हीन भावना से परे-"हिन्दी
दिवस"
बचपन मे जब अँग्रेजी स्कूल के अपने समकक्ष बच्चों
की अँग्रेजी की किताबे देखते थे तो हम सरकारी स्कूल के बच्चे
अपने आप को हीन भावना से ग्रसित पाते थे। हमारे विध्यालयों मे अँग्रेजी विषय की
शिक्षा की शुरुआत ही छठी कक्षा से होती थी तब पाँचवी कक्षा तक तो एबीसी.... काला
अक्षर भैंस बराबर थी। उन दिनों के कुछ
माता-पिता अपने बच्चों को अँग्रेजी विध्यालय के स्कूल मे सिर्फ इसलिये पढ़ने
भेजते थे कि उनका बच्चा आगे चलकर "फर्राटेदार अँग्रेजी" अर्थात
अंग्रेजों की तरह "गिटिर-पिटिर"
करेगा!!, बोलेगा?
और सरकारी स्कूल मे पढ़ने वाले स्कूल से ज्यादा योग्य और समझदार होगा। अँग्रेजी
जानने और बोलने के श्रेष्ठता के भाव को
प्रकट करने के लिये उन दिनों मात्र दो ही शब्द होते थे,
"फर्राटे दार अँग्रेजी बोलना"
और "अंग्रेजी मे "गिटिर-पिटिर" करना" !! कमोवेश
यही हीन भावना की सोच हू-ब-हू बहुत से माता-पिताओं के मन-मस्तिष्क मे आज भी है। दुर्भाग्य
देखिये यही हीन भावना जब आज की तथा कथित कल्याण कारी सरकारें समाचार पत्रों मे
बड़े-बड़े विज्ञापन देकर बच्चों को "फर्राटे दार" अँग्रेजी बोलने के सपने दिखा
कर न केवल अपरिपक्व बच्चों के मन-मस्तिष्क को अपितु उनके गरीब माता-पिताओं के मानस
पटल मे भी उस हीन भावना को बलवती करती है।
पिछले दिनों देश के दो राज्यों की सरकार ने इसी अँग्रेजी भाषा के "फर्राटे दार" अँग्रेजी बोलने के बड़े बड़े विज्ञापन प्रिंट और टीवी माध्यमों मे दिखा कर उनकी दुखती रग पर हाथ रख कर राजनैतिक लाभ लेने की कुत्सित चेष्टा की। आज मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी ये सिद्ध हो गया है कि मातृ भाषा ही एक ऐसा माध्यम है जिसमे बच्चे का मानसिक और बौद्धिक विकास तेजी से होता है। लेकिन बचपन मे ही अँग्रेजी के अनावश्यक महत्व ने पढ़ने वाले बच्चों से ज्यादा उनके संरक्षकों को हीन भावना से ग्रसित किया है। मुझे याद है हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद जब मै रोजगार कार्यालय मे अपना नाम दर्ज़ कराने गया था तब वहाँ के एक बाबू ने हमारे आवेदन मे अँग्रेजी भाषा की कोई व्याकरण त्रुटि पर कटाक्ष किया था!! तब मैंने अपने चार साल मे अँग्रेजी भाषा से अर्जित ज्ञान के आधार पर उसे पलट कर जबाब दिया था जिसका भावार्थ यह था कि, "श्रीमान, इंग्लैंड का एक सफाई कर्मी आप से ज्यादा अच्छी अँग्रेजी बोल और लिख सकता है, इस का तात्पर्य यह नहीं कि वह आपसे ज्यादा योग्य और बुद्धिमान है? महज अँग्रेजी बोलने और लिखने से ही योग्यता की पहचान नहीं हो जाती? बैसे भी अँग्रेजी मेरी मातृ भाषा नहीं है!!
मेरा कहने का तात्पर्य,
हमे अँग्रेजी भाषा को जानने सीखने की चेष्टा और प्रयास तो करने ही है लेकिन सब कुछ
तुरत फुरत एक-दो वर्ष मे अन्य विषय छोड़ सिर्फ अँग्रेजी जानने और बोलने के दिवा
स्वपन से परे यथार्थ के धरातल को लक्ष्य मान,
अँग्रेजी का ज्ञानार्जन करना चाहिये। हमे बिना किसी दंभ और अभिमान के अन्य भाषा को
सम्मान दे उनका अध्यन करना ही चाहिये लेकिन अन्य भाषा को सीखने और अध्यन मे अपनी मातृ
भाषा और स्वयं अपने स्वाभिमान से बिना किसी समझौता किये इस सद्वाक्य को हमेशा याद
रखना चाहिये कि,
"अपना मूल्य समझो और विश्वास करो कि तुम संसार के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हो!!"
(युग निर्माण योजना, शांति कुंज हरिद्वार)।
ये एक ध्रुव सत्य है कि जैसे जैसे आप उच्च
शिक्षार्जन करते है आप का ज्ञान भाषा के साथ साथ चहुं ओर ज्ञान के अन्यत्र भी
विस्तृत और व्यापक हो जाता है फिर "फर्राटे" और "गिटिर-पिटिर"
पर ही ज़ोर देकर हमारे नौनिहालों को क्यों हीन भावना से ग्रसित किया जा रहा है??
अंग्रेजों की 200 साल की गुलामी के बाद एक
अंग्रेज़ परस्त वर्ग आज भी सक्रिय है जो श्रेष्ठता की भावना से ग्रसित हो अंग्रेजों द्वारा बनाए गए
सब्ज बाग दिखा कर अपना एकाधिकार और आधिपत्य बनाये रखना चाहता है।
कल हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर कर्नाटक
के पूर्व मुख्यमंत्री श्री एचडी कुमारस्वामी का ट्वीट पढ़ कर हार्दिक दुःख और संताप
हुआ जिसमे उन्होने कहा "कि टैक्स पेयर का पैसा अनावश्यक रूप से हिन्दी दिवस
मनाने पर क्यों खर्च किया जाये? ऐसे मे उक्त
ट्वीट अनावश्यक, असमय और गैर बाजिब था,
जिसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। ऐसा वक्तव्य ऐसे व्यक्ति द्वारा दिया गया जिनके पिता श्री
एचडी देवेगौड़ा 1 जून 1996 से 11 अप्रैल 1997 देश के प्रधानमंत्री पदासीन रहे। इससे
ज्यादा क्षोभ और दुर्भाग्य की क्या बात हो सकती है?
उन जैसे सम्मानीय पर गैर जिम्मेदार व्यक्ति के वक्तव्य की मै कड़ी निंदा और भर्त्स्ना
करता हूँ।
बैसे तो आज हिन्दी दिवस है पर मै कोशिश करता
हूँ कि देश की अन्य भाषाओं के कुछ वाक्य याद कर उस प्रांत,
क्षेत्र मे या उन भाषा-भाषी लोगो के साथ बात-चीत मे इस्तेमाल करूँ। गुजरती मे, "केम च्छो", (कैसे हो) का तो अंतर राष्ट्रीयकरण हो गया है, केरला एक्स्प्रेस से दैनिक
आवागमन के समय मलयाली मे "यान निन्ने स्नेही किन्नू" केरला!! (मै केरल
को प्यार करता हूँ!!), मराठी मे,
"मी सहगल बोलतोय"!! (मै सहगल बोल रहा हूँ),
सिंधी मे, "कियाँ हो
साईं"!! (कैसे हों भाई), तमिल मे,
"बड्डकम, अन्ना"!! (नमस्कार,
भाई साहब!!), छत्तिसगढ़ी,
"मोला, छत्तिसगढ़ी नी आवे
ताई!", (मुझे छत्तिसगढ़ी नहीं
आती ताई!!), बंगाली मे,
"अमी सहगल बोलची",(मै सहगल बोल रहा
हूँ), पिछले दिनों लेह लद्धाख मे एक वृद्ध महिला
को जूले-जूले कहकर अभिवादन से उसके चेहरे पर आयी खुशी का उल्लेख मैंने अपने लेह
यात्रा ब्लॉग मे किया था और पंजाबी तो
इतनी सरल और सहज है कि, "साडे हिंदुस्तान
बिच चंगी तरियाँ बोली जान्दी है!"! आइये हम सभी मिल कर आज 14 सितंबर 2022,
को हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी सहित देश की अन्य भाषाओं को विकास और विस्तार
करने का संकल्प ले।
विजय सहगल




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