"अम्माँ" - कहां तुम चली गईं?
पौर मे देखा आँगन निहारे।
रसोई भी खोजी, थी तेरे सहारे॥
मंदिर में आसन औं खाली, पिढ़ी थी।
इतनी भी जावे की क्या जल्दी पड़ी थी॥
ठाकुर, कलेवा करा के तो जातीं ।
मुहँ अपना थोड़ा जूठारे तो आतीं॥
बिना सहारे के चलना था भारी ।
लंबी डगर कैसे तूने गुजारी ॥
अब न सफ़र करो।
कुछ तो खबर करो॥ ,
जहाँ तुम चली गईं?
कहां तुम चली गईं ?
स्कूल से जब घर आता था।
तुम को जब न पाता था॥
सीधा नानी घर जाते थे।
पक्का तुम मिल जाते थे॥
पर आज वहां मैं टेर रहा ।
हर कोई आंखें फ़ेर रहा॥
हमसे नजर चुराता है।
मुझ को ये बतलाता है॥
आज तुम यहीं नहीं ।
कहां फिर चली गईं ॥
कुछ तो खबर करो ।
अब न डगर चढ़ो॥
जहाँ तुम चली गईं?
कहां तुम चली गईं?
घबड़ाता है दिल बेचैनी है।
ये कैसी अजब अनहोनी है॥
रात में जब उठ जाते हैं।
विस्तर पे न तुझ को पाते हैं॥
पथरीली राहों में कांटे भी होंगे।
नंगे पैरों को रुलाते भी होंगे॥
चप्पल बिना कैसे चलती तूँ होगी।
तेरी कमी मुझको सलती तो होगी॥
जाना कहां था, बता के तो जाती।
जाने के पहले, जता के तो जाती ॥
अब न सबर करो ।
जल्दी खबर करो ॥
जहाँ तुम चली गई ।
कहाँ तुम चली गई ॥
दुःखों ने फिर से घेरा है।
चारों तरफ अंधेरा है ॥
पहले भी तुमने साधा है।
दूर रहीं सब बाधा है ॥
हर पीड़ा को बेध दिया ।
चक्रव्यूह को भेद दिया ॥
फिर से आज उबारो मां ।
आये संकट को टारो मां ॥
राहें न सूझ रहीं ।
भूलें क्या बूझ रहीं ॥
सच्ची ख़बर करो ।
अब तो ख़बर करो ॥
तहां तुम चली गईं।
कहां तुम चली गईं ॥
-विजय सहगल





2 टिप्पणियां:
*जगतगुरु शंकराचार्य जी कहा करते थे "कि पुत्र कुपुत्र हो सकता है लेकिन माता कभी कुमाता नहीं होती"।कलियुग में विशेषकर मुद्रा युग में हर रिश्ते की मर्यादा छिन्न-भिन्न हो गई है।ऐसा प्रतीत होता है कि माता-पिता के प्रति सम्मानजनक भाव रखने वाली पीढ़ी घटती जा रही है।इसके विभिन्न कारण हो सकते हैं मसलन संपत्ति का विवाद,परस्पर द्वेष,जलन,जीवन स्तर में असमानता, बूढ़े माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी निभाने में असमर्थता प्रकट करना आदि आदि।*
*हम शिक्षित तो हो रहे हैं लेकिन अपने संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं। रही-सही कसर पहिले दूरदर्शन और अब मोबाइल के प्रति हम मानसिक रुप से विक्षिप्त से होते जा रहे हैं जिससे संवादहीनता की खाई बढ़ती जा रही है जो विचारणीय है।*
*विजय जी दिवंगत मां के प्रति आपकी स्नेह व अनुराग से ओतप्रोत काव्यमयी अभिव्यक्ति आपके सद्पुत्र होने का प्रमाण तो देती ही है साथ ही उनका अनेकानेक आशीर्वाद भी प्रदान करती है और यही सच्ची धरोहर है।हम माता-पिता व गुरु के ऋण से तभी मुक्त हो सकते हैं जब अपनी संतान को भी संस्कारवान बना सकें।*
*मौत तो वह अंजान देश है जिसकी सरहद से कोई मुसाफिर नहीं लौटता और मृत्यु शरीर की होती है।स्थूल शरीर यहीं रह जाता है और सूक्ष्म शरीर फिर किसी शरीर को धारण करने के लिए निकल पड़ता है और यही जीवन का सनातन व शाश्वत सत्य है।*
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सुरेन्द्र सिंह कुशवाहा, ग्वालियर
सहगल सर जी , मां का कोई पर्याय नहीं है और मा के बिना जीवन अधूरा है , अतः मन में दुख हो जाता है मां केवल मां ही है उन्हें भावनाओं में , शब्दों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता ।.....
बहुत सुंदर लखनी है 🙏🙏
राजेन्द्र सिंह कटियार दुर्ग
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