बुधवार, 28 दिसंबर 2022

भारत जोड़ो?

 

भारत जोड़ो?





देश जिन्होने बांटा, सोचो!, वो थे कौन?
चीन ने हड़पी धरा हमारी तब थे मौन?
जिन वीरों ने "वैरी" को घर घुस मारा।
पीठ दिखा कर भाग रहे "अरि" को ललकारा॥
मुहब्बत की दूँका, खुल गयी
नफरत के बाज़ार मे !
सौदागर ज्यों बेंचे कंघी,
"गँजो" के त्योहार मे !!
निकल पड़े, "पैदल" अब "भारत जोड़ो"।
है नियत मेँ खोट तुम्हारी, अब ये नाटक छोड़ो ॥
देश की खातिर, देह नहीं तुम, जिव्हा हिलाते ।
सीमा के हर सैनिक का तुम मान बढ़ाते ॥
देश तुम्हें "सिर आँख बिठाता"!
राह, "पलक पाँवड़े बिछाता"!!
पर, हा!! शोक!
दुःखद, संयोग!!
जिन वीरों ने देश की खातिर, जान गवाई !
उनको तुमने "पिटा" बताया, "लाज" न आयी !!
उपेक्षित कर, जो वक्त को छेड़ेगा।
काल चक्र भी, "राह" उन्हे पीछे छोड़ेगा॥

विजय सहगल

सोमवार, 26 दिसंबर 2022

साहिबजादों का बलिदान

 

"साहिबजादों का बलिदान"





अचानक दूर से आ रही घोड़ो के टापऊँ की आवाज जब पंजाब प्रांत के सरहिंद कस्बे मे मोरिंडा गाँव के  नजदीक ही  गंगू नामक व्यक्ति के छोटे से घर के सामने आ कर रुकी तो 6 साल के  साहिबजादे फतेह सिंह और उनके बड़े भाई 8 वर्षीय जोरावर के चेहरे पर एक पल खुशी के भाव नज़र आये कि शायद उनके पिता महाराज गुरु गोविंद सिंह जी तक उनका संदेश पहुँच चुका है और वे अपने  दो अग्रज भ्राताओं  के साथ उन्हे लेने आये है। पर माता गुज़री को कुछ अनिष्ट की आशंका ने घेर लिया और अचानक नंगी तलवार लिए कुछ सैनिकों ने झोपड़ी के दरवाजे को क्रूरता पूर्वक धकेल कर खोला। माता को समझते देर न लगी जिस गंगू रसोइया को महाराज ने ताउम्र अपने महल मे एक अहम भूमिका  दे रसोई की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी थी वही आज चाँदी के चंद टुकड़ो की लालच मे उनके परिवार के साथ विश्वासघात करेगा। अनिष्ठ की आशंका सच साबित हुई रसोइये गंगू ने सरहिंद के सूबेदार वज़ीर खाँ  से गुरु माता गुज़री और दोनों साहिबजादों को मुखबरी कर पकड़वा दिया।  

दोनों साहिबजादों को परिवार से मिले संस्कारों, स्वाभिमान और परिस्थितियों से मिले  अनुभव ने उन्हे  अपनी उम्र से कहीं अधिक परिपक्व बना दिया था। उन्होने बिना एक पल गवाए ख़जर की मूठ पर हाथ रख आक्रामक मुद्रा अख़्तियार कर ली थी। माता गुजरी सहित दोनों साहिबजादे जो गंगू से अपार स्नेह रखते थे, चंद पैसों की लालच मे उनसे ऐसा कुठराघात करेगा ऐसी उम्मीद कदापि न थी। उन्हे सरहिंद के सूवेदार वज़ीर खान के आदेश से किले की ठंडी बुर्ज पर कैद कर लिया गया। माता गुजरी अपने पुत्र गुरु गोविंद सिंह सहित  अपने अन्य दो पौत्रों की अजीत सिंह और जुझार सिंह के लिये तो चिंतित थी ही इस विश्वासघात से वे क्षणिक विचलित जरूर हुई पर उनके और दोनों साहिबजादों के हौंसलों मे कोई कमी न थी।

सूबेदार नवाब वज़ीर खान ने जब अपने सिपहसालार के माध्यम से माता गुज़री के समक्ष दोनों साहिबजादों को इस्लाम स्वीकारने या मृत्यु को वरण करने के प्रस्ताव को अस्वीकारने की बात सुनी तो आग बबूला हो गया।  सन् 1705 के  पूस माह की उस सर्दीली काली रात मे माता गुजरी और दोनों अबोध साहिबजादों को किले की बुर्ज रात मे रखा गया तो मानवता शर्मसार थी! सरहिंद किले की बुर्ज पर उस गलन और ठिठुरन भरी, सर्द रात मे माता गुजरी देवी अपने दोनों पौत्रों को अपनी छाती से चिपकाए, अपने कलेजे के टुकड़ों को ठंड से बचाने का प्रयास कर रहीं थी और दोनों पौत्र साहिबजादे फतेह सिंह और जोरावर सिंह इस प्रयास मे थे कि उनकी दादी माँ को ठंड न लगे इस कारण माता को अपने हाथों के घेरे मे  जकड़ रखा था!! दादी माँ और पोतों का एक दूसरे के प्रति अपनत्व, सम्मान और समर्पण का एक अनूठा उदाहरण था। पूस की उस सर्दीली रात मे वे सभी ठंड से ग्रसित थे फिर भी एक दूसरे को बचाने के प्रयास कर रहे थे और क्रूर आततायी मुगल नवाब का पत्थर दिल मनुष्यता को तार तार कर पशुता की पराकाष्ठा का  प्रदर्शन कर रहा था।

जब वज़ीर खाँ की जुल्म ज्यादती भी माता गुजरी और उनके दोनों पुत्रों के मनोबल न तोड़ सकी तो लगातार जुल्मों सितम के बीच 13वे दिन वज़ीर खान ने पुनः एक बार जब भरी कचहरी मे दोनों साहिबजादों  को कहा,  "बोलो! इस्लाम कबूल करते हो"? छह वर्षीय छोटे साहिबजादे  फतेह सिंह ने निर्भीक होकर नवाब से पूंछा?.... अगर, मुसलमाँ हो गए तो क्या फिर कभी नहीं मरेंगे? वज़ीर खान इस छोटे बालक के दिलेर हौसले पूर्ण सवाल से अवाक था!! नवाब की कचहरी मे सन्नाटा छा गया!! कुछ  चापलूस सैनिक अपनी वफादारी के प्रदर्शन मे कृपाण से तलवार निकाल नवाब के आदेश की प्रतीक्षा मे आगे बढ़े!! परंतु अधिसंख्य सैनिक और ओहदेदार इन वीर बालकों की दिलेरी और बहदुरी पर हक्का-बक्का थे!   

कचहरी मे पसरे सन्नाटे के बीच जब वज़ीर खाँ के मुंह से कोई शब्द न फूटा, तो  फिर एक बार बालक फतेह सिंह ने अपने अग्रज जोरावर सिंह की ओर देखते हुए कहा, जब मुसलमाँ हो कर भी मरना ही है तो क्यों न अपने धर्म की रक्षा करते हुए मरें!! ईर्ष्या और नैराश्य से ग्रसित उस निर्दयी नवाब ने दोनों बालकों को जिंदा दीवार मे चिनवा देने का अमानवीय आदेश दिया!! कचहरी मे उपस्थ्ति सेना नायक और सैनिक जो गुरु गोविंद सिंह जी से बैर रखते थे वे भी नवाब के दोनों बालको को जिंदा दीवार मे चिनवा देने के आदेश से मन ही मन असहमत थे।

एक वहशी और बर्बर सूबेदार के आदेश के पालन के लिये राज मिस्त्री मजबूर थे। दोनों साहिबजादों  को जब खुले और बड़े अहाते मे सजा देने के लिये लाया जा रहा था प्रवेश द्वार को बहुत ही छोटा बनाया गया था ताकि ओज़ और स्वाभिमान से परिपूर्ण साहिबजादें वज़ीर खाँ की अदालत मे झुक कर प्रवेश करें!! किन्तु बलिदान के लिये अपने प्राणों की आहुति देने को तत्पर साहिबजादों  ने पहले पैरों को प्रवेश द्वार मे वढा  अपना सिर विपरीत दिशा मे कर कचहरी मे प्रवेश किया और इस तरह एक  बार फिर, वजीरखान का  साहिबजादों को नीचा दिखाने के मंसूवे पर पानी फेर दिया।

जब सन् 1705 की दिसम्बर माह की 26 तारीख को  दोनों साहिबजादों  को जिंदा खड़ा कर दीवार मे चिनवाया जा रहा था तो दोनों निर्भीक और निडर बालको के मुख पर स्वाभिमान का ओज़, तेज और अलौकिक प्रकाश चमक रहा था जो अपने धर्म और मानवता की रक्षार्थ अपने प्राणों की आहुति सहर्ष देने को तत्पर थे। जब दीवार की चिनाई छोटे साहिबजादे फतेह सिंह की गर्दन तक पहुँच गयी तो अचानक बड़े भाई जोरावर सिंह की आँखों मे आये आंसुओं को देख फतेह सिंह ने कहा, "जोरावर, तूँ रोता क्यों है? क्या मृत्यु से डर गया? जोरावर ने कहा, "नहीं!! भाई, रो इसलिये रहा हूँ कि "दुनियाँ मे आया मै पहले था पर कौम की खातिर शहीद तूँ पहले हो रहा है!!" तूँ है तो छोटा पर तेरी सहादत बहुत बड़ी है!! इतना कहते कहते दोनों भाई वेहोश हो गए और पीछे रह गयी उन दोनों साहिबजादों  का बलिदान जो उन्होने सनातन धर्म और देश की रक्षार्थ अपने प्राणों की आहुति दे कर किया। अपने अबोध और प्राणों से प्रिय पौत्रों के निधन का समाचार माता गुजरी ने सुना तो इस गम मे उनका भी देहावसान 27 दिसम्बर 1705 मे हो गया।    

यही नहीं सन् 1705 के ( पूस माह की छट से लेकर त्रियोदशी ) दिसम्बर 21 से 27 अर्थात 7 दिन मे  मुगल शासक औरंगजेब के क्रूर शासन के विरुद्ध गुरु गोविंद सिंह के पूरे परिवार ने अपना आत्म बलिदान कर दिया। अन्याय अधर्म के विरुद्ध लड़ते हुए "धर्मो रक्षति रक्षितः" के सूत्र को प्रतिपादित करने वाले ऐसे  सरवंसदानी गुरुगोविंद सिंह जी, उनकी परमादरणीय माता गुजरी और चारों साहिबजादो श्री अजीत सिंह, श्री जुझार सिंह, श्री जोरावर सिंह, श्री फतेह सिंह जी को हमारे श्रद्धा सुमन, सादर नमन।

विजय सहगल

शनिवार, 24 दिसंबर 2022

सुधि पाठक

 

"सुधि पाठक"







आज मै अपने ब्लॉग (sahgalvk.blogspot.com) के सुधि पाठक गणों का हृदय से धन्यवाद ज्ञपित करना चाहता हूँ जिन्होने हमारे ब्लॉग को अपना 50 हजार वां स्नेह स्पर्श, आशीर्वाद प्रदान किया। आज का दिन मेरे लिये निश्चित ही खुशी और आनंद का है क्योंकि अपने स्नेहिल पाठकों की  हौसला अफजाई और उत्साहवर्धन से मै अभिभूत हूँ। अगस्त 2018 मे शुरू ब्लॉग लेखन की ये यात्रा अपने जागरूक, मित्रवत  पाठकों के ऊर्जास्पद स्नेह के बिना संभव नहीं थी। इस ब्लॉग यात्रा के दौरान ऐसे अनेक पाठकों, प्रियजनों ने अपने विचारों और संदेशों से हमारी ब्लॉग यात्रा को समृद्ध किया है जिसका मै ऋणी हूँ। देश की सीमाओं से परे हमारे प्रवासी भाई/बहिनों ने भी इस सूचना तकनीकि के युग मे वतन से दूर अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति  स्नेह और  प्रेम को जब अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन से हिन्दी पाठकों का अपनी भाषा से  प्रेम और  समर्पण देखा तो उनके प्रति सिर आदर और सम्मान से झुके बिना नहीं रह सकता। आस्ट्रेलिया, रूस और कनाडा, यूएई जैसे देशों मे तो भारत वंशियों की संख्या लाखों मे है  तो उनका ब्लॉग पढ़ना लाज़मी है पर वियतनाम, बेल्जियम, नीदरलैंड, आयरलैंड जैसे देशों मे भले ही हिन्दी प्रेमियों की संख्या नगण्य है फिर भी उनका हिन्दी  ब्लॉग पाठन आश्चर्य से उत्साहित और रोमांचित  तो करती ही है। हम इन प्रवासी भाइ-बहिनों के भी  हृदय से आभारी है जिन्होने हमारे ब्लॉग पाठकों की सूची मे अपना नाम दर्ज़ कर मेरा गौरव बढ़ाया है।       

384 ब्लॉगस के माध्यम से हम अपने सुधि पाठकों के ऋणी है जिन्होने हमारा उत्साह वर्धन किया। इन ब्लॉग के विषय मे देश के एक साधारण नागरिक के यात्रा वृतांत, जीवन से जुड़ी सफल और असफल घटनायें/अनुभव, समाज के निचले और कमजोर वर्ग के लोगो से संपर्क, उनके दुःख दर्द को तो हमने सांझा किया ही जो मेरा प्रिय विषय है पर  कभी कभी बगैर किसी पूर्वाग्रह के राजनैतिक विषयों को भी छूने का प्रयास किया जिनका प्रचार प्रसार विभिन्न समूहों की नीति नियम के चलते सीमित रहा फिर भी पाठकों का स्नेह और असहमति का मैंने अनासक्त भाव से सिरोधार्य किया।    

सोश्ल माध्यमों जैसे फ़ेस बुक, ट्वीटर से परे ब्लॉग लेखन के लिये प्रेरित करने के लिये मै भोपाल के मेरे साथी श्री #मोहित गुप्ता जो सूचना प्रौद्योगिकी  के इंजीनियर है और मेरे अभिन्न सहयोगी है  का विशेष धन्यवाद दूँगा क्योंकि मै इस कला मे इतना पारंगत और प्रवीण नहीं था, आज भी नहीं हूँ!! अपने संदेशों, सुझावों और टिप्पड़ियों के माध्यम से अनेकों परिचित और अनाम श्रेष्ठियों (क्योंकि उन्होने संदेश के साथ अपना नाम का उल्लेख नहीं किया) के योगदान को भी नहीं भुलाया जा सकता जिन्होने  हमारे ब्लॉग को समृद्ध करने मे अपनी अहम भूमिका निभाई। मै ऐसे सभी  प्रिय पाठकों का भी हार्दिक आभार ज्ञपित करता हूँ जिन्होने हमारा उत्साहवर्धन, हौसला अफजाई और हिम्मत बढाई।   

हमारे सर्वोच्च 10 ब्लॉगस मे प्रथम स्थान पर "मेरी मुंस्यारी साधना शिविर" की यात्रा पवित्र तीर्थ यात्रा को स्थान देकर हमारे प्रिय पाठकों ने हमारी भारतीय सनातन धर्म के प्रति आस्था और विश्वास, सांस्कृतिक, संस्कारों के विचार को दृढ़ किया है जिसके लिये मै उनका आभार व्यक्त करता हूँ। इसी क्रम मे बैंक कर्मियों के वेतन समझौते एवं आईबीए की इन्शुरेंस नीति  सहित यात्रा वृतांत कुफ़री और काजीरंगा को भी स्थान दिया लेकिन इस सर्वोच्च 10 ब्लॉग मे  महिला दिवस पर मेरी  "माँ" को लिखे पत्र को सराहने पर मै अति भावुक हूँ और इस हेतु मै आप सब का ऋणी  हूँ और इस ऋण से कभी उऋण नहीं होना चाहता क्योंकि आप सभी की तरह मै भी अपनी माँ से बेइंताह प्यार करता हूँ।

मै एक बार पुनः अपने सुधि, प्रिय, मूल्यवान पाठकों का हृदय से आभार, धन्यवाद!!

विजय सहगल            

सोमवार, 19 दिसंबर 2022

दारू पिया तो मरा?

 

"दारू पिया तो मरा"?

 





महात्मा गांधी के नशाबंदी अभियान को बिहार मे  "अक्षरशः" "पूरी जी जान" से लागू करने वाले सुशासन बाबू श्री नितीश कुमार ने बीड़ा तो उठाया पर साथ ही साथ वे  महात्मा गांधी का एक बड़ा ही प्रिसिद्ध सद्वाक्य है, "अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं" को विस्मृत कर गये। महात्मा गांधी के विचारों के निष्ठावान समर्थक श्री नितीश कुमार शायद पिछले दिनों उनके राज्य मे नशाबंदी के बावजूद जहरीली शराब पीने से मारे गये 100 से ज्यादा  लोगो की मौत पर इतने निष्ठुर हो गये कि उन्होने अपने वक्तव्य मे घटना मे मारे गये लोगो को कोसते हुए बिहार विधान सभा मे 16 दिसम्बर 2022 मे कहा-:

"अं बिहार मे", "अरे तब तो बिहार मे हर जगह कहें के देखो", "मरा", "दारू पिया तो मरा, मत पियो!, मरोगे! इसका तो और ज्यादा हम प्रचार करेंगे!! दारू पी के मर गये था  तो उसको हम लोग "compensation" (मुआवजा) देंगे? सवाल ही नहीं पैदा होता!! कभी मत सोचिये!"

कोई जन कल्याण कारी राज्य का मुख्य मंत्री राज्य के 100 से ज्यादा   नागरिकों की असामयिक दर्दनाक मौत पर इस तरह का संवेदनहीन, शर्मनाक, और लज्जास्पद वक्तव्य कैसे दे सकता है? वेशक शराबबंदी, नशाबंदी के कानून की अवेहलना के चलते, जहरीली शराब पीने से मारे गये ये निरीह नागरिक जो समाज के निचले, निर्धन, अशिक्षित वर्ग से संबन्धित थे, बेशक इन्होने राज्य का कानून तोड़ा? मुख्यमंत्री महोदय कानून का पालन तो आप भी ठीक से नहीं करवा पायें? अन्यथा ये कैसे संभव है कि 100 से ज्यादा मृतक  सिर्फ दारू पीने वाले ही दोषी थे? क्या आपकी सरकार की कानून लागू करवाने वाली एजेंसी, पुलिस महकमा, आबकारी विभाग दोषी नहीं है? जिनकी ज़िम्मेदारी थी कि वह शराब बंदी, नशाबंदी समुचित ढंग से लागू करवाकर जहरीले शराब व्यापार पर लगाम लगते?  क्या पैसा कमाने की आड़ मे, भ्रष्टाचार से परिपूर्ण  इस जहरीले शराब के व्यापार मे आपके ही प्रशासन के लोग तो लिप्त नहीं है? जिनके कारण इतना बड़ा नर संहार हो गया और आप एवं आपकी एजेंसिया इस काम को नज़रअंदाज़ कर हाथ पर हाथ धरे बैठी रहीं? इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि देश मे जब जब प्रतिबंध के कानून बनाए गये तब तब शासन और सरकारों के कर्मचारियों ने भ्रष्टाचार कर इन नियम और क़ानूनों को लागू करने मे पलीता लगाया है!! रिश्वत और भ्रष्टाचार ने इन कानून की सरे आम धज्जियां उड़ाई है! गुजरात और बिहार मे लागू नशाबंदी वाले राज्यों  मे आज भी धनवान और साधन सम्पन्न श्रेष्ठी!! वर्ग को शराब का हर वो ब्रांड उपलब्ध है जो वो इक्छा करते है!! लेकिन इन्ही राज्यों मे निर्धन और निचले वर्ग के लोगों को इसी नशाबंदी की आड़ मे धन और जान से हाथ धोना पड़ता है, अन्यथा क्या कारण है कि शराब का सेवन करने वाले समृद्ध शाली वर्ग का एक भी व्यक्ति आज तक इस कानून की जद मे नहीं आया? और न ही कभी उसकी जहरीली शराब से मृत्यु हुई?  यदि शराब बंदी न होती तो कम से कम शुद्ध शराब तो मिलती? ये बदनसीब लोग अवैध जहरीली शराब पी कर बेशक बर्बाद हो जाते पर कम से कम जिंदा तो रहते!! मारे तो न जाते? इन्हे मिलावटी शराब तो न पीनी पड़ती? आपने जिस अमानवीय ढंग से इन 100 से ज्यादा  लोगो की मौत से ये कह कर पल्ला झाड़ लिए कि "दारू पिया तो मरा"!! मत पियो! मरोगे!!  महोदय ये सभी निर्धन और दबे, कुचले वर्ग के लोग दारू से नहीं मरे  बल्कि इन्हे जहर देकर मारा गया है और जिसके लिए आपकी सरकार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जिम्मेदार है!!  समाज के इन निम्न, असहाय और निर्धन  मृतकों के साथ इतना तिरिस्कार पूर्ण अशोभनीय व्यवहार बिहार के "सुशासन बाबू" को  शोभा नहीं देता?

एक जन कल्याण कारी सरकार के मुखिया के नाते पान मसाला, गुटका, तंबाकू, शराब खाने/पीने वाले लोगो को उन्हे उनके रहमोकरम पर यूं नहीं छोड़ सकते। वे भी इस समाज के अंग है। इन्हे भी सही राह पर लाने के लिए कठोरता के साथ साथ संवेदना शिक्षा की आवश्यकता है अन्यथा जेलों मे सजा काट रहे कैदियों को सदा के लिए अपराधी मान उनमे  शिक्षा के माध्यम से सुधारात्मक कार्यकलापों को क्यो चलाया जाता?  उन्हे उनके हाल पर यो ही  छोड़ा नहीं जा सकता? हमारे नीति नियंताओं ने एक लोकतान्त्रिक गणराज्य मे लोक हितकारी राज्य की संकल्पना यूं ही नहीं की थी? आपकी सरकार के नौकरशाहों ने यदि ईमानदारी और कर्तव्य परायणता दिखाई होती तो कदाचित इन 100 से ज्यादा  लोगो को  व्यर्थ ही प्राण न गँवाने पड़ते?   इसलिये जिन लोगो ने नशाबंदी कानून की अवेहलना की वे तो परलोक गमन कर गये पर उनके आश्रितों का क्या अपराध था? जो अपने संरक्षकों के न रहने से दाने-दाने को मुंहताज़ हो कर सड़क पर आ गये!! इस जहरीली शराब कांड की  जांच कर इस संबंध मे समुचित और कठोर कार्यवाही कर दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करें साथ ही साथ पीढ़ित परिवारों समुचित आर्थिक राहत दे, एक सदाशय और उदारमना राज्य की कल्पना को साकार करें! और महात्मा गांधी के उस कथन को चरितार्थ करें कि "अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं"!!

विजय सहगल


गुरुवार, 15 दिसंबर 2022

दार्जिलिंग टॉय ट्रेन

 

"बटासिया लूप", "हैयर पिन कर्ब"- "दार्जिलिंग टॉय ट्रेन"










यध्यपि मैंने ऊटी मे नीलगिरी रेल, शिमला मे कालका शिमला ट्रेन देखी थी पर दार्जिलिंग टॉय ट्रेन के बारे मे भी काफी सुन रक्खा था। इसलिये जब 8 नवम्बर 2022 को दार्जिलिंग जाने का कार्यक्रम बना तो एक माह पूर्व मैंने ट्रेन संख्या 52541 न्यू जलपाईगुड़ी - दार्जिलिंग पैसेंजर के वातानुकूलित कुर्सियान मे अपना अग्रिम आरक्षण करा लिया। सन 1879 मे शुरू हुई इस ट्रेन को विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है।  आरक्षण कराते समय सिर्फ दो ही श्रेणी के डिब्बों का विकल्प बताया गया। प्रथम श्रेणी और वातानुकूलित कुर्सी यान। वातानुकूलन का विकल्प ले मुझे दार्जिलिंग के लिए  समयानुसर 8 नवम्बर 2022 को प्रातः 10 बजे के पूर्व  न्यू जलपाई गुड़ी पहुँचना था। मुझे 7 तारीख को  गुवाहाटी से अवध आसाम डिब्रुगढ़ एक्सप्रेस से न्यू जलपाई गुड़ी पहुँचना था। लेकिन दुर्भाग्य से उक्त ट्रेन तीन घंटे से ज्यादा लेट हो चुकी थी। मुझे चिंता ये हो रही थी कि यदि असम एक्सप्रेस लेट हो गयी तो महीनों पहले से टॉय ट्रेन से यात्रा करने की योजना पर पानी फिर जाएगा। पर आशंका के विपरीत 9.15 बजे हम न्यू जलपाई गुड़ी पहुँच गए और ट्रेन छूटने की अनहोनी से बच गए। हमे बताया गया था न्यू जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग यात्रा के दौरान न तो ट्रेन मे और न ही रास्ते के स्टेशनों पर कुछ खाने पीने को मिलेगा अतः मुझे  खाने-पानी की व्यवस्था करके ही ट्रेन मे चढ़ना था। स्वल्पाहार करना लाज़मी था। नाश्ते की तलाश मे दार्जिलिंग के प्लेटफॉर्म पर भारतीय रेल द्वारा संचालित रेल डिब्बे के आकार की कैंटीन ने मन मोह लिया और स्वल्पाहार करने हेतु मै अपनी पत्नी के साथ उक्त कैंटीन का आथित्य ग्रहण करने हेतु पहुँच गया। स्वादिष्ट स्वल्पाहार के उपरान्त हम लोग टॉय ट्रेन की सवारी हेतु प्लेट फोरम पर पहुँच गए

दार्जिलिंग टॉय ट्रेन अपने ठीक वक्त 10 बजे से 15-20 मिनिट पूर्व प्लेट फॉर्म पर लग गयी। इस दौरान सभी यात्री तसल्ली पूर्वक अपनी अपनी सीटों पर बैठ गए। टॉय ट्रेन  के गार्ड श्री लामा जी से मुलाक़ात हुई पर इस ट्रेन मे गार्ड साहब का कोई डिब्बा अन्य ट्रेनों की तरह अलग से  नहीं था। प्रथम श्रेणी मे ही एक सीट पर उनका कार्यकलाप चल रहा था। ट्रेन मे मौजूद टिकिट निरीक्षक महोदय द्वारा  सभी यात्रियों के टिकिट चैक करते ही  ठीक समय पर ट्रेन ने दार्जिलिंग स्टेशन से अपनी रवानगी शुरू कर दी। गर्मी के इस मौसम मे वातानुकूलन की सुविधा ने गर्मी से कुछ राहत थी पर  वातानुकूलन की ये सुविधा प्रथम श्रेणी मे उपलब्ध नहीं थी। दार्जिलिंग तक की 83 किमी॰ की  दूरी इस ट्रेन को पड़ने वाले 13 स्टेशन के माध्यम से 7.30 घंटे मे पूरी करनी थी। हमारी अपेक्षा के विपरीत शुरुआत कुछ अच्छी नहीं थी। पड़ने वाले 2-3 स्टेशन पर गंदगी का साम्राज्य था। हमने सोचा था  ऊटी या शिमला की टॉय ट्रेन की तरह हरियाली, नदी, पेड़ों के बीच से ट्रेन सीटी बजाती पहड़ों के बीच से गुज़रेगी। लेकिन शुरुआत बेशक ठीक न रही हो पर यात्रा का मध्य और कुछ हद तक अंत ठीक  था। सड़क मार्ग के समांतर लहराती-बलखाती रेल कभी सड़क के बाएँ से और कभी दायें से आरपार निकाल जाती। ट्रेन की सीटी सुन लोग रास्ता देने के लिए खड़े हो जाते। जैसे जैसे ट्रेन आगे बदती गयी बैसे-बैसे पहाड़ी रास्ते, ऊंचे ऊंचे पेड़, पहाड़ों से बहते झरने, घरों मैदानों मे खिले डहेलिया, गुलाब, गुलदाउदी, जीनिया, मैरिगोल्ड के फूल पौधे जगह जगह दिखाई दे रहे थे। ट्रेन ने पूरी यात्रा के दौरान लगभग 50 से भी ज्यादा बार सड़क को क्रॉस किया होगा। कुर्सियांग, घूम, दार्जिलिंग मे  मे तो ट्रेन सड़क के बीच मुख्य बाजार से हो कर गुजर रही थी। हम लोगो को और बाजार, सड़क के लोग हम यात्रियों को उत्सुकता और प्रसन्नता से एक दूसरे को देख रहे थे। ट्रेन जहां से निकल जाती लोग अपने मोबाइल से ट्रेन की हर एक झलक को अपने कैमरे से कैद कर रहे थे या वीडियो बना रहे थे। कभी ट्रेन लोगो के घरों के आगे से निकलती कभी ट्रेन लोगो के घर और आँगन के पीछे से सीटी बजाती निकल जाती। कभी कभी तो ट्रेन लोगो के वाहन और घरों के बीच बैरियर बन बाधा खड़ी कर निकाल जाती। रेल स्टाफ से बातचीत मे ट्रेन और सड़क चलते वाहनों के बीच किसी दुर्घटना के बारे मे पूंछने पर गार्ड साहब ने कभी भी किसी दुर्घटना से अपनी अनिभिग्यता प्रकट की जो कबीले तारीफ थी और ये दर्शाती थी कि सड़क पर चलने वाले वाहन और लोग सड़क पर ट्रेन के प्रथम अधिकार को  स्वीकार,  सम्मान और आदर प्रेषित करते है। तिनधारा और आगे कुर्सियांग स्टेशनों पर स्टाफ द्वारा पूर्व  सूचना देकर  ट्रेन को 10-10 मिनिट के लिए  चाय, स्वल्पाहार के लिए रोका गया। जहां तीनधारा स्टेशन पर दार्जिलिंग से आने वाली ट्रेन की क्रोस्सिंग थी साथ ही साथ इस स्टेशन ने  हम यात्रियों का स्वागत गरमागरम मोमोज से किया वही कुर्सियांग स्टेशन चारों तरफ भीड़-भाड़ और गहमा-गहमी भरे बाज़ार के बीच मे था जहां चाय के लिए बाजार मे जाना पड़ा।   इन स्टेशनों  को संयुक्त राष्ट्र की धरोहर का दर्जा प्राप्त हुआ है। घूम स्टेशन पर दार्जिलिंग रेल का एक छोटा सा म्यूजियम बनाया गया है। जहां पर पुराने कोयले/भाप के इंजिन, पुराने यात्री और मालगाड़ी के डिब्बे एवं अन्य उपकरण को दर्शाया गया था।

हैयर पिन कर्ब जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग स्टेशन तक की पूरी यात्रा के दौरान इस रेल मे एक अनोखी, इकलौती बेहतरीन इंजीन्यरिंग के नमूने  की  घटना देखने को मिली जो दार्जिलिंग ट्रेन को शेष  दुनियाँ से अलग रखती है वो है ट्रेन द्वारा पहाड़ों की ऊंचाई को हैयर पिन कर्ब के माध्यम से उपर चढाना!! इस प्रिक्रिया मे "N" आकार के पथ पर पहले ट्रेन को सीधे एक ऊंचाई तक ले जया जाता है। फिर वहाँ ट्रेन को रोक कर ड्राईवर रेल लाइन को बदल कर विपरीत दिशा मे पुनः ऊंचाई पर ले कर जाता है जहां पर एक बार रेल को रोक पुनः लाइन बदल कर अब इंजिन की दिशा मे एक बार फिर  ट्रेन घुमाव दार पहाड़ी  रस्तों पर आगे की यात्रा के लिए चल पड़ती है। पूरी यात्रा मे इस तरह के हैयर पिन कर्ब पर ट्रेन पाँच-छह बार आगे पीछे हो कर पहाड़ों की ऊंचाई को कम समय और दूरी से ऊपर चढ़ती जाती है।  स्वल्पाहार और लंच के समय तिनधारा और कुर्सियांग स्टेशन पर ठहराव के दौरान ट्रेन के  नियमों के साथ साथ यात्रियों और रेल स्टाफ के बीच आपसी सामंजस्य और सद्भाव की अनूठी मिशाल देखने को मिली। जब तक सभी यात्री बापस नहीं आ गये ट्रेन आगे नहीं बढ़ी।

बटासिया लूप भी दार्जिलिंग रेल का एक अद्भुद इंजीन्यरिंग का नमूना पेश करती है। बताते है कि 1919 मे अंग्रेजों द्वारा एक पहाड़ी पर से रेल पथ का निर्माण पूरा करने मे 360 डिग्री के गोल घेरे पर पहाड़ के चारों तरफ कवर करते हुए रेल लाइन का निर्माण करने की चुनौती थी। इस चुनौती को स्वीकार कर 140 फुट के इस घेरे मे बड़े चमत्कारिक ढंग से रेल ट्रैक को धीरे धीरे एक निश्चित तरीके से इस तरह नीचे लाया गया कि जहां से ट्रेन लाइन पहाड़ पर प्रवेश करती है उसी रेल लाइन के नीचे से होकर ट्रेन पहाड़ से नीचे उतर जाती है। बतासिया लूप दार्जिलिंग रेल का एक अद्भुद मानव निर्मित नमूना है जो दार्जिलिंग रेल के सुचारु संचालन मे सहयोग करता है। बैसे बटासिया का अर्थ है खुली जगह और लूप का अर्थ है गोल घेरा। इस छोटी सी मनोरम पहाड़ी एक ओर से बरफ से ढँकी कंचन जंगा की हिमालय रेंज दिखाई देती है वही दूसरी ओर दार्जिलिंग का मनोरम दृश्य भी दिखाई देता है। रेल लाइन के चारों ओर सुंदर आकर्षक फूलों की क्यारियाँ बनाई गई है जिनके बीच मे पैदल मार्ग से पहाड़ी मे चारों ओर जाया जा सकता है। गोरखा रेजीमेंट के बीर शहीदों की याद मे इस लूप के केंद्र मे बनाए गए  युद्ध स्मारक के कारण इस स्थान के  गौरव और प्रतिष्ठा की शान और  बढ़ गई है। यध्यपि रेल लाइन के किनारे अवैध रूप से वस्तुओं का व्यापार न केवल इस स्थान की कुरूपता को बढ़ाने और रेल लाइन के किनारे खड़े लोगो की जान जोखिम मे भी डालता है। शासन को इसे रोकने के लिए समुचित कार्यवाही करनी चाहिए।

इस तरह 8 घंटे लंबी लगभग 80 किमी की ये यात्रा का आरंभ धीमा, मध्य अति उत्साह और उमंग भरा था लेकिन अंत लंबी यात्रा के कारण कुछ कुछ उबाऊ रहा। पर हमे ज्ञात हुआ कि भारतीय रेल दार्जिलिंग मे भी इस टॉय ट्रेन की एक घंटे की यात्रा संपादित कराती है जिसमे भी इस ट्रेन का रोमांच और उत्साह का आनंद लिया जा सकता है। जिसका वीडियो मैंने इस ब्लॉग मे डाला है।

विजय सहगल  

शनिवार, 10 दिसंबर 2022

अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव पर- नादव लापिड का निंदनीय वक्तव्य

 

"अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव पर- नादव लापिड का निंदनीय वक्तव्य"






पिछले दिनों 29 नवम्बर 2022 को (इफ़्फ़ी) भारत का अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव/समारोह 2022 मे इज़राइली फिल्म मेकर नादव लापिड ने कशिमिरी पंडितों के नरसंहार पर बनी फिल्म "कश्मीर फाइल्स" को अशिष्ट, अभद्र और सस्ती लोकप्रियता की फिल्म क्या बताया भारत मे टुकड़े-टुकड़े वामपंथी गेंग को तो मानों "बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने" से प्राप्त  खुशी मिल गयी। आप पार्टी से दुत्कारे गये असफल पत्रकार  "आशुतोष" और "नन्दिता दास" जैसी वामपंथी विचारकों ने तो खुशी का इज़हार ये ट्वीट कर किया कि "अरे ये  क्या हो गया? अब तो मान लो!"। ये देश का दुर्भाग्य है कि सदियों से अँग्रेजों की गुलामी के कारण देश के वामपंथी बुद्धिजीवि पत्रकार और विचारक आज तक भी अपनी स्वतंत्र सोच विकसित नहीं कर सके। यही कारण है नन्दिता दास, आशुतोष, रविश कुमार जैसे तथाकथित पत्रकार अपनी ज्ञान, मेधा और बुद्धि से पैदा हुई सोच को तब तक अधूरा समझते है जब तक उन्हे विदेशियों का कोई  प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं हो जाता। यही कारण है कि इज़राइली फिल्म मेकर नादव लापिड के श्री विवेक अग्निहोत्री द्वारा लिखी और निर्देशित फिल्म  "कश्मीर फ़ाइल"  को  "वल्गरता" के प्रमाण पत्र  देने  पर आशुतोष और नन्दिता दास जैसे  पत्रकार और फिल्मकार फूले नहीं समाये।

अपनी खुशी के उताबलेपन पन मे "आशुतोष", नन्दिता दास शायद ये भूल गये कि इफ़्फ़ी  की जूरी नादव लापिड का  "कश्मीर फाइल्स" पर दिया गया बचकाना ब्यान  कोई ईश्वरीय संदेश नहीं जिसे नकारा न जा सके! इफ़्फ़ी   की  जूरी का पद प्राप्त करना  कोई सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के प्रतिष्ठता पूर्ण पद पर नियुक्त होना नहीं है कि जिसको प्राप्त होने पर गौरवान्वित महसूस किया जाए? इफ़्फ़ी से संबद्ध हुए बिना  भी फिल्म निर्माण  के विभिन्न आयामों का सृजन करने वाले साहित्यकार, गीतकार, संगीतकार, पटकथा लेखक, निर्माता, निर्देशक अपनी कला को अनासक्त भाव से बिना किसी प्रतिसाद, प्रतिफल या पारितोषिक  के अपने कार्य का सर्वश्रेष्ठ  अंजाम दे रहे है अन्यथा  इनके बिना इफ़्फ़ी जैसी संस्थाएं सिर्फ और सिर्फ "नचैइयों" की जमात मात्र है!! फिल्म निर्माण, साहित्य सृजन, संगीत या कला सधना किसी व्यक्ति या संस्था से  पुरुष्कार, अभिनंदन या सराहना  के मुंहताज के बिना ईश्वर को समर्पित कर स्वांतः सुखाय के लिए ही किए जाते है।   तब इफ़्फ़ी जैसी संस्थानों के जूरी नादव लापिड से कश्मीर मे हुए इस सदी के नृशंस नरसंहार पर बनी फिल्म "कश्मीर फ़ाइल" पर सकारात्मक टिप्पड़ी की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

बड़ा खेद और अफसोस है कि भारत के  अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के जिस जूरी "नादव लापिड" को भारत के कश्मीर मे सन 1990 मे कश्मीरी पंडितों के भीषण नर संहार की अज्ञानता!! और अल्पज्ञान फिल्म को असभ्य, अभद्र बताना, ये दर्शाता है कि भारत देश के बारे मे उनका ज्ञान कितना अधूरा और कितना थोथा है? क्या इज़राइली फिल्म मेकर श्रीमान नादव लापिड  भारत के  अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के जूरी बनने के योग्य भी थे? जिस नादव लापिड के "कश्मीर फ़ाइल" के  ब्यान पर  इज़राइली सरकार ने न केवल नादव की निंदा और भर्त्सना की अपितु उनके कथन पर भारत से माफी मांगी, उसके  साथ जुडने से ये  वामपंथी, टुकड़े टुकड़े गेंग सहित पत्रकार आशुतोष, नन्दिता दास  के मन मे लड्डू फूटना ये दर्शाता है कि वे कश्मीर मे कश्मीरी पंडितों के कत्ले आम पर कितने खुश है?

प्रश्न ये है कि नादव लापिड को कश्मीर फ़ाइल फिल्म मे उन्हे क्या वल्गर लगा? उनको किस सीन मे अभद्रता दिखी? फिल्म की किन लाइनों मे अशिष्टता नज़र आई? जबकि फिल्म की हर घटना और विवरण के दंश से देश की जनता ने तब के विवरण और तथ्यों को समाचार पत्रों के माध्यम से पढ़ा और महसूस किया था। लेकिन फिल्म के प्रोड्यूसर और निर्देशक विवेक अग्निहोत्री  ने तो फिल्मांकन के माध्यम से तत्कालीन कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को पहली बार दुनियाँ को जीवंत दिखाने का प्रयास किया।  कश्मीरी पंडितों के इन क्रूर और  दुःखद क्षणो को  देश की करोड़ो जनता ने अपने से जोड़ कर कश्मीरी पंडितों के साथ हुए दुःख, दर्द को महसूस किया!! इस प्रितिक्रिया के फलस्वरूप सिनेमा हाल मे दर्शकों के आँखों से खून के आँसू और दर्द उनके चेहरों पर स्पष्ट देखा गया। तकालीन केंद्रीय और राज्य सरकारों की इस नर संहार की घटना से बेरुखी और ढुलमुल रवैये से आज भी देश की आम जनता मे क्रोध और रोष है। अपने ही देश मे  अपने ही जमीन से कश्मीरी पंडितों का पलायन देश के नीति नियंताओं पर एक बहुत बड़ा सवालियाँ निशान खड़ा करता है?  

इन तथाकथित छद्म वामपंथी बुद्धिजीवियों का ये मानना कि ये फिल्म समाज के वर्गों के बीच सामाजिक सौहार्द और वैमनस्य को बढ़ावा देती है। मेरा मानना है कि समाज मे घटे एक सत्य वृतांत पर आधारित घटना क्रम का चित्रण कैसे अशिष्ट और अभद्र और असभ्य हो सकता है? महज इसलिए हम इस नर संहार को स्मरण न करे कि इससे समाज का एक वर्ग विशेष आहत हो सकता है? समाज के कुछ असामाजिक, आततायी और आतंकियों की कट्टरता और कायरता पूर्ण कृत के लिए सारी समाज कैसे जोड़ा जा सकता है? क्या 1947 मे देश के बँटवारे से उपजी विभिषिका मे पाकिस्तान के अतिवादियों द्वारा मारे गए दस लाख से ज्यादा शरणार्थियों  की हत्या  का स्मरण महज इसलिए नहीं किया जाए कि इससे पड़ौसी पाकिस्तान आहात होगा? ये उचित ही था कि 14 अगस्त 1947 को देश के बँटवारे से उपजे विभाजन मे मारे गये शरणार्थियों की याद मे   "विभाजन विभीषिका  स्मृति दिवस" के रूप मे मनाने का निर्णय लिया गया।   

मै ऐसी सोच और विचार धारा के लोगो से पूंछना चाहता हूँ कि चाहे अत्याचार और अनाचार के प्रतीक यहूदी  राजा पिलातुस द्वारा प्रभु ईसा मसीह को शूली पर चढ़ाने की घटना को "गुड फ्राइडे" के रूप मे स्मरण हो? या करबला के युद्ध मे याजीद द्वारा इमाम हुसैन के निर्दयी कत्ल का "मोहर्रम" के रूप मे याद करना हो? या दुनियाँ के एक मात्र ईकलौते दृष्टांत के तहत श्री  गुरु तेग बहादुर जी  द्वारा 24 नवम्बर 1675 मे हिन्दू धर्म के रक्षार्थ क्रूर आततायी औरंगजेब जैसे  विधर्मी की अवज्ञा कर अपना आत्मोत्सर्ग कर सर्वोच्च बलिदान को "शहीदी दिवस" के रूप मे स्मृत करना  या गुरु गोविंद सिंह के 7 और 9 वर्ष से भी कम आयु के दोनों  साहबजादों ( बाबा जोराबर सिंह एवं बाबा फतह सिंह) को 26 दिसम्बर 1705 मे क्रूर आततायी नवाब वजीर खाँ द्वारा दीवार मे चिनवा देने का बलिदान इस बात के उदाहरण है कि हर देश और काल मे ऐसे महान पुरुषों  ने क्रूरताअनाचार और अत्याचार के विरुद्ध अपना बलिदान दे मानवता की रक्षा की है। हर वर्ष  इन श्रेष्ठ पुरुषों के बलिदान  दिवस पर उनके पराक्रमशूर-वीरता, शौर्य और साहस  को स्मरण करने से विद्वेषघृणातिरस्कार या नफ़रत कैसे फैल सकती हैकश्मीर फ़ाइल मे दिखलाई गयी कश्मीरी पंडितों के नर संहार की घटनाए इसी कड़ी की एक श्रंखला है।

खेद और अफसोस तो तब और होता है इज़राइल का ऐसा फ़िल्मकार, कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर अधम, आपत्तीजनक  टिप्पड़ी करता है  जिसके अपने देश मे 1939 मे द्व्तिय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी के तानशाह हिटलर ने इज़राइल के 11 लाख यहूदियों को गैस चैंबर मे डाल कर मार डालने का कुत्सित और अमानवीय कार्य किया!! जो इतिहास मे होलोकास्ट नरसंहार के नाम से जाना जाता है।  इसलिए मै इज़राइली फिल्म मेकर नादव लापिड द्वारा भारतीय फिल्मोत्सव मे कश्मीरी फ़ाइल को वल्गर (अशिष्ट और असभ्य), सस्ती लोकप्रियता की फिल्म का बताने पर असहमति प्रकट कर उनके वक्तव्य की घोर निंदा और भर्त्सना करता हूँ।

विजय सहगल