ग्रहण कर हम होटल की तरफ चलने के पूर्व संवरियाँ होटल पर श्री गिरीश जी को भोजन के बिल का भुगतान किया और इस भूलवश त्रुटि के लिये खेद व्यक्त किया। उन्होने बिल के भुगतान के लिये अकारण परेशान न होने की सौजन्यता प्रकट की। उन्होने कहा परेशान होने की क्या आवश्यकता न थी, पैसे आ ही जाते!! ऐसे मेहमान बाजी आज के समय कम ही देखने को मिलती है। होटल आते आते 10 बज चुके थे पहुँचते ही नींद के आगोश मे कब सो गया पता ही न चला।
(शेष अगली पोस्ट मे)
(शेष अगली पोस्ट मे)
विजय सहगल
सोमवार, 16 दिसंबर 2019
मांडू-2
"मांडू-2"
28 नवम्बर
2019 को सुबह 6.00-6॰15 बजे आँख खुली तो काफी अच्छा महसूस कर रहा था, कल दिन भर घूमने और यात्रा की थकान नदारद थी।
10-15 मिनिट यूं ही आलस दूर कर दैनिक कार्यों से निवृत्त हो गरम पानी से नहा धोकर मांडू के शेष बचे पर्यटन
स्थलों को देखने के लिये तैयार हो गया। लगभग 7 बजे हम शाही महल के परिसर मे टिकिट
लेकर दाखिल हुआ। उक्त स्थल मे शायद मै ही
पहला दर्शक था जो उस विशाल शाही महल परिसर मे भ्रमण कर रहा था। इस विशाल लंबे चौड़े
परिसर मे लगभग चारों ओर तालाब, बाबड़ी बनी हुई थी। मांडू का ये मुख्य पर्यटक स्थल
शाही महल परिसर है जिसमे छोटे-बड़े 14 महल, तालाब, ड्योड़ी, मस्जिद आदि है। परिसर के प्रवेश द्वार पर
पूरे क्षेत्र का मानचित्र बनाया गया है जिसमे 14 दर्शनीय स्थलों के नाम अंकित थे। इसी
परिसर मे एक संग्रहालय भी बनाया गया है जिसको प्रातः 10 बजे से देखा जा सकता है।
सूर्योदय मे परिसर मे स्थित जहाज महल पर उगते
सूरज की सुनहरी किरणों से जहाज महल काफी खूबसूरत लग रहा था। सुबह के सुहावने और
गुलाबी सर्दी के मौसम मे और हल्की गुनगुनी
धूप अच्छी लग रही थी। भ्रमण के साथ सुबह का घूमना भी हो रहा था। इस विशाल दो
मंज़िला महल के चारों ओर पानी के तालाब बने है पर पश्चिम की ओर पूरा महल विशाल तालाब के एक किनारे को घेरे खड़ा है। इसी कारण पश्चिमी तट से ऐसा प्रतीत होता है मानो
विशाल जल भंडार मे कोई बड़ा दुमंजिला पानी का जहाज खड़ा हो इसीलिए इस महल को जहाज
महल का नाम दिया गया है। इस शानदार वास्तुशिल्प की इमारत के एक ओर जहां पानी है
वही दूसरी ओर प्रवेश द्वार सुंदर घास के मैदान और सजावटी पौधों से घिरा था जिससे पर्यटन विभाग द्वारा संरक्षित परिसर स्थल की
सुंदरता मे और भी निखार आ रहा था। साफ सुथरे मार्ग के बाये मे जहाज महल का प्रवेश
द्वार और मार्ग के दूसरी तरफ दायें तबेली
महल,
कपूर तालाब, हिन्दू बाबड़ी तथा अन्य अर्धखंडहर महल और किले बने
है लेकिन अच्छे रखरखाब के कारण आँखों को सुंदर दिखाई देते है। हर इमारत के बाहर उस
इमारत का संक्षिप्त परिचय दिया हुआ है अतः हमने किसी गाइड की सेवा की आवश्यकता
महसूस नहीं की यों भी राजों, नाबाबों और रियसतदारों के इतिहास जानने की कभी
बहुत ज्यादा ईक्षा हमारी नहीं रही। बैसे
भी इन एतिहासिक इमारतों के बनवाने बाले सियासत दानों से ज्यादा हमारी रुचि इन
इमारतों के बनाने बाले कामगारों, मजदूरों, शिल्पकारों, वास्तुकारों के अनोखे वास्तु निर्माण मे रही
है,
जिनके मेहनत और सधे हाथों की कारीगरी दूर दूर से आये पर्यटकों को लुभाती रही है, पर इन
कामगारों, वास्तुकारों, मजदूरों की बनाई अनूठी इमारतें शतकों से आज भी हमे इन्हे देखने
के लिये प्रेरित करती है पर खेद है ये
कामगार, वास्तुशिल्पी इतिहास के पन्नों मे गुमनामी के
अंधेरे मे कहीं खो गये फिर चाहे कारीगर इन इमारतों के बनाने बाले हों या ताजमहल बनाने
बाले कारीगर।
जहाज महल के मुख्य हाल मे 4-5 बड़े बड़े बराण्डे
है जिनके उपर एक खुली छत्त मानों जहाज के ऊपरी डेक का आभास कराती हो। छत्त के दोनों छोरों पर बने छोटे गुंबद जहाज के मस्तूल का अहसास कराते है जिस तक पहुँचने के लिये नीचे से सीढ़ियाँ बनी
है। जहाज महल के आगे हिंडोला महल है इसी महल को पृष्ठभूमि बना रात्रि मे यही
प्रकाश और ध्वनि कार्यक्रम होता है। चूंकि ये महल हिंडोला अर्थात झूले से दिखाई
देता है इसलिए इसका नाम हिंडोला महल पड़ा। इस महल मे कहाँ से हिंडोला की भ्रांति होती है नहीं पता? पर इस
महल को देख कर हमे कहीं से हिंडोले की आकृति
प्रतीत नहीं होती। बैसे भी इतने बड़े हिंडोले हम जैसे छोटे लोगो ने
कही कभी कल्पना मे भी नहीं देखे, ये भी शायद बड़े नाबाबों के बड़े चोचले हों शायद? पूरे
मांडू मे बनी इमारतों मे ज्योमिति विज्ञान के नमूनों के उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिलते है वो इस हिंडोला महल के भीतरी बरामदों
मे भी देखने को मिले। हर वरांडे के मेहराब दूर से देखने मे अति सुंदर प्रतीत हो रहे थे।
आगे आयताकार रूप मे बनी दिलाबार खान मस्जिद है
जो स्तम्भ युक्त गलियारे के रूप मे बनाई गई है और जिसके बीच मे एक विशाल खुला आँगन
है यहाँ भी स्तंभों की ज्योमिति देखने को मिलती है। अन्य अनेक महल नुमा अर्ध खंडहर
इमारतों से होकर हम तालाब के बीच मे निर्मित इमारत जल महल मे पहुंचे जो चारों ओर
पानी से घिरी एक सुंदर टापू सी प्रतीत हो रही थी। जहां से पूर्वी छोर पर जहाज महल
साक्षात पानी के जहाज के रूप मे द्रष्टिगोचर हो रहा था। पुरातत्व विभाग द्वारा
उक्त महल के जीर्णोद्धार का कार्य प्रगति पर था।
एक बात जो
जो इस शाही परिसर मे कदम कदम पर देखने को मिली वह थी जल प्रबंधन। पूरे विशाल
परिसर मे जल का प्रबंधन बहुत ही वैज्ञानिक
तरीके से किया गया था जिसके नमूने आपको कदम कदम पर देखने को मिलेंगे। जल संग्रहण
के लिये अनेकों छोटी बड़ी बाबड़ी, तालाब, हौद और अनेकों इकाइयों को बनाया गया था।
वरसती पानी को एकत्रित करने के लिये छत्तों, खुले प्रांगण से बहने बाले जल को एकत्रित
करने का इंतजाम जगह जगह देखने को मिला। जल के इस संचय और संग्रहण का जीवित प्रयोग
इस पर्यटन स्थल को अन्य जगहों से अलग करता है। अब तक इस परिसर मे घूमते हुए लगभग
तीन घंटे हो चुके थे अब चाय की तलब और नाश्ते की भूंख लगने लगी थी। शाही परिसर से बापसी मे एक होटल से पोहे
के साथ फीकी चाय का ऑर्डर दिया पर पोहे तो
ठीक थे चाय मीठी ही निकली पता चला यहाँ दूध मे पहले से ही चीनी मिला कर रखते है
जिससे ही चाय बनाई जाती है। चाय को यूं ही छोड़ पास मे ही स्थित चतुर्भुज मंदिर के
दर्शन हेतु पहुंचे। जहां पर एक बहुत बड़े धार्मिक आयोजन चल रहा था। छोटे से कस्बे
मे काफी लोग एकत्रित थे। स्थानीय विधायक और आस पास के श्रद्धालूगण मंदिर परिसर मे
एकत्रित होकर मूर्ति स्थापना के कार्यक्रम मे शामिल हो रहे थे। भगवान श्री
राम-सीता और लक्षमन के दर्शन पश्चात मंदिर
के सामने एक बार फिर चाय का ऑर्डर दिया चाय बाले ने बहुत ही स्वादिष्ट फीकी चाय
बना कर दी तबीयत खुश हो गई। मंदिर मे फोटोग्राफी निषेध थी अतः फोटो नहीं ली।
अब वही पास मे स्थित चौथे पर्यटन स्थल पर
पहुंचे जहां पर तीन स्पॉट दर्शनीय थे जो एक ही परिसर मे स्थित थे। सबसे पहले जमा
मस्जिद देखी जिसकी सीढ़ियाँ भोपाल की ताजुल मस्जिद की तरह बनाई हुई थी। पर वास्तु
की द्रष्टि से मांडू की मस्जिद का वास्तु निर्माण अति उत्क्रष्ट था। अनेकों
स्थम्भों की ज्योमिति वास्तु पर बनी मस्जिद वास्तु शिल्प का उत्क्रष्ट नमूना थी।
मस्जिद से होकर ही जाने बाले रास्ते से होशंगशाह का मकबरा पहुंचे जो एक ऊंचे
चबूतरे पर संगमरमर के गोल गुंबद के आकार का ताजमहल की तर्ज़ पर बना था लेकिन एक
मात्र अंतर उसको ताजमहल से अलग करता था वह था छोटा आकार और कोई भी मीनार का उस
चबूतरे पर न होना। उसी मकबरे के बगल मे आयताकार विशाल कक्ष के रूप मे हिन्दू
वास्तु पर बनी समानान्तर स्तंभों पर निर्मित धर्मशाला जिसके सैकड़ों स्तम्भ भी
ज्योमिति वास्तु पर आधारित उत्तम वास्तुशिल्प को दर्शा रहे थे। बिलकुल एक सीध मे बने
स्तम्भ सूत दर सूत समान दूरी पर। इसके साथ
ही मांडू के मुख्य मुख्य स्थलों का दर्शन पूर्ण हो चुके थे। लगभग 11 बजे होटल मे
पहुँच सारे समान को पैक कर एक घंटे का विश्राम किया क्योंकि होटल का चैक आउट समय
12.30 था। विश्राम पश्चात हमारी यात्रा
पुनः शुरू हुई और हमारा अगला पढ़ाव था मांडू से
लगभग 45 किमी दूर नर्मदा नदी के तट पर बना पवित्र तीर्थ माहेश्वर। जिसका
विवरण अगली पोस्ट मे।
विजय सहगल
शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019
नागरिक संशोधन बिल 2019
"नागरिक संशोधन बिल 2019"
किसी व्यक्ति की ज़िंदगी मे इससे ज्यादा दुर्भाग्य
क्या होगा जब उसे धर्म के आधार पर उत्पीढ़ित किया जाये। धर्म के आधार पर उनको पढ़ने-लिखने
से बंचित किया जाये। अपने धर्म के पालन करने
से रोका जाये, उनके धर्मस्थलों को तोड़ा
जाये, एक धर्म विशेष के मानने बालों की बहिन बेटियों
को अपहरण कर ज़ोर जबर्दस्ती की जाये,
उनका बलपूर्वक धर्मपरिवर्तन कर अत्ताइयों द्वारा अपने धरम मे परिवर्तित करा दिया जाये,
उनके व्यवसाय को लूट लिया जाये, उनके बच्चो बुजुर्गों
से जबर्दस्ती बंधुआ मजदूरी कराई जाये और इतना सब होने के बाबजूद प्रशासन,
जिम्मेदार संवैधानिक संस्थाए, सुरक्षा मे लगी पुलिस के सिपाही न केवल उनकी शिकायतों की अनदेखी करे बल्कि गैरकानूनी
कार्य करने बाले अपराधियों के साथ खड़े हो तो ऐसे शोषित,
पीढ़ित व्यक्ति की क्या मनोदशा होगी?
ऐसा व्यक्ति अपने साथ हो रहे अन्याय पर अपने परिवार के सामने,
अपने छोटे, नौजवान बच्चों या बूढ़े माँ-बाप
के सामने अपने आपको कितना असहाय, कितना दीन,
कितना हीन भावना से ग्रसित महसूस करता होगा जब खुद सही होते हुए भी उसके साथ घटित अपराध का बो प्रतीकार भी न कर सके?
सारी कानून सम्मत संस्थाओं के बाबजूद उसे कोई सहायता न मिले?
अर्थात "मारें और रोने भी न दे",
और ये अन्याय,
अत्याचार, उत्पीढन,
जुल्मों-सितम सिर्फ और सिर्फ इसलिये किये जायें क्योंकि वो एक धर्म विशेष के मानने बाले थे,
क्योंकि बे हिन्दू थे? आतताइयों आतंकियों,
लुटेरों, गुंडों बदमाशो को पराश्रय
देने बाला देश नापाक पाकिस्तान है,
जो इस तरह की अमानवीय, अदयालु,
क्रूर घटनाओं को देखते रहने के बाबजूद मूक और अंधा बन खड़ा रहकर समाज,
धर्म विरोधी लोगो के क्रत को अपनी स्वीकृति प्रदान करता है!!
धिक्कार है ऐसे देश पाकिस्तान और वहाँ के निर्दयी देशवासियों पर,
लानत है ऐसे देश पाकिस्तान और उनके मुर्दा वासिंदों पर,
तरस आता है उन सियासी रहनुमाओं पर जो अपने
अल्पसंख्यक नागरिकों के धार्मिक उत्पीढन और सामाजिक अधिकारों की हिफाजत और रक्षा करने मे असफल और नाकामयाब रहे
और जो इस अत्याचार और अनाचार पर मौन रहे?
चोरी और सीनाज़ोरी करते हुए पाकिस्तान के धूर्त
और मक्कार रहनुमाओं तुम भारत पर तोहमत लगाते हो कि भारत हिन्दू देश बनने की राह पर
बढ़ रहा है? उल्टा चोर कोतवाल को डांटे?
जैसा तुम अपने देश के अल्पसंख्यकों के अधिकारों,
उनकी जानमाल, व्यवसाय और संपत्ति और उनके
स्वाभिमान और अस्मिता की रक्षा करने मे पूरी तरह असफल रहे,
नाकामयाब रहे हो बैसा इस देश के किसी भी अल्पसंख्यक
के विरुद्ध उक्त उल्लेखित धार्मिक उत्पीढन,
धर्म के नाम पर अपहरण, बलात्कार,
बलात धर्मपरिवर्तन, धन-संपत्ति की खुली लूटपाट
की एक भी
घटना 130 करोड़ की आबादी बाले हमारे देश मे देखने को नहीं मिलेगी इस बात का पाकिस्तान
तुम्हें खुला चैलेंज है।
पाकिस्तान से
आये ऐसे संघर्षशील उत्पीढ़ित हिन्दू शरणार्थी भाइयों की बहदुरी और धैर्य की जितनी भी
प्रशंसा की जाये कम है जिन्होने अपने धर्मपालन करने के लिये अपनी मातृभूमि को छोड़ा, अपने घर-बार, व्यवसाय को छोड़ शरणार्थियों के रूप मे
तमाम दुःख और कष्टों को स्वीकार कर अपने पूर्वजों के देश मे अपने स्वाभिमान अपने स्व्धर्मपालन
के लिये आश्रय की तलाश मे एवं श्रीमद्भग्बद गीता मे भगवान श्री कृष्ण के संदेश को चरतार्थ
करने भारत चले आये। इस श्लोक मे भगवान श्री कृष्ण कहते है :-
श्रेयान्स्वधर्मो
विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।3.35।।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।3.35।।
(अर्थात अच्छी तरह आचरणमें लाये हुए
दूसरे के धर्म से गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने
धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।)
धर्म के नाम पर सताये ऐसे हिन्दू शरणार्थियों भाइयों का "नागरिकता
संशोधन विधेयक 2019" के पारित होने पर उनकी नागरिकता की राह मे आ रही अंतिम बाधा
के हटने पर उन्हे बहुत बहुत बधाई।
विजय सहगल
बुधवार, 11 दिसंबर 2019
"मांडू"
"मांडू"
18 नवम्बर को मुरैना के एक पूरे दिन की यायावरी के
बाद हमारे पास अपने झाँसी और ग्वालियर प्रवास मे सामाजिक कार्यक्रमों मे शामिल
होने के बाद 3 दिन बिल्कुल फ्री थे। इन तीन दिनों के सदुपयोग के लिये हमने
ग्वालियर से इंदौर जाने का कार्यक्रम बनाया जहां मेरे परम मित्र श्री विजय गुप्ता
जी आजकल पदस्थ है। हमने 26 नवम्बर को ग्वालियर से इंदौर रतलाम एक्सप्रेस से
प्रस्थान कर 27 नवम्बर की सुबह इंदौर पहुँच गये। लगभग 9 बजे हम गुप्ता जी के "स्पेस
पार्क" स्थित आवास पर पहुँच गये। हम चाय पान के बाद तय कार्यक्रम अनुसार नहा
धोकर तैयार हुए। व्यवसायिक जिम्मेदारियों के चलते गुप्ता जी को हमने आगे मांडू और
महेश्वर चलने को बाध्य नहीं किया। सूटकेस से दो जोड़ी कपड़े, आवश्यक अन्तः वस्त्र, सेविंग और टूथ ब्रश आदि
पिट्ठू बैग मे डाले और अपनी पहली घुम्मकड़ी यात्रा के लिये टिफिन का भोजन ग्रहण कर गुप्ता जी के साथ उनके कार्यालय पहुँच गया।
जहां से हमे हमारे पुरानी मित्र संजय
सक्सेना की मोटर साइकल से अपनी यात्रा शुरू करनी थी। गुप्ता जी के कार्यालय के
अधिकतर साथी हमारे भी परिचित थे या जिनके साथ हम अपने सेवाकाल मे कहीं न कहीं कार्य कर चुके थे। उन सभी से मिलने और
श्री नवीन बुंदेला जी जो पहले ही इन जगहों पर जा चुके थे से मांडू और माहेश्वर के
मार्ग की आवश्यक जानकारी लेकर यात्रा के लिये निकले। वास्तव मे ये हमारी पहली
पूर्वनियोजित यायावरी यात्रा थी। इससे
पूर्व हमारे यात्रा व्रतांत हमारे घर से या पैतृक घर से ही हुई थी। पहली बार हम घर
से दूर भ्रमण के लिये मोटर साइकल से निकले थे। लगभग सुबह के 11 बज चुके थे और
हमारा पहला लक्ष्य था इंदौर से मांडू जो कि लगभग 110 किमी था। हैलमेट लगा पिट्ठू
बैग को पीछे रख बिल्कुल घुम्मकड़ी लग रहा था।
मोटरसाइकल से शीघ्र परिचित होने के बाद हमे उसमे एक बड़ी कमी लगी की
मोटरसाइकल मे कोई भी पीछे देखने के लिये मिरर न था जिसके विना हम यात्रा के
अभ्यस्त नहीं थे। इंदौर बाइपास से होते हुए हम जा ही रहे थे कि एक नौजवान को देख
कर हम उसके व्यक्तित्व को नज़रअंदाज़ न कर सके। सड़क पर 50-100 मीटर आगे
निकलने के बाद भी हम गाड़ी को बापस मोड़ कर उनके पास आये। रास्ता पूंछना या बगल के
ठेले से दो केले लेना तो महज बहाना था। हमने अनौपचारिक मुलाक़ात की श्री पंकज कुमार
जी से जिनकी बुलेट मोटरसाइकल जितनी बड़ी और शानदार थी उतनी ही हष्ट-पुष्ट उनकी
पर्सनलटी थी। यूहीं बातचीत मे अपने 148 किलो के बजन के साथ उन्होने अपने को पूर्ण
स्वस्थ और फिट बताया सुनकर अच्छा लगा। पंकज जी से कुछ मार्ग निर्देशन ले हम आगे
बड़े। इंदौर से 20-25 किमी आगे हमने मानपुर मे
मोटरसाइकल मे बैक मिरर लगवा सहज रूप से यात्रा पुनः शुरू की।
अब पिट्ठू बैग इस यात्रा के दौरान तंग कर रहा था इस
समस्या को भी मानपुर मे ही एक रबर की रस्सी लेकर बैग को सीट पर अच्छी तरह बांध कर
आगे बड़े। मौसम ठीक था धूप अच्छे से खिली थी मोटरसाइकल पर यात्रा से हल्की हल्की
ठंडक मौसम की गर्मी को कम कर यात्रा को एक सुखद अनुभूति प्रदान कर रही थी। आराम से
यात्रा करते हुए हम लगभग 60 किमी की यात्रा पूरी कर चुके थे। रास्ते मे पिट्ठू बैग
को ठीक करने कराने मे पानी की बोतल कहाँ गिर गई पता न चला सुबह के टिफिन मे बची
रोटी सब्जी रखी थी जिनको ग्रहण कर आगे कस्बे के चौराहे से पानी लेकर अपनी यात्रा
जारी रखी। इस दौरान सड़क ठीक ठाक ही रही मुख्य हाईवे से हट कर स्टेट हाइवे भी ठीक
थे। मांडू धार जिले मे एक काफी प्रसिद्ध पर्यटक केंद्र होने के कारण सड़क संपर्क
अच्छा है। छोटे गाँव कस्बों से होकर आराम से मोटरसाइकल चलाना अच्छा लग रहा था।
मांडू से लगभग 11 किमी पहले एक काकड़ा खोह नमक स्थान पर कुछ लोग दिखे जो मांडू का
ही एक दर्शनीय स्पॉट था। पर्यटक ज्यादा नहीं थे। मै भी पैरों को कुछ आराम देने के
लिये मोटर साइकल को खड़ा करके काकड़ा खो की तरफ बढ़ा। एक बहुत गहरी खाई के मुहाने पर
हम खड़े थे। पास मे ही एक छोटा झरना जिसका पानी उपर से सैकड़ो फुट नीचे गिर रहा था।
पास मे ही एक दो सजे धजे ऊंट खड़े थे जो इस बात की तरफ इशारा कर रहे थे कि यहाँ
पर्यटक आते रहते है पर आज उनकी संख्या न के बराबर थी। पर उस ऊंट बाले की बोहनी
कराने के लिये हमने उस के ऊंट पर सवारी करली। उसने बताया ये जगह जहां पर बुंदेलखंड
मे प्रसिद्ध वीर आल्हा ऊदल द्वारा मांडव्गढ़ का युद्ध हुआ था जिसमे दुश्मनों की फौज
से घिर जाने के कारण आल्हा ऊदल घोड़े पर बैठ कर छलांग लगाई थी। घोड़े के टाप के
निशान पहाड़ी पर देखे जा सकते है, इसलिए ये एक एतहासिक जगह
है। यहाँ से मांडू 4-5 किमी दूर था। कांकड़ा खोह से आगे बढ़ते हुए हमने आलमगीर
दरवाजे मे प्रवेश कर मांडू मे अपनी उपस्थिती दर्ज़ की। मांडू के प्रवेश करते ही
किले नुमा 3-4 दरवाजे मिले जो 6-7वे शताब्दी के परमार शासकों की राजधानी मांडू के
वैभव की कहानी ब्याँ कर रहे थे। मांडू एक बहुत छोटा गाँव है जो मुश्किल से
1.00-1.50 किमी लंबी सड़क के दोनों ओर विरल रूप से बसा है जबकि मांडू के पर्यटक
स्थल इस बसाहट के चारों ओर 7-8 किमी के दायरे मे फैले है जिनमे मुख्य 4-5 स्पॉट ही
पर्यटन के द्रष्टि देखने लायक है और जिनका रख रखाव भी पर्यटन विभाग द्वारा बहुत
अच्छी तरह से किया जा रहा है बाकी अन्य अनेक महल अर्ध खंडहर रूप मे यहाँ वहाँ
देखने को मिल जाएंगे जिनमे अंधा अंधी का महल, चोर कोट, लोहानी गुफा आदि है। मांडू पर 13वी शताब्दी मे मुगलों
के कब्जे के बाद काफी महल, बाबड़ी और मंडप आदि बनाए गये। पहुँचते हुए लगभग 2.30-3.00 बज
चुके थे चूंकि यहाँ घूमने के काफी स्पॉट है अतः हमने बगैर समय गवाये मांडू के
आखिरी छोर पर स्थित रानी रूपमति मंडप देखने का निर्णय लिया। विंध्याचल की पहाड़
श्रंखला मे स्थित मंडप 2000 फुट की ऊंचाई पर वसा है उसमे भी रानी रूपमति मंडप पहाड़
के सबसे ऊंचाई पर स्थित है। मोटरसाइकल को पार्किंग मे लगा पिट्ठू बैग को एक शिकंजी
बाले की दुकान मे रख कर महल के भ्रमण हेतु बढ़े। महल पर चढ़ने को सीढ़ियाँ और चढ़ाई पर
बने स्लोब थे। समय बचाने हेतु मै सीढ़ियों
से चढ़ा सीढ़ी कम थी पर ऊंची नीची थकाऊ चढ़ाई। कहते है राजा बाज़ बहादुर ने ये महल
अपनी प्रियतम रानी के लिये इस महल का निर्माण कराया था। पर्यटन विभाग मध्य प्रदेश
द्वारा बहुत ही सुंदर और सफाई के साथ इस स्थल का रखरखाव इस स्थल की सुंदरता को और
बढ़ा देता है। दो आयात की भुजाओं पर बने वरांडों के उपर दोनों किनारों पर बने छत्रिनुमा
वर्गाकार महल जिन पर गोल गुंबद बने है बहुत ही सुंदर वास्तु कला के नमूने है। आयात
की दोनों रेखाओं की एक सीध मे बने महल के गोल मेहराब ज्योमिति के उत्क्रष्ट नमूने
है। एक के अंदर एक महल के ये मेहराव ज्योमिति के सुंदर नमूने दिख रहे थे, दूसरे छोर का निर्गम
द्वार देखने मे बहुत ही सुंदर प्रतीत हो रहा था। इस तरह की ज्योमिति शिल्प मांडू
मे अन्य महलों, मस्जिदों, धर्मशालाओं मे जगह जगह देखने को मिलती है। रानी रूपमति महल की
सर्वोच्च छत्त से मांडू का बड़ा मनोहारी द्रश्य देखा जा सकता है। गुजरात मालवा से
आये सैकड़ों पर्यटक इस सुहावने मौसम मे महल से मांडू का नज़ारा देख आनंद से सराबोर
थे। महल के खुले क्षेत्र मे हरी घास के मैदान और सजावटी पौधे स्थल की सुंदरता मे
चार चाँद लगा रहे थे। महल से बापसी मे पिट्ठू बैग लेते समय नमकीन और थोड़ी मीठी
नीबू शिकंजी ने यात्रा की सारी थकावट दूर कर फिर से तरोताजा कर दिया।
हमारा अगली मंजिल राजा बाज बहादुर महल था। पहाड़ी की
ढलान पर रूपमति मंडप से 1-1.50 किमी
दूर बाज़ बहादुर महल था। आयताकार किले नुमा महल जिसमे दो आँगन बनाये गये थे उनमे से
एक आँगन मे पानी की सुंदर कुंड या वावड़ी बनाई गई है जिसके चारों ओर महल के कक्ष
बनाये गये थे। किले नुमा महल के ऊपरी छत्त पूरी तरह से खुली थी जिनके दोनों
किनारों पर रूपमति महल की तरह बारहदरी के खंबों पर टिकी गुंबद महल की शोभा बढ़ा रही
थी। सूरज ढलने को था, पक्षियों के झुंड अपने घरौंदों की तरफ कलरव करते जा रहे थे हमे
भी अपने आश्रय स्थल की तलाश थी। राजा बाज़ बहादुर और रानी रूपमति के वैभव की कहानी अपने
दिल मे समेटे/सँजोये हमने भी अपने अगले पढ़ाव आश्रय स्थल की ओर रुख किया।
होटल मे अपने बैग को रख रात्रि मे होने बाले प्रकाश
एवं ध्वनि कार्यक्रम मे शामिल होने 7.00 बजे के कुछ मिनिट पूर्व स्थल पर पहुंचा।
घुप्प अंधेरे मे हिंडोला महल को पृष्ठ भूमि बना ध्वनि और प्रकाश कार्यक्रम अत्यंत
रंग-बिरंगी रंगो, सुंदर संगीत और दृश्यों को समेटे मांडू अपने वैभव की कहानी
सुना रहा था। कार्यक्रम अत्यंत ही सुंदर और मनभावन था। मांडू को मुगल शासकों ने
शादियाबद नाम रखा जिसका अर्थ है खुशियों का शहर जिसको छोटे से मांडू गाँव मे घूमने
पर पल पल महसूस किया जा सकता है। उस दिन मांडू गाँव मे प्राचीन चतुर्भुज मंदिर मे
बड़ा धार्मिक आयोजन चल रहा था जिसके अंतर्गत उस दिन पूरे गाँव मे मिट्टी के दिये
घरों,
दुकानों होटेलों मे रोशन किये जा रहे थे जो कि मंदिर के धार्मिक आयोजन का
हिस्सा था। कार्यक्रम उपरांत एक भोजनालय मे भोजन के बाद दिनभर की यात्रा और कुछ
स्पॉट के भ्रमण की थकान के बाद थक कर बेहद
चूर था अतः होटल पहुँचते ही कब सो गया पता ही न चला।
(शेष अगले अंक मे)
विजय सहगल
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