मंगलवार, 30 अगस्त 2022

नग्न सत्य

"नग्न सत्य"

 



हमारे मित्र श्री अरविंद शर्मा जी ने पिछले दिनों सन 1896 मे  श्री जीन लियोन जेरोम  द्वारा रचित निम्न रचना "झूठ-सच" प्रेषित की। 

The Lie & The Truth


The Lie said to the Truth:
"Let's take a bath together,
the well water is very nice."

The Truth, still suspicious,
tested the water and
found out it really was nice.

So they got naked and bathed.

But suddenly, the Lie
leapt out of the water and fled,
wearing the clothes of the Truth.

The Truth, furious,
climbed out of the well
to get her clothes back.

*But the World,*
*upon seeing the naked Truth,*
*looked away,*
*with anger and contempt.*

Poor Truth returned to the well and
disappeared forever,
hiding her shame.

Since then,
_*the Lie runs around the world*_,
_*dressed as the Truth, and*_
_*society is very happy...*_
_*Because the world has no desire*_
_*to know the naked Truth.*_

( _*Jean-Léon Gérome*, wrote the above in 1896_ )


मेरे लगभग उनतालीस वर्ष के बैंक सेवाकाल मे यूं तो मेरे अनेकों मित्र और सहचर रहे है पर उनमे श्री मुकेश महेन्द्रा, श्री सतीश शर्मा, श्री सुबोध आनंद और  श्री अरविंद शर्मा मेरे सम्मानीय मित्रों और शुभ चिंतकों मे से कुछ है जिनका मै व्यक्तिगत तौर पर दिल से आदर और सम्मान रखता हूँ।  क्योंकि ये सभी  उम्र, अनुभव शिक्षा और चातुर्य मे मुझ से ज्यादा अनुभवी और ज्ञानी है। इन सभी मे कविता मे वर्णित  स्पष्टवादिता, सत्यवादिता  और निर्भीकता जैसे गुण सामान्य थे पर शायद आज के संदर्भ मे इन्हे सद्गुण कहें या दुर्गुण जिनके  के कारण ये सभी सफलता के उन पायदानों तक  न पहुँच सके जिन तक अन्यथा लोग पहुँच पाते है और जिसके वे हकदार थे। ऐसे अन्य अनेकों साथी निश्चित ही हमारे-आपके संपर्क मे बैंक सेवा के दौरान आये होंगे। इनके प्रति सेवानिव्रत्ति के बाद भी आदरभाव, सम्मान  मन मे उपजता है।  

रचना सार्वकालिक होने से मुझे भी अच्छी लगी।  उनका ये भी  आग्रह था कि मै इस रचना को हिन्दी अनूदित भी करूँ। मै  कह नहीं सकता कि इस उद्देश्य मे मै कहाँ तक सफल रहा? इस का निर्णय मै अपने सुधि पाठकों के उपर छोड़ता हूँ:-

"नग्न सत्य"

सच और झूठ थे दो नाम,
अलग अलग है आते जाते।
पर एक दिन कहा झूठ ने,
चलो आज एक साथ नहाते।

देख!!,
कुएं का पानी अच्छा है।
शंका के संग।
किया आचमन॥
सच ने बोला,
"हाँ", जल मीठा और सच्चा है॥

लगे नहाने वस्त्र त्याग कर,
झूठ संग थे साथ-साथ पर॥
तभी डाह, झूठ मन आई।
पानी से छलांग लगाई॥
पहन वस्त्र, सच के, वह भागा।
रहा देखता, सच, हतभागा!!

जब तक सच, बाहर आ पाता।
हा! हा!! लाज बचाना पाता?
"नग्न सत्य" को देख सामने,
दुनियाँ ने, उपहास उड़ाये।
तब से ये दस्तूर बन गया,
सच संकट, झूठा मुस्काये॥

झूठ पहन, सच के गणवेश।
घूमे दुनियाँ, बन दरवेश॥
देख हँसाई, जग की, खुद पर,
"सच", मन ही मन पछताया॥
गहरी लाज़ शरम के कारण,
कूप से फिर, बापस न आया॥

"कूट" बखान की महिमा न्यारी।
निजी स्वार्थ "सच" पर है भारी।
हर्षित जन है, हर्षित गण-मन।
"सत्य घिनौना", क्या प्रयोजन?
हम कृतघ्न झूठ को हेरें।
"कटु सत्य" से आंखें फेरें॥
स्याह रात के पथ अँधियारे।
"नग्न सत्य" कैसे स्वीकारें?
"नग्न सत्य" कैसे स्वीकारें?

उक्त रचना की ही तरह  सत्य की महिमा हमारे ऋषियों और महात्माओं ने  "सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र" की ईमानदारी और सत्यवादिता पर गहराई से प्रकाश डाला है वही दूसरी ओर कुटिल और धूर्त व्यक्तियों के बारे मे भी विस्तार से लिखा है। लेकिन ये रचना कुछ अलग हट के है। एक सौ छब्बीस वर्ष बाद भी आज के दौर मे विशेषतः भारतीय राजनैतिक परिदृश्य मे ये रचना सम-सामयिक और प्रांसंगिक है। मेरी और श्री शर्मा जी की भी ये इच्छा थी कि इस रचना मे वर्तमान समय के अनुरूप देश मे झूठ के रूप मे "कुख्यात पात्र" का नाम भी लिखू?  पर चूंकि व्हाट्सप्प के अनेकों समूह मे राजनैतिक पोस्ट का प्रेषण निषेध होने के कारण हमने उस व्यक्ति का नाम न लिखने का निर्णय लिया!! 

हाँ, बाकी, आप समझ तो गये होगे!!

विजय सहगल 


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