"वीज़ा वाले, चिरकुल
बालाजी मंदिर-हैदराबाद"
भूटान यात्रा की खुमारी अभी ठीक से उतरी भी
न थी कि 11 मई 2025 को प्रातः काल हैदराबाद से 27-28 किमी दूर यहाँ के प्रसिद्ध
मंदिर चिरकुल बालाजी जाने का सुखद संयोग बन गया।
इसलिये भूटान यात्रा के संस्मरण को कुछ विराम देते हुए
आइये आपको भगवान चिरकुल बालाजी के दर्शन कराते हैं। भगवान बालाजी वेंकटेश्वर को समर्पित इस मंदिर के बारे मे मान्यता है कि जो
श्रद्धालु सच्ची श्रद्धा और भक्ति से इस मंदिर के गर्भगृह के बाहर की 11 बार
परिक्रमा करता है, उसकी इच्छा भगवान श्री
बालाजी पूर्ण करते हैं। इस मंदिर को वीसा वाले बालाजी भी कहते हैं। भगवान बालाजी
मे श्रद्धा और समर्पण रखने बाले लोगों,
विशेषतः विध्यार्थियों का मानना हैं कि
भगवान बालाजी की 11 बार प्रदक्षिणा करने
वाले भक्तों का विदेश प्रवास पर पढ़ने या नौकरी पर जाने हेतु वीसा लग जाता हैं,
अतः सामान्य दिनों की अपेक्षा, सप्ताहांत मे बड़ी संख्या मे लोग रंगारेड्डी जिले
के इस छोटे से गाँव चिरकुल मे बालाजी भगवान के दर्शनों और परिक्रमा हेतु पधारते हैं। ऐसी मान्यता हैं कि जिस
श्रद्धालु भक्त की मनोकामना पूर्ण हो जाती है वह पुनः मंदिर के गर्भगृह के बाहर की
108 परिक्रमा करते हुए भगवान बालाजी के प्रति ज्ञपित करते हैं।
अति प्राचीन साधारण दक्षिण भारतीय वास्तु के
इस मंदिर का निर्माण लगभग 500 वर्ष पूर्ण एक भक्त श्री रामदास के चाचा द्वय अकन्ना
और मदन्ना ने कराया था। वर्गाकार आकृति मे बने स्तंभों पर अभिलंभित प्रांगण और
उसके अंदर गर्भ गृह मे स्थापित भगवान वेंक्टेश्वर के अप्रितिम सुंदर
प्रतिमा के नयनाभिरम दर्शन अद्भुद और अविस्मरणीय थे। मंदिर के चारों ओर एक छोटा
परिक्रमा पथ या आँगन हैं जहां अवकाश के दिनों को छोड़ कर,
यहाँ पर दर्शनार्थी परिक्रमा लगाते हैं। यह
मंदिर तेलंगाना राज्य के अति प्राचीन मंदिरों मे से एक है। ऐसी किवदंती हैं कि एक भक्त जो हर वर्ष तिरुपति
बालाजी भगवान के दर्शन हेतु जाया करते थे,
एक बार गंभीर रूप से बीमार होने के कारण तिरुपति नहीं जा सके। तभी रात,
भगवान बालाजी उनके सपने मे आए और कहा,
मैं यही पास के जंगल मे हूँ, चिंता करने की
जरूरत नहीं। भक्त ने तुरंत बतलाये गये स्थान पर जाकर खुदाई की जिसमे भगवान
वेंकटेशवेर की एक छोटी प्रतिमा निकली। खोदते समय मूर्ति पर दो जगह हल्का घाव हो
गया जिससे खून निकलने लगा और आसपास की धरती लाल हो गयी। तभी किसी अदृश्य शक्ति ने
गाय के दूध से प्रतिमा को स्नान के सुझाव के पश्चात रक्त का रिसाव बंद हो गया। इस तरह भगवान
वेंकटेशवेर की चिरकुल गाँव मे समुचित अनुष्ठान के पश्चात, स्थापना की गयी तत्पश्चात मंदिर का निर्माण
हुआ।
प्रायः
ग्रामीण परिवेश या ऐसी ही अन्य छोटी जगहों
पर मै कबीर दास के उस दोहे के वशीभूत होकर
यात्रा या भ्रमण करता हूँ जिसमे वे कहते
हैं कि-:
कबीरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय। आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय।।
आप ऐसे ग्रामीण परिवेश मे बैठे छोटे बिक्रेताओं,
आजीविका कमाने वालों या हस्तरेखा देखने भविष्य
बतलाने वाले सेवा प्रदाताओं की सेवा के बदले लुटने के हिसाब से जाइए उनको मोलभाव कर
लूटने के हिसाब से न जायें?
हम परिवार सहित कुछ दूर पैदल चल कर मंदिर
के प्रवेश द्वार पर पहुंचे। मंदिर के आस पास एक छोटे से ग्रामीण परिवेश का सा
दृश्य था। फूल-मालाओं, नारियल प्रसाद
की दुकानों के साथ घरेलू सामानों, चाट पकौड़ी के स्टालों,
पुराने पत्थरों के पाटों से बनी घेरेलु आटा चक्की और तोता राम द्वारा लोगो के
भविष्य बताने वाले शास्त्रियों को देख कर अति प्रसन्नता हुई कि ग्रामीण जन जीवन मे
हम कैसे एक दूसरे का सहयोग कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुचारु रूप से चलाते हैं।
काशी राम जी के तोताराम से अपना भविष्य जानना बचपन मे अपने अतीत मे झाँसी के पंचकुइयां मेले को देखने सरीखा था।
काशी राम जी जो मूलतः सोलापुर महाराष्ट्र
से थे, उन्होने बताया उनके दादा,
परदादा भी तोते के माध्यम से या हस्तरेखा देख,
लोगो का भविष्य बतलाकर कर अपना जीवन यापन
करते हैं। ईश्वर की कृपा से आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती हैं। इसी गाँव मे सालों
से रह रहे हैं, जीवन से संतुष्ट हैं।
उनके परिवार मे पांचों बेटे, चिरकुल गाँव मे यहीं,
ये ही काम कर रहे हैं। काशी राम के बारे
मे जानकार और मिलकर बात करना अच्छा लगा। एक ठेले पर ताज़ा जामुन और शहतूत को लेने
मे छत्तीसगढ़ की उस सब्जी मंडी की याद हो आयी,
जब सब्जी विक्रेताओं से स्थानीय छत्तिसगढ़ी
भाषा मे, "मोला छत्तिसगढ़ी
नी आवे दाई" कह कर उनसे सब्जियों की पूंछ परख किया करता था और वो मुस्करा कर अच्छी और बढ़िया सब्जियाँ
देती थी।
मंदिर परिसर की सफाई करने वाली महिला
कर्मियों के कार्य की प्रशासा पर उन कर्मियों ने टूटी फूटी हिन्दी मे अपनी
कृतज्ञता प्रकट करने का प्रयास किया जो उनकी भाषा से कम लेकिन उनके चेहरों पर उभरे
भावों से ज्यादा स्पष्ट दिखाई दे रहा था। वे उसी चिरकुल गाँव के रहने वाली थी और जान कर
प्रसन्नता हुई की उनके बच्चे स्कूल मे पढ़ने जाते हैं। हमे मंदिर के सामने ही एक
पुरातन कुएँ को देखना भी अच्छा लगा जिसके
जल से भगवान बालाजी का स्नान और अभिषेक किया जाता हैं। पास के मैदान
मे ही समाज के अंग थर्ड जेंडर गुरु,
रानी, सुल्तान आदि आराम करते दिखे जो आसपास के
गाँव से थे और जीवाका उपार्जन के लिए भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण होने के
आशीर्वाद देते दिखे। परिक्रमा पथ पर ही
गौशाला देखने हेतु चला गया। गौशाला के सेवक लक्ष्मण सफाई कार्यों मे रत थे ताकि
गायों के चारागाहों से बापसी के पूर्व उनके स्थलों की सफाई हो जाय। इसी बीच गायों
के दो नन्हें छौने जो 5-7 दिनों के थे को देखना किसी आनंद कौतूहल से कम न था।
इसीबीच दो नन्हें बाल गोपाल बाग से कुछ तोतापरी आम को अपने दोनों हाथों से समेटने की
असफल कोशिश करते दिखाई दिये जो किसी विजेता की तरह आमों को समेटे चले आ रहे थे,
मानों कोई बड़ा युद्ध जीत कर गर्वोन्माद भरे विजेता की तरह आ रहे हों।
स्थानीय
लोगो और पुलिस की मिलीभगत से,
चंद पैसों के लिए लोग कार और दोपहिया वाहनों को मंदिर परिसर तक लाते और ले जाते दिखे।
अपने देश मे ऐसे नव धनाढ्यों मूढ़ों का एक ऐसा
वर्ग, वाहनों को बिल्कुल मंदिर तक ले जाने मे अपनी
शेख़ी, अकड़ और घमंड दिखलाता मिल जाएगा जो पैदल चलने
वालों को कठिनाई और यातायात मे बाधा उत्पन्न कर अपने राजनैतिक रसूख का घटिया प्रदर्शन
करता नज़र आयेगा। उनके चेहरों पर, अपने इस भौड़े दिखावे से वे समाज मे अपने श्रेष्ठता के भाव से ग्रसित
नज़र आते हैं, जिसके कारण परिक्रमा कर रहे आम श्रद्धालुओं को
आवागमन मे अव्यवस्था और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता हैं। प्रशासन को पार्किंग स्थल पर ही
वाहनों को, रखवा कर इस समस्या का
समाधान सख्ती से करना चाहिये।
कुल मिला कर तेलेंगाना के रंगारेड्डी जिले
के इस अति प्राचीन मंदिर के दर्शन और
ग्रामीण परिवेश मे घूमना मन को अति प्रसन्नता और आनंद का भाव दे गया जो दशकों तक
मेरे स्मृति पटल पर अंकित रहेगा।
चिरकुल बालाजी की जय! गोविंदा!! गो..........विंदा!!!
विजय सहगल











3 टिप्पणियां:
बहुत सुन्दर वर्णन मामाजी 🙏
[01/06, 16:25] I S Kadian Chandigarh: Mandir ke vishaya me suna tha prantu aaj aap ji ne darshan bhi kra diye.
Thanks 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
[01/06, 16:33] I S Kadian Chandigarh: Sehgal ji I appreciate your command on HINDI language. Thanks once again.
I S Kadian, chandigarh
आपके उत्कृष्ट लेखन शैली और उसमें प्रदर्शित लोकभाषा के सम्मान से मन गदगद हुआ।
महूं एक घाँव रहे हों छत्तीसगढ़ मां
सामान्य जनमानस के अन्तरतम को स्पर्श कर उपजे संवाद और घटनाओं को जिस काबिलीयत से आपने शब्दों में पिरोया है, वह आपके उच्चकोटि की लेखन शैली को प्रतिबिंबित करता है।
आपके ब्लॉग में लिखे संस्मरण और दुर्लभ सामग्री को TGI के फेसबुक पटल पर उत्कीर्ण करें तो हम सभी लाभान्वित होंगे।🖋️🖋️🙏
अखिलेश कुमार
TGI Group
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