"घनश्याम
चाचा"
मेरी माँ को अखबार पढ़ने का बड़ा शौक था। मुझे
अच्छी तरह याद है कि हमारे मुहल्ले मे मेरे घर के अलावा शायद ही दूसरे घरों मे
प्रातः का स्थानीय समाचार पत्र आता था। उन दिनों एक समाचार पत्र विक्रेता
सुबह-सुबह चिल्ला चिल्ला कर समाचार बेचता था। मुझे आज भी उसकी शक्ल याद है। बड़ा
चेहरा जिस पर हल्की दाढ़ी, सफ़ेद-काले अधपके
बाल, पयजामा-कमीज पहने ऊंची आवाज मे चिल्लाता।
" झाँसी-वासियों!!, आज की ताज़ा
खबर!! दहेज के चलते बहू ने मिट्टी का तेल डाल कर आग लगाई!! पति के साथ सास-ससुर
गिरफ्तार!! या "ओरछा गेट बाहर दिन दहाड़े मकान मालिक के हाथ पैर बांध,
डाँका और लूट पाट!!" हर रोज कोई नयी
हैड लाइन के साथ "दैनिक भास्कर" समाचार पत्र की बिक्री होती थी। समाचार
बिक्री के बीच फुर्सत के दो क्षण मे वह गोपाल धर्मशाला के नीचे दुकान पर चाय की चुसकियाँ
लेता और साथ मे बीड़ी के दो कश खींच वह फिर
अखबार बेचने मे लग जाता था। चौराहे पर
सुबह चाय पीने वालों मे कोई एक दो लोग अखबार खरीद लेते। शायद उन दिनों 20-25 पैसे का अखबार होता था। उसकी यही दिनचर्या
थी। गली मुहल्लों मे घूम घूम कर अखबार बेचा करता था। अल सुबह उसकी आवाज मुझे सोते
हुए कभी कभी सुनाई दे जाती थी।
उन दिनों मेरे घर के अंदर अखबार आने के
पूर्व ही घर के बाहर चबूतरे पर बैठ कर आस पास के परिचित अखबार की सुर्खियां पढ़
लेते थे। हम खड़े होकर उनकी तरफ आतुर दृष्टि से बेचैन होकर उनके चंगुल से पेपर छूटने का इंतज़ार करते और जैसे ही पेपर
फ्री होता अखबार लेकर तुरंत घर के अंदर की
तरफ दौड़ लगाते कि कहीं कोई दूसरा अनचाहा नवांगन्तुक पेपर पढ़ने की चेष्टा न करने
लगे। घर की सुबह की दिनचर्या एक दम
निश्चित होती थी चाय के दौरान और बाद मे भी दैनिक जागरण समाचार पत्र का एक एक पन्ना हम भाई
बहिनों के हाथ मे होता था। कुछ देर बाद अदला-बदली का क्रम चलता रहता। संपादकीय
पृष्ठ के लेख, बगैर पढे ही आगे पलट
देते थे। एक कॉलम "मन की मौज"
मनस्वी द्वारा लिखी जाती थी लेकिन उसे भी शीर्षक के अलावा बगैर पढे ही रख देते थे।
पाठकों के पत्रों को बहुत महत्व दिया जाता था और बगैर किसी नागा के पत्र छपते थे।
आज राष्ट्रीय समाचार पत्रों के अलावा शायद ही पाठकों की राय और असहमति को महत्व
दिया जाता है। आज कल ग्वालियर से प्रकाशित अखबार "दैनिक भास्कर" मे
"पाठकों के पत्रों" का कॉलम न होना अखबार के औसत दर्जे का सबूत है।
उन दिनों स्कूल से आने के बाद घर पर बहुत
कोई काम नहीं रहता था। स्कूल मे भी आज की तरह "होम वर्क" का चलन नहीं था
और न ही मै कोई प्रवीण सूची मे आने वाला छात्र था जो सुबह शाम किताबों से जूझता
रहता हो!! तब हमारा नित्य का नियम था कि शाम के समय अपने पड़ौस मे स्थित
"घनश्याम चाचा" की दुकान पर जाना। वे थे तो फुटकर किराना व्यापार के
कारोबारी पर व्यापार के मामले मे वस्तुओं के दाम,
कृषि की पैदावार के उतार चढ़ाव, वस्तुओं की मांग
और पूर्ति, राजधानी मे किराने की वस्तुओं
के भाव आदि पर पैनी निगाह रखते थे। घनश्याम
चाचा का रहन सहन एक दम भारतीय परवेश की
धोती और कुर्ता के साथ उन दिनों प्रचलित सिर पर गांधी टोपी,
साधारण रहन सहन था। चाचा की दुकान पर जाने के दो-तीन मुख्य कारण थे।
क्योंकि उनकी दुकान पर 1970 के दशक मे राजधानी दिल्ली से निकलने वाले हिन्दी का
मुख्य पत्र "हिंदुस्तान" शाम के समय आता था। उन दिनों राजधानी दिल्ली के
समाचार पत्र प्रायः रेल के माध्यम से ही प्रसारित होते थे। हिंदुस्तान समाचार पत्र प्रसार के साधनों के अभाव
के कारण दूर दराज़ के क्षेत्रों मे दूरी और
यातायात के साधन की उपलब्धता के अनुसार कहीं दोपहर और कहीं शाम के पहुंचता था।
दूसरा, शहर और समाज के कुछ गणमान्य लोग भी उनकी
दुकान पर शाम के बैठने आते थे उनमे से एक श्री रामदास सहगल जो अपने समय के स्नातक
थे और अँग्रेजी का अच्छा ज्ञान रखते थे और जो किसी सरकारी महकमे से सेवानिवृत्त
हुए थे। कुछ अन्य लोग भी शाम की बैठक के लिए आते जाते बने रहते थे। वे सभी
उम्रदराज श्रीमान पुरुष, जीवन के अपने
अनुभव और किस्से कहानियाँ सुनाते थे जिसमे बड़ा रस आता था। तीसरा जो मुझे अख़बार और
वरिष्ठ लोगो के अनुभव सुनने के श्रोता के साथ घनश्याम चाचा की दुकान से गुड़ की
ढेली मुफ्त मे खाने मिल जाती, जिस पर कोई रोक
टोक नहीं थी। सर्दियों मे रवे दार गुड़ का स्वाद ही,
बड़ी से बड़ी मिठाइयों को मात देता था। दुकान के सामने छोटे से मैदान मे लकड़ी की एक
छोटी बेंच पड़ी रहती थी जिस पर दो लोग ही बैठ सकते थे। जब कोई तीसरा आगंतुक आ जाता तो टीन के खाली कनस्तर पर एक
फट्टी डाल कर स्थान बना लिया जाता था। कोई और व्यक्ति के आने पर वरिष्ठता के क्रम
को ध्यान रखते हुए हम जैसे लोग खड़े होकर भी चौपाल मे शामिल हो अपनी उपस्थिति बनाये
रखते थे। मेरा नित्य का क्रम था कि शाम के समय घनश्याम चाचा की दुकान पर आधा-एक
घंटे अखबार का वाचन करना।
उन दिनों लॉन टेनिस की विम्बलडन,
आस्ट्रेलिया, फ्रेंच और यूएस ओपन ये
चार विश्व प्रिसिद्ध प्रितियोगितायेँ
होती थी जिनकी खबरे हिंदुस्तान समाचार के मुख्य पृष्ठ पर छाई रहती थी। वैसे तो
मुझे इस खेल की ज्यादा जानकारी न थी पर ब्योर्न बोर्ग और जिमी कोनर्स के नाम आपस मे प्रतिद्वंदी के रूप
मे प्रिसिद्ध थे। जहां ब्योर्न बोर्ग अपनी सादगी के लिए प्रिसिद्ध थे जबकि जिमी कोनर्स सनकी झगड़ालू!! जिसके किस्से अखबारों
मे बड़ी रोचकता से प्रकाशित होते थे। प्राचीन
रोडेशिया और आज का जिम्बाब्वे के रूढ़िवादी श्वेत अंग्रेजों और राष्ट्रवादी अश्वेतों के बीच गुरिल्ला युद्ध की खबरे भी समाचार पत्रों की
सुर्खियां होती थी। उन दिनों युगांडा देश के तानशाह और क्रूर शासक ईदी अमीन के
किस्से भी समाचार पत्रों की मुख्य शीर्ष समाचार होता था। उसके काल मे लाखों नागरिक
मौत के घाट उतार दिये गये। युगांडा मे प्रवासी भारतियों के व्यापार और दुकानों को
लूटने की घटनाएँ भी हिंदुस्तान पत्र की सुर्खियाँ होती थी। उक्त निर्दयी के कितने
बीबी बच्चे थे उसे खुद नहीं मालूम था। उन दिनों उस निरंकुश शासक के बारे मे समाचार
पत्र मे किस्से कहानियाँ विस्तार पूर्वक छपते थे,
कहा जाता था कि वह नरभक्षी था और आदमियों का मांस खाता था।
उन दिनों हिंदुस्तान समाचार पत्र के अंदर के पृष्ठों मे "बेताल"!! चलता
फिरता प्रेत!! के शीर्षक से कार्टून की सीरीज छपा करती थी। जिसको पढ़ने मे बड़ा मजा
आता था। बेताल के साथ उसके साथ उसके जर्मन सेफर्ड कुत्ता का स्वेत श्याम कार्टून का
जबर्दस्त आकर्षण हुआ करता था। इन पत्रों के नाम तो आज याद नहीं पर उसकी प्रेमिका
के किस्से दिमाक मे छाए रहते थे!! काले सफ़ेद रंग की रेखाओं से बनी बेताल सीरीज के
3-4 फोटो के कार्टून 2-3 मिनिट मे देख-पढ़ लेता
और फिर बेताल के अगले अंक का इंतज़ार बड़ी आतुरता से करता था।
एक ओर गर्मियों मे सड़क पर साइकल,
बैल गाड़ी और तांगों के यातायात का शोर ही सुनाई देता था,
स्कूटर बहुत ही कम संख्या मे दिखाई दे जाते जबकि कार तो न के बराबर थी। ऑटो,
टेम्पो का उन दिनों आविष्कार हुआ तो होगा पर झाँसी मे चलन शुरू नहीं हुआ था। आवागमन
का एक मात्र साधन साइकल या तांगा था। सर्दियों मे उनकी दुकान पर लोहे के तस्सल के चारों लकड़ी के अलाव
के साथ विद्व जनों की गोष्ठी यादगार क्षण थे।
घनश्याम चाचा का शांत और सौम्य व्यवहार एवं हिंदुस्तान समाचार पत्र के साथ उन दिनों की सुखद स्मृतियाँ को जब भी याद करता हूँ तो मेरा सिर "घनश्याम
चाचा" की याद मे श्रद्धा और सम्मान के साथ झुक जाता है।
विजय सहगल



2 टिप्पणियां:
बहुत सुंदर वर्णन..
Bahut pyara varnan. Miss you dada
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