शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

अछूता घड़ा

 

 "अछूता घड़ा"




13 अगस्त 2022 को राजस्थान के जालोर जिले के सुराणा गाँव से एक दिल दहला देने वाली घटना समाचार पत्रों की सुर्खियों मे छायी हुई थी। जिसने राजस्थान सहित देश के अनेक क्षेत्रों मे लोगो को आहत किया। मैंने भी जब उक्त घटना की विस्तृत जानकारी समाचार पत्रों मे पढ़ी तो मन शोक और क्षोभ से भर गया।  20 जुलाई 2022 को एक दलित वर्ग के 9 वर्षीय बालक इन्द्र मेघवाल को उसके अध्यापक ने सिर्फ इसलिये बुरी तरह पीटा क्योंकि उस दलित मासूम ने एक अध्यापक के पानी के घड़े अपनी प्यास बुझाने हेतु घड़े का उपयोग कर लिया अर्थात उसको  छू लिया था!! उस घड़े को छूने की कीमत उस अबोध बालक को अपनी जान देकर गंवानी पड़ी क्योंकि उसके अध्यापक ने घड़े छूने के अपराध के रूप मे उस निरपराधी बालक को  बुरी तरह पीट पीट कर अधमरा कर दिया था,  जिसके कारण कान के अंदर गहरा अंदुरुनी घाव हो जाने के कारण 20 दिन जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष के चलते इलाज के दौरान उस बेगुनाह की अहमदाबाद मे असमय मृत्यु हो गयी। जिस निष्कपट बालक ने अपने सुनहरे  भविष्य के सपने हांसिल करने के लिये जीवन की राह  पर  पहला कदम ही बढ़ाया था कि समाज द्रोहियों की उस  कलुषित अमानवीय सोच ने उस बहादुर बच्चे की राह मे रोड़ा डाल,  रोक सकने के  नाकामयाब प्रयास पर  उन दुष्टों  ने उसके  जीवन को ही समाप्त कर उसके सपनों की   यात्रा को अंतिम यात्रा मे परिवर्तित कर समाज और देश के साथ बहुत बड़ा घृणित पाप और गुनाह किया है।  

इस निंदनीय और हृदयविदारक घटना को गाँव के ही एक 40 वर्षीय अध्यापक, छैल सिंह जैसे  दुष्ट अध्यापक  ने अंजाम दिया, जिससे अपेक्षा थी कि वह शिक्षा और विद्या के माध्यम से देश के नौनिहालों को ऐसी शिक्षा और संस्कार देता  जो समाज के इस उंच-नीच और छुआ छूत के भेद को समाप्त कर उन्नति और विकास के शिखर पर ले जाने वाली राह दिखाता? इस शिक्षाक ने अध्यापक के नाम को कलंकित किया!!  पर हा!! शोक और  दुर्भाग्य कि देश की आज़ादी के 75वें अमृतमहोत्सव के बावजूद भी हम देश से छुआ-छूत और उंच-नीच के भेद को नहीं मिटा सके?? जो हम सब के लिये शर्म और लज्जा की बात है!! इस घटना को समाज के अति सम्मानीय शिक्षा क्षेत्र से जुड़े ऐसे अध्यापक ने अंजाम दिया  जिसे हमारे देश की सांस्कृति और सभ्यता  मे "गुरु गोविंद दोऊ खड़े.......के, से भाव से "देवतुल्य" स्थान दिया गया है, पर बड़े रोष और क्रोध का विषय है कि इस अध्यापक रूपी नर पिशाच ने अपने ही पुत्रवत शिष्य की पानी के घड़े से पानी लेने के दौरान घड़े  को छूने के कारण निर्ममता पूर्वक पीट-पीट कर हत्या कर दी।

ये अपराध किसी अनपढ़-गँवार व्यक्ति द्वारा भी किया जाता तो भी छुआ-छूत के अपराध मे उसे सजा मिलती लेकिन जब ये अपराध एक ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया जिसके ऊपर दायित्व था कि वह अपने अध्यवसाय से बच्चों को शिक्षित कर जातिभेद, रंगभेद, छुआ-झूत जैसी सामाजिक बुराइयों से परे रख उन्नति के पथ को प्रशस्त करता? लेकिन दुर्भाग्य!! इस अध्यापक ने एक ऐसे बालक को इतनी तरह पीटा जिसकी परिणति उसकी मृत्यु के रूप मे हुई। तब ऐसे क्रूर और निर्दयी अध्यापक को कठोरतम सजा मिलनी ही चाहिये ताकि भविष्य मे ऐसी सामाजिक भेद पैदा करने वाले अपराध करने के पूर्व लोग सौ बार सोंचे?       

सरकार और प्रशासन के उच्च पदस्थ अधिकारी दुर्बल वर्ग के विरुद्ध होने वाले अपराध रोकने मे कितने गंभीर है इस बात का अंदाज़ा इस घटना को देख बड़ी सहजता से लगाया जा सकता है कि इस मासूम छात्र इंदर मेघबाल के विरुद्ध हिंसात्मक अपराध की पुलिस प्राथमिकी घटना के 20 दिन बाद तब दर्ज़ की गयी जब उस मासूम की मृत्यु हो गयी। इस घटना मे शामिल अध्यापक रूपी अपराधी ने पहले कुछ धन देकर परिवार पर समझौते का दबाव भी बनाया लेकिन दुर्भाग्य से छात्र की मृत्यु के कारण उस दुष्ट अध्यापक की काली करतूतों का खुलासा हो गया। 

नौ वर्षीय इस अभागे बालक ने अभी ज़िंदगी की दहलीज़ पर पहला ही कदम बढ़ाया था कि शिक्षित हो वह अपने माँ-बाप की लाठी बन सहारा बनेगा पर छुआ-झूत की इस सामाजिक बुराई ने उसे असमय काल का ग्रास बना लिया। उस माँ के बारे मे सोच कर दिल दहल जाता है जो अपने दिल के टुकड़े की स्कूल से आने की बाँट जोह रही होगी और उसके दिल को कितना बड़ा धक्का लगा होगा जब उसको मालूम चला होगा कि जिस अध्यापक के पास अपने बच्चे के उज्ज्वल भविष्य निर्माण के लिये बच्चे को ज्ञान और शिक्षा प्राप्त हेतु भेजा था उस क्रूर आततायी ने तो उसके लाल की जान लेकर उस माँ के  भविष्य पर ही  कुठराघात कर उसके जीवन को अंधकार से भर दिया। अब उस अभागी माँ के भविष्य को सौ सूर्यों का प्रकाश भी उजाला नहीं ला सकता।   

इस कुत्सित कृत्य की जितनी भी निंदा की जाये कम है। यध्यपि उस अध्यापक को पुलिस द्वारा  इस अमानवीय कुकृत्य पर गिरफ्तार कर लिया गया है लेकिन जब तक उस अधम अध्यापक को उस अबोध बालक की हत्या के जुर्म मे सख्त से सख्त सजा नहीं मिल जाती तब तक शासन और सरकार के साथ क्या हम सभी को, समाज के हर वर्ग को शांति पूर्वक  बैठना चाहिये? हम सभी का आज ये नैतिक और सामाजिक दायित्व होना चाहिये कि उंच-नीच और छुआ-छूत जैसे   किसी भी दोष, बुराई के समूल उन्मूलन तक चैन से न बैठने का संकल्प ले।     

विजय सहगल

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