शुक्रवार, 18 अगस्त 2023

कालीन की खेती

 

"कालीन की खेती"









मैंने अपने थिण्ड्लु गाँव के प्रवास पर ग्रामवासियों को विभिन्न कृषि गतिविधियों मे देख उनके पुरुषार्थ की हमेशा प्रशंसा की हैं। इसी श्रंखला मे पिछले कई दिनों  के श्रम के पश्चात आज मै  आपको एक नए कृषि घटना क्रम से अवगत कराऊंगा। अभी तक हम-आपने कालीन का उत्पादन फ़ैक्टरियों मे होते देखा या सुना है। कालीन के लिये प्रसिद्ध भदोही  जहां सैकड़ों कामगार दिन रात कालीन के बुनाई कर देश के आर्थिक विकास मे अपना बहुमूल्य योगदान देते है। लेकिन यदि आप से कहा जाए कि कालीन की खेती भी होती है तो आपको सुनकर कुछ आश्चर्य तो जरूर होगा ही। जी हाँ मैंने मखमली घास के कालीन की पैदावार खेतों मे होती देखी है।

17 जुलाई 2023 को प्रातः भ्रमण के दौरान एक खेत मे कुछ कृषि श्रमकों को खेत मे एक विशेष प्रकार की मशीन से घास के एक बड़े मैदान मे एक  निश्चित लंबाई-चौड़ाई के टुकड़ों को न केवल बारीकी से काटते देखा बल्कि पीछे पीछे मजदूरों द्वारा घास के उन टुकड़ों को कपड़े के थान की  तरह रोल कर लपेटते देखा। जब मैने खेत मे श्रमिकों को कार्य करते देख इस घास की कीमत के बारे मे  पूंछा तो सभी मजदूर निरुत्तर थे और उन्होने एक किसान की तरफ इशारा करते हुए कहा कि खेत के मालिक श्री मुनियाँ गौड़ा ही इस  बारे मे बता सकते है। मै उन किसान की तरफ हैरानी से देख रहा था! क्योंकि खेते के मालिक श्री मुनियाँ गौड़ा भी एक साधारण मजदूर की तरह सभी खेतिहर मजदूरों के साथ काम मे जुटे हुए थे, अतः ये भेद करना कठिन था कि कौन श्रमिक और कौन खेत का स्वामी है।  कार्पेट ग्रास रूपी इस  कृषि उत्पाद मे रांची से आये श्रमिक श्री प्रसाद और अशोक तथा उनके परिवार के अन्य सदस्य  नियमित रूप से गौड़ा जी के सहायक के रूप मे हिस्सा बंटाते है।   श्री गौड़ा जी जो एक उन्नतशील किसान हैं, ने बताया इस मखमली कार्पेट घास को इस रूप मे पहुंचाने के पूर्व एक कठिन रास्ता तय करना पड़ता है। खेत मे पहले लाल दुमट  मिट्टी की लगभग 6-8 इंच मोटी मिट्टी की परत खेत मे बिछाई जाती है ताकि इस मिट्टी से कार्पेट ग्रास के 3-4 फसल लगातार प्राप्त की जा सके।  खाद और कीटनाशकों से मिश्रिण से तैयार इस मिट्टी की परत मे तैयार घास के छोटे छोटे गुच्छे बिखेर कर लगाए जाते है तत्पश्चात पानी की अच्छी और गहन सिंचाई के पश्चात घास पूरे खेत मे फैल जाती है और ये ही घास घनी होकर मखमली कालीन का रूप धारण कर लेती है।

तैयार खेत मे कीट नाशकों और रसायनिक खादों का छिड़काव निरंतर चलता रहता है। कटिंग के लिये तैयार इन खेतों मे पहले प्लास्टिक के पाइप और 10-12 फुट लंबी रस्सी की सहायता से  3-3  फुट के अंतराल पर तीखी धार वाले हँसिये से सिर्फ चौड़ाई मे 1.5 फुट चौड़ी लकीर की गहरे निशान लगाए जाते है। अन्य मजदूर निशान लगाने के दौरान निकली घास के तिनकों  को पीछे-पीछे साफ करते नज़र आयें। मुनियाँ गौड़ा जी ने बताया लगभग 7-8 लाख रुपए कीमत की इस पेट्रोल चालित मशीन का रख रखाब काफी महंगा है और डालर की बढ़ती कीमत के कारण भी मशीन के पुर्जे आयात करना काफी खर्चीला है। अब उक्त आयतित मशीन से तैयार खेत मे से 1.5X3.00 फुट के टुकड़े काटने की बारी थी। श्री गौड़ा जी ने मशीन को जैसे ही स्टार्ट किया तो रस्सी की सहायता से बनाए गये पथ पर मशीन को चलाना शुरू कर दिया। मशीन के  पहिये के एक ओर लगे शार्प ब्लेड घास सहित मिट्टी की पतली सतह को तेजी से काटने लगे। पीछे पीछे कृषक मजदूर डेढ़ फुट चौड़े और तीन फुट लंबे अर्थात 4॰5 वर्ग फुट के  घास के टुकड़ों को को कपड़ों के थान की तरह तीन तहों मे लपेट कर रखने लगे। कुछ ही मिनटों मे पूरे खेत मे समान रूप से मुड़े कार्पेट ग्रास के गट्ठर नज़र आने लगे। मांग और पूर्ति के हिसाब से स्थानीय बाज़ारों मे इस कार्पेट ग्रास की कीमत लगभग 15 रुपए वर्ग फीट थी। इस ग्रास को राज्य और देश के दूर दराज़ हिस्सों मे तुरंत रवाना कर दिया जाता है। परंपरा गत रूप की कृषि से हट  कर लगभग 90 दिन मे उत्पादित इस कृषि उत्पाद, कार्पेट ग्रास का उत्पादन यहाँ के किसानों की आर्थिक आय मे एक महत्वपूर्ण योगदान करता है जिसका अनुमान  आप गाँव के किसानों की समृद्धि और संपन्नता का अनुमान उनके घर और रहन सहन को देख, सहज रूप से लगा सकते है।    

इन कार्पेट ग्रास के टुकड़ों को राज्य सरकार के कार्यालयों, विधान सभाओं, स्टेडियम और अन्य संस्थानों मे पहले से तैयार जमीन मे चादर की तरह बिछा दिया जाता है। इन कालीन के टुकड़ों पर पानी के गहरी सिंचाई से पहले से तैयार जमीन पर रोप दिया जाता है। बैसे छोटे छोटे घरों और निजी कार्यालयों पर भी मखमली घास की चादर बिछाना और उसका रखरखाब करना साधारण मानवी की क्षमता के बाहर है। केंद्र और राज्याश्रय के संरक्षण के बिना इस मखमली कार्पेट घास के सौंदर्य का आकर्षण एक विलासता का पर्याय ही होगा। इस स्वर्गिक वातावरण और सुंदर मौसम के बीच गौड़ा जी का मकान किसी हिल स्टेशन पर बने बंगले से कम नहीं दिखाई दे  रहा था।

अतः आज के बाद जब कभी आप सरकारी कार्यालयों, राज्य की विधान सभाओं, लोक सभा या अन्य खेल मैदानों या सरकारी कार्यालयों मे हरी मखमली घास के मैदान देंखे या उन पर चलें  तो आप निश्चित मान के चले कि इस मखमली कार्पेट घास का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संबंध कर्नाटक के गाँव थिण्ड्लु से अवश्य होगा।

विजय सहगल       

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

*वाह विजय जी।आपने तो ऐसे विषय को अपने संस्मरण में चुना जिसकी जानकारी मुझ जैसे कई महानुभावों को नहीं होगी।अक्सर बड़े कार्पोरेट आफिसों,सरकारी कार्यालयों, निजी नर्सिंग होमों आदि में हरी घाँस के लाॅन देखकर मन प्रफुल्लित हो जाता था।*
*आपके इस रोचक व ज्ञानवर्धक आलेख से बुद्धि के बंद द्वार खुले।आप अपने घुमक्कड़ स्वभाव के साथ साथ अपने जिज्ञासु मन को भी शांत कर जिस प्रकार सरल शब्दों में लिपिबद्ध कर सबको लाभान्वित करते है वो सराहनीय व अनुकरणीय है।*
🌹🌹🙏🌹🌹👌👌👌
सुरेन्द्र सिंह कुशवाहा, ग्वालियर

बेनामी ने कहा…

बहुत सुंदर जानकारी ।

बेनामी ने कहा…

*आपका एक अछूते विषय के ऊपर लिखना आपके आत्मविश्वास को रेखांकित करता है।हिन्दी में लिखना अंग्रेजी से ज्यादा कठिन है और फिर ऐसा विषय जिस पर ज्यादा चर्चा तक न हुई हो ।*