#तख्त
सचखण्ड श्री हजूर अबचलनगर साहिब, नादेड़"
श्रीमद्भगवत
गीता मे भगवान श्री कृष्ण ने अध्याय 4 के श्लोक 8 मे कहा हैं-:-
परित्राणाय साधूनां
विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय
संभवामि युगे युगे।।4.8।। अर्थात साधु पुरुषों की रक्षा करनेके लिये, पापकर्म करनेवालों का
विनाश करनेके लिये और धर्मकी भलीभाँति स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट
हुआ करता हूँ।
बैसे
तो सिक्ख धर्म मे महान गुरुओं का इतिहास त्याग और बलिदान से परिपूर्ण हैं, लेकिन
श्री गुरु गोविंद सिंह जी दुनियाँ के इतिहास मे मात्र एक ऐसे महान सपूत थे जिनके
परिवार की तीन पीढ़ियों ने अपने देश, सनातन हिन्दू धर्म और समाज की रक्षा और उसके स्वाभिमान के
लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसिलिये श्री गुरु गोविंद सिंह को सरबंस दानी कहा
जाता हैं क्योंकि उन्होने मुगल शासक औरंगजेब के अत्याचारों के खिलाफ लड़ते हुए अपने पूरे वंश का बलिदान
किया। उनके पिता श्री गुरु तेग बहादुर जी
ने हिन्दू धर्म की रक्षा हेतु औरंगजेब के इस्लाम धर्म को स्वीकारने से इंकार के
बाद 24 नवंबर 1675 मे दिल्ली के चाँदनी चौक मे अपना शीश बालिदान कर दिया था, जहां आज गुरुद्वारा शीश गंज साहिब स्थ्ति हैं। गुरु गोविंद सिंह जी के चारों पुत्रों मे से बड़े दो पुत्र बाबा अजीत सिंह, बाबा
जुझार सिंह 22 दिसम्बर 1704 चमकौर के युद्ध मे अपने प्राणों की आहुति दी। विदित हो कि
पंजाब की सिरसा नदी के किनारे स्थित चमकौर
नमक स्थान पर सिक्खों और मुगलों के बीच युद्ध हुआ था। गुरु गोविंद सिंह जी के
नेतृत्व मे 40 सिक्खों की छोटी सी सेना ने जिसमे उनके दोनों बड़े पुत्र मुगल सेनापति वजीर खान के अगुआई वाली एक लाख
मुगल सेना को तहस नहस कर छक्के छुड़ा दिये थे। इतनी विशाल सेना के बावजूद मुगल सेना
उन्हे छू भी न सकी थी लेकिन इस युद्ध मे उनके दोनों बड़े साहिब्जादे शहीद हो गाय।
26 दिसंबर 1704 मे ही फतेहगढ़ मे सरहिंद के नाबाव ने गुरु गोविंद सिंह जी के दो
छोटे साहिबजादे जोराबर सिंह और फतेह सिंह को इस्लाम कबूल न करने के कारण जिंदा
दीवार मे चिनवा दिया था और गुरु गोविंद सिंह की माता श्री गुजरी को किले की दीवार
से गिरा कर शहीद कर दिया था। मानव इतिहास मे पूरे वंश के बलिदान का ऐसा कोई दूसरा उदाहरण देखने को नहीं मिलता।
गोदाबरी
नदी के तट पर स्थित नांदेड़ शहर मे तख्त सचखण्ड श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा, सारी
दुनियाँ मे प्रसिद्ध हैं यहाँ सारी
दुनियाँ से लोग गुरद्वारे के दर्शनार्थ आते हैं। मुझे भी 24
मार्च 2025 को इस परम पावन गुरुद्वारे तख्त श्री हुज़ूर साहिब के दर्शन लाभ का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसी स्थान पर सिक्ख धर्म के दस मे गुरु श्री गोविंद सिंह ने
अपने प्रिय घोड़े दिलबाग के साथ अंतिम सांस ली थी। 7 अक्टूबर 1708 को गुरु गोविंद सिंह जी का नादेड़ मे ही
निधन हो गया था। हुज़ूर साहिब वह स्थान है जहां पर गुरु गोविंद सिंह जी ने 1708 मे
अपनी मृत्यु के पूर्व डेरा डाला था। गुरु
जी ने वहाँ अपना दरबार और मंडली आयोजित की थी। कालांतर मे सिक्खों ने उसी स्थान कमरा
बना कर गुरु ग्रंथ की स्थापना की जिसे आज
तख्त श्री हुज़ूर साहब कहा जाता हैं। इस
गुरद्वारे के केंद्र मे स्थित एक छोटे से कक्ष को अंगीठा साहब कहते हैं जहां पर गुरु गोविंद सिंह की पार्थिव देह का
अंतिम संस्कार किया गया था।
गुरुद्वारे
के केंद्रीय कक्ष मे गुरुद्वारे के प्रधान
जत्थेदार के अलावा किसी को इस कक्ष के अंदर
जाने के अनुमति नहीं हैं। इसी कक्ष मे गुरु गोविंद सिंह की अस्थियाँ, कुछ निजी मूल्यवान
वस्तुएँ, अस्त्र-शस्त्र आदि रक्खे गए हैं। इस कक्ष को कुछ निश्चित समय
के लिए ही दिन मे अलग अलग समय खोला जाता है। मुझे भी 24 दिसम्बर 2025 को रात्री 9.30
के लगभग गुरुद्वारे के इस पवित्र कक्ष के
दर्शन हुए और गुरु गोविंद सिंह जी की निजी
उपयोग के अस्त्रों, अंग वस्त्रों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। गुरु
गोविंद सिंह ने 1708 के पूर्व नांदेड़ को अपना आध्यात्मिक केंद्र बना कर इसे अबचल
नगर नाम दिया था। सरहिंद के नवाब वजीत खान ने गुरु जी पर धोखे से हमला करवाया था।
गुरु गोविंद सिंह जी ने जवाबी हमले मे एक हमलावर को अपनी तलवार से तुरंत ही मार
डाला था और दूसरा भागने की फिराक मे उनके
अनुयाइयों द्वारा मारा गया। इस हमले मे गोविंद सिंह जी स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे पर
एक दिन धनुष की डोरी चढ़ाते समय घाव पुनः खुल गये और इस तरह 7 अक्टूबर 1708 मे श्री
गुरु गोविंद सिंह जी का निधन हो गया।
22
दिसम्बर 1666 मे पटना मे जन्मे श्री गुरु गोविंद सिंह जी का बचपन का नाम गोविंद
राय था। गुरु गोविंद सिंह जी एक महान कवि, वीर योद्धा,
दार्शनिक और संगीत के पारखी थे। उन्हे गुरुमुखी के साथ साथ उर्दू, फारसी और संस्कृत का भी अच्छा
ज्ञान था। 14 अप्रैल 1699 मे वैशाखी के
दिन ऐतिहासिक आनंदपुर गुरुद्वारे मे गुरु गोविंद सिंह जी ने पंज प्यारों को दीक्षा
देकर खालसा पंथ की स्थापना की। 1708 मे अपने मृत्यु के पूर्व
दसवें गुरु श्री गोविंद सिंह जी ने अपनी दूरदृष्टि सोच की घोषणा
कर कहा था कि उनके बाद कोई गुरु नहीं होगा
और गुरु ग्रंथ साहिब ही आखिरी गुरु होंगे।
कई
एकड़ मे बने इस गुरुद्वारे के भव्य रूप
निर्माण की नींव 1832 मे महाराजा रणजीत
सिंह ने रक्खी थी जिसका निर्माण 1837 मे पूर्ण हुआ था। यूं तो गुरद्वारे मे प्रवेश
के कई द्वार हैं लेकिन मुख्य विशाल प्रवेश द्वार सफ़ेद संगमरमर का बना हुआ हैं
जिसके दोनों ओर दो मंज़िला कोरिडोर बना हैं जिसके बाहरी तरफ श्रद्धालुओं और
सेवादारों के लिए कमरे बनाए गए हैं। भव्य प्रवेश द्वार के बाहर और अंदर सुनहरे
रंगों से वेलबूटे, फूल पत्तियों का निर्माण सिक्ख वास्तु शैली मे किया गया हैं। तीन द्वारों
से निर्मित प्रवेश द्वार के अंदर विशाल हाल का निर्माण हैं जिसके मध्य दरवाजे से
दूर स्थित गुरद्वारे की संगमरमर की इमारत को देखना सुखद अनुभव था। विशाल हाल के ऊपरी सतह पर अर्ध गोलाकार गुंबद मे प्रकाशित गुरद्वारे
की सुंदरता देखते ही बनती हैं। गुरद्वारे
के प्रवेश द्वार मे प्रवेश करते ही गुरुग्रंथ साहब के एक आध्यात्मिक प्रकाश
और सकारात्मक ऊर्जा को स्पष्ट महसूस किया
जा सकता हैं। चारों तरफ गुरु ग्रंथ साहब के शबद गूंज रहे थे। दो मंज़िला मुख्य
गुरुद्वारे की भव्य परंपरागत सिक्ख वास्तु शैली मे संगमरमर की स्वेत पृष्टभूमि
पर गहरे, लाल, नीले, हरे रंग और सुनहरे रंगों से परंपरागत सिक्ख
गतिविधियों को बड़े सफाई से पैंट किया गया था । तीन छोटे द्वारों के माध्यम से
श्रद्धालु गुरुद्वारे के अंदर प्रवेश कर रहे थे। सामने ही स्वर्ण पत्रों जड़ित चारों दरवाजों से बने मुख्य ऐतिहासिक कक्ष
अंगीठा साहिब के दर्शन करना बड़े ही
रोमांचकारी क्षण थे। इसी कक्ष मे सिक्खों के महान गुरु, गुरु
गोविंद सिंह जी के पवित्र पार्थिव देह का
दाह संस्कार किया गया था, जिसे अंगीठा साहब के नाम से जाना
जाता है। कक्ष उस समय बंद था। पता चला कि कक्ष को लगभग 9.30 बजे रात के बाद
श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोला जाएगा। एक तरफ गुरु ग्रंथ साहब का अखंड पाठ किया जा रहा था। हम लोगो ने गुरुग्रंथ साहब
और अंगीठा साहब के सामने मत्था टेक कर महान गुरुओं को स्मरण कर अपनी भावांजलि अर्पित
कर परिक्रमा की। परिक्रमा पथ पर बने चारों
दिशाओं मे बने स्वर्ण दरवाजों पर सिर नवा
कर स्पर्श करना एक आनंद दायक अनुभव था। दरबाजे के ऊपरी तरफ बाएँ गुरु नानक और दूसरी तरफ गुरु गोविंद सिंह जी की
तस्वीर को स्वर्ण पत्रों पर खूबसूरती से उकेरा गया था। यही कलात्मकता चारों
दरबाजों पर की गयी थी। कक्ष के कपाट खुलने मे अभी कुछ समय था तब तक हम दोनों ने
गुरुद्वारे के ऊपरी कक्ष के भी दर्शन किए जहां पर कुछ ग्रंथियों द्वारा श्री
गुरुग्रंथ साहब का पाठ किया जा रहा था। छोटी छोटी सीढ़ियों से उतर कर पुनः नीचे
कक्ष मे बैठ कर मैंने गुरु गोविंद सिंह के परिवार के महान त्याग और बलिदान को
स्मरण कर उन्हे अपने भाव पुष्पों को अर्पण किया।
गुरुद्वारे
मे बैठी संगत मे अचानक कुछ चहल-पहल हुई पता चला कि हजूर साहब गुरद्वारे के मुख्य
जत्थेदार बाबा श्री कुलवंत सिंह जी, दैनिक परंपरा के निर्वहन हेतु गुरुद्वारे मे बने कक्ष को खोलने आ रहे हैं। बाबा कुलवंत
सिंह जी ने अपनी परंपरा गत वेषभूषा मे प्रवेश करते ही सभी श्रद्धालुओं का अभिवादन
और कुशलक्षेम के बाद दरबाजे मे लगे ताले को खोला। दरबाजे के किवाड़ खुलते ही वहाँ
उपस्थित जन समूह ने बोले!! सो निहाल........, सत श्री
अकाल..... के जयकारों से गुंजायमान हो गाया।
गुरु गोविंद सिंह जी के व्यक्तिगत अस्त्र-शास्त्रों और वस्तुओं को देखना
रोमांचकारी अवुभाव था। आवश्यक रीतिरिवाज के निष्पादन पश्चात कक्ष का दरबाजा पुनः
बंद कर ताला लगा दिया गया। इस तरह नांदेड़ स्थित गुरद्वारा तख्त श्री हुज़ूर साहिब
के आधुनिक तीर्थ के दर्शन लाभ के बाद आगे की यात्रा की ओर प्रस्थान किया।
विजय
सहगल





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