सोमवार, 31 दिसंबर 2018

मेघदूतम पार्क, नोएडा



मेघदूतम पार्क, नोएडा

मेरे घर के पास एक बहुत ही सुंदर पार्क है मेघदूतम। इस पार्क मे हर दिन हजारों बच्चे, नौजवान और बुजुर्ग लोग सैर और घूमने के लिये आते हैं।  इस पार्क मे एक अत्यंत आकर्षक ओपिन थिएटर हैं जिसे एम्फीथिएटर कहते   हैं। इसके  बीच मे सबसे नीचे गोल पक्की सीमेंटेड स्टेज हैं, जिसके चारों ओर अर्धचंद्राकार 7 सीढ़ी नुमा दर्शकदीर्घा हैं जिनपर बैठ कर लोग कार्यक्रम का आनंद लेते हैं या यूहीं मौसम के अनुरूप लुत्फ उठाते हैं अर्थात सर्दियों मे सुनहरी धूप का लाभ लेते हैं और गर्मियों मे सूर्योदय पूर्व का आनंद बच्चे स्केटिंग, कराटे या अन्य गेम खेलते हैं। इस थिएटर की खूबी हैं ऊंचाई के कारण पेड़ों की छाया न होने के कारण धूप खुली और भरपूर रहती हैं। यूं तो मैं प्रातः लगभग 6 बजे घूमने जाता हूँ पर आजकल सर्दियों की बजह से मैं लगभग 9.30-10 बजे भ्रमण के लिये जाता हूँ आज भी  आज साल 2018 के आखिरी दिन सुबह 10 बजे मेघदूतम पार्क भ्रमण के लिये पहुंचा जहाँ पर आज 250-300 लोगो से मुलाक़ात हुई। इस मुलाक़ात मे बच्चे ज्यादा पर नौजवान लड़के लड़कियां  और बुजुर्ग पुरुष महिलाएं भी थी। बच्चे टॉफी, चॉकलेट, फ्रूटी, एपी एपल जूस, चूइंगम आदि खा रहे थे, मैंने उन बच्चों से कुछ से बात की और उनकी प्रिय स्नेक्स के बारे मे पूंछा अधिकतर बच्चों की पसंद लेयर चिप्स थी पर कुछ अंकल चिप्स के भी शौकीन थे। कुछ बच्चे लोलिपोप और और रंग बिरंगी जेम्स के लिये ज्यादा लालायित थे। ये सारे बच्चे कुछ अकेले और कुछ स्कूल ग्रुप के साथ आए थे जो इस पार्क के आसपास या थोड़ी दूर के रहवासी रहे होंगे। अकेले बच्चे अपने माता पिता या अन्य गार्डियन के साथ थे इन बच्चों और उनके संरक्षकों से मिलना एक दुष्कर एवं दुरूह कार्य था। अर्ध चंद्राकार दर्शक दीर्घा मे घूम घूम कर उनसे  मिलने और बार-बार झुक कर बात करने से कमर का बुरा हाल था लेकिन इन लोगो से मिलने की चाह ने हमे चैन से बैठने नहीं दिया। कुछ भटके नौजवान ताश खेल रहे थे पर उनकी ताश की गड्डी मे दो पत्ते, हुक्म का नहला और हुकुम की तिगगी गायब थी। कुछ बुजुर्ग खैनी, तम्बाकू,  और पान मसाला के बिभिन्न ब्रांडो के शौकीन थे। ऐसे अनेक नौजवान जो शायद कॉलेज स्टूडेंट थे, चाय या कॉफी के शौकीन थे जो कागज के कपों मे नन्ही प्लास्टिक स्टिक से चाय या कॉफी को हिला कर उसमे कॉफी मिला  कर गर्मागरम चुस्कीयों के साथ चाय/कॉफी का मजा ले रहे थे। एक छोटा बालक अखरोट का आधा हिस्से लिये कुछ गुमसुम बैठा था जब मैंने उससे उस की उदासी का कारण पूंछा तो उसने बताया आधा अखरोट उसके भाई ने ले लिया उसको दिलासा देकर मैं आगे बढ़ा। बीच बीच मे बैठ कर सुस्ता लेता था, बो तो भला हो मेडम भावना का जो सुंदर सुरीले गीतों से हमारा मन बहलाये हुए थी और गानों के बीच गोवा की राजधानी पंजिम का सुंदर वर्णन अपने 100.1 एफ़एम गोल्ड पर अपने सुनने बालों से बात कर हमारा मनोरंजन कर रही थी जिनके बिना पार्क मे इन सभी लोगो से मुलाक़ात संभव नहीं थी। उनके सुंदर, सुमधुर गाने लगातार हमारे मोबाइल पर  बज कर हमारा हौसला बड़ाये हुए थे। इन सब मे एक बात अच्छी थी एक-दो लोगो को छोड़ कर कोई सिगरेट का शौकीन नहीं था। बीड़ी पीते हुए तो कोई भी नहीं मिला जो इस बात का प्रतीक था कि नोएडा बासियों का आर्थिक स्तर अन्य शहरों के मुक़ाबले ऊँचा था। मूँगफली के शौकीन लोगो पर ही मात्र हमारा क्रोध था क्योंकि जहाँ तहाँ उनके निशान हमे दीख रहे थे अतः उन से मैं परास्त होकर ज्यादा नहीं मिला सका । लगातार लगभग 3 घंटे की लोगों से मुलाक़ात मे  अब मैं थक कर चूर हो गया था लेकिन खुशी इस बात की थी कि उस थिएटर के सभी दर्शक दीर्घाओं  मे बैठे सैंकड़ों लोगो से उनके दुवारा छोड़े गये कचरे के माध्यम से उनसे मिल सका। अब तक मेरा कचरे का बैग आधे से ज्यादा भर गया था।  ये बो लोग थे जो 1 जनवरी 2018 से या उससे पहले से आज साल के आखिरी दिन अर्थात 31.12.2018 के बीच अपने चहेतों, बच्चो, अपने दोस्तों के साथ या अकेले इस ऐम्फीथिएटर मे घूमने या मौसम का आनंद लेने आये थे और अपनी यादें कचरे के रूप यहाँ छोड़ गये। आज साल के आखिरी दिन मैंने 20018 की समाप्ती और 2019 के आगमन की पूर्व संध्या पर मेरा ये संकल्प   मेघदूतम     पार्क के उन छोटे कर्मचारियों के प्रति हमारा सम्मान हैं जो लगातार अपनी सेवा  से और  उस की देख भाल, सेवा  से  हमारे और अन्य रोज़ाना आने बाले हजारों लोगो की  स्वास्थ की देखभाल करते हैं। क्यों न हम सभी पार्कों या अन्य सार्वजनिक स्थालों  पर  नये बर्ष 2019 के रेसोल्यूशन के रूप मे  स्वछ्ता की शपथ लें!!

विजय सहगल      

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

मानसिक आरोग्यशाला


मानसिक आरोग्यशाला

कभी कभी छोटी सी चूक से बड़ी हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं और उसकी बजह से व्यक्ति उपहास का पात्र बन जाता हैं। अगर थोड़ी से सावधानी वर्ती जाय तो उस स्थिति से बचा या उसे टाला जा सकता हैं। ऐसी ही स्थिति मे घटित एक घटना का मैं गवाह बना।  बात उन दिनों की है जब मैं थाटीपुर शाखा ग्वालियर मे प्रबंधक था शायद 2004-05 की बात रही होगी। श्री ए॰ के॰ मुंजाल साहब उस समय भोपाल प्रादेशिक कार्यालय के प्रादेशिक  प्रबन्धक  थे। श्री मुंजाल जी का ग्वालियर की नया बाज़ार और हमारी शाखा, थाटीपुर  का निरीक्षण का कार्यक्रम था। ग्वालियर ही नहीं पूरे मध्यप्रदेश मे एक चलन था कि जब प्रादेशिक प्रबन्धक किसी शाखा के दौरे पर होते तो आसपास की शाखाओं के सारे  प्रबन्धक भी प्रादेशिक प्रबन्धक से मिलने चले आते थे। कुछ प्रबन्धकगण  व्यव्हारिक्ता के नाते उनको अपनी शाखा मे आने का अनौपचारिक आमंत्रण देते थे। समय की उपल्ब्ध्ता के आधार पर प्रादेशिक प्रबन्धक कभी कभी उस अनुरोध को स्वीकार भी कर लिया करते थे। उस दिन भी यही हुआ। हमारी मानसिक आरोग्यशाला के प्रबन्धक जी  के अनुरोध पर  उन्होने  पूर्वनिर्धारित शाखाओं के निरीक्षण के पश्चात उनकी मानसिक आरोग्यशाला शाखा मे आने का अनुरोध स्वीकार कर लिया। चूंकि मानसिक आरोग्यशाला, शाखा का निकट भविष्य मे नये परिसर मे स्थांतरित होने का कार्यक्रम था, शाखा मानसिक आरोग्यशाला के नये परिसर की फर्निशिंग का कार्य भी चल रहा था।  श्री मुंजाल साहब का उद्देश्य एक पंत दो काज़ करने का था कि इस बहाने शाखा के कार्य की प्रगति की भी समीक्षा हो जायगी, उन्होने शाम के समय मानसिक आरोग्यशाला शाखा  मे आने का कार्यक्रम निश्चित कर दिया। सर्दियों का समय था दोनों शाखाओं के निरीक्षण के पश्चात दिन ढलने के पूर्व उन्होने हमारे एवं नया बाजार शाखा के प्रबन्धक और कुछ अन्य स्टाफ के साथ शाखा मानसिक आरोग्यशाला के लिये प्रस्थान किया। शाखा मे पहुँचने पर स्टाफ से मिलने की औपचारिकता के बाद शाखा परिसर का भ्रमण किया जो मेंटल हॉस्पिटल परिसर के  एक बहुत छोटी  बिल्डिंग मे चल रही थी जिसका स्पेस बहुत नाकाफी था। चाय-पानी की औपचारिकता के पश्चात उन्होने शीघ्र ही नये भवन को देखने की इक्छा जाहिर की। मानसिक आरोग्यशाला के प्रबन्धक के  साथ श्री मुंजाल साहब और  हम सभी 5-6 स्टाफ नये परिसर को देखने के लिये चल दिये। नया शाखा परिसर मानसिक आरोग्यशाला से लगभग 100-150 मीटर दूर रहा होगा। हम लोग पैदल ही चल कर 5-7 मिनिट मे बैंक के नये निर्माणाधीन परिसर मे पहुँच गये जो एक छोटी लेकिन काफी खुले परिसर की मार्केट मे था। उक्त मार्केट मे एक समान निर्मित चालीस, शटर से सुसज्जित दुकाने थी। मानसिक आरोग्यशाला के प्रबन्धक ने बताया कि बैंक ने इन चालीस दुकानों मे से तीन दुकाने मेंटल हॉस्पिटल कमेटी से किराये पर ली हैं जो मार्केट के मध्य मे स्थित थी।  सारी दुकानों के आगे 6-7 फुट का कवर्ड वरांडा नुमा कॉरीडोर बना हुआ था। कॉरीडोर के आगे काफी खुला एरिया पार्किंग के लिये भी था। उक्त पूरा मार्केट बाउंड्री बाल से कवर्ड किया हुआ था। मानसिक आरोग्यशाला के प्रबन्धक सिलसिले बार परिसर की खूबियों को बताना शुरू किया।  जैसा की स्वाभिक था प्रादेशिक प्रबन्धक श्री मुंजाल जे ने उन तीन दुकानों को देखने की इक्छा प्रबन्धक महोदय से जताई और किराये के संबंध मे पूंछा। प्रबन्धक महोदय ने किसी स्टाफ से नवीन परिसर के बंद तीनों शटर के तालों को खोलने के निर्देश देते हुए श्री मुंजाल जी को बताया चूंकि सरकारी बिल्डिंग है तो किराया कलेक्टर महोदय दुवारा निर्धारित रेट से होगा। प्रादेशिक प्रबन्धक ने पुनः पूंछा किराया कितना बनता हैं। मानसिक आरोग्यशाला प्रबन्धक ने कहा भू अभिलेख के इंस्पेक्टर ने निरीक्षण कर लिया है । जब प्रादेशिक प्रबन्धक ने पुनः किराये के बारे मे पूंछा कुल कितना किराया अंदाज से देना होगा? शायद प्रबन्धक महोदय को इस मामले मे जानकारी नहीं थी। मैंने कुछ बात सम्हाल्ते हुए कहा यहाँ शायद 4-5 रूपये वर्ग फूट होगा। श्री मुंजाल जी के चेहरे से उनकी खीज़ और अप्रसन्नता के भाव आसानी से पढे जा सकते थे। उन्होने बैंक परिसर के लिये आवंटित दुकानों के  शटर के तालों   को खुलने का  इंतजार मार्केट के कॉरीडोर के पास खड़े होकर किया, जिसे एक सब-स्टाफ  ताले खोलने का प्रयास कर रहा था। यहाँ जो मैंने देखा उस का उल्लेख मैंने उपर शुरुआत मे किया अर्थात प्रबंधिकीय कौशल मे थोड़ी कमी। मैंने देखा  उस सब-स्टाफ के हाथ मे चाबियों का एक बड़ा सा गुच्छा था हमे ये अनुमान लगाने मे देरी नहीं हुई कि चाबियों के इस गुच्छे मे पूरे मार्केट की 40 दुकानों की 80 चाबियाँ है जो कि  प्रत्येक शटर मे लगे दो-दो ताले की थी। अब तो हमे कुछ अप्रिय घटने की आशंका होने लगी जो हास्यासपाद रूप मे लेने जा रही थी। इसी बीच मानसिक आरोग्यशाला के प्रबन्धक लगातार बैंक परिसर की गुणों को बताये जा रहे थे। उन्होने प्रादेशिक प्रबन्धक महोदय को सम्बभोधित करते हुए कहा, तीसरे  शटर मे स्ट्रॉंग रूम और कैश कैबिन होंगे, पहले शटर मे मैनेजर कैबिन होगा। श्री मुंजाल जी ने कहा ठीक हैं,  ताला खोलो-ताला खोलो, मैनेजर साहब ने देखा ताला अब भी नहीं खुला तो पुनः बोले,  "सर दूसरे कैबिन मे  ग्राहकों  के लिये काउंटर होगा। मुंजाल जी ने फिर कहा भाई पहले ताला खोल-ताला खोल। दुर्भाग्य से उस गुच्छे मे सभी चाबियाँ एक ही कंपनी के ताले की थी जो कमोबेस एक जैसी प्रतीत हो रही थी।सब स्टाफ लगातार एक के बाद एक चाबी लगा कर शटर के तले खोलने का प्रयास कर रहा था।  दिन ढल चुका था, लाइट की व्यवस्था भी नहीं थी। दुर्भाग्य से स्टाफ दुवारा ताला खोलने के सारे प्रयास निरर्थक हो रहे थे। जब मानसिक आरोग्यशाला, प्रबन्धक ने बतलाना शुरू किया कि "सर, यहाँ ए॰टी॰एम॰ लगाया जायेगा",  तो श्री मुंजाल साहब के सब्र का पैमाना टूट चुका था। अपने क्रोध को काबू करने का असफल प्रयास करते हुए झल्ला कर बोले,"ताला खोल-ताला खोल। दुर्भाग्य से  अंत तक शाखा परिसर के शटर का ताला नहीं खुला तो नहीं खुला और वह बगैर परिसर को देखे बापस हो गये।
कितनी चिंताजनक और दु:ख की  स्थिति थी कि प्रादेशिक प्रबन्धक जिस कार्य के लिये आये थे, एक न समझी और मिस मैनेजमेंट की बजह से उस को ना कर सके।  मेरा मानना हैं यदि थोड़ी सी  सावधानी उस दिन रखी जाती और मानसिक आरोग्यशाला के प्रबन्धक यदि बैंक के परिसर के शटर के ताले की दो या तीन चाबियों बाला ताला लगा  उन तालों की एक चाबी  अपने पास रखते तो उस दिन जैसी हास्यास्पद एवं अजीब स्थिति से बचा जा सकता था।

विजय सहगल     

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

चूहों का सम्मेलन


चूहों का सम्मेलन

इस सच से हम सभी भलीभाँति परिचित हैं कि हिन्दुस्तान  की सभी ट्रेनों मे चाहे वह स्लीपर कोच हो या ए॰ सी॰ का प्रथम, दुवतीय या तृतीय श्रेणी का कोच हो इन ट्रेनों मे मालिकाना हक़ भले ही  रेल मंत्रालय का  हैं पर हर ट्रेन के डिब्बे मे चूहों की उपस्थिती ये बताती हैं कि ट्रेन के असली मालिक चूहे  हैं जिनके नियंत्रण मे पूरी ट्रेन इंजिन से  लेकर  पीछे गार्ड के डिब्बे तक होती हैं। हर स्टेशन पर इन चूहों की उपस्थिती इस बात का प्रमाण हैं कि पूरे रेल तंत्र पर इन चूहों का ही राज्य हैं। इस कड़वे सच के साथ चूहों के अन छूये पहलू को छूने का प्रयास कर रहे हैं।
अजि सुनते हो बेटा  बड़ा  हो गया  है अब उसके लिए कोई योग्य लड़की  की तलाश करो या यों ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहोगे,  समय निकलता जा रहा हैं बेटा अब बड़ा भी होगया है और अब तो उसने कारोबार मे  भी आपका हाथ बटाना शुरू कर दिया हैं। गाड़ी संख्या 22416 ए॰पी॰ ए॰सी॰ एक्सप्रेस के फ़र्स्ट ए॰सी॰ कोच मे अपने ऑफिस मे  बैठ कर वह अपने पति से कुछ नाराजी मे कह रही थी। "अरी भाग्यवान परेशान क्यों होती हो हम भी बेटे के व्याह के लिये योग्य लड़की की तलाश चारों ओर  कर रहे हैं", चूहे ने  अपनी चिन्तित पत्नी को ढाढ़स बंधाते हुए कहा। जी हाँ ये एक ऐसे चूहा परिवार की कहानी हैं जो 22416 अप  ए॰पी॰ ए॰सी॰ एक्सप्रेस जो विशाखापटनम से हज़रत निज़ामुद्दीन के बीच चलती हैं, के मालिक हैं और अपने योग्य सुपुत्र के विवाह के लिये सुंदर सुयोग्य बधू की चाहत के  लिये चिन्तित हैं।  बैसे इनके परिवार का यह एक खानदानी व्यवसाय है जो पूरे हिंदुस्तान मे फैला हुआ हैं जिसको इनके परिवार की कई पीढ़ीयां इसी  ट्रेन  संचालन के कार्य को  सफलता पूर्वक करती आ रही  हैं। चूहे ने कहा हमने 12615 जी॰टी॰ एक्सप्रेस बालों की लड़की से बात की थी पर लड़की मे कुछ कमी के कारण माना कर दिया। चूहे की पत्नी ने पूंछा ऐसी क्या कमी थी, क्या कम पढ़ी लिखी या दुबली हैं? बैसे भगवान का शुक्र हैं अपने चूहा समाज मे इन आदिमियों की तरह  सुंदरता और दहेज जैसे समस्याओं से हमारे समाज को  रुबारू नहीं होना पढ़ता, तो फिर  लड़की मे ऐसी क्या कमी  थी जो तुमने मना कर दिया। चूहा बोला अरी भाग्यवान जी॰टी॰ एक्सप्रेस  जैसी इतनी बड़ी और प्रसिद्ध  गाड़ी को चेन्नई से दिल्ली तक मैनेज करना अनपढ़ लोगो के बस की बात नहीं, उसकी पढ़ाई लिखाई मे कहीं कोई शंका नहीं हैं। हम चूहों की तो बस  एक ही शान होती हैं,  आदमी मे जैसे उसकी  मूंछ होती हैं और चूहों मे उसकी पूंछ। उस लड़की की "पूंछ" कटी थी शायद किसी रेल दुर्घटना मे कट गई थी, इसलिए मना कर दिया। सुनकर चूहे की पत्नी ने अपने पति से  सहमति जताई। पर तुरंत ही पति से कहा विशाखापटनम से निज़ामुद्दीन तक रास्ते मे इतनी पैसेंजर ट्रेन मिलती हैं इन पैसेंजर ट्रेन के चूहों  से बात क्यों नहीं चलाते? अब चूहे का पारा  गुस्से से सातवे  आसमान पर था बोला "तुम  तो अपने पुत्र मोह मे अंधी हुई जा रही हो। अरे अपना भी तो कुछ स्टेटस देखो? क्या विशाखापटनम-रायपुर, या गोंदिया-नागपुर, इटारसी-भोपाल, झाँसी-बीना, आगरा-दिल्ली पैसेंजर बाले चूहों  की कोई औकात हैं हम लोगो के सामने? हम लोग सुपरफास्ट ए॰सी॰ एक्सप्रेस ट्रेन बाले हैं, अरे जरा इन पैसेंजर ट्रेन बाले चूहों और इनकी फटीचर रेल गाड़ियों से इन का स्तर तो देखो।  इटारसी-भोपाल पैसेंजर बालों के पास सफाई कर्मचारी रखने की क्षमता भी नहीं कितनी गंदी गाड़ी रहती हैं। आगरा-झाँसी बालों के पास टिकिट चेक करने के लिये टी॰सी॰ तक रखने के पैसे  नहीं हैं तभी तो इन रेल गाड़ियों मे कितने लोग बिना टिकिट यात्रा करते हैं। अरे सफाई के लाले पड़े रहते है इनके यहाँ, एक सफाई बाला भी नहीं रख सकते ये अपने घर (ट्रेन) मे। उसने पत्नी को उल्हाना देते हुए कहा।   अपनी   22416 अप  ए॰पी॰ ए॰सी॰ एक्सप्रेस को देखो हम लोगो ने पड़े लिखे आदमियों जैसे टी॰सी॰, रसोईयान के वेटर आदि  को नौकरी पर रखा हैं जो प्रोपर ड्रेस मे रह कर यात्रियों की सेवा करते हैं और तो और ये पैसेंजर बाले अपनी ट्रेन मे यात्रियों को  मूँगफली-और पोपकोर्न के अलावा कुछ नहीं देते हमारी 22416 अप  ए॰पी॰ ए॰सी॰ एक्सप्रेस मे ऑन लाइन खाने की सप्लाइ होती हैं चाय कॉफी तो पूरे दिन हम लोग पेंट्री-कार के माध्यम से सर्व करते हैं। ब्रेकफ़ास्ट, खाना और डिनर कितना स्वादिष्ट होता हैं हमारे यहाँ,  पैसेंजर ट्रेन बाले चूहे परिवार हमारे स्तर के नहीं हैं अतः तुम उनके परिवार की लड़की लाने की सोचना भी नहीं। अरे अनपढ़ और देहाती यात्रियों के साथ रह कर  इन पैसेंजर ट्रेन के चूहा परिवारों  का रहन सहन भी अनपढ़ और देहातियों की तरह हो गया  हैं। हमारे बच्चे पढे-लिखे एवं टिप-टॉप टाई-सूट मे होते हैं क्योंकि हम लोग की ट्रेन मे अंग्रेजी पढे लिखे लोग यात्रा करते हैं। तुम नहीं समझोगी, ये सब संगत का असर हैं। चूहे ने अपनी नाराजी जाहिर करते हुए अपनी चुहिया पत्नी को प्यार से डांटा।
इसी बीच खबर लगी कि अखिल भारतीय चूहों का सम्मेलन नई दिल्ली मे होने जा रहा हैं और  22416 अप  ए॰पी॰ ए॰सी॰ एक्सप्रेस बाले चूहे को विशाखापटनम और दिल्ली के बीच के अन्य स्टेशन जैसे विजयबाड़ा, खम्मम, वारंगल, रामगुंडम चंदरपुर और अन्य स्टेशनों  से 100-100  चूहों को लाने का बंदोवस्त करना हैं। सम्मेलन नई दिल्ली के यार्ड मे होना तय हुआ हैं। उक्त सम्मेलन मे चूहों को ट्रेन परिचालन मे हो रही कठिनाईयों और अन्य विषयों पर चर्चा की जायेगी। ब्रहद समागम की तैयारियां चारों तरफ शुरू हो गई। संदेश देश के चारों दिशाओं मे जाने बाली ट्रेनों के माध्यम से प्रेषित किये जाने लगे। उत्तर मे संदेश जम्मू तवी एक्सप्रेस एवं पंजाब मेल के माध्यम से भेजे गए, दक्षिण मे ख़बर के लिये जी॰टी॰ एक्सप्रेस, केरला एक्सप्रेस, कर्नाटक और आंध्रा एक्सप्रेस के चूहों ने ये ज़िम्मेदारी सम्हाली, पूर्व मे गुवाहाटी और हाबड़ा मेल, उत्कल एक्सप्रेस एवं अन्य गाड़ियों से समाचार भेजे गये, पूर्व मे सूरत, बड़ोदरा, अहमदाबाद मेल के चूहों ने ये ज़िम्मेदारी उठाई। इन सब तैयारियों मे कब समय निकाल गया पता ही नहीं चला। सभी चूहों को खाने पीने की व्यवस्था विभिन्न शहरों को  नई दिल्ली से चलने बाली भोपाल, जयपुर, लखनऊ, देहारादून, चंडीगढ़  शताब्दी एक्सप्रेस के चूहों ने उठाई क्योंकि उन्हे इन गाड़ियों मे परोसे जाने वाले नाश्ते और खाने का अच्छा खासा अनुभव था। इसी बीच वह दिन भी आ गया जब सम्मेलन था। सारे हिंदुस्तान के विभिन्न प्रान्तों से आये चूहे सुबह सुबह तैयार होकर अपने अपने प्रान्तों के परिवेश मे नई दिल्ली के यार्ड की तरफ मार्च करते हुए जा रहे थे। अद्भुद द्रश्य था। निर्धारित समय पर देश की सबसे तेज गति से चलने बाली ट्रेन 12050 गतिमान एक्सप्रेस के मालिक चूहे की अध्यक्षता मे सम्मेलन की शुरुआत हुई। अध्यक्षीय भाषण मे 12050 गतिमान एक्सप्रेस चूहे ने देश मे परिचालित रेल तंत्र पर चूहों के एक छत्र राज्य पर खुशी जाहिर की। अपने अस्तित्व को आदमियों दुवारा मिटाने के प्रयासों की निंदा करते हुए चेतावनी दी गई यदि ऐसे प्रयास जारी रखे तो हम सब जगह सूरत की तरह प्लेग बीमारी फैला कर मानव जाति के लिये मुसीबत खड़ी कर देंगे। एक अन्य चूहा जो हट्टा कट्टा था शायद पंजाब से आया था बोला आदमियों को हम चूहों से सीखना चाहिये कैसे हम सब मिल कर भोजन करते हैं जबकि हमारी ट्रेनों मे आदमी कैसे अलग अलग दिशाओं मे मुह करके अलग अलग खाना खाते हैं। एक अति उत्साहित चूहा जो बिहार से आया था बोला हमने सुना हैं मुंबई मे उत्तर भारतीय चूहों पर वहाँ के कुछ लोगो ने मारपीट कर उन्हे मुंबई से बाहर खदेड़ने की कोशिश की है हम इस कोशिश का मुहतोड़ जबाब देंगे। तभी एक बुजुर्ग तजुर्बेकर चूहे ने कहा नहीं बच्चे हम चूहे आपस मे लड़ कर कभी भी इतना नीच और घिनोना कार्य नहीं कर सकते हैं, ये तो उन दोहरे चरित्र के व्यक्तियों का कार्य है जो  एक तरफ धर्म का वास्ता देकर एकता की बात करते हैं बही भाषा और प्रांत के आधार पर अपने ही भाइयों के साथ मारपीट करते हैं।  ये कार्य तो मुंबई के आदमियों दुवारा बिहार और उत्तर भारतीय आदमियों के साथ मारपीट कर  किया गया हैं जो आपस मे जाति, धरम और प्रांत के आधार पर एक दूसरे से नफरत करते हैं।  ऐसा झूठा विडियो आदमियों दुवारा हम चूहों की एकता को तोड़ने के लिये वाइरल किया गया हैं। हम सभी चूहों से आग्रह करते हैं कि बगैर सही तथ्यों को जाँचे-परखे कोई भी विडियो आदमियों की तरह सोश्ल मीडिया मे वाइरल या पोस्ट न करे। क्योंकि इन आदमियों को कोई भी मैसेज, फोटो, विडियो बगैर सत्यता को जाँचे-परखे फॉरवर्ड करने की आदत हैं। कुछ आदमियों को तो अपने नाम के  छपास की इतनी भूख होती हैं कि वे   नकल (कॉपी-पेस्ट) मार कर जब तक 5-10 पोस्ट फॉरवर्ड न कर ले उनका खाना नहीं पचता।  एक चूहा जो बड़ी देरी से अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा था, शायद हैदराबाद से आया था। बड़ी गरमा-गरम तक़रीर कर रहा था। आदमियों दुवारा ट्रेनों मे से चूहों को समाप्त किये जाने पर कुपित था। आदमियों को संबोधित करते हुए बोला "तूँ क्या तेरी बिसात क्या, तेरे जैसे 56 आये और चले गए, मैं क्या मेरी एक लाख नश्ले इन्ही ट्रेनों मे रहेंगी!! क्योंकि ये ट्रेने  हमारे अब्बा की हैं। बड़ी तालियाँ बटोरी उसने चूहों की जमात मे। एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से सम्मेलन मे पारित किया गया कि चूहों की आर्थिक विकास दर 20-25% प्राप्त करने के लिये सभी चूहों का आह्वान किया गया।  सन 2021 तक सभी चूहों को पक्की छत्त के रूप मे नई-नई एक्सप्रेस ट्रेन   प्रदान करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। सम्मेलन मे एक स्वर से सभी चूहों ने सर्वसम्मति से आदमियों दुवारा चलाये जा रहे स्वछ भारत अभियान की तीव्र निंदा की गई क्योंकि इस अभियान की बजह से चूहों के अस्तित्व मिटने का खतरा हैं इसलिये ज्यादा से ज्यादा गंदगी फैलाने का निर्णय लिया गया। गंदगी फैलाने का अभियान चलाया जाये और इस हेतु आदमियों को ज्यादा से ज्यादा  पान, तंबाकू, पान मसाला इस्तेमाल करने एवं खाने बालों को बड़ावा देने का निर्णय लिया गया।  हॉस्पिटल और औषधालयों को शीघ्र बंद कराया जाये ताकि ज्यादा-से ज्यादा लोग बीमार हों और महामारी फैले,  बिहार और गुजरात के चूहों ने अपने प्रेदशों मे शराब बंदी समाप्त करने की मांग उठाई, ताकि देश मे चूहों को समान रूप से पीने की सुविधा मिले। निर्वाध रूप से शराब की सप्लाइ की जाये ताकि चूहे और आदमी टल्ली होकर दोनों गंदगी फैलाओ अभियान को सफलता पूर्वक लागू कर सके।
एक चूहे ने बतलाया, एक दिन तो हद हो गई एक नौजवान उस दिन यहाँ ट्रेन मे बार-बार अपनी आस्तीन को ऊपर चढ़ाते हुए कह रहा था "चौकीदार चोर हैं"। ट्रेन का मालिक चूहा  घबड़ा गया और उसने  पूंछा श्रीमान क्या गलती हो गई मुझ से मैंने क्या चोरी की हैं। वह बोला ये मैं नहीं जानता पर ये सही है कि "चौकीदार चोर हैं"। चूहा बोला कृपया बताए हमारे ट्रेन के  नौकरों टी॰सी॰, रसोई यान के कर्मचारी या कोच अटटेंडेंट ने आपसे कुछ रिश्वत मांगी या ज्यादा पैसे लिये।  वह बोला हमे नहीं मालूम पर ये निश्चित हैं कि भैया-"चौकीदार चोर हैं"। चूहा बोला फिर नाम भी तो बताओं चौकीदार का और क्या चोरी की उसका कोई प्रमाण तो दो, पर वह नौजवान सिर्फ अपना ही राग अलापता रहा। "चौकीदार चोर हैं" -"चौकीदार चोर हैं"।  चूहे ने पूंछा ट्रेन की सुरक्षा मे तैनात सुरक्षा गार्ड ने कोई चोरी की हैं। तो नौजवान बोला हम कुछ नहीं जानते पर ये सच हैं कि "चौकीदार चोर हैं।" इस पर साथी चूहा बोला ऐसा कौन सा  चूहा आगया अपने समाज मे  जिसने ऐसी हिमाकत की। तब ट्रेन मालिक चूहे ने कहा, नहीं वह नौजवान चूहा जाति  से नहीं वह तो आदिम  जाति से था। इस पर दूसरा चूहा  हँसते हुए बोला अच्छा तुम उस साहुल आंधी की बात कर रहे हो। जो आदमियों मे टप्पू  के नाम से जाना जाता हैं।  तभी पहला चूहा बोला नहीं नहीं उसका नाम साहुल आंधी नहीं उसका नाम ...  । अचानक इतनी ज़ोर से फिर वही आवाज आई "चौकी दार चोर हैं" इस आवाज मे उन चूहों की आवाज न जाने कहाँ दब गई। और इस   तरह चूहों का अखिल भारतीय सम्मेलन सफलता पूर्वक समाप्त हो गया। उक्त सम्मेलन की सफलता इस बजह से भी याद रहेगी कि गाड़ी संख्या 22416 ए॰पी॰ ए॰सी॰ एक्सप्रेस के चूहे के बेटे का संबंध गाड़ी संख्या 12050 गतिमान एक्सप्रेस की  बेटी से पक्का हो गया। शादी की सूचना आप सबको यथा समय प्रेषित की जाएगी।

विजय सहगल

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

सुंदर-सौम्य-सुशील महिला


सुंदर-सौम्य-सुशील महिला

मेरे मित्र हैं श्री शर्मा जी जिनकी ससुराल भी हमारी ससुराल की तरह ललितपुर मे हैं। सपत्नीक रायपुर मे मेरे घर मिलने आये। चान्स की बात उस दिन मेरी शादी की सालगिरह थी। उनकी पत्नी और उन्होने ने हम दोनों को शादी की सालगिरह की मुबारकबाद दी। मेरी पत्नी और मैंने उनको धन्यवाद कहा। जैसा की आमतौर पर चलन हैं पत्नी ने कहा "12 साल कैसे निकल गये पता ही नहीं चला"। मैंने भी धीरे से चुटकी ली "हाँ तुम्हें क्यों पता चलेगा, अरे हमसे पूंछों शादी के बाद का एक एक दिन अंगुलियों पर याद हैं"! सुन कर सभी लोग ठहका लगाने लगे। उनकी पत्नी ने ये घटना हू-व-हू लिख कर मासिक पत्रिका सरिता मे लिख भेजी। किस्सा सरिता पत्रिका मे प्रकाशित हुआ और श्रीमती शर्मा पुरुस्कार पा गई।
एक बार शायद 1990 या 1991 मे  शादी की साल गिरह पर हम लोगो ने बाहर होटल मे खाना खाने का प्रोग्राम बनाया। उस समय मैं नया बाजार शाखा ग्वालियर मे कार्यरत था।  फूल बाग के सामने एक होटल मे हम लोग अपने बड़े बेटे के साथ जो उस समय 5 साल का था  खाना खाने पहुँचे। खाने का मैन्यू  फ़ाइनल कर वेटर को ऑर्डर दे दिया। बीच खाने मे मुझे याद  आया ऑफिस से आकार  कपड़े बदलते समय पर्स तो घर पर ही रह गया! अब तो हालत खराब हो गई, खाना अचानक गले मे ही अटक गया। क्रेडिट/डेबिट कार्ड का चलन था नहीं। मोबाइल तो दूर की बात लैंड लाइन फोन भी ज्यादा नहीं हुआ करते थे। क्या करे समझ नहीं आ रहा था। अपने आपको सयंत कर हमने खाना जारी रखा और पत्नी से भी ऐसा करने को कहा। खाने के बाद वेटर मीठे/आइसक्रीम के लिये पूंछने आया श्रीमती जी ने मना करना चाहा पर मैंने आइसक्रीम  का भी ऑर्डर दे दिया। ऑर्डर देने के बाद पत्नी ने कुछ गुस्से मे कहा बैसे ही पैसे नहीं हैं और बिल क्यों बढ़ा रहे हों? मैंने कहा "नाश सो सवा-सत्यानाश", जो समस्या 100 रुपये मे होगी वही सवा सौ मे होगी, क्यों न  आइसक्रीम भी खाई जाए। मैंने हँसते हुए  कहा  वर्तन यदि 100/- रुपये के बिल न देने पर धोने पड़ेंग तो सवा सौ के बिल पेमेंट न देने पर भी धोने पड़ेंगे?? इसी उधेड़-बुन मे वेटर से बिल मंगाया जो 150-200 का रहा होगा।  मैं बिल लेकर काउंटर पर बैठे होटल मैनेजर के पास गया, उसे अपना परिचय दिया और बताया की मैं ओरिएंटल बैंक मे कार्यरत हूँ और अपने पर्स के न होने की समस्या बताई। मुझे अंदर ही अंदर  लगा मैनेजर हमे बुरा-भला, बहाने बाज बताकर झगड़ेगा या बुरा व्यवहार करेगा। लेकिन जब उसने बैंक का नाम सुना तो बोला अरे ओ॰ बी॰ सी॰ मे तो मेरा छोटा भाई  अशोक मेहता काम करता हैं!! सुनकर मैं हतप्रभ रह गया और अंदर ही अंदर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा, कि आज तो भगवान ने लाज रख ली नहीं तो पता नहीं कैसी परिस्थिति बनती। मैनेजर श्री मेहता जी से फिर तो काफी बाते  हुई। उन्होने कुछ नगद और भी देने की पेशकश की कि शायद कही बाजार आदि जा रहे हो तो आवश्यकता पड़े? लेकिन हमने उन्हे धन्यवाद कह कर सीधे घर की ओर रुख किया और दूसरे दिन होटल बिल का भुगतान किया।  
कुछ महिलाओं की आदत हैं जब कभी भी बात करों,  भगवान से पति पत्नी के रिश्तों की दुहाई देंगी। ऐसे ही एक बार किसी पारिवारिक समारोह मे सभी लोगो के सामने पत्नी बोली हम तो ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि   हमे तो सात जन्म तक इनकी ही पत्नी बनाना।  मैंने बहुत ही गंभीरता पूर्वक कहा " भाई -भतीजा बाद की हद हैं, हर बार हर जन्म मे तुम ही पत्नि के रूप मे क्यों? कभी दूसरी को भी तो मौका मिलना चाहिये! अरे कटरीना-करीना भी तो इंतजार कर रही होंगी उन्हे भी तो मौका मिलना चाहिये अगले जन्म मे या तुम्ही तुम सात जन्मों तक मेरा पीछा नहीं छोड़ोगी!!
बातें तो कोई हमारी श्रीमती से सीखे। जब कभी हमे धमकाना हो तो बात बात मे बोलती " हमे ऐसा बैसा मत समझना बी॰ के॰ कंचन की बेटी हूँ।" (बी॰के॰ कंचन मेरे फादर इन लॉं का नाम हैं) एक बार गुस्से मे मैंने भी जबाब दे दिया बी॰ के॰ कंचन कोई बहुत बड़ी तोप हैं क्या? क्या कर लेंगे बी॰ के॰ कंचन- बी॰ के॰ कंचन। अब तो ये धमकी बाला अस्त्र श्रीमती जी के  काम नहीं आया। श्रीमती जी ने कुछ दिन बाद एक नया डायलोग की खोज कर ली। कहीं कुछ बात पर धमकी भरे लहजे मे  मेरी माँ का नाम लेते हुए वह बोली "ऐसा बैसा मत समझना", "श्रीमती शीला सहगल"  की बहू हूँ।  अब जब उसने मेरी माँ का नाम देकर मुझे डराया तो  सुनकर मैं भी भौचक्का रह गया और चुप रहा और  धमकी के आगे कुछ नहीं बोल पाया।
कभी-कभी कुछ ऐसे व्यक्तित्व नज़र आते हैं जो अपनी बोलचाल या पहनावे के कारण सहज़ ही आपको प्रभावित कर देते हैं।  एक दिन तो हद हो गई झाँसी मे मैं अपने घर के बाहर हमारे किरायेदार की दुकान पर बैठा था जो बाजार मे हैं। मैंने बड़े आदर-सम्मान भाव से देखा 60-70 मीटर दूर  मंदिर के पास से एक सौम्य, सुंदर  महिला पूर्णतयः भारतीय परिवेश, प्रभावशाली व्यक्तित्व, सिर पर पल्लू डाले चली आ रही हैं। दिल मे लगा किसी सभ्य परिवार की बहू अपने रिशतेदारों के साथ शायद बाजार से  आ रही हैं। दिल के किसी कोने मे उस महिला और उसके परिवार के भाग्य को सराहता हुआ उधेड़-भुन मे सोच रहा था कि कितने सौभाग्यशाली परिवार होगा जिसे इतनी सौम्य सुंदर बहू मिली। एक आदर्श स्त्री की कल्पना उस समय मन मे चल रही थी।  परन्तू ये क्या जैसे जैसे वो नजदीक आई मैं दंग रह गया वो तो मेरी श्रीमती जी हैं!! दिल ही दिल मे अनजाने मे मिली इस खुशी से अपने आप पर आई हंसी को रोक नहीं पाया।     
मेरी शुरू से आदत रही हैं प्रत्येक माह मे एक निशित राशि वेतन से निकाल कर पत्नी को देता रहा हूँ। ये राशि समय,  पद, के हिसाब से उसी तरह बढ़ती रही जैसे  बैंक मे  हमारा वेतन "वेतन-समझौते" के हिसाब से बढ़ता रहा। बीच बीच मे इस निश्चित-वेतन राशि के अतिरिक्त जिस अदा से वह पैसे मांगती है वह देखते ही बनती हैं। जब वह बड़ी स्टाइल मे कहती तुम्हारे बीबी-बच्चे खुश रहे 2000/- रूपाय देदे या  4000/- देदे। इस तरह वेतन के अतिरिक्त राशि की मांग समय समय पर  प्रायः की जाती।  कौन कठोर होगा जो  ऐसी हसीन मांगने बाली को 4-5 हजार रूपय देने से मना कर सकता हैं? बो तो धन्य हो नरेंद्र मोदी की नोट-बंदी नीति का  जब इस "मांगने बाली" की जोड़ी गई रकम का पता चला।  
तमाम मुद्दों पर हमने आपसी सहमति विकसित कर ली थी, जिसमे सबसे बड़ी थी लेट्रीन पॉट की सफाई और हमारे घर की विदेश नीति, क्या होगी, पाकिस्तान के साथ हमारे घर और देश की नीति क्या होगी, रेल-बजट, आम बजट  आदि आदि, जिसकी ज़िम्मेदारी हमने ले ली थी बाकी सभी छोटी-मोटी  जिम्मेदारियाँ हमारी श्रीमती जी ने सम्हाल ली थी, जैसे खाना, राशन, साफ सफाई, रोजाना के खर्च,  रिश्तेदारी मे लेन-देन  आदि सभी कुछ श्रीमती जी की  ज़िम्मेदारी थी। जब कभी भी वह ज्यादा काम की शिकायत करती तो हमारा रटा-रटाया जबाब होता चलो कल से हम अपने काम आपस मे बदल लेते हैं। कल से लेट्रिन की सफाई तुम्हारी!! ये सुनते ही उस की शिकायत बापस हो जाती। 
पत्नि के साथ  छोटी छोटी, मीठी-मीठी  नोक-झोंक मे हमरे सफल वैवाहिक जीवन का सफर यों ही चल रहा हैं  जिसने हमारे वैवाहिक जीवन को  बेइंतह खुशियों से भर दिया। हम उसका आभार व्यक्त करते हैं कि उसने हमसे ज्यादा, जी  हाँ हमसे ज्यादा हमारे माँ-पिता को प्यार और सम्मान देकर   एक आदर्श बहू का परिचय दिया। हमने अपने माता-पिता के चेहरे पर अपनी पत्नी के साथ होने पर जो खुशी देखी हैं वह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि मेरी पत्नी का  प्यार और सम्मान मेरे माता  पिता के प्रति हमसे अधिक रहा हैं, तभी जब कभी भी हमारे माता-पिता सागर, ग्वालियर, भोपाल, रायपुर या दिल्ली मेरे पास आए तो  हमारे पड़ौसी और मिलने बाले ये समझते थे ये मेरी पत्नी के माता पिता हैं।  वास्तव मे वह किचिन किंग हैं, 15-16 साल के अनुभव के साथ शेयर मार्केट की अच्छी जानकार और और व्यवहार कुशल महिला हैं जिसके साथ रहते  ज़िंदगी मे आयी  कठिनाइयो, परेशानियों को हम लोगों ने  सफलतापूर्वक सामना किया हैं। "एसी  सुंदर सौम्य, सुशील  महिला की  33वी  शादी की साल गिरह पर हम उसे  बहुत -बहुत बधाई" और शुभकामनायें देते हैं। रीता- हैप्पी   मैरिज एनिवर्सरी ।  

विजय सहगल




मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

गढ कुण्डार का किला










                                                        "गढ कुण्डार का किला"
9 दिसम्बर 2018  को जब मैंने  गढ कुण्डार का किला देखा जो झाँसी के पास हैं, इस शानदार इमारत को देखने मे हमे 60 साल लगे जिसका हमे बेहद अफसोस है!! चलिये आप को हम गढ कुण्डार का किला लिये चलते हैं। "गढ कुण्डार का किला" पर  एक इतिहासिक उपन्यास भी हिन्दी साहित्यिक जगत के मूर्धन्य उपन्यासकर स्व॰ व्रंदावन लाल वर्मा दुवारा लिखा गया हैं जो उपन्यास जगत मे अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता हैं।  गढ कुण्डार का किला झाँसी से लगभग 45-50 कि॰मी॰ दूर खजुराहो रोड पर निवाड़ी जिला टीकमगढ़ मे हैं। कहते हैं 1182 ई॰ मे इस किले का निर्माण महाराज खेत सिंह खंगार ने कराया था जिसे पर  बाद मे बुंदेले राजाओं ने विजयी  प्राप्त की। गढ कुण्डार का किला  एक ऐसी इतिहासिक इमारत हैं जो आज से लगभग 1000 साल पूर्व अपने वैभवशाली गौरव की गाथा कह रहा है। एक   अनखोजी ऐसी पुरातत्व धरोहर जिसे दिल्ली या आसपास के लोगो दुवारा  बहुत कम खर्च पर एक दिन मे देखा जा सकता हैं। इस स्थान पर न के बराबर पर्यटक आते हैं। इस का मुख्य कारण म॰प्र॰ सरकार दुवारा इस पर्यटन स्थल का प्रचार-प्रसार न करना और सड़क के छोटे टुकड़े (लगभग आधा कि॰मी॰) का निर्माण नहीं करना और चाय पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव हैं।  मैं अपनी मोटरसाइकल से  झाँसी से प्रातः 10 बजे के आसपास गढ कुण्डार के किले को देखने रवाना हुआ।  प्रातः की हल्की सर्दी मे मोटरसाइकल की यात्रा सुनहरी धूप मे बड़ी बड़ी सुखद थी। झाँसी से 15 की॰मी॰ तक यात्रा आराम से मध्यम गति से तय की। उ॰प्र॰ की सीमा समाप्त होने पर म॰प्र॰ की सीमा शुरू होती ही, धूल धूसरित  वातावरण इस बात का एहसास आप को सहज ही करा देता हैं। 5-6 कि॰मी॰ लंबी सड़क के दोनों ओर काफी संख्या मे क्रेसर मशीने  पत्थरों को तोड़ कर गिट्टी का निर्माण कर वातावरण को दूषित-प्रदूषित कर नियम कानून की धज्जियां उड़ा रहे थे। बड़े-बड़े ड्ंपर वेलगमा यहाँ-वहाँ दौड़ रहे थे। कहीं भी नहीं लगा की म॰प्र॰ सरकार का कहीं शासन-प्रशासन यहाँ हैं। इस छोटे से टुकड़े को  छोड़ दे  तो सड़क के  दोनों ओर हरे भरे  जंगल यात्रा को सुखद बना रहे थे।  सैकड़ों की संख्या मे पौधशालये, बरुआसागर (उ॰प्र॰) कस्बे की मौजूदगी सुंदर सुंदर पेड़-पौधों की नर्सरी के रूप मे करा रही थी। बड़ी संख्या मे लोग सुंदर सजावटी पौधो की खरीद कर रहे थे। बरुआ सागर शहर अदरक उत्पादन का भी एक बड़ा केंद्र हैं जिसका उत्पात देश मे दूर-दूर स्थानो तक प्रेषित किया जाता हैं। यहाँ से म॰प्र॰ के निवाड़ी शहर 5-7 की॰ मी॰ दूर हैं जहाँ से हमे मुख्य मार्ग को छोड़ कर बायीं ओर 18 की॰मी॰ और आगे जाना था जिसकी सूचना  दिशा सूचक बोर्ड के माध्यम से पर्यटकों को दी जा रही थी। उक्त 18 की॰मी॰ सड़क पर  दिल्ली-नोएडा के मुक़ाबले लगभग न के बराबर ट्रैफिक मे 25-30 कि॰मी॰ की गति से मोटरसाइकल के चलाना एक आजाद पंछी की तरह उड़ने का सुखद अहसास खुशी देने बाला था।   उप सड़क मुख्य सड़क से भी अच्छी नज़र आ रही थी जो सीमेंट से बनी हुई थी हमे लगा म॰प्र॰ सरकार पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये गढ कुण्डार किले को  पर्यटन के नक्शे पर लाना चाह रही होगी। इस किले की एक बहुत विशेषता है कि गढ कुण्डार से 5-6 की॰मी॰ दूर से ही किले की सुंदर इमारत ऊंची पहाड़ी पर साफ नज़र आने लगती हैं (चित्र1)पर जैसे ही आप  कुण्डार गाँव मे पहुचते हैं किला नीचे से नज़र नहीं आता। म॰ प्र॰ सरकार की नियत भी यहीं से नज़र आने लगती हैं।  जब  कुण्डार गाँव से कुछ पहले एक बोर्ड मुख्य सड़क से बायी ओर मुड़ने का इशारा करता हैं। लेकिन कोई पक्की या अध-पक्की सड़क न दिखने के कारण हम ये सोच कर उसी सड़क पर आगे बढ़ गये लेकिन बायी तरफ कोई सड़क नहीं दिखाई दी!! तब हमने एक ग्रामीण से किले का रास्ता पूंछा तो उसने बताया की आप रास्ता पीछे छोड़ आये हैं। हम बापस आये और उस पूर्ण तया: कच्चे  रास्ते पर जब बढ़े तो लगा कहाँ एक सड़क आगे दूर दूर सीमेंट से बनी दीख रही थी बही दूसरी ओर गढ कुण्डार किले को जाने बाली सड़क सीमेंट या डामर की न होकर महज़ पगडंडी बाली कच्ची सड़क हैं, जो शायद पर्यटकों को  इस बात का अहसास कराती है कि सड़क मतदाताओं के लिये है जो वोट देते हैं पर्यटक वोट नहीं देते?  आगे पहाड़ी पर जाने के लिये तो रास्ता  और भी गया वीता था। जहाँ तहाँ पड़े फिसलन भरे छोटे-बड़े कंकर पत्थरों की पगडंडी 150-200 मीटर रही होगी, यहाँ तो पैदल चलना भी कठिन था । प्रदेश सरकार और  पर्यटन विभाग की घोर लापरवाही पर धिक्कार करने के अलावा और कुछ नहीं सूझ रहा था। जैसे तैसे इन कठिनाइयों को पार करने पर पक्की सीढ़ियो देख कर सारा क्रोध काफ़ूर हो गया। सीढ़ियो के पार करने पार एक विशाल दरवाजे की बहुत विशाल एवं सुंदर निर्माण देखते ही बनता था जो गढ कुण्डार किले का मुख्य दरवाजा था (चित्र2)। मुख्य दरवाजे मे प्रवेश करने पर बड़ी दालानों से होकर मुख्य प्रांगढ़ मे पहुँचा जा सकता हैं। उक्त किला 8 मंज़िला इमारत हैं। नीचे की तीन मंजिलों को सुरक्षा की द्रष्टि से बंद कर दिया गया हैं। कहते हैं की एक बार इस किले मे एक बारात नीचे के तहख़ानो मे घूमने गई थी फिर कहाँ खो गई आज तक पता नहीं चला!! यहाँ आने के पूर्व हमारे एक मित्र श्री के॰ सी॰ रामपुरिया से यहाँ आने के बारे मे जानकारी की लिये मोबाइल पार बात की, जो  झाँसी शाखा मे कार्यरत हैं और गढ कुण्डार के पास निवाड़ी के रहने वाले हैं। उन्होने भी हमे आगाह कर भुतहा  किले के   नीचे न जाने के लिये कहा था? इन दालानों पार कुछ सीढ़िया ऊपर चढ़ने पार एक विशाल आँगन मे पहुँचा जाता है जिसके चारों ओर बड़े बड़े महल और कमरे बने हुए थे जो राजाओं के दीवान और मंत्रियों के रहे होंगे (चित्र 4 एवं 6)।  कर्मचारी  प्रमोद रजक दुवारा किले का विवरण अच्छे ढंग से दिया गया। एक मंदिर का विशाल प्रांगण जो मंदिर सा प्रतीत होता हैं(चित्र 5)। एक विशेष निर्माण जो आज कल के इमोजी जैसा था आश्चर्य करने बाला था(चित्र3)।  जिसमे दो आंखो के नीचे खुला मुह जैसा प्रतीत होता हैं। विशाल आँगन मे एक कोने मे अन्न पीसने की चक्की बनी है जिसे चार-पाँच व्यक्ति एक साथ चलाते थे। वही दूसरी ओर विशाल हवन कुंड वना हैं इसके ऊपर मुख्य जजमान के बैठने का चबूतरा हैं जिसपर बैठ कर हवन की आहुतियाँ कुंड मे दी जाती थी। आँगन के चारों तरफ बने कमरों, दालानों के ऊपर चारों कोनों मे बने महल नुमा आकृतियाँ राजाओं और राजकुमारों की रही होंगी। इन चार निर्माणों मे एक महल के ऊपर दो मंज़िला निर्माण और था जो शायद राजा का निवास रहा होगा (चित्र 10)। किले मे पीने के पानी की व्यवस्था गुप्त तहख़ानो से बाबड़ी से लाने ले जाने की थी। बाबड़ी मे पानी नीचे तालाब और वर्षाती पानी से एकत्रित कर की जाती थी। गढ कुण्डार का  किला एक समृद्धशाली इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। एक सुंदर और शानदार किला जो दर्शनीय स्थल जो बुंदेलखंड के इतिहास मे अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता  हैं।
बापसी मे एक उम्रदराज महिला को उसके वजन से ज्यादा वजन की लकड़ी को सिर पर ढोकर ले कर जाना हृदय को द्रवित कर गया। जब मैंने उससे पूंछा सरकार की व्रद्धावस्था पेंशन मिलती हैं या ऐसा कोई  बैंक खाता भी हैं। तो उसने बताया की न तो उसको कोई पेंशन मिलती हैं या खाता हैं और बगैर मेहनत के कैसे उस का गुजारा होगा? उसका उत्तर हमारी व्यवस्था और जनधन खाते रूपी विकास पर एक तमाचा हैं! (चित्र 11)
विजय सहगल

शनिवार, 1 दिसंबर 2018

गणेश बिजली भंडार


"गणेश बिजली भंडार"

सरमन लाल एंड संस, जी हाँ यही नाम था उस फ़र्म का जिसकी दूसरी पीढ़ी की संतान उस समय दुकान की गद्दी पर बैठी थी जो दुकान शहर के बीचों बीच मुख्य बाज़ार मे स्थित थी। दुकान की गद्दी पर बैठा वह बालक अपने आपको किसी शहँशाह से कमतर नहीं समझ रहा था जिसकी दुकान मे बेचने लायक माल के नाम पर कुछ भी नहीं था पर दुकान के गल्ले मे कुछ आने-दो आने पड़े हुए थे। सड़क के पार चौराहे पर गज़क मूफली भुने चने-लाई की दुकान थी। गुल्लक मे से एक आने की गज़क लाकर गद्दी पर बैठ कर अपने भाई के साथ बड़े शान से स्वाद लेकर खा रहा था।  वह खाते हुए ऐसा महसूश कर रहा मानो दुनियाँ का सबसे बड़ा व्यापार घराने का वारिस सुबह का नाश्ता ऑफिस मे बैठ कर कर रहा हो। उस दुकान को लेकर उस बच्चे ने बड़े-बड़े सपने देख रखे थे। उस का मन था बड़े होकर इस दुकान मे डॉक्टर बन कर एक क्लीनिक खोलने का था, जिसकी शुरुआत उसने विज्ञान के विषयों के साथ अपनी पढ़ाई की दिशा तय कर की  थी।  दिन कुछ यों ही निकल रहे थे। भारतीय मध्यम वर्गीय परिवारों का दुर्भाग्य है कि कुछ अतिरिक्त आमदनी की लालच मे वे  अपनी कीमती संपत्ति को दाँव पर लगाने मे  नहीं चूकते। उस बालक के साथ भी बही हुआ था। दादा जी की उम्र काफी थी अतः व्यवसाय करना उन के बश मे न था। पिता जी सरकारी सेवा मे होने के कारण व्यापार मे समय नहीं दे सकते थे। बच्चे उम्र की उस दहलीज़ पर थे कि  व्यापार की समझ के लिये  उम्र और अनुभव  दोनों ही आड़े आ रहे थे। अतः  दूर दराज से उस लड़के के पिता से मित्रता निकाल कर एक व्यक्ति ने दुकान पर नया व्यवसाय शुरू करने के लिये एक नई पार्टनरशिप फर्म  का गठन किया गया। एक नई उम्मीद जागी थी उस दिन उस बालक के मन मे। आशा की एक किरण के रूप मे एक नये भविष्य का आरम्भ हो रहा था उस दिन। हालांकि उस लड़के के दिल मे एक वेदना थी कि  अपने दादा की फर्म सरमन लाल एंड संस की जगह जब एक नयी फर्म गणेश बिजली भंडार का बोर्ड दुकान पर लगाया गया।  इस तरह एक नये लेकिन एक अनिश्चित  अध्याय का आरंभ हुआ था उस दिन।  लेकिन शीघ्र ही जीवन की कड़ुवी सच्चाई से बालक को रूबरू होना पड़ा जिसकी नीव झूठ और फ़रेब के आधार पर रखी गई थी। जंगल मे जैसे चालाक लोमड़ी  वेबश छोटे जानवरों का शिकार करती है वैसे ही उस लाचार  लड़के के सपनों का शिकार कानूनी दाँव -पेच के रूप मे नज़र आने लगा। एक ना खत्म होने बाले मुक़दमे की शुरुआत हो गई थी।  दुकान पर कब्जे के रूप मे ताला भागीदारी फर्म का था लेकिन ताले की चाबी  तथाकथित गणेश बिजली भंडार के पास थी। चंद दिनों पहले जो बालक दुकान की गद्दी पर शान के साथ बैठ भविष्य के सपनों मे खोया रहता था।  आज बह वास्तविक ज़िंदगी मे दुकान के नीचे सड़क पर था, सपने बिखर गए थे, उम्मीदें टूट गई थी और आरम्भ था एक संघर्ष का जिसके साथ अब उसे बड़ा होना था।  दुकान दूसरे पक्ष द्वारा हड़प ली गई थी!!
अब उस के पास विषय तो विज्ञान के थे लेकिन ज्ञान कुछ और तलाश कर रहा था। प्री मेडिकल टेस्ट का अधूरा भरा आवेदन फॉर्म आज भी उसके महात्वपूर्ण कागजों के साथ फ़ाइल मे पड़ा है जो उन टूटे सपनों का साक्षात गवाह हैं। दुकान से जहाँ कुछ अतिरिक्त कमाई की उम्मीद थी बही मुक़दमेबाज़ी मे पिता की स्थिर कमाई का कुछ हिस्सा खर्च के रूप मे बढ़ने लगा। परिवार मे सभी सदस्यों को  इस आर्थिक संघर्ष से सामना करना पड़ा। परिवार का हर एक सदस्य अपने-अपने तरह से इस संघर्ष को लड़ रहा था। उस बच्चे का अब लक्क्ष डॉक्टर बनना नहीं था अपितु शीघ्र से शीघ्र रोज़गार की तलाश कर परिवार की आर्थिक ज़िम्मेदारी मे सहभागी होना था। इस हेतु प्रयास भी उसने टायपिंग और शॉर्ट हैंड  सीखने के रूप मे  शुरू कर दिये थे। दीपावली पर आतिशबाज़ी की दुकान लगाना, दादाजी द्वारा किये गये घी तेल का व्यवसाय को करने  मे एक साल का समय और आर्थिक नुकसान के रूप मे पैसा गवा कर उठाना पड़ा। इस कारण उस बालक का स्नातक पूर्व इंटर की परीक्षा मे असफलता का मुह देखना पड़ा।  परिवार के बड़े सदस्य द्वारा छोटी-मोटी  नौकरी के लिये 12-14 घंटे मेहनत कर परिवार को आर्थिक रूप से सुढ़्रद करना था। इस लंबे संघर्ष के लिये सीधे-सच्चे व्यक्ति के साथ  झूठ-फ़रेव, धोखा और बदनीयत से व्यवहार करने बाले लोगो द्वारा कानून का दुर्पयोग कर दुकान को हड़प  कर  जाना केवल एक व्यक्ति, उस पूरे परिवार को अपने स्वार्थ और लाभ के लिये संघर्ष और गरीबी मे धकेलने का कुत्सित कार्य  था बल्कि धोखा देकर मानवता की हत्या करना था जिसमे सांझेदारी फर्म का  दूसरा पक्ष कानूनी रूप मे  सफल अवश्य हो गया किन्तु उक्त बालक का मुकदमा आज भी परम परमेश्वर परमात्मा की अदालत मे लंबित है??

विजय सहगल



शनिवार, 24 नवंबर 2018

भोजनालय


"भोजनालय"

मेरा मानना हैं किसी भी व्यक्ति के साथ  जाति, धर्म, प्रांत, लिंग भेद  के आधार पर उत्पीड़न या अपमान करना मानवता के प्रति अपराध हैं। पीड़ा देने वाले की मानसिकता उसके परिवार समाज/धर्म  से मिली मानसिकता को दर्शाता है। पर पीढ़ित को मिले अपमान का दंश  और पीड़ा देने बाले व्यक्ति के व्यवहार और कार्य को भुक्तभोगी  सारी ज़िंदगी नहीं भूलता। जब अपमान, उत्पीड़न किसी जाति, धर्म, प्रांत या देश के व्यक्तियों द्वारा लगातार मानवता के विरुद्ध किया जाता हैं तो वही  उस देश या समाज/धर्म का चरित्र वन जाता हैं। सारी दुनियाँ मे लोग उस देश, समाज, धर्म को उसी कसौटी पर रख कर कसते हैं।
मैं अपने माता-पिता और परिवार के साथ उन दिनों (दिसम्बर 1996) एल॰एफ़॰सी॰ भ्रमण पर गुजरात गया हुआ था। 10-12 दिन की यात्रा का कार्यक्रम था। गुजरात मे बड़ौदा, जाम नगर, जूना गढ़, दुवारका, भेट दुवारका, सोमनाथ और  अहमदाबाद मे जाने का कार्यक्रम था। दिसम्बर माह मे यध्यपि सारे गुजरात मे छुट्टियाँ रहति हैं काफी भीड़ हर स्टेशन पर थी फिर भी यात्रा बहुत अच्छी चल रही थी। हमारा आखिरी पढ़ाव अहमदाबाद था। हम लोगो ने गांधी नगर, अक्षर धाम मंदिर के शानदार दर्शन किए। सोमनाथ दर्शन अद्भुत थे।  एक दिन हम लोगो का अहमदाबाद मे शॉपिंग करने मे व्यस्त रहे। हम लोग पूर्णतयः शाकाहारी हैं अंडा आदि भी परिवार मे नहीं खाते इस तरह की चर्चा हम लोग एक दुकान पर कर रहे थे। किसी शुद्ध शाकाहारी होटल की जानकारी उस दुकानदार से चाही। उसने अपनी जानकारी के अनुसार एक अच्छा साफ सुथरा एवं शुद्ध शाकाहारी स्वदेशी भोजनालय  की जानकारी हमे  दी जो वही पास मे था।  हम सभी लोग दोपहर मे उस भोजनालय का पता पूछते हुए पहुचे। कपड़ा बाज़ार मे ही उक्त भोजनालय  पहली मंजिल पर था। सही जगह का नाम तो नहीं मालूम पर कोई पुरानी बिल्डिंग थी। सीढ़ियाँ लकड़ी की बनी हुई थी।  हम लोग सीढ़ियाँ चढ़ कर उस भोजनालय  मे पहुंचे। भोजनालय  साफ सुथरा था लेकिन कुर्सी मेज आदि नहीं थी। यह जन कर हमे और भी अच्छा लगा कि पूर्णतयः भारतीय परिवेश मे भोजन करने की व्यवस्था हैं। होटल के कर्मचारियों ने लंबी विछी पट्टी पर हम सब को बैठाया। उन लोगो ने हम सभी के सामने पत्तल परोस दी। हम लोगो ने उन लोगो से अपने पूर्ण शाकाहारी भोजन ग्रहण करने की इक्क्षा से  उन कर्मचारियों को अवगत कराया  जो भारतीय परिवेश मे धोती पहने हुए थे। अचानक उनमे  दो लोगो ने आपस मे चर्चा की और मुझसे मेरी जाति पूंछी। मैं थोड़ा चौंका फिर भी मैंने बताया मैं सहगल हूँ खत्री जाति से हूँ, यू॰पी॰  का रहने बाला हूँ। मेरे को घोर आश्चर्य हुआ जब उसने हम सभी को भोजन कराने से माना कर दिया। जब मैंने ऐसा करने की बजह पूंछी तो उसने मुझे कहा कि आपलोगो को भोजन नहीं कराया जा सकता? मैंने कहा हम लोग पूर्णतयः शाकाहारी  भोजन करते हैं। आपके भोजनालय का पता एक दुकानदार ने दिया था और आपके भोजनालय की काफी प्रशंसा भी की थी आपका जो भी भोजन का शुल्क है हम भुगतान करेंगे, हम मुफ्त मे भोजन ग्रहण नहीं कर रहे? लेकिन उन कर्मचारियों ने साफ-साफ भोजन कराने से मना कर सामने विछी हुई पत्तलों को उठा लिया। तब मैंने कुछ ज़ोर देकर कहा कि आपको पत्तल आदि देने के पूर्व पूंछताक्ष करनी चाहिए थी? आपका यह व्यवहार निंदनीय हैं।  परदेश का मामला था माता-पिता और पत्नी के अलावा दोनों छोटे बच्चे साथ थे, बहस करना उचित नहीं लगा।  बुरा तो बहुत लगा कि स्वंत्रता के 49 साल बाद भी इस तरह जाति, धर्म  का भेद भाव आज भी हिदुस्तान मे जारी हैं। हम लोगो ने बापस आकार एक अन्य भोजनालय मे भोजन किया किन्तु पूरी गुजरात के शानदार यात्रा के अंत मे इस घटना के अपमान और भेद-भाव  से मिले घाव को मैं आज  तक नहीं भूला हूँ।

विजय सहगल




सोमवार, 19 नवंबर 2018

मेकाहारा



"मेकाहारा"

बो स्याह, भयाबह  काली रात मुझे आज भी याद हैं। उन दिनो मैं रायपुर मे था। बर्ष और माह ठीक से याद नहीं शायद 1998-99 रहा होगा। हमारे मित्र देवांगन का रात मे लगभग 9 बजे फोन आया कि उनकी शाखा के गार्ड श्री दास को ब्रेन हैमरेज़ हुआ है मैकाहारा (मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल, रायपुर) मे एड्मिट हैं। रायपुर मे उन दिनो तीन शाखाएं थी, मुख्य शाखा-जी॰ ई॰ रोड, मेडिकल कॉलेज काउंटर, क्लेकटोरेट काउंटर,  रायपुर स्टाफ की  एक बड़ी खूबी थी (अब भी हैं) बह थी आपसी भाई चारा, एक दूसरे के दुख:-दर्द मे सभी का साथ मे खड़ा होना। न केवल रायपुर पूरे मध्य प्रदेश (उस समय रायपुर मध्य प्रदेश मे था, आज का छत्तीसगढ़ भी उसी परंपरा का निर्वहन कर रहा हैं)  मे ऐसा आपसी सद्भाव सेंट्रल जोन कमेटी, अधिकारी-कर्मचारी यूनियन के कारण संभव हुआ था जो शायद ही कही  देखने को मिलता हो। देवांगन जी ने बताया रात मे लगभग 7 बजे शाखा को बंद करते समय श्री दास बेहोश हो कर बहीं गिर गये थे। उन्हे ब्लड प्रैशर की शिकायत थी। उसी हालत मे उन्होने खुद  बी॰पी॰ की दबाई लेने की कोशिश  भी की जो बह अपने पास रखते थे परन्तू कोई लाभ न होने के कारण उनको हॉस्पिटल मे एड्मिट कराया गया जो शाखा के बहुत नजदीक था। चूंकि वहाँ पर अपनी शाखा थी हॉस्पिटल का सारा स्टाफ मेडिकल कॉलेज शाखा के स्टाफ को अच्छी तरह जानता था तुरंत ही एड्मिशन  की औपचारिकता पश्चात  उपचार   उपलब्ध हो कर इलाज शुरू हो गया। धीरे-धीरे मेरे सहित मुख्य शाखा से मजूमदार जी, मेडिकल काउंटर से निनावे, निखाड़े, हिरेंज जी और अन्य अनेक स्टाफ हॉस्पिटल पहुँच गये। ब्रेन हैमरेज के कारण मुह-नाक से काफी रक्त बह गया था। रक्त की आवश्यकता थी। मेरे सहित  2-3 और स्टाफ ने तुरंत ही रक्त उपलब्ध करा दिया। हम सभी लगातार दास जी के पास ही खड़े थे और उनके शीघ्र स्वस्थ की कामना कर रहे थे। परंतु दुर्भाग्यवश इतनी सब देखभाल के बाबजूद भी दास जी को नहीं बचाया जा सका और उनका देहावसान रात लगभग 1 बजे  हो गया। हम सभी स्टाफ काफी गमगीन हो गये। पर होनी को कौन टाल सकता था? सभी बुझे और दुखी  मन से उनके परिवार से बात कर उनके पार्थिव शरीर के अन्त्येष्टि के बारे मे चर्चा कर कार्यक्रम बनाने लगे। दास जी का ग्रहनगर रायपुर से 40-50 कि॰मी॰ दूर राजिम मे था। सभी स्टाफ सदस्यों ने  जिनकी संख्या 15-20 से उपर रही होगी काफी  दुखी मन से  आपस मे चर्चा के बाद यह  तय किया कि सुबह लगभग छः बजे हॉस्पिटल से ही सीधे श्री दास जी के  पार्थिव देह को एम्ब्युलेन्स से उनके ग्रहनगर राजिम  ले जाया जायेगा जहां उनका अंतिम संस्कार किया जायेगा। इस बार्तालाप, सलाह मशविरा मे हम लोगो को 1 घंटा और लगा होगा। लगभग रात के 2-2.5 का वक्त होगा। उन दिनो मोबाइल का चलन शुरू नहीं हुआ था, पेजर का चलन था।  हम लोगो ने तय किया कि सभी अपने-अपने घरों मे जाकर आगे के कार्यक्रम की सूचना परिवार को दें एवं आवश्यक कार्यों को  तुरंत निपटा कर  बापस हॉस्पिटल मे ही एकत्रित हो  जायें ताकि सभी एक साथ मिलकर राजिम स्थित ग्रहनगर मे  श्री दास जी की अन्त्येष्टि मे शामिल हो सके। हम सभी स्टाफ बात करते हुए मेडिकल कॉलेज काउंटर की तरफ बढ़ लिये जहां हम लोग प्रायः अपने वाहन आदि खड़े करते थे। क्योंकि मेडिकल कॉलेज परिसर मे स्टैंड के अलावा अन्यत्र पार्किंग निषेध थी इसलिये हम सभी स्टाफ जब कभी भी मेडिकल कॉलेज काउंटर जाते थे तो काउंटर के सामने ही अपने स्कूटर, कार आदि पार्क करते थे जो अंदर पीछे की तरफ था। वहाँ पर ही मेडिकल कॉलेज के अन्य स्टाफ भी अपने वाहन खड़े करते थे। जब मैं अपनी कार मे बैठा और कार को स्टार्ट किया तो मैंने महसूस किया की कार का स्टाइरिंग मोड़ने  मे काफी दिक्कत हो रही हैं। जब मै कार के इंजिन को  बंद कर नीचे उतरा तो देखा ड्राईवर सीट बाले अगले पहिये मे बिलकुल हवा नहीं हैं मैं समझ गया गाड़ी पंचर हैं। यह देख कर हमारे कुछ साथी मेरी सहायता के लिये रुक गये। कार की डिक्की से स्टेपनी निकाल कर मैंने  पहिये बदलने की प्रिक्रिया शुरू ही की थी कि देवांगन जी बोले सर इस का तो अगला दूसरा पहिये मे भी बिलकुल हवा नहीं हैं शायद दूसरा पहिया भी पंचर हैं? अब मेरा माथा ठनका ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि दोनों पहिये एक साथ पंचर हों? मुझे कुछ साजिश की शंका होने लगी। हम लोग सारी रात से हॉस्पिटल मे परेशान थे अब ये नई समस्या का सामना या यों कहे समाधान का रास्ता खोजने के लिए कार की डिक्की से पहिया बदलने हेतु टूल्स निकालने लगे।  अचानक एक मेडिकल स्टूडेंट जिसने बेहद शराब पी रखी थी अपने कुछ साथियों के साथ आया और यहाँ गाड़ी खड़ी करने पर एतराज करने लगा। हम लोगो ने जब बैंक स्टाफ होने का परिचय दिया इसके बाबजूद भी लगातार बह ऊल-जलूल कुछ भी बोले चला जा रहा था। हम लोगो ने अपने साथ हुए हादसे का भी उल्लेख किया पर बेकार। तब मुझे सहसा याद आया यह  मेडिकल छात्र अपने कुछ साथियों के साथ सारी रात हॉस्पिटल के वार्डो मे शराब पीकर हल्ला-गुल्ला मचा रहा था। कुछ चौकीदार, गार्ड के साथ इसने मारपीट भी की थी। जिसकी आवाज़े लगातार हम लोगो ने सुनी थी। शराब पीकर बोतल-गिलास, खिड़कियों के शीशे  तोड़ने की आवाजे भी  हमने सुनी थी और इस गुंडागर्दी पर आपस मे चर्चा भी की थी, पर हमे कभी ऐसा नहीं लगा की इतने पढे लिखे वर्ग का छात्र कार के पहियों की हवा निकालने की इतनी नीच ध्रष्टता करेगा? हम लोग अपने स्टाफ के इलाज हेतु वैसे ही परेशान थे और उसके देहांत के बाद तो और भी दुखी थे इसलिये इस उद्दंड छात्र के पूरे हॉस्पिटल मे किये जा रहे उद्दंडता की तरफ हमारा ध्यान होते हुए भी नजरंदाज किया था। किन्तु अब उसके इस व्यवहार से  हमारा शक पक्का था कि हमारी कार के अगले दोनों पहियों की हवा इसी दुष्ट छात्र ने ही जान कर निकाली हैं। हम जैसे तैसे एक पहिये को खोल कार का पहिया बदल रहे थे, हाथ मे पहिये खोलने का "पाना" (औज़ार) था, क्रोध तो बहुत आया पर एक और नई समस्या को आमंत्रित करन उचित नहीं समझा। एक पहिया बदलने के बाद हमने दूसरे पहिये मे हवा न होने के बाबजूद कार को धीरे धीरे चला कार वहाँ से हटा कार दूसरी जगह जहां कुछ चहल पहल थी कार को ले जाना उचित समझा। अब समस्या थी दूसरे पहिये को बदलने की। बगैर एक और पहिये मे हवा भरे दूसरे पहिये को बदल पाना संभव नहीं था। रात के 3 बजे हवा भरने बाले भी उपलब्ध नहीं थे। रात मे शास्त्री चौक, घड़ी चौक, जी॰ई॰ रोड, मेडिकल कॉलेज के आस-पास घोर सन्नाटा पसरा था।   एक पहिये की अदला-बदली मे ही काफी थकान हो गई थी। अपने साथी के स्कूटर पर सवार होकर हम स्टेपनी लिये हुए काफी भटके पर रात मे पंचर बाला कोई नहीं मिला जिससे पहिये मे हवा डलवाई जा सके । फिर किसी ने बताया स्टेशन के पास एक पंचर बाला बैठता हैं जो 24 घंटे पंचर/हवा भरने  का काम करता हैं। हम लोग भागे भागे स्टेशन पहुंचे, सौभाग्य से उसकी दुकान खुली थी तब हमने दूसरे पहिये मे भी हवा भरवा कर टूल्स  की मदद से उस अगले  दूसरे पहिये को भी  बदला। सारी रात से  श्री दास जी के इलाज़ और देहांत के पश्चात उनके शव को लेकर  हम सभी मानसिक रूप से परेशान होकर थक चुके थे इस कार की घटना ने हम लोगो को शारीरिक रूप से भी काफी थका कर परेशानी को और दुगना कर दिया था। मैं हैरान था कि कैसे एक मेडिकल स्टूडेंट  जो कि समाज मे एक अलग आदर सम्मान रखते हैं इतनी नीचता और धूर्तता कर सकता है जिसके कारण हमलोगो को  को इतनी परेशानी का सामना करना पड़ा। हम लोग उस दिन किसी तरह राजिम पहुँच कर श्री दास जी अंतिम यात्रा मे शामिल हुए अंतेयष्ठि पश्चात उनके शोकाकुल परिवार को इस अपूर्णिय क्षति मे धैर्य धारण करने की शक्ति हेतु ईश्वर से प्रार्थना की।
दोपहर बाद जब हम लोग बापस रायपुर पहुंचे तो मुख्य ब्रांच के प्रबन्धक वी॰के॰ शर्मा एवं अन्य स्टाफ से विचार विमर्श कर उस छात्र के विरुद्ध उक्त घटना की मैंने मोदहा पारा, पुलिस स्टेशन रायपुर मे एफ़॰आई॰आर॰ दर्ज कराई। एक शिकायती पत्र मेडिकल कॉलेज के डीन को भी दिया। उक्त शिकायती पत्र पर डीन श्री मुखर्जी ने कार्यवाही करते हुए उस छात्र के कृत की तीव्र निंदा की  और उस छात्र के निलंबन पर अपने स्टाफ के साथ विचार विमर्श किया। मेडिकल कॉलेज के सभी प्रोफेसर एवं स्टाफ इस घटना से एक मत होकर नाराज़ थे।  सभी की राय थी उसका कार्य वास्तव मे निंदनीय है पर निलंबन से उस छात्र का जो कि फ़ाइनल ईयर का छात्र था,  भविष्य बर्वाद हो जायेगा।  इस को द्रष्टिगत रखते हुए उससे अपने अपराध के लिये माफी मांगने को कहा। उस छात्र ने हम सभी से अपने कृत के लिये माफी मांगी। बही दूसरी ओर पुलिस ने भी अपनी जांच शुरू कर दी थी अतः उक्त मेडिकल स्टूडेंट ने व्यक्तिगत तौर मे हमारे कोलेक्ट्रे काउंटर पर आकार पुनः हम से माफी मांगी अतः हमने अपने साथियों से विचार विमर्श कर चेतावनी देते हुए माफ कर अपनी पुलिस शिकायत बापस ले ली।
यध्यपि इस घटना को घटे लाभग 20-22 साल हो गये परन्तू उस मेडिकल डॉक्टर के इतने गैर जिम्मेदारान और उग्र व्यवहार पर हम आज भी चिन्तित है कि क्यों कर उसने हमारे साथ हद दर्जे की नीच और बचकानी हरकत की?  उम्मीद हैं वह आज जहाँ भी हो उक्त व्यवहार को छोड़ कर एक शालीन मेडिकल डॉक्टर के रूप मे प्रैक्टिस कर जनता की सेवा कर रहा होगा।

विजय सहगल                     

रविवार, 18 नवंबर 2018

शांतिकुंज हरिद्वार


शांतिकुंज -हरिद्वार






मुझे शांतिकुंज हरिद्वार मे संजीवनी शिविर मे 9 दिवसीय सत्र मे भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। मै अपनी पत्नी श्रीमती रीता के साथ दिनांक 31 जुलाई 2018 को सत्र मे भाग लेने हेतु हरिद्वार पहुँच गया। शांतिकुंज का वातावरण प्राचीन गुरुकुल या आश्रम की तरह है। दिनचर्या भी अलग हटकर रहती है। इस संजीवनी सत्र मे शामिल होना हमारे लिये एक चैलेंज था क्योंकि जिस दिनचर्या के हम या हम जैसे लोग अभ्यस्त है और जो तथाकथित शिक्षा एवं पद का आवरण हमने ओढा है उसको उतारे विना सत्र मे सफलता संधिग्ध थी? सत्र मे शामिल अभ्यर्थियों से अपेकक्षा रहती है की सत्र के शिविरार्थीयों के लिये  निश्चित भारतीय परिधान मे ही प्रतिदिन के सत्र मे शामिल हों अर्थात पीली धोती कुर्ता एवं मंत्र चादर। यों तो गायत्री परिवार की पत्रिका अखंड ज्योति के माध्यम से हमारे बड़े भाई श्री शरद सहगल  1970-71 से जुड़ें थे। वे अखंड ज्योति  के संपर्क मे कैसे और किसके माध्यम से आये मालूम नहीं पर झाँसी मे मेरे घर पर पत्रिका नियमित समय पर आती थी। पत्रिका यध्यापि मै पूरी तो नहीं पढ़ता था फिर भी प्रथम पृष्ट एवं बॉक्स मे प्रकाशित कई छोटी छोटी कहानियाँ एवं दृष्टांत एवं अंतिम पृष्ठ पर सामाजिक सदसन्देश देती कविता जरूर  एक बार मे ही पढ़ लेता था। पत्रिका का प्रभाव उसमे प्रकाशित लेख एवं विचार तो होते ही थे  जो मुख्य बात उसमे हमने नोट की थी कि पत्रिका की विषय वस्तु, लेख आदि उत्तम होते ही थे किन्तु पत्रिका मे कोई भी विज्ञापन नहीं था, जो आज भी अनवरत रूप से पत्रिका मे नहीं छपता। पत्रिका का प्रकाशन 1926 से परम पूजनीय गुरदेव श्री राम शर्मा आचार्य द्वारा लगातार किया गया। उनके विचारों और लेखों से प्रेरित पत्रिका आज भी नियमित प्रकाशित होकर देश और विदेश मे युगनिर्माण योजना के तहत विचार क्रांति अभियान चला रही है। एक और बात जो इस मिशन से जुड़े लोगो ने उस समय हमे  प्रभावित की बह थी पत्रिका वितरित करने बाले सज्जन से हमारी भेट, जो महीनो नहीं हुई, बो परिजन पत्रिका हमारे घर झाँसी  के दालान मे नियमित छोड़ जाते यहाँ तक कि  वार्षिक शुल्क देय होने के बाबजूद पैसे कई महीने बाद लेने आये तब उनसे भेट हुई मैंने आग्रह पूर्वक उन्हे घर मे आमंत्रित किया और उनका परिचय प्राप्त किया उनका नाम तो नहीं मालूम पर सरनेम श्री विश्वकर्मा लिखा करते थे।  ऐसे सेवा भावी कार्यकर्ता से मुलाक़ात पर मै उनके प्रति काफी आदर और सम्मान का भाव आज भी रखता हूँ।  31 जुलाई को हम दोनों हरिद्वार स्थित शांतिकुंज आश्रम पहुँच गये। संजीवनी सत्र के मुख्य व्यवस्थापक श्री नमो नारायण पांडे जी से संपर्क हुआ उन्होने सत्र मे शामिल होने आये अभ्यर्थियों को कमरे का आवंटन किया। एक कमरे मे छ: लोगो की व्यवस्था की गयी थी। स्त्री एवं पुरुषों के लिये अलग अलग व्यवस्था थी। प्रत्येक   कमरे मे आवशयक सुविधा जैसे पंखे, लाइट, लेट्रिन बाथरूम की व्यवस्था थी, प्रत्येक अभ्यार्थी के लिये पलंग अलग गद्दों सहित था। चूंकि हम सभी शिविरार्थी युग निर्माण योजना सतसंकल्प हेतु आये थे इसलिए हमे कम से कम सुविधाओं मे अपनी दिनचर्या पूर्ण करनी थी जैसा की गुरुदेव का सदवाक्य है कि "सुखी रहने के दो तरीके है-अपनी आवश्यकताओं को कम करें एवं परिस्थितियों से समझौता करे"। वास्तव मे सभी अभ्यार्थी एक व्रहद  लक्ष्य "युग निर्माण मिशन" का ककहरा सीखने आये थे जिसकी पहली सीढ़ी है कि "युग निर्माण कैसे होगा"? "व्यक्ति के निर्माण से"। शिविर मे शामिल अधिकतर परिजनो का आध्यात्मिक विध्या का  ज्ञान हमसे कही बहुत ज्यादा था। वे मंत्र, यज्ञ हवन क्रिया आदि मे  बहुत निपुण थे।   सत्र की शुरुआत 31 को संकल्प सिद्धि के साथ हुई। लगभग 1000-1100 सौ  शिविरार्थी जो देश के अलग अलग प्रांतो से आये हुए थे संकल्प लेने हेतु सभागार मे उपस्थित थे। सभी शामिल परिजनो को दिनचर्या एवं खान पान एवं रहन सहन के नियम श्री नमो नारायण पांडे जी द्वारा बताया गया। दिनचर्या कठिन थी लगा मै शायद उसको पूरा कर भी पाऊँगा या नहीं? दिन की शुरुआत प्रातः 3.30 बजे बिस्तर से उठने से करनी थी तत्पश्चात 30-40 मिनिट मे दैनिक रूटीन, स्नान आदि के बाद तैयार होना था, साथ मे कमरे मे रह रहे अन्य साथियों के लिये भी स्थान छोड़ना था ताकि इन्ही 30-40 मिनिट मे अन्य परिजन भी तैयार हो सके। पहले दिन की शुरुआत थोड़ी कठिन रही किन्तु रूम मे रह रहे सहभागी श्री हरी राम प्रजापति, श्री शिव मोहन यादव एवं श्री रामतीर्थ जो तीनों गाजीपुर से सत्र मे शामिल होने आये थे और जिनकी पृष्ठभूमि ग्रामीण कृषक परिवारों से थी के कारण आसान हो गयी थी। ये परिजन ठीक समय पर अपनी दिनचर्या शुरू कर देते थे और हमारे कमरे मे सबसे पहले तैयार हो जाते थे। चूंकि छ: लोगो को एक ही समय पर तैयार होना होता था अतः नहाने, लैट्रीन, एवं दातौन-मंजन हेतु अलग अलग स्थान/कक्ष बनये गये थे। गर्मी के वावजूद भी हरिद्वार मे सुबह का मौसम ठंडे पानी से नहाना मुझे एक हिम्मत का काम लगा। हमारे कक्ष मे अन्य दो साथियों मे एक श्री लम्बोदर मिश्रा जो बहराइच से थे और 1990 से मिशन के लिये समयदान कर रहे थे एवं अन्य श्री सतीश शर्मा जो गाज़ियाबाद से थे। 4.30 बजे से सत्र का प्रथम चरण गुरुदेव श्री राम शर्मा आचार्य  एवं माताजी श्रीमती भगवती देवी के निर्देशन मे ध्यान योग से होता तत्पश्चात उनके द्वारा किसी विषय पर छोटा सा सम्बोधन होता। एक-दो मिनिट के आराम के बाद 1 घंटे 30 मिनिट के लिये गायत्री मंत्र का जप करना अनिवार्य होता था। गायत्री मंत्र जाप दोपहर एवं शाम को भी 45-45 मिनिट करना होता था।  ये जप साधना समूहिक रूप मे उसी प्रवचन हाल मे करनी होती जहां नित्य के सारे कार्यक्रम होते। एक समाचार कुछ दिन पूर्व हमने पढ़ा था कि चेन्नई के किसी मंदिर मे पहली बार एक हरिजन को मंदिर का पुजारी नियुक्त किया गया। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि गायत्री परिवार मे ऐसे सैकड़ो कार्यकर्ता है जो सामाजिक रूप से कमजोर और पिछड़े वर्ग से आते है और जो पिछले अनेकों वर्षो से  जो विधिपूर्वक पूजा, हवन, संस्कार आदि सम्पन्न कराते है। हमे याद है 1996 मे जब मुझे कलेक्टरेट रायपुर (छत्तीसगढ़) शाखा को नवीन परिसर मे स्थान्तरित करने का मौका मिला तो शाखा का विधिवत हवन पूजन कलेक्टरेट रायपुर स्थित ग्रामीण विकास विभाग मे चतुर्थ श्रेणी मे कार्यरत श्री हीरा लाल प्रजापति एवं श्री कांशी राम कुशवाह से कराया था। वे हवन-पूजन कराने मे पारंगत थे और आध्यात्मिक विषयों मे ज्ञान हमसे कहीं ज्यादा था और जो  बहुत योग्य और हम से आध्यात्मिक विध्या मे आगे थे।  6.30 बजे से सभी शिविरार्थी यज्ञ मे शामिल होते है यज्ञ शांतिकुंज मे रहने बाली बहिनों द्वारा नित्य सम्पन्न कराया जाता है। यज्ञ मे शांतिकुंज मे स्थित कार्यकर्ता एवं आये हुए अन्य इक्छुक अतिथि भी शामिल होने के पात्र होते बशर्ते सभी स्त्री -पुरुष भारतीय परवेश (पुरुष -धोती कुर्ता, स्त्री-साड़ी ) मे हों। यज्ञ का कार्य विधिवत रूप से बनी 3 यज्ञ शालाओं मे स्थापित 27 हवन कुंडो मे सम्पन्न कराया जाता जो पुराने आश्रम व्यवस्था की याद दिलाती थी जो बचपन मे हम रामलीलाओं मे देखते या रामचरित मानस/कल्याण  मे लगी तस्वीरों या पुराने धार्मिक कैलेंडरों मे देखा करते। हमे बताया गया कि यज्ञशालाओं मे मे से एक हवन कुंड मे बहुत प्राचीन अग्नि अखंड रूप से लगातार जलती रहती है जिसे स्वयं गुरुदेव हिमालय मे तप साधना करने के पश्चात साथ मे लाये थे और उस हवन कुंड मे स्थापित किया था। उस हवन कुंड मे अग्नि आज भी लगातार प्रज्वलित रहती है। यज्ञ मे शामिल होने के पश्चात गुरदेव श्री राम शर्मा, आचार्य द्वारा 1926 मे प्रज्वलित अखंड दीपक का दर्शन और गुरदेव की समाधी को प्रणाम करना नित्य का क्रम था।   लगभग 1.30 घंटे का अवकाश हल्का फुल्का चाय नाश्ता आदि करने के लिये मिलता था। दिन के दूसरे सत्र की शुरुआत 8.30 बजे से 10 बजे तक होती जिसमे किसी एक विद्वान द्वारा सामाजिक या धार्मिक रीति रिवाज पर अपने विचार रखे जाते। सभी शिविरार्थीयों से अपेक्षा की जाति की समाज की कुरितययों को दूर करने, जातिविहीन समाज की रचना हेतु और गुरदेव द्वारा लिखित 3200 से भी अधिक लिखित पुस्तकों को विचार क्रांति अभियान के तहत घर घर जाकर प्रचार प्रसार हेतु कार्य करे।  तीसरा सत्र का समय 1.30 से 4.00 बजे तक रहता इसमे भी विचारगोष्टी या प्रवचन के पूर्व 10-15 मिनिट की संगीतमय भजन प्रस्तुति  के साथ होती जो सामाजिक समरसता और सामाजिक बुराई के उन्मूलन का संदेश देते। चौथा सत्र शाम के छ: बजे नाद योग से शुरू होता था जिसमे 15 मिनिट सुमधुर बासुरी और तबले की युगल संगीत मय प्रस्तुति होती ऐसा प्रतीत होता जैसे कि सूर्य अस्त हो रहा है, गोधूलि बेला मे सभी पशु पक्षी अपने घोंषलो मे बापस हो रहे है। किसान अपने हल बैलों के साथ गले मे बंधे घुंघरुओं कि मधुर ध्वनि करते हुए  अपने घरों को बापस आरहे हों और गायों के झुंड कोलाहल करते हुए  शाम को दिन भर के  भ्रमण पश्चात अपने अपने स्थान पर बापस आ रहे हों। इस सत्र मे भी संगीत मय प्रस्तुति के बाद सामाजिक विषयों पर प्रवचन होता और रात्री 8.00 बजे पूरे दिन के कार्यक्रम की समाप्ति होती। भोजन के पश्चात 9.30 बजे सभी अपने कमरे मे विस्तर पर सोने के लिये पहुँच जाते ताकि अगले दिन प्रातः 3.30 बजे से पुनः तैयार हो सके। इस  दिनचर्या का कार्यक्रम पूरे 9 दिन इसी तरह चला। 9 दिन के शिविर मे एक दिन कुछ समय शांतिकुंज एवं देवसांस्कृति विश्व विध्यालय के प्रमुख डा. श्री प्रणव पाण्ड्या एवं दीदी श्रीमती शैलवाला से भी मिलने का कार्यक्रम शिवरार्थिओ से कराया गया।   पूरे नौ दिन के प्रवास मे स्व-परीक्षण कर मै कह नहीं सकता कि मै कहाँ तक सफल रहा? पर मै एक दावा तो कर सकता हूँ कि सत्र के भौतिक अनुशासन का हमने सत -प्रतिशत पालन किया, शिक्षा और पद के छद्म आवरण को एक हद तक उतारने मे सफल रहा। आते वक्त हम एक दूसरे परिजनो से  अपरचित थे पर जाते वक्त हमारे काफी परिजन  आपस मे परचित हो गये जो देश के विभिन्न शहरों से आये थे। श्री अनिरुद्ध मिश्रा जी (अहमदाबाद) , श्री अर्जुन व्यास (मुंबई), श्री सोनी जी (हिमाचल),  श्री सुरेन्द्र गुप्ता (लखीमपुर खीरी), श्री प्रेम नारायण पटेल (सागर), उनमे से कुछ है। मै अपने आपको शिविर मे शामिल हुए परिजनो मे इसलिये हीन समझता रहा क्योंकि मैंने अपने, अपने परिवार के निर्माण के अलावा कोई भी ऐसा कार्य नहीं किया जो समाज या युग निर्माण के निमित्त हो? 
अब मै पूरे शांतिकुंज की दिनचर्या पर भी प्रकाश डालना चाहूँगा। शांतिकुंज आने वाले प्रत्येक परिजन को संस्कार और यज्ञ आदि मे शामिल होने के लिये यथा संभव रहने के लिये स्थान उपलब्ध कराया जाता है। स्थान या कमरों मे रुकने बाले आगंतुकों से अपेक्षा कि जाती है कि कमरे बाथरूम आदि की स्वच्छता वे अपने घर की तरह करे।   पूरा शांतिकुंज इतना साफ सुथरा रहता है की देखते ही बनता है आपको आश्चर्य होगा कि पूरे आश्रम की साफ सफाई गायत्री परिवार के ही परिजन स्वयं करते है । भोजन बनाने के लिये आये हुये या रह रहे परिजन ही चावल, दाल, सब्जी आदि की सफाई, इनका बनाना-पकाना, रोटी वेलना सेकना आदि कार्य खुद ही करते है। भोजन ग्रहण करने के लिये थाली और गिलास लेकर प्रत्येक व्यक्ति पंक्तिवध्द  होकर लाइन मे वैठता है भोजन परोसने की ज़िम्मेदारी भी भोजन कर रहे या भोजन ग्रहण कर चुके परिजन सम्हाल्ते है। भोजन करने के बाद थाली और गिलास स्वयं ही साफ कर सभी परिजन उसे निश्चित स्थान पर रखते है। सफाई की व्यवस्था भी कुछ परिजन सम्हाल्ते है। पूरे शांतिकुंज मे साहित्य विक्रय केंद्र, कार्यालय की देखभाल के लिये देश के कोने-कोने से आये समयदानी परिजन अपनी निशुल्क सेवायें देते है। सारे संस्कार जैसे-जन्मदिन, उपनयन, जनेऊ, विवाह, तर्पण, गर्भजन्मोत्सव  आदि कार्यक्रम भी गरीब-अमीर के भेदभाव के बिना सम्मान सहित सम्पन्न कराये जाते है। नित्य पूरे आश्रम मे आये हजारों परिजनो के बीच चाहे यज्ञ के समय या भोजन बनाने, ग्रहण करने या परोसने या संस्कार कराते समय ये पहचान पाना असंभव जी हाँ असंभव है कि कौन किस जाति, गोत्र, वर्ण या प्रांत का है। सभी परिजन एक साथ सभी कार्य साथ साथ करते है। 11 अगस्त को जबकि पूरा हरिद्वार मे कावड़ मेले मे आये लाखों लोगो द्वारा कचरे के पहाड़ जगह जगह छोड़ दिये गये हों किन्तु  उसकी सफाई हेतु सैकड़ो गायत्री परिवार के परिजनो ने लगभग दो कि. मी. लंबाई मे हरिद्वार स्थित घाटो मे श्रमदान कर सफाई  की और शासन का सहयोग किया।  और अंत मे एक मुख्य बात  जिसको जानने की जिज्ञासा आपको भी होगी कि नौ दिन, एक माह, तीन माह या अन्य छोटे सत्रों मे आये परिजन या ऐसे व्यक्ति या परिवार जो गायत्री परिवार से नहीं भी जुड़े है संस्कार आदि कराने शांतिकुंज आते है उन से क्या शुल्क लिया जाता है!! आपको जानकर हैरानी होगी कि ठहरने, बिजली, पानी, भोजन, संस्कार आदि कराने का कोई भी  शुल्क/दक्षिणा आदि किसी भी परिजन से नहीं लिया जाता है और न ही उसके लिये किसी को बाध्य किया जाता है। जो परिजन यदि कोई दान देना चाहे तो उस दान की वाकायदा रसीद जारी की जाति है।  मेरा आग्रह है आप जब भी कभी हरिद्वार जायें तो एक बार अवश्य कुछ समय के लिये शांतिकुंज मे अवश्य जायें और हो सके तो व्यक्ति, परिवार, ग्राम, जिला, प्रदेश, देश ही नहीं  युग निर्माण सतसंकल्प हेतु यज्ञ मे शामिल हों।

विजय सहगल