शुक्रवार, 27 जनवरी 2023

मेरी पहली विदेश (नेपाल) यात्रा

 

"पहली विदेश (नेपाल) यात्रा"








9 नवम्बर 2022 के मेरे  राशि फल मे शायद विदेश यात्रा का योग रहा होगा पर मुझे इस बात की जरा भी आभास नहीं था कि आज मै अपने पड़ौसी देश नेपाल की यात्रा पर जाऊंगा। कार्यक्रमानुसार मिरिक की यात्रा के बीच अचानक एक जगह सूचना बोर्ड ने  "नेपाल-0 किमी॰" बताया। सड़क से लगी कुछ दुकानों पर तमाम गिफ्ट आइटम, गरम कपड़े एवं कुछ खाने पीने के छोटे छोटे जलपान गृह थे जो नेपाल देश की धरती पर थे। नेपाल के ये बहुत सीमित क्षेत्र का बाज़ार था।  कुछ किमी॰ और आगे जाने पर आधिकारिक तौर पर दोनों देशों की सीमा मौजूद थी। बाकायदा बैरियर से दोनों देशों की सीमाओं का निर्धारण किया गया था। भारत की सीमा मे सीमा सुरक्षा बल और पश्चिमी बंगाल की पुलिस मुस्तैदी से तैनात थी वही दूसरी ओर कुछ कदम की दूरी पर नेपाल पुलिस के लोग अपने देश की सीमा पर तैनात थे लेकिन दोनों देशो की सुरक्षा बलों के लोग पाकिस्तान और चीन की सीमा के विपरीत  एक मित्रता पूर्ण माहौल मे एक दूसरे को समान रूप से सम्मान देते हुए अपने-अपने कार्यों मे व्यस्त थे।

जब पश्चिमी बंगाल के पुलिस अधिकारियों से मैंने  सीमा पार नेपाल जाने की औपचारिकताओं के बारे मे जानना चाहा तो उन्होने बड़ी तत्परता और व्यावहारिकता के साथ आधार कार्ड और मोबाइल नंबर एक रजिस्टर पर दर्ज़ कर मात्र हस्ताक्षर प्राप्त  किए और हो गयी सारी औपचारिकता!! मुझे इतनी त्वरित और न्यूनतम औपचारिकता की उम्मीद नहीं थी। अब क्या था हम अगले कुछ  कदम पार  नेपाल की सीमा मे थे। दूसरे देश की धरती पर कदम रखना, एक अलग ही उत्साह और उमंग और रोमांच  उत्पन्न  कर रहा था। यध्यपि लोगो की भेषभूषा, बोलचाल और रहन सहन मे कोई अंतर नहीं था फिर भी मै भौगोलिक और विधिक रूप से नेपाल मे एक विदेशी यात्री के रूप मे था। मै नहीं कह सकता कि पशुपति नगर के लोग मुझे किस दृष्टि से देख रहे थे पर मै स्वयं नेपाल मे एक विदेशी यात्री के रूप मे सोच, उत्साह, जोश और  रोमांच का अनुभव कर रहा था। क्योंकि ये मेरी पहली विदेश यात्रा थी।

नेपाल सीमा मे लगी दुकानों पर थोड़ा ठहलने और  कदम ताल करने पर एक व्यक्ति ने टैक्सी से पशुपति नगर के अंदर ले चलने का आमंत्रण दिया। भारतीय मुद्रा के 300/- रुपए मे टैक्सी का  लौटा-बाट भाड़ा सुन मुझे ये सौदा सस्ता लगा। इस तरह मात्र 300 रुपए खर्च कर टैक्सी मे बैठते ही मेरी पहली विदेशी नेपाल यात्रा शुरू हो चुकी थी। कह नहीं सकता कि नेपाल का पशुपति नगर, सीमा पर स्थित होने के कारण इतना साफ सुथरा था या वहाँ के नागरिकों का स्वभाव ही साफ सफाई वाला था, लेकिन कुछ भी हो इस नगर की साफ सफाई, चौड़ी सड़के और मृदभाषी लोगो को देख मन प्रसन्न तो था ही। जिज्ञासा और उत्सुकता कभी कपड़ो के भाव और कभी सब्जी के रेट पूंछ नेपाल से अपने देश की महंगाइ के तुलनात्मक अध्यन एक अर्थशास्त्री की तरह शुरू हो चुके थे। गरम कपड़े लुधियाना से बिक्रय हेतु लाये गए थे। गिफ्ट आइटमस पर चीनी वसुतुओं का वर्चस्व था। सब्जी और सीमित प्रकार के फल भी ठीक ठाक ही थे पर कीवि 50 रुपए किलो  देख, आधा किलो कीवि ले ली जो स्वाद मे अत्यधिक मीठी और एक अलग तरह का क्रिस्पी स्वाद लिए थी। होटल ढुक-ढुकी के बोर्ड पर गोर्खा स्ट्रॉंग बीयर का विज्ञापन था पर दुकान के एक भाग मे चाय-नाश्ते का होटल भी था। होटल को देख कुछ यूं ही चाय पीने की इक्छा को जाग्रत किया। वहाँ गुप्ता जी से भेंट हुई जो होटल के मालिक थे और भारत के आजमगढ़  के रहने वाले थे। अनौपचारिक परिचय के बाद उन्होने बढ़िया बगैर चीनी की चाय और नमकीन खुरमे का स्वल्पाहार कराया।  एक मीठी और मधुर सेल्फी के साथ स्वादिष्ट चाय का सेवन यादगार था।

एक भवन की पहली मंजिल पर लगे बोर्ड "सूर्योदय नगर पालिका" के कर्मचारियों से बोर्ड पर लिखे "इलाम" शब्द का अर्थ जानने की जिज्ञासा, उन लोगो से बातचीत मे भाषा की  संवादहीनता के कारण समझ न सका। एक भवन पर "नेपाली कॉंग्रेस" के कार्यालय का बोर्ड देख ठिठक गया। एक समय नेपाल मे सत्तारूढ़ रहे  दल के साधारण और सादगी पूर्ण कार्यालय को देख अपने देश के राजनैतिक दलों के भवनों और कार्यालयों से तुलना ने इन दलों की सोच और व्यवहरिकता पर सोचने को मजबूर कर दिया??

एक बजाज लोडर पर लाउड स्पीकर पर कुछ सेल करने की आवाज सुनाई दी, पर भाषा की अनिभिज्ञता के कारण न  समझ सका। नजदीक आने पर ज्ञात हुआ 100 रुपए मे पैकेट बिक्री का कार्य हो रहा था। पता किया तो उस पैकेट मे चार सौ ग्राम नीबू का पैकेट बेचा जा रहा था जो कौतूहल का विषय था। नेपाल मे वस्तु विनिमय से ज्यादा देशाटन का उद्देश्य पूर्ण हुआ और अब नेपाल से अपने देश की सीमा मे बापसी का समय था। 

सड़क से निकलती टैक्सी के एक ओर भारत और दूसरी ओर नेपाल को देखना कौतूहल उत्पन्न करने वाला था। श्रीमद्भगवत गीता मे एक श्लोक पढ़ा था:-

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।।17.20।।

यहाँ सात्विक दान के माध्यम से बताया गया कि प्रत्येक घटित घटना या प्रसंग के पीछे देश (स्थान), काल (समय), पात्र (व्यक्ति) का हाथ होता है। कैसे एक देश की सीमा रूपी रेखाओं  के बदलने से वहाँ रह रहे नागरिकों के भाग्य बदल जाते है और कैसे उन्हे उस देश मे रहने की कीमत अदा करनी पड़ती है।  जिसका जीवंत उदाहरण आज का पाकिस्तान है!! यदि आज पाकिस्तान की सीमा रेखाएँ  अखंड भारत का हिस्सा होती  तो वहाँ के नागरिकों को 10 किलो आटे के लिए लाइन मे लग कर, दर-दर की ठोकरे न खाने पड़ती। इसलिए यात्रा कार्यक्रम मे नेपाल, बांग्लादेश और चीन की सीमाओं का भ्रमण से मेरा ये निष्कर्ष था कि भारत के प्रत्येक नागरिक को अपनी उन्नति, बुद्धिमति  और अभिव्यक्ति व्यक्त करने  की जो स्वतन्त्रता हांसिल है, शायद ही किसी अन्य देश मे हो!!

विजय सहगल

  

                  

 

6 टिप्‍पणियां:

Surinder Pal Bhatia ने कहा…

अति उत्तम एवं जीवंत प्रस्तुति। पड़ते हुए मैं स्वयं को उस यात्रा का सहयात्री महसूस करने लग गया। लेखक को साधुवाद। अनुरोध है कि यह बताएं कि नेपाल में प्रविष्ट होते समय क्या क्रोना वैक्सीन का सर्टिफिकेट दिखाने को बोला गया।

बेनामी ने कहा…

बहुत सुंदर सहगल जी आपकी लेखन शैली पाठक को भी अपने साथ उस यात्रा के सुख की अनुभूति कराता है ।

बेनामी ने कहा…

आदरणीय सहगल जी,
यात्रा वृतांत का सुंदर वर्णन ,ठीक खोजी पत्रकार की तरह।
जल्दी ही आप पड़ोसी राष्ट्रों की यात्रा करें, ऐसी आशा करते हैं ।

विजय सहगल ने कहा…

भाटिया जी नमस्कार Sir यहाँ तो जरूरी नहीं था। पर काठमांडू या अन्य का नहीं मालूम। आपकी प्रेरक टिप्पड़ी हेतु आभार।

Deepti Datta ने कहा…

बहुत सुन्दर Sir..

जगदीश राठौर ने कहा…

बहुत बढ़िया सर जी
पढ़ते समय ऐसा लगा की मैं भी आपके साथ घूम रहा हूं