गुरुवार, 29 मई 2025

मानवीय संवेदनाओं का शहर, भूटान की राजधानी थिंपु

 

"मानवीय संवेदनाओं का शहर, भूटान की  राजधानी थिंपु"






26 अप्रैल 2025 की दोपहर बागडोगरा  से भूटान के फुएंत्शोलिंग की लगभग 155 किमी की थकाऊ यात्रा के पश्चात, रात मे, भूटान के फुएंत्शोलिंग मे  एक अच्छी नींद आयी। 27 अप्रैल 2025 को प्रातः 7 बजे,  ग्रुप के लोग फुएंत्शोलिंग  से भूटान की राजधानी थिंपु की लगभग 145 किमी की यात्रा पर जाने के लिए उत्साह और उमंग से तरोताजा हो तैयार थे।  पिछले दिन पहली विदेश यात्रा का कौतूहल, जोश  या यूं कहें कि नशा उतरना शुरू हो चुका था। ग्रुप के कुछ लोग तो आपस मे  पूर्व परिचित थे, फिर  भी कल के मुक़ाबले आपसी भाईचारा और समंजस्य कुछ ज्यादा और घनिष्ठ  हो चुका था। महिला मण्डल के सदस्य  भी आपस मे शक्ल सूरत के साथ, नाम और उपनाम से भी  परिचित होकर एक दूसरे से घुलमिल गये थे। यात्रा की उमंग और जोश इतना था कि हमारे ग्रुप के एक सदस्य राकेश चतुर्वेदी का एक सूटकेस किसी दूसरी बस मे चढ़कर आगे चला गया, उनका इस तरफ ध्यान ही नहीं गया।  गनीमत थी कि वह अपरिचित बस भी थिंपु जा रही थी और उनका सूटकेस वहाँ मिल गया।

कैसे एक समान सोच के लोगो द्वारा मिलजुल कर ऊंचे  लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है, सफाई के मामले मे जिसका सटीक उदाहरण  मैंने अपने ब्लॉग दिनांक 13 अप्रैल 2025 मे शेगाँव मे गजानन महाराज मंदिर के प्रबंधन की भूरि-भूरि प्रशंसा कर किया था। (https://sahgalvk.blogspot.com/2025/04/blog-post_13.html) बड़े से बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये कैसे समान विचारों के लोगो के  समूहिक प्रयास से, किसी छोटे से गाँव को एशिया का सबसे साफ सुथरा  गाँव बनाया जा सकता है, ये मेघालय के एक छोटे से गाँव मौलिन्नोंग को देख कर सहज ही लगाया जा सकता हैं। ब्लॉग दिनांक 21 जनवरी 2023  (https://sahgalvk.blogspot.com/2023/01/blog-post_21.html)। लेकिन कैसे एक देश की जनता द्वारा अपने समूहिक सद्प्रयास से साफ सफाई जैसे, सर्वोच्च लक्ष्यो की प्राप्ति के लिए किए गए सार्थक प्रयासों के नतीजों का एक सटीक उदाहरण आज मैंने भूटान यात्रा के दौरान देखा।    

लगभग तीन साढ़े तीन घंटे की यात्रा के दौरान या यूं भी हर पैमाने पर दोनों देशों की तुलना करना एक मानवीय स्वभाव होता हैं और निष्पक्ष भाव से हर विषय की  समीक्षा करना, उसे स्वीकारना और उसे प्रदर्शित करना एक आदर्श स्थिति होती हैं। हो सकता है कि हम लोगों मे  से, बहुतों ने विभिन्न देशों की यात्रा की हो जहां साफ सफाई की अच्छी और आदर्श  व्यवस्था देखी हो, लेकिन देश के बाहर किसी देश मे साफ सफाई की इतनी अच्छी स्थिति को अवलोकन, मेरे लिये पहला अनुभव था। सड़क के दोनों ओर कहीं कोई पन्नी, प्लास्टिक बोतल, चिप्स नमकीन के खाली पाउच, सिगरेट के पैकेट या पान तंबाकू की पुड़ियाँ  दूर दूर तक कहीं  नज़र नहीं आयी। लोगो के समूहिक प्रयास से, घर की साफ-सफाई से लेकर, पड़ौस फिर नगर और देश की सफाई तक के परिणाम ऐसे ही सद् प्रयासों से संभव हो सकते हैं जिसे मैंने भूटान मे साक्षात देखा।

पैमाना मात्र साफ सफाई ही नहीं था, रास्ते मे कहीं बहुत भारी यातायात नहीं था। दक्षिण एशिया के हिमालय क्षृंखला मे स्थित यह एक  बहुत छोटा देश हैं जिसकी जनसंख्या आठ लाख से भी कम हैं। राजधानी थिंपु की तरफ जाने या आने वाले वाहनों मे कहीं कोई हॉर्न सुनने को नहीं मिला। पता चला हॉर्न वर्जित का निशान भी  भूटान मे कहीं  देखने को नहीं मिलेगा क्योंकि अनावश्यक रूप से हॉर्न बजाना भूटान के नागरिकों के संस्कार मे ही नहीं है।   

  



रास्ते मे करीब साढ़े ग्यारह बजे जब हम चाय पान हेतु एक रेस्टुरेंट मे रुके तो उसके बोर्ड पर उसके  नाम को सरसरी तौर पर पढ़ने की भूल  कर बैठा और  कुछ चौंका! बोर्ड पर सहगलों, रेस्टुरेंट एंड  बार देख कर सोचने को मजबूर होना पड़ा कि इस दूर दराज भूटान मे "सहगल साहब" कहाँ से आ टपके? जब ध्यान से देखा तो दरअसल उस पर शेलगोन (Shelgoen) रेस्टुरेंट एंड बार लिखा था। खैर...। भूटान मे दो  शहरों के बीच राष्ट्रीय राजमार्गों मे दुकाने, मकान आदि काफी कम हैं। लेकिन जितने भी व्यापारिक संस्थान हैं उन पर सभी कुछ उपलब्ध रहता है जैसे कच्ची सब्जी-भाजी, खाना-नाश्ता, चाय-कॉफी, स्नेक्स, स्टेशनरी  और साथ मे सिगरेट, अँग्रेजी शराब तो आवश्यक रूप से उपलब्ध रहेगी ही। कहीं भी दीर्घ या लघु शंका का निवारण यहाँ अपराध है अतः सरकार और लोगो की सहभागिता के आधार पर व्यापारिक संस्थानों या सार्वजनिक स्थानों पर सशुल्क/निशुल्क टॉइलेट की व्यवस्था उपलब्ध रहती है।

सामान्य शिष्टाचार भूटान की सांस्कृति का एक अंग हैं। मैंने भूटान की भाषा एक शब्द "कुजूजाम्बो" या "कुजूजाम्बोला" अपने भूटानी गाइड से सीख लिया था जिसका अभिप्राय अभिवादन से था। किसी भी भूटानी नागरिक से यदि आप भूटानी भाषा का शब्द  "कुजूजाम्बो" या "कुजूजाम्बोला" कहेंगे तो चेहरे पर मुस्कराहट के साथ, वह भी आपका अभिवादन "कुजूजाम्बो" या "कुजूजाम्बोला" बोल कर कहेगा। इस रामबाण शब्द का उपयोग मैंने अपनी भूटान की यात्रा मे होटल स्टाफ, बौद्ध भिक्षुओं, स्कूली बच्चों, बाज़ारों एवं  अन्य  बूढ़े और नौजवानों  से  खूब किया, जिससे भूटान के लोगो से परस्पर बातचीत की शुरुआत करने मे और उनके बारे मे जानने समझने मे  काफी सहजता से सहायता मिली।





लगभग दो बजे, दोपहर तक हम लोग भूटान की राजधानी थिंपु पहुँच गये थे। खाली पेट राजधानी थिंपु का सौन्दर्य आँखों से ओझल था, क्योंकि कहावत हैं कि भूंखे भजन न होय गोपाला.......। एक अच्छे रेस्टोरेन्ट मे जब स्वादिष्ट भोजन से तृप्ति हुई, तब कहीं जा कर भूटान की राजधानी थिंपु की शोभा, सुंदरता और सौन्दर्य  दिखलाई दिया। खाने की बात चली तो लगे हाथ अपने पाठकों को ये भी बतलाते चलें कि, अपने दिल से ये गलतफहमी निकाल दे कि भूटान मे शाकाहारी खाना मिलने मे कठिनाई होती होगी। शाकाहारी तो था ही, साथ ही   आपको बगैर लहसुन-प्याज का जैन खाना भी पूर्व सूचना पर उपलब्ध हो सकता है वह भी एक बेहतरीन स्वाद के साथ, क्योंकि हमारे ग्रुप मे कुछ सदस्य जैन खाना ही खाने वाले थे।



भीड़-भाड़ से दूर, थिंपु एक छोटा सा लेकिन अनुशासित शहर है। एक दम शांत और सरल लोग। देश की राजधानी के मुख्य बाज़ार क्लॉक टावर के नजदीक, मुख्य चौराहे पर, बिना हॉर्न के, वाहनों की आवाजाही, चौराहे पर बिना लाल हरी बत्ती के शांत आवागमन देखने को मिला।  अपने देश की राजधानी दिल्ली की तुलना मे, यहाँ भूटान, यातायात पुलिस, की आँख के इशारे से बेहद धीमी गति से वाहनों को चौराहे के आर-पार, जाता देखना कल्पना के परे थे। आपने सड़क पार करने के लिये जैसे ही ज़ेब्रा क्रॉसिंग पार पैर रक्खा नहीं, कि सामने से आने वाले कार ड्राईवर स्वतः ही अपने वाहन को आपके, सड़क क्रॉस करने तक रोके रहेंगे। पैदल चलने वाले लोगो को सड़क पार करने को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के नियम को भूटान मे बड़ी तव्वजों दी जाती है। इस बात के परीक्षण हेतु मैंने अपने एक साथी राकेश सिन्हा को जान बूझ कर ऐसा करने के लिये सड़क पार भेजा, मुझे खुशी है भूटान इस परीक्षा मे पूरी तरह सफल रह। दो वाहनों के बीच समुचित दूरी रखने का रिवाज़ को देखना भी अच्छा लगा।  

भूटान की अपनी पारंपरिक वेषभूषा मे नज़र आएंगे। भूटान के लोग अपने पहनावे के प्रति भी काफी सजग हैं। देश के सर्वोच्च पदासीन राजा से लेकर सरकारी अधिकारी, कर्मचारी पुरुषों द्वारा पूरी बाहों का, घुटनों तक पहने जाने वाले वस्त्र को "घो" कहा जाता है जिसको कमर पर एक बेल्ट ("केरा") से बांधा जाता है। महिलाओं द्वारा पैरों तक लपेट कर पहने जाने वाले वस्त्र को किरा कहते हैं। भूटान के नागरिक अपनी वेषभूषा और अपने राजा-रानी के प्रति बड़े भावुक और संवेदनशील हैं। वे राजपरिवार के प्रति गहरी निष्ठा और सम्मान का भाव रखते हैं। शाही परिवार के प्रति किसी भी तरह के असम्मान और अनादर को गंभीरता से लेते हैं। भूटान मे आए पर्यटकों, आगंतुकों और अतिथियों के प्रति भी भूटान के लोगों के मन मे गहरा  आदर भाव है। भूटान मे, भारतीय सांस्कृति के "अतिथि देवो भवः" को सही मायनों मे धरातल पर कार्यरूप मे परिणित होते देखना एक सुखद अनुभव था।



इन्ही दिनों थाईलैंड के राजा का आगमन भूटान मे था। पूरे रास्ते मे शुभागमन का शुभ संदेश देते भूटान के रंगबिरंगे झंडे, थाई नरेश के स्वागत मे लगाये गये थे। जगह जगह भूटान राज परिवार की  आदम कद फोटो, थाई किंग के साथ चौराहों, भवनों और अन्य सरकारी इमारतों पार लगाई गयी थी। इसी कारण जगह जगह सड़कों का मार्ग परिवर्तित कर वाहनों को ले जाया जा रहा था। आज थाई राजा की स्वदेश बापसी थी।  अतः स्कूली बच्चों को उनकी बिदाइ के रास्ते मे दोनों राष्ट्रों के ध्वजों के साथ बड़ी संख्या मे देखा गया। गाइड ताशी ने बताया भारत के प्रधानमंत्री मोदी के बाद किसी राष्ट्र प्रमुख के राष्ट्रगमन पर, ऐसा शाही स्वागत  दूसरी बार हुआ है।                                                     

                                                               ..................जारी।

विजय सहगल

                        

  

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

अच्छा लेख