"गणेश चौथ का मकर"
भारतीय सांस्कृति मे तीज त्योहार और पर्वों
का बड़ा महत्व है। पूर्व से पश्चिम तक उत्तर से दक्षिण तक अलग अलग प्रान्तों और
भाषा से परे विभिन्न लोकसंस्कृति, बेशभूषा और पहनावे
की झलक इन उत्सवों और पर्व के समारोह मे स्पष्ट देखी जा सकती है।
महाराष्ट्र से शुरू हुआ ऐसा ही एक त्योहार गणेश चतुर्थी या गणेश चौथ आज पूरे भारत
बर्ष बड़ी धूम धाम और उत्साह से मनाया जाता है। मुझे याद है बचपन मे ये एक ऐसा
त्योहार होता था जब हर घर मे गणेश चतुर्थी के इन 7 दिनों मे बच्चे अपने अपने घरों मे अपनी
रचनात्मकता और सृजनशीलता का उपयोग कर विभिन्न तरह की झाकियों का प्रदर्शन किया
करते थे जिन्हे हम लोग "मकर सजाना" कहते थे। इस कलात्मक प्रदर्शनी के
लिये "मकर" शब्द का उपयोग मै आज तक नहीं समझ पाया। कोई ज्ञानी श्रीमान
पुरुष यदि इसकी व्याख्या सांझा करे तो खुशी होगी। मकर सजाने मे बच्चों की कल्पना अनंत आकाश की
तरह विशाल थी लेकिन इन प्रदर्शनीयों के केंद्र बिन्दु भगवान गणेश ही होते थे।
जिनको मकर की झाकियों के मध्य मे स्थापित कर उनके चारों ओर, हर घर मे कोई विषय लेकर
सजावट की जाती थी। कोई किले, कोई पहाड़,
कोई नगर या जंगल की झांकी सजाता था। जब जंगल की पृष्ठभूमि होगी तो जंगली जानवरों
के खिलौने शेर, भालू,
तेंदुए हाथी के माटी के खिलौने भी जहां तहां बाग बगीचों से लायी हरी भरी पट्टियों
और शाखाओं के बीच खड़े कर दिये जाते थे। जमीन पर घास-मंडी से लायी जानवरों की हरी
घास को चारों ओर बिछा कर जंगल के दृश्य की कल्पना शीलता को धरातल पर वास्तविक रूप
मे परिवर्तित कर दिया जाता था। कहीं कहीं अहिंसा का संदेश देती झाँकी मे शेर और
बकरी एक ही झरने से पानी पीते नज़र आते। किले का सृजन गत्तों पर गेरुई के लाल या काले
रंग रंग से रंग कर उन पर सफ़ेद या काले रंग
से समांतर रेखाएँ के बीच आड़ी रेखाओं से ईंट का रूप दे किले के कंगूरे की बुर्ज का रूप देने का प्रयास कोई करता। सीधे
गत्ते को गोलाकार देने के लिये गत्ते के पीछे धागों से बांध दिया जाता। इस तरह की
4-5 आकृतियाँ एक के ऊपर एक या लाइन मे फैला कर बड़े किले का रूप देखना आकर्षक और रुचिकर
दिखाई देता था। जब किला हो तो गत्तों की सहायता से काले रंग की तोपों की नली,
और बुर्ज पर खड़े सिपाही के खिलौने खड़े करना तो लाज़मी बनता। मकर की तैयारी के लिए
पूरे साल खिलौनों के खरीद की तैयारी चलती रहती थी।
काले काले पहाड़ों का रूप देने के लिए उन
दिनों घर घर मे उपयोग होने वाले पत्थर के कोयले का उपयोग कर,
एक के उपर एक रख पहाड़ों को ऊंचाई प्रदान की जाती। बर्फीले पहाड़ की आकृति रुई से
ढँक कर पूरी की जाती थी। बर्फीले पहाड़ पर भालू और भेड़ तथा अन्य पहाड़ों पर शेर चीतों,
हिरण के कागज की मिट्टी के खिलौनों को गुफा का रूप देकर सजाया जाता था। उन दिनों
दो तीन भागों मे विभक्त नृत्यांगना को, कोई बच्चा छिप कर काले धागे से हिला कर
चमत्कारिक नृत्यांगना का नृत्य प्रस्तुत करता जिसे देख बच्चे खुश होते। हम सभी बच्चे एक दूसरे के घरों मे सजने वाले इस
मकर को घंटों देख कल्पना लोक मे खोये रहते।
आज के बच्चों के विपरीत उन दिनों गणेश चौथ
पर मकर सजाने के लिए बच्चों मे रचनात्मकता,
नव सृजन और कलात्मकता निखारने की असीमित संभावनाएं उपलब्ध रहा करती थी। मुझे याद
है हमारे पड़ौस मे एक राजू डेंगरे जी के घर मकर मे विराजित गणेश जी के पीछे एक रंग
बिरंगी चक्र टेबल फैन की सहायता से बनाया जाता था। उसकी बिशेषता थी की गोल चक्र मे
कई रंगो की पारदर्शी पन्नियाँ लगा उसके पीछे एक बल्ब जलाया जाता था। जिसकी चमकदार
रोशनी मे चक्र घूमता था। न जाने किस तकनीकी से उनके पिता श्री,
पंखे मे ऐसे ही दो चक्र लगते थे जो एक ही धुरी पर विपरीत दिशा मे घूम कर 3डी दृश्य
पैदा करते थे। मानों चक्र की धुरी का केंद्र लगातार अनंत गहराई मे प्रवेश किए जा रहा
हो!! आज 50 साल बाद भी मै राजू डेंगरे के पिता जी द्वारा अपनाई इस तकनीकि को न
जान सका?
हमारे बचपन के साथी हेमचन्द भाई पटेल के
घर उन दिनों नीले,
पीले रंग की ट्रेन का प्रदर्शन उन दिनों किया गया था। जो चाबी की सहायता से
गोलाकार पटरी पर दौड़ती थी और उन दिनों की ताज एक्स्प्रेस की प्रितिकृति थी। एक बार
चाबी भरने के बाद 8-10 चक्कर लगा लेती थी। मेरे सहित सभी बच्चों के बीच उक्त ट्रेन
कौतूहल का विषय थी। उन दिनों चाबी से
घूमने वाले कम ही खिलौने दिखाई देते थे। भिन्न भिन्न जगहों पर इतने खिलौनों का दर्शन/प्रदर्शन एक साथ दिखाई
देना मन मे खुशी और उत्साह पैदा कर देता था। हमारे घर के आसपास और सामने के घरों
के अलावा घास मंडी मे धुम्मन सेठ के घर भी मकर सजाया जाता था,
जहां तमाम लोग मकर को देखने पहुँचते थे।। शायद परिवार के किसी सदस्य का उपनाम या
नाम का अपभ्रंश से "धुम्मन" नाम पड़ा हो?
लिखधारी परिवार के बच्चे हमारे बचपन के सहपाठी
थे।
लेकिन सबसे ज्यादा दर्शक मुरली मनोहर मंदिर
मे आते थे। एक तो यूं भी मंदिर मे नियमित दर्शनार्थी,
भगवान की आरती और दर्शन मे शामिल होती ही थे साथ ही साथ पुजारी जी के बच्चों
द्वारा मंदिर के पास की दालान मे मकर देखने वालों की भीड़ लगी रहती थी। पिछले साल
भाई राजू गोलवलकर ने मंदिर मे सजाई झांकी की कुछ फोटो फ़ेस-बुक पर सांझा की थी
जिसने मेरे बचपन की यादें ताजा कर दी थी और जिनको मैंने अपने लेपटोप मे पास सँजो
कर रक्ख लिया था जिसे मै बगैर राजू की अनुमति के सांझा कर रहा हूँ।
मुझे याद है कि उन दिनों मैंने विज्ञान के
एक प्रयोग को एक बार अपने घर की झांकी मे उपयोग किया था जिसमे टेबल टेनिस की गेंद
को पानी की धारा पर चला कर प्रदर्शन किया था। लोगो ने पानी की धार पर नाचती टेनिस
की बाल को बड़ी उत्सुकता और जिज्ञासा से जादू जैसा चमत्कार मान देखा था। कुछ तो
कहते थे कि धागे से बाल को पानी की धार पर लटका दिया। लेकिन जैसे ही हम लोग पानी की
धारा मे हाथ या किसे डंडे से अवरोध करते तो बाल तुरंत गिर जाती थे जिसे पुनः धारा
मे स्थापित करने पर बॉल नाचने लग जाती!! लोगो ने गुरुत्वाकर्षण के इस प्रयोग को
अचरज के साथ देख बड़ी प्रसन्नता व्यक्त की थी।
अनंत चौदस या डोल ग्यारस वाले दिन गणेश
विसर्जन का सिलसिला दिन से शुरू हो सारी रात और देर रात तक चलता रहता था। झाँसी
शहर मे श्री गणेश प्रतिमाओं को लक्ष्मी ताल मे विसर्जित किया जाता था, जिनके साथ
बुन्देली लोक नृत्य "चाचर" खेलना देखते ही बनता था। बड़ा दुःख और खेद है वर्तमान
मे लोगो की व्यस्तता और
राजनैतिक आश्रय न मिलने के कारण उक्त बुंदेलखंडी नृत्य लुप्तप्राय होने की कगार पर
है। कुछ लोग तालाब मे एक मात्र नाव के नाविक लंगड़ की सेवाएँ ले तालाब के बीच मे
प्रतिमाएँ विसर्जित करते थे। झाँसी के अधिकांश लोगो सहित मै भी उस नाविक को लंगड़ कहता था क्योंकि शायद ही किसी को उसका नाम पता
हो? उस ज़िंदादिल,
संतोषी नेक नाविक ने अपने नाम के विरूप अपभ्रंश
पर शायद ही कभी प्रतिरोध या प्रितिक्रिया व्यक्त की हो!! साथ ही नाव के भाड़े या
उतराई पर भी मैंने उसे कभी हीला हुज्जत करते नहीं देखा या सुना।
आज विक्रम संवत 2079 की भाद्र माह, शुक्ल पक्ष की एकादशी तदानुसार अँग्रेजी वर्ष की 6 सितंबर 2022 पर भगवान श्री गणेश की विग्रह विसर्जन करने के पूर्व मैंने बचपन के उन स्वर्णिम पलों को आज पुनर्जीवत करने का निश्चय किया। यध्यपि 54-55 वर्ष पूर्व के पलों को यादों से विलग यथार्थ मे जीना मुश्किल ही नहीं असंभव था। लेकिन जब दिल मे ठान लिया तो ठान लिया!! अपने अहम रूपी छद्मवेश को परे रख अपनी कॉलोनी के सामने और अगल बगल के आठ दस घरों मे श्री गणेश भगवान की मूर्ति के विसर्जन की सूचना, व्यक्तिगत तौर पर और श्रीमती जी के माध्यम से सभी घरों मे दे दी। कॉलोनी के तरुण और बच्चों को भी आमंत्रित कर प्रसाद के रूप मे मिष्ठान की व्यवस्था भी तुरत फुरत कर ली। फिर क्या था ठीक शाम को छह बजे सभी घरों के लोग इक्कठे हो गये और बिघ्न विनाशक श्री गणेश की प्रतिमा के साथ जुलूस के रूप मे शामिल हो इन्ही घरों के सामने भ्रमण किया। लोगो से आग्रह किया गया था कि वे अपने साथ अपने घरों से शंख, घंटी, मजीरे, झालर भी साथ ले आएं!! बच्चों ने गणपत बब्बा मोरैया, अगले वरष तू जल्दी आ!!, गणपत गणेश की जय!!, एक-दो-तीन-चार, गणपत जी की जय जय कार!! पाँच-छह-सात-आठ, गणपति जी हमारे साथ!! आदि के जयकारों के साथ जलूस के रूप मे भगवान गणेश जी की मूर्ति के साथ कॉलोनी के पार्क मे एकत्रित हो पहुंचे। यकीन मानिए टोली मे उपस्थित लोगो कि संख्या 28-30 के लगभग हो गयी थी। मुझे यकीन नहीं था कि इतने सूक्ष्म सूचना पर पड़ौसी इतनी जल्दी एकत्रित हो जायेंगे!! 50-60 मीटर के इस अल्प भ्रमण के बाद सामने पार्क मे ही पर्यावरण और प्रदूषण के प्रति जागरूक हमारे रहवासियों ने भगवान श्री गणेश की विधिवत पूजन-आरती और मंत्रोच्चार के बीच मजीरों घंटी और शंख ध्वनि के साथ एक साफ सुथरी जल से भरी बाल्टी मे सम्मान सहित श्री जी की प्रतिमा का विसर्जन किया। एक ओर जहां इस कार्यक्रम से कॉलोनी के सभी बाल-वृंद, युवा-बुजुर्ग उत्साहित थे वहीं दूसरी ओर मैंने भी इन यादगार पलों को आज पुनः अनुभव किया जो मेरे लिये किसी स्वर्गिक आनंद से कम न था। जय श्री गणेश!!
विजय सहगल





कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें