"नर्मदे हर -- महेश्वर"
नोट- आज
हमारा देश हमारे पडौसी आतंकी देश पाकिस्तान की नापाक साज़िशों से बहदुरी से जूझ रहा
हैं। आज का ब्लॉग हम अपने देश की सशस्त्र सेनाओं के वीर योद्धाओं को समर्पित करते हैं जिनकी बहादुरी,
वीरता, पराक्रम और शौर्य की बदौलत आज हम और हमारा देश सुरक्षित
है। ईश्वर से हम प्रार्थना करते हैं कि सीमा पर अपना शौर्य और वीरता का प्रदर्शन कर रहे भारत के वीर सपूतों की "विजयी भवः" का आशीर्वाद प्रदान करें और उनकी रक्षा कर "ऑपरेशन सिंदूर" को सफल बनाये।
28 नवम्बर 2019 की मैंने अपनी
पिछली महेश्वर यात्रा और प्रवास का विवरण अपने ब्लॉग https://sahgalvk.blogspot.com/2019/12/blog-post_21.html मे लिखा
था। आज लगभग साढ़े चार साल बाद पुनः
महेश्वर आने का सुखद संयोग प्राप्त हुआ। वास्तव मे महेश्वर स्थित नर्मदा का देवी
अहिल्या घाट है ही इतना सुंदर कि यहाँ आना हर्ष और आनंद से सराबोर कर देता है। आज
21 मार्च 2025 को भी यहाँ पुनः परिवार सहित आने का सुयोग बना। सहस्त्र्धारा की
उत्साह जनक लेकिन थकाऊ उत्तरार्ध यात्रा
के पश्चात, नर्मदा
नदी के सुंदर घाट पर कल कल बहती माँ नर्मदा नदी की शांत, निस्तब्ध
बहती लहरों को निहारना मन को सुकून और शांति प्रदान करने वाले क्षण थे। घाट की
सीढ़ियों पर बैठ कर कभी नदी को देखना और कभी पृष्ठभूमि मे देवी अहिल्या घाट की
कलात्मक नक्काशी और सौन्दर्य को देखना किसी स्वर्गिक आनंद और उल्लास की तरह था।
सहसा विश्वास नहीं होता कि नर्मदा नदी की जो धारा सहज और शांत भाव से महेश्वर के
इस देवी अहिल्या घाट मे बह रही है मात्र एक-सवा किमी दूर सहस्त्रधारा मे इसका रूप
इतना विकराल और रौद्र कैसे हो सकता हैं। शायद यही ईश्वरीय विधान हैं कि देश काल और
पात्र के अनुसार स्थान और परिस्थितियाँ किसी शांत मानस को भी इतना अशांत, उद्वेलित और क्रूर बना देती हैं।
मेरा
लक्ष्य रात ढलने के पहले पहले नर्मदा नदी के अहिल्या घाट और उसके आसपास के मंदिरों
के दर्शन करना तो था ही साथ ही श्रीमती जी महेशवेरी साड़ी और सूट देखने की भी
इच्छुक थी जिसके हथकरघे पूरे महेश्वर मे जहां तहां दिखाई दिये। हम अपने
कार्यक्रमानुसार अन्य घाटों से, देवी अहिल्या घाट होते हुए सीढ़िया चढ़ कर देवी
अहिल्या के शिव मंदिर की ओर बढ़े। जैसे जैसे मंदिर की सीढ़ियाँ चढे, घाट का प्रवेश द्वार और उसके चारों ओर कलात्मक द्वारपाल, दरबान अपनी परंपरागत मालवा शैली वेशभूषा मे अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित
नज़र आए। उपर के तरफ पहरेदार के हाथों मे तीरकमान था तो मध्य और नीचे
पहरेदारों के हाथ मे दंड था। खंभों पर
वेल-वूटे, फूल पत्तियाँ और गुलदस्ते उकेरे गए थे। सबसे उपर
जाली दर सात झरोखों से पूरे द्वार की खूबसूरती मे चार चाँद लग गए। प्रवेश
द्वार के दोनों ओर 6-7 द्वारों वाला कवर्ड
लंबा बरामदा था, जो चार मंज़िला था। उपर की मजिलों का प्रवेश
मंदिर के अंदर से था। जबकि नीचे की पहली मंजिल पर घाट से ही जाया जा सकता था, जहां से नीचे घाट और नर्मदा नदी को देखना रोमांचकारी अनुभव था। उपर से
नीचे घाट और नदी के दृश्य भी मनोहारी था। मुख्य शिव मंदिर मे भी ऐसी ही वास्तु
कलात्मकता देखने को मिली। देव अप्सराओं और किन्नरों की जीवंत मूर्तियाँ चारों तरफ
नज़र आयी। मंदिर के ऊपरी छज्जे के नीचे विभिन्न बाध्ययन्त्रों यथा ढोलक, वीणा, सितार मृदंग, बीन
वांसुरी के साथ संगीतज्ञों की सुंदर मूर्तियों की भाव भंगिमा और उनके उपर उकेरे गए
अलंकृत नख से लेकर सिख तक गहिनों, यथा पैरों मे पायजेब, कमर मे करधौनी,सिर मे अलंकरण शोभायमन थे। मंदिर के
दोनों ओर दीप स्तम्भ थे जो आज उपयोग मे नहीं हैं। शिव मंदिर के ठीक सामने ऐसा और
इतना ही भव्य गणेश मंदिर स्थित था जहां पर भी श्रद्धालु दर्शनार्थ जा रहे था।
मंदिर
से ही होकर एक रास्ता देवी अहिल्या के किले की ओर जाता हैं। देवी अहिल्या का राज
दरवार मे रखे पुराने रथ, पालकी, राजमहल, अस्त्र शस्त्र
आदि अपने पुरातन वैभव और प्रभाव की कहानी
कह रहे थे। भगवान शिव ही देवी अहिल्या के आराध्य थे और भगवान शिव के प्रतिनिधि की तरह ही देवी अहिल्या ने शासन किया।
उनके द्वारा स्थापित 11000 पार्थिव शिव लिंगों का निर्माण की परंपरा का निर्वहन आज
भी मंदिर परिसर मे नित्य किया जाता हैं। अब तक राज राजेश्वर सहस्त्राजून मंदिर, विश्वनाथ मंदिर के दर्शनादि के पश्चात मेहश्वर बाज़ार की ओर बढ़ लिए।
22
जनवरी 2025 को नर्मदा स्नान के इरादे से हम दोनों प्रातः 6.30 बजे होटल से घाट की
ओर बढ़ लिए। नर्मदा नदी के किनारे किनारे घाट पर चलना अच्छा लग रहा था। तभी घाट पर
झाड़ू लगा रहे सफाई कर्मी रमेश का उत्साहवर्धन करते हुए उसके इस कार्य की प्रशंसा
की और कहा आप का सेवा कार्य भी किसी देवता से कम नहीं क्योंकि आप नरक को अपने
पवित्र कर्म से स्वर्ग बना देते हैं। रमेश ने बड़ी नम्रता पूर्वक कृतज्ञता ज्ञपित
की। पूर्व दिशा मे सूर्य देव का लालिमा लिये, स्वर्णिम आभा से युक्त सूर्य, एक अप्रितिम दृश्य की छटा बिखेर रहा था। माँ
नर्मदा की परिक्रमा के उद्देश्य से निकले श्रद्धालुओं का एक समूह घाट पर पूजा अर्चना के
उद्देश्य से तैयारी करता मिला। उन
भक्तजनों का स्नेह अभिनंदन कर नर्मदा परिक्रमा की जानकारी प्राप्त की। तीर्थयात्रीयों का ये समूह, मांडव मे रेवा कुंड के दर्शन
स्नान के पश्चात महेश्वर आए थे। एक अन्य ग्रुप भी पिछले दिन मुझे रेवा कुंड, मांडव मे पूजन अर्चन करते मिला
था। हम लोग भी उनके इस कार्यक्रम मे
सहभागी हुए और नर्मदा परिक्रमा के अपने मन्तव्य के लिये माँ नर्मदा से प्रार्थना
की। मांडव मे ही मेरी मुलाक़ात परमानंद गिरि जी से हुई जिन्होने नर्मदा परिक्रमा के उद्देश्य से 23 नवंबर 2023 को, ओंमकारेश्वर से अपनी यात्रा का शुभारंभ किया था। विदित हो कि माँ नर्मदा
की ये कठिन और नियम संयम युक्त परिक्रमा को
3 साल 3 महीने और 13 दिन मे लगभग 3800 किमी की यात्रा के पश्चात सम्पन्न किया जाता
हैं जो नदी के दोनों किनारे से होकर उसी
स्थान पर समाप्त होती है जहां से शुरू होती हैं। हर साल लाखों तीर्थयात्री और
श्रद्धालु इस पवित्र परिक्रमा को पूर्ण
करते हैं, जो अमर कंटक या ओंकारेश्वर से नर्मदा परिक्रमा शुरू
कर गुजरात के भरूच मे खंभात की खड़ी से बापस मुड़ कर
बापसी करते हैं।
आधुनिक
डिजिटल और इलेक्ट्रोनिक युग मे मोबाइल ने कैमरे से फोटो खींच कर फोटो एल्बम बनवाने
और कभी कभी विस्मृत सुनहरी यादों को पुरानी फोटोओं के अल्बम को पलट कर देखने के जिज्ञासा, कौतूहल, उल्लास और उन्माद को समाप्त कर दिया हैं। लेकिन मै पर्यटन और धार्मिक
यात्राओं के दौरान फोटोग्राफरों द्वारा फोटो खीच कर उनकी भौतिक प्रति (हार्ड कॉपी)
रखना पसंद करता हूँ। यहाँ भी मैंने दिनेश फॉटोग्राफर से 3-4 बड़ी फोटोओं का प्रिंट
बनवा कर अपने पास रक्खा। मेरा मानना हैं इसके दो फायदे हैं नंबर एक तो आप बड़ी
सहजता से उन सुनहरी यादों को फोटोओं के माध्यम से देख और दिखा सकते हैं जो कि
मोबाइल कैमरे मे सहजता से संभव नहीं और दूसरा हमारे द्वारा खर्च की गयी छोटी धन राशि
फोटो ग्राफर दिनेश के माध्यम से आर्थिक धारा के प्रवाह को आगे बढ़ाने मे सहभागी हो
सकेगी।
सुबह
सुबह पुनः अहिल्या घाट पर रील, प्रेवेडिंग सूट, और यू
ट्यूबर की भीड़ देख कर चौंक गया। घाट और मंदिर मे लगभग 8-10 कैमरा, लाइट और साउंड की गतिविधियों करते फ़िल्मकर दिखे। पता लगा कि हर रोज सुबह
इन फ़िल्मकारों का कब्जा अहिल्या घाट और मंदिर पर हो जाता हैं। प्रशासन को इस संबंध
मे समुचित कार्यवाही करना चाहिये ताकि दर्शनार्थियों,
श्रद्धालुओं और तीर्थ पर आए लोगों को असुविधा न हो।
सूर्योदय
हो चुका था अब नर्मदा स्नान की तैयारी के पश्चात लगभग 20-25 मिनिट स्नान के पश्चात
सूर्य को अर्घ दे कर माँ नर्मदा की पूजन-आरती के पश्चात मछलियों को आटे की गोलियां
भोजन के लिये नदी मे डाली। इसे आप दिखावा या ड्रामा कहें, मै ऐसे
पवित्र स्थानों पर स्नान के पूर्व थोड़ी कार सेवा मे विश्वास करता हूँ। इस दिन भी
घाट पर पड़ी पन्नियों और कचरे को समेत कर कचरे दान मे डाला। नर्मदा नदी मे बड़ी बड़ी
मछलियों को आटे की गोलियां खिलना एक सुखद अनुभव था। होटल बापसी के समय नर्मदा नदी
के घाट की ओर बड़ी संख्या मे महिलायेँ और
पुरुष सिर पर बड़ी बड़ी कपड़ों की पोटली सिर
पर लाते दिखे। एक महिला से जब इस संबंध मे पूंछा तो उसने बताया कि माता आ रहीं
हैं। विस्तार पूर्वक जानकारी मे पता चला कि चैत्र नवरात्रि के आगमन की तैयारी के
पूर्व घर के सारे पहनने ओढ़ने के कपड़ों को धो कर सुखा कर रक्खा जाता हैं। ऐसा मौसम
के बदलाब के कारण होना भी प्रतीत होता हैं। एक घाट पर रंग बिरंगी ओढ़ने बिछाने के
कपड़ो की फोटो लेना अच्छा अनुभव था।
कभी
कभी जीवन मे बड़े सुखद संयोग भी बनते हैं ऐसा ही एक संयोग महेश्वर मे हमारे साथ भी
हुआ जब मेरा एक पुराना मित्र अनिल रस्तोगी भी अपने परिवार और मित्र के साथ इन्ही दिनों मालवा क्षेत्र के भ्रमण पर था और
हम लोग लगभग 9 साल बाद महेश्वर मे दिनांक 22 मार्च 2025 को को मिले। इस तरह एक बार
फिर महेश्वर की यादगार यात्रा सम्पन्न कर मन मे नर्मदा परिक्रमा करने की इच्छा और
संकल्प को मन मे लिये अपने अगले गंतव्य के
लिये प्रस्थान किया।
विजय
सहगल

















2 टिप्पणियां:
शानदार वृतांत, अनुपम लेखन शैली 👌
शानदार रोचक जानकारी , प्रभाबी लेखनी क्या कहने
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