शनिवार, 11 जून 2022

गुरद्वारा सिंह शहीदों दां

 

"गुरद्वारा सिंह शहीदों दां"







कभी कभी कोई वस्तु जिसकी आपको अपेक्षा ने हो अचानक से आपको प्राप्त हो जाये तो मिलने वाली खुशी की कल्पना ही की जा सकती है। 30 मई को यूं तो मुझे मुहाली स्थित आई॰ एस॰ बी॰  मे अपने बेटे के उपाधि वितरण कार्यक्रम 2022 मे शामिल होना था। सोहाना स्थित होटल से प्रातः भ्रमण के दौरान जब मै मुख्य मार्ग तक पहुंचा तो मार्ग के दायें सिरे पर एक भव्य और विशाल गुरुद्वारे के दर्शन हुए जिस पर निर्माण कार्य चालू था। प्रवेश द्वार पर बड़ी और ऊंची लोहे के जालों के सहारे निर्माण की संरचना खड़ी की गयी तो जो निर्माण कार्य मे सहायक थी। जिज्ञासा वश जब मैंने गुरद्वारे मे प्रवेश किया तो बड़े बड़े फ़्लेक्स बोर्ड पर एक फोटो पर गरम तबे पर नीचे जलते चूल्हे पर  सिख गुरु जी को बैठे देखा, बगल मे एक महिला को एक छोटे से जल पात्र लिए खड़ा देख मुझे समझते देर ने लगी कि ये  श्री गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी दिवस के प्रतीक पर छबील के रूप मे गुलाब जल के वितरण का परिदृश्य है। पर गुरुमुखी भाषा से अनिभिज्ञ होने के कारण इस बोर्ड एवं अन्य बोर्ड पर लिखे संदेश को न समझ सका। अपनी जिज्ञासा को शांत करने हेतु एक बुजुर्ग सेवादार श्री शीतल सिंह जी से मैंने एक अन्य  बोर्ड पर लिखे संदेश और उन पर बने वीर सिख योद्धा के बारे मे जानकारी चाही तो उन्होने  विस्तार से उन वीर बाबा हनुमान सिंह जी के बारे मे बताया जिनकी फोटो कई स्थानों पर अस्त्र-शास्त्रों से सुसज्जित वेशभूषा मे थी।  

18 नवम्बर 1755 को नारंगपुर वाला, पंजाब मे जन्मे बाबा हनुमान सिंह जी को महाराजा रणजीत सिंह जी के निधन के बाद महारानी जींद कौर ने अकाल तख्त साहब, अमृतसर के जत्थेदार  बाबा हनुमान सिंह  जी के पास पत्र भेज कर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध मे सहायता के लिए निवेदन किया। सन 1845 मे 90 वर्ष की उम्र मे बाबा जी ने अपने सेनानियों के साथ तुरंत ही अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई का आवाहन कर युद्ध के लिये मुदकी नामक स्थान के लिये कूच किया और युद्ध मे  लगभग 10 हजार अग्रेजी सैनिको को मौत के घाट उतरकर युद्ध मे विजय प्राप्त की। लेकिन "जय चंद और मीर जाफ़र" की कढ़ी के करम सिंह उर्फ कर्मा अली के विश्वासघात के कारण बापस अंग्रेजों ने बारूदी तोपों और बंदूकों से आक्रमण कर बाबा जी से युद्ध किया जिसमे बाबा जी के पंद्रह हजार से ज्यादा सैनिकों ने बलिदान दिया। स्वयं बाबा हनुमान सिंह ने बारूदी तोपों और बंदूकों से आहात हो घायल अवस्था मे सोहना स्थित इस स्थल पर अपनी सहादत दी। बाबा हनुमान सिंह और उनके साथियों की सहादत की याद मे इस स्थान पर ही बाबा जी का अंतिम संस्कार किया गया और इस गुरद्वारे के नाम "गुरद्वारा सिंह शहीदों" का नामकरण किया गया। 

यध्यपि मै अपनी पत्नी रीता के साथ बिना स्नान ध्यान के ही प्रातः भ्रमण पर निकला था लेकिन गुरद्वारे के पवित्र जल की कुछ बूंदे अपने शरीर पर सिंचन कर पवित्रीकरण मंत्र :-

ॐ अपवित्रः   पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: बाह्याभंतर: शुचि:।। के स्मरण के साथ मन, वचन और कर्म के पवित्र भाव लिये गुरद्वारे मे प्रवेश किया। सरोवर मे प्रवेश के साथ ही सीढ़ियों से चढ़ कर जैसे ही दो मंज़िले सफ़ेद संगमरमर से बने भव्य गुरद्वारे के विशाल परिसर मे प्रवेश किया तो सामने गुरुग्रंथ साहिब के दर्शन से मन अपार आनंद से भर गया। गुरद्वारे के पूरे फर्श पर सुंदर ब्राउन रंग का नक्काशी किए हुए फर्श था जिसके बीच मे एक लाल रंग के गलीचे से एक पथ का निर्माण किया गया था जिस पर होकर श्रद्धालु गुरु ग्रंथ साहिब के सामने मत्था टेक रहे थे। मुख्य मंडप के चारों स्तंभों के उपर स्वर्ण पत्रों पर बहुत ही सुंदर नक्काशी की गयी थी। गुरद्वारे की छत्त पर भी रंगीन सुंदर ज्योमिति आकार मे फूलों की सुंदर चित्रकारी की गयी थी जिसके बीचों-बीच एक सुंदर काँच का झूमर लटकाया गया था जो अपनी सुनहरी रोशनी की छटा चारों ओर विखेर रहा था। गुंबद के ठीक नीचे सिंहासन पर गुलाबी वस्त्रों के बीच गुरुग्रंथ साहिब जी विराजमान थे। सुंदर स्टील की फ्रेम से गुरुग्रंथ साहब के चारों ओर परिक्रमा पथ बनाया गया था  जिसके चारों ओर सुंदर फूलों की सजावट की गयी थी। मैंने भी  सभी दर्शनार्थी श्रद्धालुओं का अनुसरण कर गृरुग्रंथ साहब के सामने नतमस्तक हो अपनी श्रद्धा और सम्मान प्रकट किया। चारों तरफ एक आध्यात्मिक शांति के  वातावरण के बीच जब  हमोनियम और तबले की संगत के मधुर संगीत की स्वर लहरियों के  बीच ग्रंथियों  जी की सुमधुर वाणी मे शबद कीर्तन:-   

"दीन दयाल भरोसे तेरे।
सब परिवार चढ़ाया बेड़े॥
राम जपोजी ऐसे ऐसे
द्रु प्रह्लाद जपयो हर जैसे॥
दीन दयाल भरोसे तेरे.........."

सुना तो मंत्रमुग्ध होकर गुरद्वारे के एक कोने मे बैठ कीर्तन का श्रवण करे बिना न रह सका  और सम्पूर्ण शबद के श्रवण के बाद ही पुनः एक बार गुरु ग्रंथसाहब को प्रणाम कर सीढ़ियों से नीचे वाले हाल मे पहुंचा जहां ऐसा बताया गया कि बाबा हनुमान सिंह का अंतिम संस्कार इसी पवित्र धरा पर किया गया था एवं बाबा जी द्वारा प्रयुक्त अस्त्र-शस्त्र को उनकी याद मे संजो कर रक्खा गया था। बाबा हनुमान सिंह जी को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर गुरुद्वारे के प्रांगण से बाहर निकलने के पूर्व स्वादिष्ट "कड़ा प्रसाद" को सिर माथे लगा ग्रहण किया मानों इस महत्वपूर्ण, पवित्र और इतिहासिक  स्थान के दर्शन का फल रूपी मधुर प्रसाद पा कर मन कृत्य-कृत्य हो गया हो।   

गुरद्वारे के बाहर निकलते ही पवित्र निशान साहब के दर्शन किये जहां सभी भक्त श्रद्धा और सम्मान पूर्वक निशान साहिब के चबूतरे को निर्मल, स्वच्छ जल एवं दूध से सफाई कर रहे थे। हम पति-पत्नी ने भी अन्य श्रद्धालुओं का अनुसरण कर निशान साहिब को प्रणाम कर नीचे परिक्रमा पथ की सफाई के कार्य मे भागीदारी कर अपना आदर और सम्मान प्रेषित किया।         

इस घटना के बारे मे काफी समय पूर्व सुना था पर मेरे अवचेतन पटल से यह घटना विस्मृत हो चुकी थी पर सहसा 30 मई को प्रातः सोहना के इस पवित्र और महान इतिहासिक स्थान के दर्शन ने मुझे विस्मय से अभिभूत कर आनंद से भिगो दिया। मुझे विश्वास नहीं था कि अचानक यूं ही मै इस स्थान से एक अजनवी की तरह हो कर गुज़रूँगा।               

आज की सुबह इस पवित्र स्थल के दर्शन, जीवन के एक यादगार क्षण और घटना के रूप मे मन मस्तिष्क पर अंकित हो गया।    

 

विजय सहगल

 

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Really appreciate your each and every word penned down 🙏

Unknown ने कहा…

Very nice