शुक्रवार, 25 अगस्त 2023

बगुला भगत ऋषि रणदीप सुरजेवाला का श्राप

 

"बगुला भगत ऋषि रणदीप सुरजेवाला का श्राप"




जब से काँग्रेस राज परिवार के राजऋषि रणदीप सुरजेवाला ने हरियाणा के कैथल मे जनसभा को संबोधित करने के दौरान भाजपा को बोट देने वाले या समर्थन करने वाले लोगों को  राक्षस कहा और श्राप दिया!! लोग बड़े व्यग्र हैं!! बड़ा आश्चर्य और खेद का विषय हैं कोई योग्य, अनुभवि और  परिपक्व बुद्धिजीवि नेता देश के नागरिक मतदाताओं के लिये  "राक्षस" जैसे  अनुचित और घिनौने शब्दों का इस्तेमाल कैसे कर  सकता है? सार्वजनिक मंच से निश्चित ही ऐसी कुत्सित सोच और ज़बान  तो कोई कुपढ़ और अस्थिरचित्त व्यक्ति ही बोल सकता है जिसकी तीव्र भर्त्स्ना और निंदा की जानी चाहिए। लोकतन्त्र मे वैचारिक मतभेद और मतांतर होना साधारण बात है। नैतिक मर्यादाओं के भीतर रहकर  सकारात्मक आलोचना, दोष-विवेचना और टीका टिप्पड़ी राजनैतिक दलों का परम अधिकार है और जिसको करना भी चाहिये और जिसकी प्रशंसा भी की  जानी चाहिये। लेकिन प्रजातन्त्र, जिसमे देश की प्रजा का जनादेश सर्वोच्च होता है यदि उस पर  कोई राजनैतिज्ञ ईर्ष्या और द्वेष वश उन मतदाताओं को अनर्गल, निरर्थक और असंयमी भाषा का प्रयोग करें तो उसकी बुद्धि और योग्यता पर सवाल उठना लाज़मी है और वही सवाल आज देश की जनता काँग्रेस के राज्य सभा सांसद रणदीप सुरजेवाला से पूंछ रही है कि लोकतन्त्र मे आम जनों को मिले मतदान के मौलिक अधिकार से चुनी हुई सरकार के मतदाताओं को  आप "राक्षस" और "राक्षस प्रवृत्ति"  का कैसे कह सकते है? और ऊपर से तुर्रा ये कि उन मतदाताओं को महाभारत की धरती से श्राप देने का दुस्साहस!!   अर्थात उल्टा चोर कोतवाल को डांटे!! काँग्रेस का बंटाढार करने मे सुरजेवाला ही नहीं अपितु पवन खेड़ा, सुप्रिया श्रीनेत और दिग्विजय सिंह जैसे अनेक प्रवक्ताओं की पूरी टोली हैं। होना तो ये चाहिए था कि कॉंग्रेस पार्टी और उनके प्रवक्ताओं को देश के 23 करोड़ मतदाताओं को कोसने और उनको राक्षस कहने की बजाए अपने नीतियों-कार्यक्रमों, अपनी योजनाओं और पूर्व मे की गई अपनी उपलब्धियों को देश की जनता के सामने रखते ताकि लोग उनके विजन और सोच से प्रभावित हो उनके पक्ष मे मतदान कर सकते।

अब सवाल ये उठता है कि इस घोर कलयुग मे रणदीप सुरजेवाला के मन मे भगवान कृष्ण की कर्मभूमि और भारत की आस्था और अध्यात्म की पुण्यभूमि कुरुक्षेत्र मे अकारण और असमय "श्राप" देने का भाव  क्यों जागा? उन्हे  ये भी स्पष्ट करना चाहिए था  कि आखिर महाभारत मे वे कौरवों के पक्ष मे थे  या कि  पांडवों के?? क्योंकि यदि वे पांडव सेना के पक्ष मे थे जिसका नेतृत्व भगवान बासुदेव श्री कृष्ण कर रहे थे तो उन्हे श्रीमद्भगवत गीता मे भगवान श्री कृष्ण की शिक्षाओं का  भलीभाँति ज्ञान होगा। परंतु  कुटिल और कपट मानसिकता वाले बगुला भगत  ऋषि सुरजेवाला का भाजप के पक्ष मे मतदान करने वाले 23 करोड़ मतदाताओं से द्वेष करने वाले और उन्हे राक्षस प्रवृत्ति का बताने वाले सुरजेवाला स्वयं नहीं जानते कि श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 16 मे श्लोक संख्या 19 मे भगवान श्री कृष्ण ने उन जैसे व्यक्तियों को ही आसुरी (राक्षसी) योनियों मे डालने का उल्लेख करते हुए कहा है:-

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।।  {16.19}   अर्थात

 

ऐसे द्वेष करने वाले पापाचारी (और) क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार मे बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ।

तब रणदीप सुरजेवाला  को विचारमंथन करना चाहिये कि असुर अर्थात राक्षस कौन है? वे 23 करोड़ मतदाता जिन्होने उनके दल के विरुद्ध मत दान किया या वे स्वयं जो  मतदाताओं से द्वेष वश उन्हे राक्षस कह रहे है।       

इसलिए ये तो निश्चित है कि छल ऋषि सुरजेवाला पांडवों के पक्ष मे नहीं अपितु कौरवों के पक्ष मे खड़े हों, श्राप दे रहे थे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरित मानस मे कहा हैं :-

"बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देई बिधता"॥  अर्थात

हे! तात! नरक मे रहना अच्छा है परन्तु विधाता, दुष्टों का संग कभी न दे।

तब कहीं ये तो नहीं भाजप के पक्ष मे मतदान करने वाले मतदाताओं ने इसी धारणा के वशीभूत बेशक!!, अभावों और कष्ट रूपी नरक मे रहने मे ही भलाई समझी हो  पर दुष्ट सुरजेवाला के संग न देने का संकल्प लिया हो?? तब फिर सुरजेवाला का शाप कैसे फलीभूत हो सकता है? पर सुना हैं काँग्रेस विध्वंस का श्राप तो  श्री करपत्रि जी महाराज द्वार द्वारा 7 नवंबर 1961 को दिया गया था जब श्रीमती गांधी ने संसद भवन के बाहर गो हत्या पर प्रतिबंध की मांग को लेकर धरना दे रहे साधु महात्माओं पर अंधा-धुन्ध फायरिंग कराई थी, जिसमे अनेक साधुओं का संहार किया गया था। श्री करपत्रि जी महाराज द्वार काँग्रेस को दिये गया  श्राप और उसके परिणाम  राजनीति के विध्यार्थियों के लिये  शोध और अनुसंधान का विषय हो सकता है। 

लोकतान्त्रिक तरीके से देश के मतदाताओं द्वारा एक सरकार को चुने जाने पर काँग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला द्वारा  यदि नागरिकों को  राक्षस प्रवृत्ति वाली उपाधि से कलुषित किये जाने और श्राप के कोपभाजन होने की इस कलियुगी सोच पर हंसी आती है। लग तो ये रहा था कि इस  कलयुगी ऋषि का श्राप न जाने किसको श्राप से भस्म  कर दे? या पत्थर बना दे? या कहीं किसी को पशु पक्षियों की योनि न बदल दे!!? एक तिनके को भी  शापित कर भस्म नहीं कर पाने वाले सुरजेवाला ने अपनी जग हँसाई ही कराई। बैसे  उनका ये श्राप सुनकर कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि सुरजेवाला उस कुल के ही रक्तबीज है जिन्होने 48 वर्ष पहले 1975 मे  देश मे आपातकाल लागू कर लोकतन्त्र की नृशंस हत्या का प्रयास किया था। आज फिर इनकी संताने भारत मे येन केन प्रकारेण सत्ता हथियाने के फेर मे अपने  पक्ष मे मतदान न करने वालों को श्राप दे रहीं हैं, धमका रहीं हैं।   

अपने निजी लोभ और लालच के वशीभूत, अधम सोच और स्वार्थ की मानसिकता से  जो व्यक्ति देश के लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी सरकार को चुनने वाले मतदाताओं को राक्षस और समर्थकों को राक्षसी प्रवृत्ति का बताएं उससे ज्यादा मूढ़ मति कौन होगा?  कलयुगी ऋषि रणदीप सुरजेवाला काँग्रेस राज परिवार की चापलूसी और चाटुकारिता मे इतने तल्लीन है कि इन्हे अच्छाई-बुराई का कोई भान नहीं है, नीति-अनीति के बारे मे इन मदांध मूढ़ व्यक्तियों से अपेक्षा करना व्यर्थ है। आप निश्चित मानिए काँग्रेस को किन्ही  बाहरी व्यक्तियों से नहीं अपितु इनके दल के अंदर ही उपस्थित रणदीप सुरजेवाला जैसे आत्मघाती  व्यक्तियों से खतरा है जो देश के मतदाताओं को "राक्षस", "राक्षसि प्रवृत्ति" और "शाप" जैसे गाली-गलौज वाली भाषा के  शब्दों के प्रयोग से अपनी नकारात्मक और अधम सोच से काँग्रेस की लुटिया डुबो देंगे पर कभी सुधरने का नाम नहीं लेंगे!! शायद ऐसे ही कुटिल और धूर्त व्यक्तियों के बारे मे राजा भर्तहरी ने अपने नीति शतक के श्लोक संख्या 11 मे लिखा हैं -:

शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक् छत्रेण सूर्यातपो

नागेन्द्रो निशिताङ्कुशेन समदौ दण्डेन गोगर्धभौ ।

व्याधिर्भेषजसंग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैर्विषं

सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम् ॥ [नीतिशतक श्लोक 11]  अर्थात

 

अग्नि जल से शांत होती है, सूर्य की धूप छाते से, मतवाले हाथी को तीक्ष्ण अंकुश से वश मे किया जा सकता है, बैल और गधे को डंडे से सही रास्ता दिखाया जा सकता है, बीमारियों का निदान औषधियों से और विष का उपशमन अनेक मंत्रों के प्रयोग से शांत किया जा सकता है अर्थात शास्त्रों मे सब प्रकार की औषधि है, परंतु मूर्ख मनुष्य के लिए कोई औषधि नहीं है।

विजय सहगल

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

मित्र आपने कमीने सुरजेवाला के दुष्टवचनो का बहुत सही विश्लेषण किया है । एक तो बेचारा इनका नेता मंदबुद्धि है दूसरे उसे यह मंदबुद्धि सुरजेवाला, मणिशंकर ऐय्यर जैसे दुष्ट राय देने वाले है तो कांग्रेस का पतन निश्चित है ।