शनिवार, 24 नवंबर 2018

भोजनालय


"भोजनालय"

मेरा मानना हैं किसी भी व्यक्ति के साथ  जाति, धर्म, प्रांत, लिंग भेद  के आधार पर उत्पीड़न या अपमान करना मानवता के प्रति अपराध हैं। पीड़ा देने वाले की मानसिकता उसके परिवार समाज/धर्म  से मिली मानसिकता को दर्शाता है। पर पीढ़ित को मिले अपमान का दंश  और पीड़ा देने बाले व्यक्ति के व्यवहार और कार्य को भुक्तभोगी  सारी ज़िंदगी नहीं भूलता। जब अपमान, उत्पीड़न किसी जाति, धर्म, प्रांत या देश के व्यक्तियों द्वारा लगातार मानवता के विरुद्ध किया जाता हैं तो वही  उस देश या समाज/धर्म का चरित्र वन जाता हैं। सारी दुनियाँ मे लोग उस देश, समाज, धर्म को उसी कसौटी पर रख कर कसते हैं।
मैं अपने माता-पिता और परिवार के साथ उन दिनों (दिसम्बर 1996) एल॰एफ़॰सी॰ भ्रमण पर गुजरात गया हुआ था। 10-12 दिन की यात्रा का कार्यक्रम था। गुजरात मे बड़ौदा, जाम नगर, जूना गढ़, दुवारका, भेट दुवारका, सोमनाथ और  अहमदाबाद मे जाने का कार्यक्रम था। दिसम्बर माह मे यध्यपि सारे गुजरात मे छुट्टियाँ रहति हैं काफी भीड़ हर स्टेशन पर थी फिर भी यात्रा बहुत अच्छी चल रही थी। हमारा आखिरी पढ़ाव अहमदाबाद था। हम लोगो ने गांधी नगर, अक्षर धाम मंदिर के शानदार दर्शन किए। सोमनाथ दर्शन अद्भुत थे।  एक दिन हम लोगो का अहमदाबाद मे शॉपिंग करने मे व्यस्त रहे। हम लोग पूर्णतयः शाकाहारी हैं अंडा आदि भी परिवार मे नहीं खाते इस तरह की चर्चा हम लोग एक दुकान पर कर रहे थे। किसी शुद्ध शाकाहारी होटल की जानकारी उस दुकानदार से चाही। उसने अपनी जानकारी के अनुसार एक अच्छा साफ सुथरा एवं शुद्ध शाकाहारी स्वदेशी भोजनालय  की जानकारी हमे  दी जो वही पास मे था।  हम सभी लोग दोपहर मे उस भोजनालय का पता पूछते हुए पहुचे। कपड़ा बाज़ार मे ही उक्त भोजनालय  पहली मंजिल पर था। सही जगह का नाम तो नहीं मालूम पर कोई पुरानी बिल्डिंग थी। सीढ़ियाँ लकड़ी की बनी हुई थी।  हम लोग सीढ़ियाँ चढ़ कर उस भोजनालय  मे पहुंचे। भोजनालय  साफ सुथरा था लेकिन कुर्सी मेज आदि नहीं थी। यह जन कर हमे और भी अच्छा लगा कि पूर्णतयः भारतीय परिवेश मे भोजन करने की व्यवस्था हैं। होटल के कर्मचारियों ने लंबी विछी पट्टी पर हम सब को बैठाया। उन लोगो ने हम सभी के सामने पत्तल परोस दी। हम लोगो ने उन लोगो से अपने पूर्ण शाकाहारी भोजन ग्रहण करने की इक्क्षा से  उन कर्मचारियों को अवगत कराया  जो भारतीय परिवेश मे धोती पहने हुए थे। अचानक उनमे  दो लोगो ने आपस मे चर्चा की और मुझसे मेरी जाति पूंछी। मैं थोड़ा चौंका फिर भी मैंने बताया मैं सहगल हूँ खत्री जाति से हूँ, यू॰पी॰  का रहने बाला हूँ। मेरे को घोर आश्चर्य हुआ जब उसने हम सभी को भोजन कराने से माना कर दिया। जब मैंने ऐसा करने की बजह पूंछी तो उसने मुझे कहा कि आपलोगो को भोजन नहीं कराया जा सकता? मैंने कहा हम लोग पूर्णतयः शाकाहारी  भोजन करते हैं। आपके भोजनालय का पता एक दुकानदार ने दिया था और आपके भोजनालय की काफी प्रशंसा भी की थी आपका जो भी भोजन का शुल्क है हम भुगतान करेंगे, हम मुफ्त मे भोजन ग्रहण नहीं कर रहे? लेकिन उन कर्मचारियों ने साफ-साफ भोजन कराने से मना कर सामने विछी हुई पत्तलों को उठा लिया। तब मैंने कुछ ज़ोर देकर कहा कि आपको पत्तल आदि देने के पूर्व पूंछताक्ष करनी चाहिए थी? आपका यह व्यवहार निंदनीय हैं।  परदेश का मामला था माता-पिता और पत्नी के अलावा दोनों छोटे बच्चे साथ थे, बहस करना उचित नहीं लगा।  बुरा तो बहुत लगा कि स्वंत्रता के 49 साल बाद भी इस तरह जाति, धर्म  का भेद भाव आज भी हिदुस्तान मे जारी हैं। हम लोगो ने बापस आकार एक अन्य भोजनालय मे भोजन किया किन्तु पूरी गुजरात के शानदार यात्रा के अंत मे इस घटना के अपमान और भेद-भाव  से मिले घाव को मैं आज  तक नहीं भूला हूँ।

विजय सहगल




सोमवार, 19 नवंबर 2018

मेकाहारा



"मेकाहारा"

बो स्याह, भयाबह  काली रात मुझे आज भी याद हैं। उन दिनो मैं रायपुर मे था। बर्ष और माह ठीक से याद नहीं शायद 1998-99 रहा होगा। हमारे मित्र देवांगन का रात मे लगभग 9 बजे फोन आया कि उनकी शाखा के गार्ड श्री दास को ब्रेन हैमरेज़ हुआ है मैकाहारा (मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल, रायपुर) मे एड्मिट हैं। रायपुर मे उन दिनो तीन शाखाएं थी, मुख्य शाखा-जी॰ ई॰ रोड, मेडिकल कॉलेज काउंटर, क्लेकटोरेट काउंटर,  रायपुर स्टाफ की  एक बड़ी खूबी थी (अब भी हैं) बह थी आपसी भाई चारा, एक दूसरे के दुख:-दर्द मे सभी का साथ मे खड़ा होना। न केवल रायपुर पूरे मध्य प्रदेश (उस समय रायपुर मध्य प्रदेश मे था, आज का छत्तीसगढ़ भी उसी परंपरा का निर्वहन कर रहा हैं)  मे ऐसा आपसी सद्भाव सेंट्रल जोन कमेटी, अधिकारी-कर्मचारी यूनियन के कारण संभव हुआ था जो शायद ही कही  देखने को मिलता हो। देवांगन जी ने बताया रात मे लगभग 7 बजे शाखा को बंद करते समय श्री दास बेहोश हो कर बहीं गिर गये थे। उन्हे ब्लड प्रैशर की शिकायत थी। उसी हालत मे उन्होने खुद  बी॰पी॰ की दबाई लेने की कोशिश  भी की जो बह अपने पास रखते थे परन्तू कोई लाभ न होने के कारण उनको हॉस्पिटल मे एड्मिट कराया गया जो शाखा के बहुत नजदीक था। चूंकि वहाँ पर अपनी शाखा थी हॉस्पिटल का सारा स्टाफ मेडिकल कॉलेज शाखा के स्टाफ को अच्छी तरह जानता था तुरंत ही एड्मिशन  की औपचारिकता पश्चात  उपचार   उपलब्ध हो कर इलाज शुरू हो गया। धीरे-धीरे मेरे सहित मुख्य शाखा से मजूमदार जी, मेडिकल काउंटर से निनावे, निखाड़े, हिरेंज जी और अन्य अनेक स्टाफ हॉस्पिटल पहुँच गये। ब्रेन हैमरेज के कारण मुह-नाक से काफी रक्त बह गया था। रक्त की आवश्यकता थी। मेरे सहित  2-3 और स्टाफ ने तुरंत ही रक्त उपलब्ध करा दिया। हम सभी लगातार दास जी के पास ही खड़े थे और उनके शीघ्र स्वस्थ की कामना कर रहे थे। परंतु दुर्भाग्यवश इतनी सब देखभाल के बाबजूद भी दास जी को नहीं बचाया जा सका और उनका देहावसान रात लगभग 1 बजे  हो गया। हम सभी स्टाफ काफी गमगीन हो गये। पर होनी को कौन टाल सकता था? सभी बुझे और दुखी  मन से उनके परिवार से बात कर उनके पार्थिव शरीर के अन्त्येष्टि के बारे मे चर्चा कर कार्यक्रम बनाने लगे। दास जी का ग्रहनगर रायपुर से 40-50 कि॰मी॰ दूर राजिम मे था। सभी स्टाफ सदस्यों ने  जिनकी संख्या 15-20 से उपर रही होगी काफी  दुखी मन से  आपस मे चर्चा के बाद यह  तय किया कि सुबह लगभग छः बजे हॉस्पिटल से ही सीधे श्री दास जी के  पार्थिव देह को एम्ब्युलेन्स से उनके ग्रहनगर राजिम  ले जाया जायेगा जहां उनका अंतिम संस्कार किया जायेगा। इस बार्तालाप, सलाह मशविरा मे हम लोगो को 1 घंटा और लगा होगा। लगभग रात के 2-2.5 का वक्त होगा। उन दिनो मोबाइल का चलन शुरू नहीं हुआ था, पेजर का चलन था।  हम लोगो ने तय किया कि सभी अपने-अपने घरों मे जाकर आगे के कार्यक्रम की सूचना परिवार को दें एवं आवश्यक कार्यों को  तुरंत निपटा कर  बापस हॉस्पिटल मे ही एकत्रित हो  जायें ताकि सभी एक साथ मिलकर राजिम स्थित ग्रहनगर मे  श्री दास जी की अन्त्येष्टि मे शामिल हो सके। हम सभी स्टाफ बात करते हुए मेडिकल कॉलेज काउंटर की तरफ बढ़ लिये जहां हम लोग प्रायः अपने वाहन आदि खड़े करते थे। क्योंकि मेडिकल कॉलेज परिसर मे स्टैंड के अलावा अन्यत्र पार्किंग निषेध थी इसलिये हम सभी स्टाफ जब कभी भी मेडिकल कॉलेज काउंटर जाते थे तो काउंटर के सामने ही अपने स्कूटर, कार आदि पार्क करते थे जो अंदर पीछे की तरफ था। वहाँ पर ही मेडिकल कॉलेज के अन्य स्टाफ भी अपने वाहन खड़े करते थे। जब मैं अपनी कार मे बैठा और कार को स्टार्ट किया तो मैंने महसूस किया की कार का स्टाइरिंग मोड़ने  मे काफी दिक्कत हो रही हैं। जब मै कार के इंजिन को  बंद कर नीचे उतरा तो देखा ड्राईवर सीट बाले अगले पहिये मे बिलकुल हवा नहीं हैं मैं समझ गया गाड़ी पंचर हैं। यह देख कर हमारे कुछ साथी मेरी सहायता के लिये रुक गये। कार की डिक्की से स्टेपनी निकाल कर मैंने  पहिये बदलने की प्रिक्रिया शुरू ही की थी कि देवांगन जी बोले सर इस का तो अगला दूसरा पहिये मे भी बिलकुल हवा नहीं हैं शायद दूसरा पहिया भी पंचर हैं? अब मेरा माथा ठनका ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि दोनों पहिये एक साथ पंचर हों? मुझे कुछ साजिश की शंका होने लगी। हम लोग सारी रात से हॉस्पिटल मे परेशान थे अब ये नई समस्या का सामना या यों कहे समाधान का रास्ता खोजने के लिए कार की डिक्की से पहिया बदलने हेतु टूल्स निकालने लगे।  अचानक एक मेडिकल स्टूडेंट जिसने बेहद शराब पी रखी थी अपने कुछ साथियों के साथ आया और यहाँ गाड़ी खड़ी करने पर एतराज करने लगा। हम लोगो ने जब बैंक स्टाफ होने का परिचय दिया इसके बाबजूद भी लगातार बह ऊल-जलूल कुछ भी बोले चला जा रहा था। हम लोगो ने अपने साथ हुए हादसे का भी उल्लेख किया पर बेकार। तब मुझे सहसा याद आया यह  मेडिकल छात्र अपने कुछ साथियों के साथ सारी रात हॉस्पिटल के वार्डो मे शराब पीकर हल्ला-गुल्ला मचा रहा था। कुछ चौकीदार, गार्ड के साथ इसने मारपीट भी की थी। जिसकी आवाज़े लगातार हम लोगो ने सुनी थी। शराब पीकर बोतल-गिलास, खिड़कियों के शीशे  तोड़ने की आवाजे भी  हमने सुनी थी और इस गुंडागर्दी पर आपस मे चर्चा भी की थी, पर हमे कभी ऐसा नहीं लगा की इतने पढे लिखे वर्ग का छात्र कार के पहियों की हवा निकालने की इतनी नीच ध्रष्टता करेगा? हम लोग अपने स्टाफ के इलाज हेतु वैसे ही परेशान थे और उसके देहांत के बाद तो और भी दुखी थे इसलिये इस उद्दंड छात्र के पूरे हॉस्पिटल मे किये जा रहे उद्दंडता की तरफ हमारा ध्यान होते हुए भी नजरंदाज किया था। किन्तु अब उसके इस व्यवहार से  हमारा शक पक्का था कि हमारी कार के अगले दोनों पहियों की हवा इसी दुष्ट छात्र ने ही जान कर निकाली हैं। हम जैसे तैसे एक पहिये को खोल कार का पहिया बदल रहे थे, हाथ मे पहिये खोलने का "पाना" (औज़ार) था, क्रोध तो बहुत आया पर एक और नई समस्या को आमंत्रित करन उचित नहीं समझा। एक पहिया बदलने के बाद हमने दूसरे पहिये मे हवा न होने के बाबजूद कार को धीरे धीरे चला कार वहाँ से हटा कार दूसरी जगह जहां कुछ चहल पहल थी कार को ले जाना उचित समझा। अब समस्या थी दूसरे पहिये को बदलने की। बगैर एक और पहिये मे हवा भरे दूसरे पहिये को बदल पाना संभव नहीं था। रात के 3 बजे हवा भरने बाले भी उपलब्ध नहीं थे। रात मे शास्त्री चौक, घड़ी चौक, जी॰ई॰ रोड, मेडिकल कॉलेज के आस-पास घोर सन्नाटा पसरा था।   एक पहिये की अदला-बदली मे ही काफी थकान हो गई थी। अपने साथी के स्कूटर पर सवार होकर हम स्टेपनी लिये हुए काफी भटके पर रात मे पंचर बाला कोई नहीं मिला जिससे पहिये मे हवा डलवाई जा सके । फिर किसी ने बताया स्टेशन के पास एक पंचर बाला बैठता हैं जो 24 घंटे पंचर/हवा भरने  का काम करता हैं। हम लोग भागे भागे स्टेशन पहुंचे, सौभाग्य से उसकी दुकान खुली थी तब हमने दूसरे पहिये मे भी हवा भरवा कर टूल्स  की मदद से उस अगले  दूसरे पहिये को भी  बदला। सारी रात से  श्री दास जी के इलाज़ और देहांत के पश्चात उनके शव को लेकर  हम सभी मानसिक रूप से परेशान होकर थक चुके थे इस कार की घटना ने हम लोगो को शारीरिक रूप से भी काफी थका कर परेशानी को और दुगना कर दिया था। मैं हैरान था कि कैसे एक मेडिकल स्टूडेंट  जो कि समाज मे एक अलग आदर सम्मान रखते हैं इतनी नीचता और धूर्तता कर सकता है जिसके कारण हमलोगो को  को इतनी परेशानी का सामना करना पड़ा। हम लोग उस दिन किसी तरह राजिम पहुँच कर श्री दास जी अंतिम यात्रा मे शामिल हुए अंतेयष्ठि पश्चात उनके शोकाकुल परिवार को इस अपूर्णिय क्षति मे धैर्य धारण करने की शक्ति हेतु ईश्वर से प्रार्थना की।
दोपहर बाद जब हम लोग बापस रायपुर पहुंचे तो मुख्य ब्रांच के प्रबन्धक वी॰के॰ शर्मा एवं अन्य स्टाफ से विचार विमर्श कर उस छात्र के विरुद्ध उक्त घटना की मैंने मोदहा पारा, पुलिस स्टेशन रायपुर मे एफ़॰आई॰आर॰ दर्ज कराई। एक शिकायती पत्र मेडिकल कॉलेज के डीन को भी दिया। उक्त शिकायती पत्र पर डीन श्री मुखर्जी ने कार्यवाही करते हुए उस छात्र के कृत की तीव्र निंदा की  और उस छात्र के निलंबन पर अपने स्टाफ के साथ विचार विमर्श किया। मेडिकल कॉलेज के सभी प्रोफेसर एवं स्टाफ इस घटना से एक मत होकर नाराज़ थे।  सभी की राय थी उसका कार्य वास्तव मे निंदनीय है पर निलंबन से उस छात्र का जो कि फ़ाइनल ईयर का छात्र था,  भविष्य बर्वाद हो जायेगा।  इस को द्रष्टिगत रखते हुए उससे अपने अपराध के लिये माफी मांगने को कहा। उस छात्र ने हम सभी से अपने कृत के लिये माफी मांगी। बही दूसरी ओर पुलिस ने भी अपनी जांच शुरू कर दी थी अतः उक्त मेडिकल स्टूडेंट ने व्यक्तिगत तौर मे हमारे कोलेक्ट्रे काउंटर पर आकार पुनः हम से माफी मांगी अतः हमने अपने साथियों से विचार विमर्श कर चेतावनी देते हुए माफ कर अपनी पुलिस शिकायत बापस ले ली।
यध्यपि इस घटना को घटे लाभग 20-22 साल हो गये परन्तू उस मेडिकल डॉक्टर के इतने गैर जिम्मेदारान और उग्र व्यवहार पर हम आज भी चिन्तित है कि क्यों कर उसने हमारे साथ हद दर्जे की नीच और बचकानी हरकत की?  उम्मीद हैं वह आज जहाँ भी हो उक्त व्यवहार को छोड़ कर एक शालीन मेडिकल डॉक्टर के रूप मे प्रैक्टिस कर जनता की सेवा कर रहा होगा।

विजय सहगल                     

रविवार, 18 नवंबर 2018

शांतिकुंज हरिद्वार


शांतिकुंज -हरिद्वार






मुझे शांतिकुंज हरिद्वार मे संजीवनी शिविर मे 9 दिवसीय सत्र मे भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। मै अपनी पत्नी श्रीमती रीता के साथ दिनांक 31 जुलाई 2018 को सत्र मे भाग लेने हेतु हरिद्वार पहुँच गया। शांतिकुंज का वातावरण प्राचीन गुरुकुल या आश्रम की तरह है। दिनचर्या भी अलग हटकर रहती है। इस संजीवनी सत्र मे शामिल होना हमारे लिये एक चैलेंज था क्योंकि जिस दिनचर्या के हम या हम जैसे लोग अभ्यस्त है और जो तथाकथित शिक्षा एवं पद का आवरण हमने ओढा है उसको उतारे विना सत्र मे सफलता संधिग्ध थी? सत्र मे शामिल अभ्यर्थियों से अपेकक्षा रहती है की सत्र के शिविरार्थीयों के लिये  निश्चित भारतीय परिधान मे ही प्रतिदिन के सत्र मे शामिल हों अर्थात पीली धोती कुर्ता एवं मंत्र चादर। यों तो गायत्री परिवार की पत्रिका अखंड ज्योति के माध्यम से हमारे बड़े भाई श्री शरद सहगल  1970-71 से जुड़ें थे। वे अखंड ज्योति  के संपर्क मे कैसे और किसके माध्यम से आये मालूम नहीं पर झाँसी मे मेरे घर पर पत्रिका नियमित समय पर आती थी। पत्रिका यध्यापि मै पूरी तो नहीं पढ़ता था फिर भी प्रथम पृष्ट एवं बॉक्स मे प्रकाशित कई छोटी छोटी कहानियाँ एवं दृष्टांत एवं अंतिम पृष्ठ पर सामाजिक सदसन्देश देती कविता जरूर  एक बार मे ही पढ़ लेता था। पत्रिका का प्रभाव उसमे प्रकाशित लेख एवं विचार तो होते ही थे  जो मुख्य बात उसमे हमने नोट की थी कि पत्रिका की विषय वस्तु, लेख आदि उत्तम होते ही थे किन्तु पत्रिका मे कोई भी विज्ञापन नहीं था, जो आज भी अनवरत रूप से पत्रिका मे नहीं छपता। पत्रिका का प्रकाशन 1926 से परम पूजनीय गुरदेव श्री राम शर्मा आचार्य द्वारा लगातार किया गया। उनके विचारों और लेखों से प्रेरित पत्रिका आज भी नियमित प्रकाशित होकर देश और विदेश मे युगनिर्माण योजना के तहत विचार क्रांति अभियान चला रही है। एक और बात जो इस मिशन से जुड़े लोगो ने उस समय हमे  प्रभावित की बह थी पत्रिका वितरित करने बाले सज्जन से हमारी भेट, जो महीनो नहीं हुई, बो परिजन पत्रिका हमारे घर झाँसी  के दालान मे नियमित छोड़ जाते यहाँ तक कि  वार्षिक शुल्क देय होने के बाबजूद पैसे कई महीने बाद लेने आये तब उनसे भेट हुई मैंने आग्रह पूर्वक उन्हे घर मे आमंत्रित किया और उनका परिचय प्राप्त किया उनका नाम तो नहीं मालूम पर सरनेम श्री विश्वकर्मा लिखा करते थे।  ऐसे सेवा भावी कार्यकर्ता से मुलाक़ात पर मै उनके प्रति काफी आदर और सम्मान का भाव आज भी रखता हूँ।  31 जुलाई को हम दोनों हरिद्वार स्थित शांतिकुंज आश्रम पहुँच गये। संजीवनी सत्र के मुख्य व्यवस्थापक श्री नमो नारायण पांडे जी से संपर्क हुआ उन्होने सत्र मे शामिल होने आये अभ्यर्थियों को कमरे का आवंटन किया। एक कमरे मे छ: लोगो की व्यवस्था की गयी थी। स्त्री एवं पुरुषों के लिये अलग अलग व्यवस्था थी। प्रत्येक   कमरे मे आवशयक सुविधा जैसे पंखे, लाइट, लेट्रिन बाथरूम की व्यवस्था थी, प्रत्येक अभ्यार्थी के लिये पलंग अलग गद्दों सहित था। चूंकि हम सभी शिविरार्थी युग निर्माण योजना सतसंकल्प हेतु आये थे इसलिए हमे कम से कम सुविधाओं मे अपनी दिनचर्या पूर्ण करनी थी जैसा की गुरुदेव का सदवाक्य है कि "सुखी रहने के दो तरीके है-अपनी आवश्यकताओं को कम करें एवं परिस्थितियों से समझौता करे"। वास्तव मे सभी अभ्यार्थी एक व्रहद  लक्ष्य "युग निर्माण मिशन" का ककहरा सीखने आये थे जिसकी पहली सीढ़ी है कि "युग निर्माण कैसे होगा"? "व्यक्ति के निर्माण से"। शिविर मे शामिल अधिकतर परिजनो का आध्यात्मिक विध्या का  ज्ञान हमसे कही बहुत ज्यादा था। वे मंत्र, यज्ञ हवन क्रिया आदि मे  बहुत निपुण थे।   सत्र की शुरुआत 31 को संकल्प सिद्धि के साथ हुई। लगभग 1000-1100 सौ  शिविरार्थी जो देश के अलग अलग प्रांतो से आये हुए थे संकल्प लेने हेतु सभागार मे उपस्थित थे। सभी शामिल परिजनो को दिनचर्या एवं खान पान एवं रहन सहन के नियम श्री नमो नारायण पांडे जी द्वारा बताया गया। दिनचर्या कठिन थी लगा मै शायद उसको पूरा कर भी पाऊँगा या नहीं? दिन की शुरुआत प्रातः 3.30 बजे बिस्तर से उठने से करनी थी तत्पश्चात 30-40 मिनिट मे दैनिक रूटीन, स्नान आदि के बाद तैयार होना था, साथ मे कमरे मे रह रहे अन्य साथियों के लिये भी स्थान छोड़ना था ताकि इन्ही 30-40 मिनिट मे अन्य परिजन भी तैयार हो सके। पहले दिन की शुरुआत थोड़ी कठिन रही किन्तु रूम मे रह रहे सहभागी श्री हरी राम प्रजापति, श्री शिव मोहन यादव एवं श्री रामतीर्थ जो तीनों गाजीपुर से सत्र मे शामिल होने आये थे और जिनकी पृष्ठभूमि ग्रामीण कृषक परिवारों से थी के कारण आसान हो गयी थी। ये परिजन ठीक समय पर अपनी दिनचर्या शुरू कर देते थे और हमारे कमरे मे सबसे पहले तैयार हो जाते थे। चूंकि छ: लोगो को एक ही समय पर तैयार होना होता था अतः नहाने, लैट्रीन, एवं दातौन-मंजन हेतु अलग अलग स्थान/कक्ष बनये गये थे। गर्मी के वावजूद भी हरिद्वार मे सुबह का मौसम ठंडे पानी से नहाना मुझे एक हिम्मत का काम लगा। हमारे कक्ष मे अन्य दो साथियों मे एक श्री लम्बोदर मिश्रा जो बहराइच से थे और 1990 से मिशन के लिये समयदान कर रहे थे एवं अन्य श्री सतीश शर्मा जो गाज़ियाबाद से थे। 4.30 बजे से सत्र का प्रथम चरण गुरुदेव श्री राम शर्मा आचार्य  एवं माताजी श्रीमती भगवती देवी के निर्देशन मे ध्यान योग से होता तत्पश्चात उनके द्वारा किसी विषय पर छोटा सा सम्बोधन होता। एक-दो मिनिट के आराम के बाद 1 घंटे 30 मिनिट के लिये गायत्री मंत्र का जप करना अनिवार्य होता था। गायत्री मंत्र जाप दोपहर एवं शाम को भी 45-45 मिनिट करना होता था।  ये जप साधना समूहिक रूप मे उसी प्रवचन हाल मे करनी होती जहां नित्य के सारे कार्यक्रम होते। एक समाचार कुछ दिन पूर्व हमने पढ़ा था कि चेन्नई के किसी मंदिर मे पहली बार एक हरिजन को मंदिर का पुजारी नियुक्त किया गया। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि गायत्री परिवार मे ऐसे सैकड़ो कार्यकर्ता है जो सामाजिक रूप से कमजोर और पिछड़े वर्ग से आते है और जो पिछले अनेकों वर्षो से  जो विधिपूर्वक पूजा, हवन, संस्कार आदि सम्पन्न कराते है। हमे याद है 1996 मे जब मुझे कलेक्टरेट रायपुर (छत्तीसगढ़) शाखा को नवीन परिसर मे स्थान्तरित करने का मौका मिला तो शाखा का विधिवत हवन पूजन कलेक्टरेट रायपुर स्थित ग्रामीण विकास विभाग मे चतुर्थ श्रेणी मे कार्यरत श्री हीरा लाल प्रजापति एवं श्री कांशी राम कुशवाह से कराया था। वे हवन-पूजन कराने मे पारंगत थे और आध्यात्मिक विषयों मे ज्ञान हमसे कहीं ज्यादा था और जो  बहुत योग्य और हम से आध्यात्मिक विध्या मे आगे थे।  6.30 बजे से सभी शिविरार्थी यज्ञ मे शामिल होते है यज्ञ शांतिकुंज मे रहने बाली बहिनों द्वारा नित्य सम्पन्न कराया जाता है। यज्ञ मे शांतिकुंज मे स्थित कार्यकर्ता एवं आये हुए अन्य इक्छुक अतिथि भी शामिल होने के पात्र होते बशर्ते सभी स्त्री -पुरुष भारतीय परवेश (पुरुष -धोती कुर्ता, स्त्री-साड़ी ) मे हों। यज्ञ का कार्य विधिवत रूप से बनी 3 यज्ञ शालाओं मे स्थापित 27 हवन कुंडो मे सम्पन्न कराया जाता जो पुराने आश्रम व्यवस्था की याद दिलाती थी जो बचपन मे हम रामलीलाओं मे देखते या रामचरित मानस/कल्याण  मे लगी तस्वीरों या पुराने धार्मिक कैलेंडरों मे देखा करते। हमे बताया गया कि यज्ञशालाओं मे मे से एक हवन कुंड मे बहुत प्राचीन अग्नि अखंड रूप से लगातार जलती रहती है जिसे स्वयं गुरुदेव हिमालय मे तप साधना करने के पश्चात साथ मे लाये थे और उस हवन कुंड मे स्थापित किया था। उस हवन कुंड मे अग्नि आज भी लगातार प्रज्वलित रहती है। यज्ञ मे शामिल होने के पश्चात गुरदेव श्री राम शर्मा, आचार्य द्वारा 1926 मे प्रज्वलित अखंड दीपक का दर्शन और गुरदेव की समाधी को प्रणाम करना नित्य का क्रम था।   लगभग 1.30 घंटे का अवकाश हल्का फुल्का चाय नाश्ता आदि करने के लिये मिलता था। दिन के दूसरे सत्र की शुरुआत 8.30 बजे से 10 बजे तक होती जिसमे किसी एक विद्वान द्वारा सामाजिक या धार्मिक रीति रिवाज पर अपने विचार रखे जाते। सभी शिविरार्थीयों से अपेक्षा की जाति की समाज की कुरितययों को दूर करने, जातिविहीन समाज की रचना हेतु और गुरदेव द्वारा लिखित 3200 से भी अधिक लिखित पुस्तकों को विचार क्रांति अभियान के तहत घर घर जाकर प्रचार प्रसार हेतु कार्य करे।  तीसरा सत्र का समय 1.30 से 4.00 बजे तक रहता इसमे भी विचारगोष्टी या प्रवचन के पूर्व 10-15 मिनिट की संगीतमय भजन प्रस्तुति  के साथ होती जो सामाजिक समरसता और सामाजिक बुराई के उन्मूलन का संदेश देते। चौथा सत्र शाम के छ: बजे नाद योग से शुरू होता था जिसमे 15 मिनिट सुमधुर बासुरी और तबले की युगल संगीत मय प्रस्तुति होती ऐसा प्रतीत होता जैसे कि सूर्य अस्त हो रहा है, गोधूलि बेला मे सभी पशु पक्षी अपने घोंषलो मे बापस हो रहे है। किसान अपने हल बैलों के साथ गले मे बंधे घुंघरुओं कि मधुर ध्वनि करते हुए  अपने घरों को बापस आरहे हों और गायों के झुंड कोलाहल करते हुए  शाम को दिन भर के  भ्रमण पश्चात अपने अपने स्थान पर बापस आ रहे हों। इस सत्र मे भी संगीत मय प्रस्तुति के बाद सामाजिक विषयों पर प्रवचन होता और रात्री 8.00 बजे पूरे दिन के कार्यक्रम की समाप्ति होती। भोजन के पश्चात 9.30 बजे सभी अपने कमरे मे विस्तर पर सोने के लिये पहुँच जाते ताकि अगले दिन प्रातः 3.30 बजे से पुनः तैयार हो सके। इस  दिनचर्या का कार्यक्रम पूरे 9 दिन इसी तरह चला। 9 दिन के शिविर मे एक दिन कुछ समय शांतिकुंज एवं देवसांस्कृति विश्व विध्यालय के प्रमुख डा. श्री प्रणव पाण्ड्या एवं दीदी श्रीमती शैलवाला से भी मिलने का कार्यक्रम शिवरार्थिओ से कराया गया।   पूरे नौ दिन के प्रवास मे स्व-परीक्षण कर मै कह नहीं सकता कि मै कहाँ तक सफल रहा? पर मै एक दावा तो कर सकता हूँ कि सत्र के भौतिक अनुशासन का हमने सत -प्रतिशत पालन किया, शिक्षा और पद के छद्म आवरण को एक हद तक उतारने मे सफल रहा। आते वक्त हम एक दूसरे परिजनो से  अपरचित थे पर जाते वक्त हमारे काफी परिजन  आपस मे परचित हो गये जो देश के विभिन्न शहरों से आये थे। श्री अनिरुद्ध मिश्रा जी (अहमदाबाद) , श्री अर्जुन व्यास (मुंबई), श्री सोनी जी (हिमाचल),  श्री सुरेन्द्र गुप्ता (लखीमपुर खीरी), श्री प्रेम नारायण पटेल (सागर), उनमे से कुछ है। मै अपने आपको शिविर मे शामिल हुए परिजनो मे इसलिये हीन समझता रहा क्योंकि मैंने अपने, अपने परिवार के निर्माण के अलावा कोई भी ऐसा कार्य नहीं किया जो समाज या युग निर्माण के निमित्त हो? 
अब मै पूरे शांतिकुंज की दिनचर्या पर भी प्रकाश डालना चाहूँगा। शांतिकुंज आने वाले प्रत्येक परिजन को संस्कार और यज्ञ आदि मे शामिल होने के लिये यथा संभव रहने के लिये स्थान उपलब्ध कराया जाता है। स्थान या कमरों मे रुकने बाले आगंतुकों से अपेक्षा कि जाती है कि कमरे बाथरूम आदि की स्वच्छता वे अपने घर की तरह करे।   पूरा शांतिकुंज इतना साफ सुथरा रहता है की देखते ही बनता है आपको आश्चर्य होगा कि पूरे आश्रम की साफ सफाई गायत्री परिवार के ही परिजन स्वयं करते है । भोजन बनाने के लिये आये हुये या रह रहे परिजन ही चावल, दाल, सब्जी आदि की सफाई, इनका बनाना-पकाना, रोटी वेलना सेकना आदि कार्य खुद ही करते है। भोजन ग्रहण करने के लिये थाली और गिलास लेकर प्रत्येक व्यक्ति पंक्तिवध्द  होकर लाइन मे वैठता है भोजन परोसने की ज़िम्मेदारी भी भोजन कर रहे या भोजन ग्रहण कर चुके परिजन सम्हाल्ते है। भोजन करने के बाद थाली और गिलास स्वयं ही साफ कर सभी परिजन उसे निश्चित स्थान पर रखते है। सफाई की व्यवस्था भी कुछ परिजन सम्हाल्ते है। पूरे शांतिकुंज मे साहित्य विक्रय केंद्र, कार्यालय की देखभाल के लिये देश के कोने-कोने से आये समयदानी परिजन अपनी निशुल्क सेवायें देते है। सारे संस्कार जैसे-जन्मदिन, उपनयन, जनेऊ, विवाह, तर्पण, गर्भजन्मोत्सव  आदि कार्यक्रम भी गरीब-अमीर के भेदभाव के बिना सम्मान सहित सम्पन्न कराये जाते है। नित्य पूरे आश्रम मे आये हजारों परिजनो के बीच चाहे यज्ञ के समय या भोजन बनाने, ग्रहण करने या परोसने या संस्कार कराते समय ये पहचान पाना असंभव जी हाँ असंभव है कि कौन किस जाति, गोत्र, वर्ण या प्रांत का है। सभी परिजन एक साथ सभी कार्य साथ साथ करते है। 11 अगस्त को जबकि पूरा हरिद्वार मे कावड़ मेले मे आये लाखों लोगो द्वारा कचरे के पहाड़ जगह जगह छोड़ दिये गये हों किन्तु  उसकी सफाई हेतु सैकड़ो गायत्री परिवार के परिजनो ने लगभग दो कि. मी. लंबाई मे हरिद्वार स्थित घाटो मे श्रमदान कर सफाई  की और शासन का सहयोग किया।  और अंत मे एक मुख्य बात  जिसको जानने की जिज्ञासा आपको भी होगी कि नौ दिन, एक माह, तीन माह या अन्य छोटे सत्रों मे आये परिजन या ऐसे व्यक्ति या परिवार जो गायत्री परिवार से नहीं भी जुड़े है संस्कार आदि कराने शांतिकुंज आते है उन से क्या शुल्क लिया जाता है!! आपको जानकर हैरानी होगी कि ठहरने, बिजली, पानी, भोजन, संस्कार आदि कराने का कोई भी  शुल्क/दक्षिणा आदि किसी भी परिजन से नहीं लिया जाता है और न ही उसके लिये किसी को बाध्य किया जाता है। जो परिजन यदि कोई दान देना चाहे तो उस दान की वाकायदा रसीद जारी की जाति है।  मेरा आग्रह है आप जब भी कभी हरिद्वार जायें तो एक बार अवश्य कुछ समय के लिये शांतिकुंज मे अवश्य जायें और हो सके तो व्यक्ति, परिवार, ग्राम, जिला, प्रदेश, देश ही नहीं  युग निर्माण सतसंकल्प हेतु यज्ञ मे शामिल हों।

विजय सहगल

मित्र अनिल समधिया


"अनिल समाधिया होने का अर्थ" 

वैसे तो हमारे मित्र अनेक है परन्तू अनिल जैसे मित्र की बात कुछ और है। अनिल तुम्हें शायद याद होगा हमारी मित्रता की शुरुआत 1973-74 मे हुई थी जब हम लोग 8वी पास कर सरस्वती पाठशाला इंटर कॉलेज मे दाखिल हुए थे। हम लोगो का घर भी नज़दीक था। हमारे माता-पिता एक दूसरे से परिचित तो थे किन्तू पारवारिक प्रगाढ़ता हम लोगो की मित्रता के बाद ही हुई। परन्तू मित्रता की नीव एक अजीव किस्से से हुई इसे हम दोनों के अलावा हमारे बड़े भाई साहब श्री शरद सहगल के अलावा शायद कोई नहीं जनता। उन दिनो झाँसी मे एक सर्कस लगा हुआ था। अनिल के पिताजी नगर पालिका मे हुआ करते थे। तुमने हमे उस सर्कस का एक पास दिया था जो दो लोगो के लिये था। हमारी ईक्षा सर्कस देखने की थी हमने भाई साहब से जिद कर साथ चलने के लिये मनाया। अनिल की राइटिंग का कोई जबाब नहीं था उससे अच्छी राइटिंग हमने अपने जानने बालो मे आजतक नहीं देखी। हुआ यू था तुमने एक सफ़ेद कार्ड पर हू-व-हू पास की नकल कर अपने हाथ से लिख कर हमे दी थी। ये स्पष्ट था कि वह छपा हुआ पास नहीं था वह हाथ से लिखी हुई पास कि नकल थी। परन्तू हमे न जाने क्यों दूर दूर तक उसके बारे मे कोई शंका नहीं थी। जब हमने वो पास सर्कस के मैनेजर को दिया तो वह दक्षिण भारतीय शक्स तो गुस्से से लाल पीला होने लगा और धमकी देने लगा की ये फर्जी पास है। जब भाई साहब ने देखा तो सारा माजरा समझते देर नहीं लगी। वह प्रथम द्रष्ट्या पास की हाथ से लिखी नकल थी। ख़ैर उन्होने स्थिति को सम्हाला एवं टिकिट खरीद कर सर्कस को देखा। अगले दिन हमने अनिल को उस घटना के बारे मे शिकायत की तो तुमने आश्चर्य मिश्रित भावनाओ से बताया की अरे तुम उस पास को सचमुच असली समझे थे वह तो हमने यू ही मज़ाक मे तुम्हें लिख कर दे दिया था वो तो देखने मे ही अलग दिख रहा था तुम उस पास को ले कर सर्कस भी चले गये? मैंने जब कहा "हाँ हमे भी वह मज़ाक लगा था पर वो पास तुम्हने हमे दिया था हमे उस पास पर नहीं तुम पर विश्वास था"। हम तो उस विश्वाश को लेकर सर्कस मे गए थे । तमाम अफसोस के पश्चात उस घटना के वाद हम दोनों की मित्रता की एक नई शुरूआत हुई। तुम्ह्ने उस घटना के बाद हमारी मित्रता मे ताउम्र अब तक विश्वास मे रत्ती भर कमी नहीं आने दी। दिन व दिन एक दूसरे के परिवारों मे हम दोनो एक परिवार के सदस्य के रूप जाने जाने लगे। धीरे धीरे हम लोग विध्यालय से महाविध्यलय पहुंचे हमरी मित्रता भी समय की गति के साथ आगे बढ़ती रही। एक विशेष बात जो हम दोनों के बीच रही की दोनों परिवार की जो सवसे नजदीकी रिश्ते थे जैसे -मामा, बुआ, बहिन-बहिनोई, भतीजे-भतीजी, भांजे-भांजी, भाई, मौसी एक दूसरे के इन नजदीकी रिशतेदारों को जानते ही नहीं थे बल्कि उन सभी के यहाँ हम लोगो का आना जाना आज भी वादस्तूर जारी है। हमे अब भी याद है प्रदीप भाईसहब ने हमे ओरग्निक कैमिस्ट्रि की Tution दी थी और तबके बाद से हम लोगो का लगभग प्रायः एक दूसरे के घर आना जारी रहा, घर मे अम्मा पिताजी से हमे पुत्रवत स्नेह हमेशा मिला।। चान्स की बात थी की हम दोनों की सर्विस भी लखनऊ मे पोस्टिंग के साथ हुई। लखनऊ मे ही स्व. राजेन्द्र अग्निहोत्री परिवार से मुलाक़ात हुई एक और परिवार हमारे परिवार मे घर के सदस्यों की तरह शामिल हो गया । यहाँ तक की हम लोग एक दूसरे के ससुराल के सदस्यों से गहरे से जुड़े रहे। अनिल तुम्ह्ने हमेशा एक सच्चे दोस्त की तरह हमारा हर मुश्किल की घड़ी मे साथ दिया और संकट के समय समाधान होने तक साथ खड़े रहे। तुम्हें याद है लखनऊ मे जब एक बार खाने मे कुछ रोटियाँ कम पड़ी थी, पटैरिया जी दस तंदूरी रोटी लाने होटल गये थे और उसने दस तंदूरी मुर्गे पैक कर दिये थे जब उसे 450/- रुपये मांगे तब कही बताया की रोटियाँ चाहिए। इस तरह की अनेक घटनाए हमारे जेहन मे आज भी ताजा है। श्रीमद भगवत गीता मे मित्र की मध्यस्थ शब्द के रूप मे बहुत सुंदर व्यख्या की है "दोनों पक्षों का हित चाहने वाला" उक्त शब्द को तुमने बहिन नीलम के रिश्ता कराते समय चिरथार्थ किया। हम जब भी तुम्हारे घर जाते और घर पर उस समय कोई रिश्तेदार या मित्र होता तो पिताजी हमारा परिचय अपने उन रिशतेदारों या परिवार मित्रों के समक्ष अनिल के क्लोज़ मित्र के रूप मे कराते तो हमे फ़क्र का एहसास होता। रायपुर से जगन्नाथ पुरी तक की शानदार, यादगार यात्रा मारुति 800 से करने का व्रतांत सिद्धार्थ, साक्षी, सौम्या और जया को आज भी याद होगा। अक्सर हम उस यात्रा को याद कर लेते है। हम सभी तुम्हारे शीघ्रा स्वस्थ होने की कामना करते है ताकि हम लोगो ने जो वादा सेवानिव्रती के पश्चात वद्रीनाथ, केदारनाथ यात्रा के लिये किया था उसे पूरा कर सके।
अनिलतुम्हारे  जन्मदिन पर तुम्हे बहुत बहुत शुभकामनाये।
तुम्हारा मित्र।

विजय सहगल

आपातकाल के 43 बर्ष


आपातकाल के 43 बर्ष

आज से 43 बर्ष पूर्व इस देश मे तब की काँग्रेस सरकार द्वारा देश पर आपात काल थोपा गया था । बहुत ही बुरा बक्त था। अतिक्रमण के नाम पर हमारे घर के सामने नाली के ऊपर के चबूतरे आस पड़ोस के मकान सहित तोड़े गये थे । तब की PAC/POLICE द्वारा हमारे पिता सहित पड़ोस के काफी लोगो को अपमानित किया गया था। अखबारो पर सेन्सर शिप लागू थी। एक घटना का उल्लेख मै करना चाहूँगा। दिन/माह साल तो याद नहीं है मैंने एक लेख झाँसी के समाचार पत्र दैनिक जागरण मे डाइलिसिस पर लिख कर भेजा था। क्योकि उस समय श्री जय प्रकाश नारायण को डायलिसीस दिया जाता था। उस पृक्रया के बाद हमने लिखा था कि लोकनायक श्री जय प्रकाश नारायण को कितना कष्ट एवं तकलीफ रहती होगी। मुझे अछी तरह याद है रविवार बाले दिन सप्ताहिक पृष्ठ पर लेख तो छापा गया परंतु आखीर की लाइंस जिसमे जय प्रकाश नारायण का उल्लेख था नहीं छपी गई।


विजय सहगल 

हमारी अमरनाथ यात्रा 2018


"हमारी अमरनाथ यात्रा -2018"














श्री अमरनाथ यात्रा का विचार अप्रैल 2018 मे सेवानिव्रति पश्चात हमने  हमारे मित्र श्री यशवीर सिंह के साथ सांझा किया, जिसे उन्होने सहर्ष स्वीकार करने पर हमलोगो ने अमरनाथ यात्रा की तैयारी मई मे ही शुरू कर दी। मेडिकल सर्टिफिकेट पर्मिट, टिकिट, होटल आदि की बूकिंग के साथ 29 जून को नई दिल्ली से श्रीनगर की यात्रा शुरू हुई। दोनों परिवारों के मन मे एक उत्साह व उमंग था। ग्वालियर  की तेज गर्मी से छुटकारा मिला और श्रीनगर मे वर्षात की ठंडी फुहारो के साथ  एक सुखद शुरुआत हुई। ऐसा मानना है की अमरनाथ यात्रा के पूर्व  श्रीनगर मे शंकराचार्य मंदिर के दर्शन आवश्यक है, हम लोगो ने वर्षात मे मंदिर की  कठिन सीढ़ियों चढ़ते हुए मंदिर मे दर्शन किए। डलझील, चश्मे शाही और परीमहल देखने के पश्चात 30 जून को हमलोगे ने  श्रीनगर से लगभग 
90 किलोमीटर दूर पहलगाम की ओर प्रस्थान किया । प्रात: 6 बजे 20-25 किमी. चलने के बाद भी  रास्ते  मे जब एक भी सुरक्षा बल का जवान नहीं मिला तो मन मे कुछ अनिष्ट की आशंका हुई और हमने ड्राईवर से कहा की टीवी समाचरों मे तो हर कदम पर कहा जा रहा था की सुरक्षा के कड़े इंतजाम है पर यहाँ तो एक भी सुरक्षा बल का जवान या अन्य वाहन आदि आते या जाते नहीं दिख रहे है
? शायद आप गलत रास्ते पर है? उसका मोबाइल पर जो गूगल मेप सेट था उसको लगभग मैंने ले कर देखा तो बह सोनमर्ग पर सेट था। तब गुस्सा आना लाज़मी था । ड्राईवर ने बताया कि टूर ऑपरेटर ने आपलोगो को सोनमार्ग के रास्ते अमरनाथ जाने के लिया बताया। पुनः पहलगाम के लिये रास्ते  पूंछते हुए हम लोग बापस श्रीनगर होते हुए पहलगाम के रास्ते पर आये। एकवारगी हमे पिछले साल गुजरात की बस पर हुए आतंकवादी हमले की याद कर सिहर गए जो रास्ते भटकने की बजह से हमले का शिकार हुई थी। भगवान शिव की कृपा थी की हम लोग सही रास्ते पर आ गये। श्रीनगर से पहलगाम के रास्ते मे सुरक्षा के प्रबंध बहुत ही कड़े थे। हाइवे पर हर 40-50 मीटर पर CRPF केई जवान राइफल्स से सुसज्जित थे। तेज वर्षात मे भी अपनी ड्यूटि मे मुस्तैद हर यात्री को सुरक्षा का अहसास दिला रहे थे। लगभग 40 किमी.  के बाद हमे मेन हाइवे छोड़ अनंतनाग की ओर बढ़ना था जो कि आतंकबाद प्रभावित जिला है।  उस रास्ते मे भी CRPF के जवान हर 20-30 मीटर की दूरी पर पहरा दे रहे थे। हमे वास्तव मे लगा की हम श्रीअमरनाथ जी की तीर्थयात्रा तो कर ही रहे थे पर  ये यात्रा फौज के जवानों की कर्मठता, उनकी बहदुरी और उनके त्याग की कहानी वयां कर रही थी। जवानो के प्रति सम्मान से हमारा सर नतमस्तक था। एक ओर जहाँ सेना और CRPF के जवानों की  सुरक्षा के बिना यात्रा वर्तमान मे संभव नहीं हो सकती थी वही दूसरी ओर हमे जवानों के साथ अपने आप पर भी फ़क्र था की हम उस अहसास को भी मजबूत कर रहे थे कि  कन्याकुमारी से कश्मीर हमारा है। अमरनाथ यात्रा वास्तव मे तीर्थयात्रा के साथ देशयात्रा है जो ये अहसास कराती है की कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है । हम लोग 30 जून 2018 को प्रत: 10 बजे पहलगाम पहुंचे। मौसम की ख़राबी एवं हिमालयन हेलीकाप्टर सर्विस की कुव्यवस्था की बजह से हम 3 जुलाई 2018 को प्रत: 9 बजे  पहलगाम से पंजतरणी पहुंचे। यहाँ भी भरी बारिश के बीच लगभग 5-6 किमी. की यात्रा घोड़े से शुरू की। यात्रा मार्ग ऊबड़ खाबड़ पत्थरों और कीचड़ से भरा हुआ था। यहाँ एक बार फिर यात्रा के रास्ते पर पहाड़ों के ऊपर फौज और सीआरपीएफ़ के जवानों की कड़ी निगरानी देखते ही बनती थी। ग्लेशियरो को पार करते हुए हम यात्रा मार्ग पर बढ़ रहे थे। यहाँ यात्रा मार्ग काफी शकरा है। घोड़ों, पालकी बालों की बजह से पैदल यात्रियों को इस मौसम मे काफी कठनाई है। प्रशासन को पैदल यात्रियों की सुविधाओं का विशेष ख्याल रखना चाहिए। लगभग 2 घंटे की घोड़ा यात्रा के पश्चात हम लोग सारी कठिनाइयो को पार करते हुए अमरनाथ पहुंचे। बर्फानी बाबा अभी भी हम से 1 किमी. दूर थे। इन हालातो मे हमलोगो ने पालकी की सेवाए ली और अमरनाथ जी की गुफा की तरफ प्रस्थान किया। जांच आदि के बाद अब हम उस मुकाम से चंद क़दमो की दूरी पर थे जिसका हमे दो माह से इंतजार था। लंबी लाइन मे हम भोले नाथ जी के दर्शन हेतु लग गये।  आखिर बो पल आ गया जब हम बर्फानी बाबा के सामने थे। अदभुद दृश्य था लगभग 12-13 फुट ऊंचा प्रकृतिक विशाल हिम शिव लिंग बहुत बड़ी गुफा मे विध्यमान था । पास मे ही अन्य शिव परिवार साक्षात गुफा मे विराजमान था। हर हर भोले के जयकारों के बीच हमे आगे बढ़ना था ताकि अन्य श्रद्धालूँ दर्शन के लिये आ सके। दर्शन के पश्चात जब श्रीमती जी ने पूंछा की आपने भोले नाथ से क्या मांगा? तब हमे याद आया की हम तो कुछ भी मांगने से चूक गये!! हम तो उस द्र्श्य को देखने मे ही लीन रहे!!!!  शायद बाबा भोले नाथ हमे कुछ मांगने के लिये दुवारा बुलाना चाह रहे हो।

      बाबाबर्फानी के दर्शन के बाद हम लोग गुफा के नीचे आ गए। नीचे जगह जगह देश के दूर दराज से आये भंडारो मे से एक मे हमने प्रसाद ग्रहण किया । हमारी इक्छा थी की एक रात अमरनाथ मे रुकूँ पर लोगो ने सलाह दी की ऑक्सिजन  की कमी एवं मौसम की खराबी की बजह से रुकना उचित नहीं होगा। शायद ठीक ही सलाह थी जैसे ही हम लोग घोड़े से आगे बड़े बरसात शुरू हो गई थी। जैसे जैसे हम आगे बढ़ते गये मौसम ख़राब होता गया, वारिस  तेज होती गई, तापमान अचानक काफी नीचे आ गया। लगातार भीगते हुए हम लोग 6  बजे लगभग  बापस पंजतरणी पहुंचे। यशवीर जी की पत्नी सर्दी से बेहाल थी। NDRF के लोगो ने तुरंत कंबल से उनको ढका एवं गरम पानी एवं चाय दी लगभग आधा घंटे अपने टेंट मे बैठा के रखा। मेडिकल कैंप मे डॉक्टर को दिखाया सबकुछ समान्य था जानकार हम चिन्तामुक्त हुए। रात मे पंचतरणी बेस कैंप मे टेंट लिया चार  कंबल एवं एक रज़ाई ओड़ने  के बबजूद हम सर्दी की बजह से एक मिनिट सो नहीं सके। बेस कैंप मे रात मे सूचना प्रसारित की जा रही थी की यात्रा के मार्ग मे भूस्खलन की बजह से रास्ता  बंद कर दिया गया है, ज्ञात हुआ की बाल्टाल मे हुई इस घटना मे 4-5 लोग हताहत हो गये। यात्रा 4-5 जुलाई 2018 को पंजतरणी के आगे अमरनाथ जी के लिया बंद करदी गई। हम लोग 4 जुलाई को पंजतरणी से पहलगाम होते हुए जम्मू के लिये प्रस्थान किया। रास्ते मे चेनानी - नाशरी सुरंग  जो लगभग  9 किमी. लंबी है हिंदुस्तान के विकास की एक मील का पत्थर है। 10 घंटे की जम्मू यात्रा मे पूरे मार्ग मे विभिन्न संस्थाओं द्वारा भंडारो के माध्यम से यात्रियों को तरह तरह के व्यंजन वितरित किए जा रहे थे, उनका सेवा भाव और प्रेम देखते ही बनता था। अंत मे ये उल्लेख करना आवश्यक है कि अमरनाथ यात्रा आपकी द्रढ़निश्चय एवं उच्च ईक्षाशक्ति से ही पूरी हो सकती है परंतु सेना/सीआरपीएफ़ के जवानों  की बहादुरी उनकी देश के प्रति सच्ची सेवा, लगन  एवं पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, लखनऊ, बदायूं और देश के अन्य सैकड़ो धार्मिक भंडारो की सेवा भावनाओ के विना संभव नहीं हो सकती।
विजय सहगल,  

गुरुवार, 15 नवंबर 2018

"हीराकुंड एक्सप्रेस"


हीराकुंड एक्सप्रेस



कोई  भी संस्थान बुरा नहीं होता अपितु उस मे कार्यरत कर्मचारियों की  संस्थान के प्रति निष्ठा और कार्य के प्रति उनके समर्पण ही  उस संस्थान को बुरा या अच्छा बनाते हैं फिर वो संस्थान रेल्वे हो, बैंक या कोई अन्य सरकारी, अर्ध  सरकारी या गैर सरकारी संस्थान हो। स्थानीय निकाय, राज्य सरकारों के कार्यालय, रेल एवं अन्य ऐसे कार्यालय जिनका वास्ता आम आदमी से पड़ता है,  कुछ लोगो की कार्य प्रणाली के कारण ही जनता की निगाहों मे नेक नियत से नही देखे जाते। ऐसा नही है कि इन संस्थानो मे या अन्य दीगर संस्थानो मे अच्छे लोग नहीं होते अधिकतर संख्या  मे अच्छे लोगो की बदौलत ही देश के सभी संस्थान या विभाग सही तरीके से कार्य कर रहे  है। ट्रेन मे आरक्षण, नगर पालिका मे टैक्स जमा, विजली विभाग मे बिल जमा, कानून व्यवस्था के समय पुलिस विभाग या अस्पताल मे नर्स और डॉक्टर की भूमिका के कारण ये विभाग अच्छे या बुरे कहे जाते हैं।  मैं पिछले लगभग आठ सालों से विभिन्न प्रादेशिक निरीक्षालयों मे कार्यरत रहा। इस विभाग मे कार्यरत विभाग प्रमुखों श्री चरंजीव  चावला जी, श्री आर॰ बी॰ जैन, श्री गुगलानी, श्री आर्या जी जैसे सकारात्मक सोच वाले अधिकारियों की कार्य प्रणाली को मैंने नजदीक से देखा हैं। उनकी सकारात्मक सोच ने  विभाग और बैंक की प्रतिष्ठा को ऊँचा उठाया है। निश्चित ही इन जैसे अच्छे एवं व्रहद सोच बाले बहुत से अधिकारी-कर्मचारी बैंक मे अन्य जगहों मे पदस्थापित होंगे जिनके कारण संस्थान नई ऊचाइयों को छू कर तरक्की की राह पर अग्रसर हैं, किन्तु मैं शायद उन्हे नही जानता या  उनके साथ मैंने कार्य नही किया।  बहीं दूसरी ओर मैंने देखा है कि इस विभाग के हमारे कुछ साथियों ने  अपने निजी महत्वाकांक्षा या झूठी मान प्रतिष्ठा के कारण अपनी विभिन्न रिपोर्ट के माध्यम से  अपने ही  साथियों के कैरियर को दांव पर लगा दिया। ऐसे करने बाले लोग योग्य तो थे पर नकारात्मक सोच के कारण उन्होने न केवल कार्यरत अधिकारियों के लिये परेशानी उत्पन्न की बल्कि संस्थान का भी अहित किया।
रेल विभाग की ऐसी ही एक घटना मुझे याद है जब मैं रायपुर कलेक्टरेट  शाखा मे जॉइनिंग के बाद पहली बार अपने घर झाँसी जा रहा था। शायद जुलाई-अगस्त 1996 की घटना हैं। मेरा रिज़र्वेशन हीराकुंड एक्सप्रेस से "चापा" स्टेशन से था। गाड़ी लगभग 2 घंटे की देरी से चापा पहुँची। ए॰सी॰ कोच अंदर से जुड़ा न होने के कारण मैं उस डिब्बे मे नहीं पहुँच सका। अगला स्टेशन बिलासपुर था जहाँ ट्रेन लगभग 40 मिनिट रुकती है। जब मैं बिलासपुर मे अपने उस कोच मे पहुँचा और टिकिट चैकर के माध्यम से अपनी सीट को ख़ोजा तो टिकिट चैकर ने बताया की आपका रिज़र्वेशन चापा स्टेशन पर न आने के कारण निरस्त कर दिया गया हैं। मैं भौचक्का  होकर टिकिट चैकर के चेहरे को देखने लगा!! टिकिट चैकर ने अपने निजी स्वार्थ के कारण मेरे कन्फ़र्म टिकिट को निरस्त करने मे अति तत्परता दिखाई। अपने आपको संयत कर मैंने नम्रता पूर्वक टिकिट चैकर से निवेदन किया कि ऐसा कैसे कर सकते है आप?, मेरा कन्फ़र्म रिज़र्वेशन है लगभग 800 कि॰ मी॰ की दूरी तय कर कैसे मैं 13-14 घंटे यात्रा पूरी करूंगा? परन्तू उस निर्दयी टिकिट चैकर ने कहा आप चापा स्टेशन पर नही आये इसलिये आपका टिकिट कैन्सल कर दिया गया हैं। मैंने पूरी विनम्रता के साथ जब कहा कि चापा स्टेशन पर गाड़ी मात्र 2-3 मिनिट ही रुकी थी डिब्बे की सही लोकेशन भी प्रदर्शित नही की गयी, ए॰सी॰ का डिब्बा पीछे लगा होने के कारण अंदर से कनैक्ट भी नही था हम चाह कर भी डिब्बे मे नही पहुँच सकते थे? बैसे भी अगले 1-2 स्टोपेच तक तो नियमानुसार आपको इंतजार करना चाहिये और अगले स्टोपेच बिलासपुर मे मैं आ ही गया हूँ।  परन्तू उक्त "जिम्मेदार"!! टिकिट चैकर ने कहा ऐसा कोई नियम नहीं हैं आपके चापा पर न आने के कारण टिकिट निरस्त किया गया हैं।
मैंने पुनः अपने आपको नियंत्रित करते हुए इतना अवश्य कहा महोदय मैं आपकी शिकायत गार्ड से करने जा रहा हूँ। उसने बड़ी सहजता से कहा आपको जो करना हो कर लो।  मैं परेशान होकर आख़री डिब्बे मे स्थित  गार्ड के डिब्बे की ओर पहुँचा और  मैंने अपने आपको असहाय महशूस करते हुए गार्ड साहब से अपनी व्यथा सुनाकर शिकायत लिखने हेतु "शिकायत पुस्तिका" की मांग की? गार्ड साहब ने कहा शिकायत की किताब स्टेशन मास्टर के पास हैं वहाँ जाकर आप शिकायत करे। उनका जबाब सुनकर ऐसा लगा पूरा बिलासपुर रेल मण्डल नकारा और अपनी ड्यूटि के प्रति घोर लापरवाह और यात्रीयों के प्रति निष्ठुर, अदयालू है। इस दौड़ भाग मे हमारी सांस फूल गई मैंने कहा गार्ड साहब क्यों मज़ाक कर रहे हैं, अब यदि मैं स्टेशन मास्टर के पास शिकायत करने दूसरे प्लेटफॉर्म पर जाऊंगा तब तक ट्रेन छूट जायेगी और मैं यहीं बिलासपुर मे रह जाऊंगा, मैं आया तो था टिकिट चैकर की शिकायत करने पर अब टिकिट चैकर के साथ मुझे आपकी भी शिकायत करनी पड़ेगी। क्रोधित होते हुए बड़ी उपेक्षा से गार्ड ने  कहा जरूर कर दीजये। अब मेरी हताशा, निराशा, और क्रोध चरम पर था। पुनः भाग कर मैं अपने कोच पर बापस आया और टिकिट चैकर से कहा " टिकिट चैकर महोदय ये ट्रेन 2 घंटे देरी से हैं इसको मैं चैन खींच कर और 2 घंटे यही रोकूँगा, जिसकी ज़िम्मेदारी आपकी होगी। उसने इस चेतावनी को नजरंदाज़ किया। इतना कह कर मैं कोच के अंदर पहुँचा और कैबिन मे स्थित चैन के लाल हैंडल को खींचा, पीछे पीछे आ रहे उस टिकिट चैकर ने हमारे आक्रोश को भाँपते हुए कुछ बचाव की मुद्रा मे आते हुए कहा मैंने आपकी सीट निरस्त नहीं की  मेरी ड्यूटि तो बिलासपुर से है आपकी सीट तो पिछले टिकिट चैकर ने कैन्सल की है जो यहाँ तक ट्रेन ले कर आया। मैंने क्रोधित होकर कहा गाड़ी यही खड़ी रहेगी, आज तेरी नौकरी जायेगी या पिछले टिकिट चैकर की जो तेरा ही भाई बंधु है, भलाई इसी मे हैं कि तू मुझे बर्थ दे, बर्ना या तो तू मरेगा या तेरा टिकिट चैकर साथी। उसको मेरा "तू" "तेरी" शब्द शायद बुरे लगे थे। बह बोला आप बात किस लहजे मे बात कर रहे है? मैंने भी उसी लय मे कहा "एक मालिक जैसे अपने नौकर से बोलता है"।   मैं यात्री के रूप मे मालिक हूँ तू सेवक के रूप मे मेरा नौकर है, जब मैं नम्रता से बात कर रहा था तो तेरे समझ मे नही आया अब बोलने का लहजा तुम्हें खराब लग रहा है। अब बह पूरी तरह अपनी बचाव की मुद्रा मे था। उसने कहा लेकिन थोड़ा नम्रता पूर्वक तो बोल सकते है।  मैंने कहा  इंग्लिश मे तुम्हें पब्लिक सरवेंट कहे तो कुछ नहीं पर हिन्दी मे नौकर कहा तो बुरा लगता है?  दुर्भाग्य से चैन का लाल हैंडल टूट कर मेरे हाथ मे आ गया। अतः मैं दूसरे कैबिन मे "चैन पुल" करने बढ़ा तो टिकिट चैकर ने कहा मैं कोशिश करता हूँ आपको सीट देने की। मैंने चलते चलते कहा कोशिश नहीं मुझे सीट नंबर बता नहीं तो मैं पुनः चैन पुल करता हूँ। अब टिकिट चैकर महोदय समर्पण की मुद्रा मे आ चुके थे उन्होने कहा आप 41 नंबर बर्थ ले लीजये। मैंने कहा हाँ अब मुझे  अच्छा लगा, जब  तक आपको मैंने नम्रता पूर्वक कहा आपको समझ ही नही आया?? मैंने अपनी सीट पर अपना सामान जमाया और  दौड़-भाग, लगातार वहसा-वहसी  से मैं काफी थक गया था रात भी बहुत हो गई थी इसलिये मैं शीघ्र ही नींद के आगोश मे सो गया। सुबह कब हो गयी पता ही नही चला। पिछले किसी स्टेशन पर टिकिट चैकर ड्यूटि समाप्त कर ट्रेन से उतर चुके थे। सागर के आसपास जब मैं सोकर उठा तो हमारे सामने बाली सीट पर जो सज्जन बैठे थे उन्होने बताया कि बिलासपुर मे रात मे उस टिकिट चैकर ने हमे दो सीट देने का वादा किया था किन्तु आपकी बातचीत और कहा-सुनी के कारण उस टिकिट चैकर ने मुझ से कहा कि  अब आपको एक ही  बर्थ दे पायेंगे, क्योंकि एक बर्थ मुझे देनी पड़ेगी। इस तरह इस संघर्ष यात्रा कि समाप्ती झाँसी पहुँचने पर हुई।
मेरा मानना हैं यध्यपि परिस्थितियाँ काफी बदली हैं फिर भी  एक आम आदमी को सुखी, कानून सम्मत जीवन जीने के लिये हिंदुस्तान मे व्यवस्था से आज भी काफी संघर्ष करना पड़ता हैं आपका कानून  सम्मत अधिकार होते हुए भी व्यवस्था चलाने बाले तथाकथित "सरवेंट" कैसे आपके कानूनी अधिकार का अपहरण कर व्यवस्था को अंगूठा दिखा कर अपनी ताकत का अहसास कराते हैं। लेकिन इस जीवन रूपी संघर्ष यात्रा मे आवश्यक नही कि आप हर बार चैन के "लाल हैंडल" को खींच कर इन "संगठित गुंडों" को परास्त कर  अपना सफर पूरा कर सकें??

विजय सहगल