"संस्कृत
संभाषण-कक्षा"
17 अगस्त 2021 को अपने नित्य प्रातः भ्रमण
उपरांत जब मै सुबह समाचार पत्र का अवलोकन करा रहा था तो हमारी निगाह अचानक एक
समाचार पर स्थिर हो गयी। "मिस्ड कॉल
दें और केवल 20 दिनों मे सीखें ऑन लाइन "संस्कृत" बोलना और पढ़ना"। प्रस्ताव
अच्छा था, बचपन मे कक्षा छठी से
हाई स्कूल तक संस्कृत का अध्यन तो किया था पर मूल उद्देश्य था की परीक्षा मे जैसे
भी हो पास होने लायक अंक आ जाये। हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली का दुर्भाग्य रहा
है कि अग्रेजों द्वारा नियुक्त अंग्रेज़ नौकर शाह लॉर्ड मैकाले ने आज से 186 वर्ष पूर्व सन 1835 मे जिस शिक्षा प्रणाली को
देश पर थोपा था वो सिर्फ विश्वविध्यालयों मे
स्नातकों/परास्नातकों का उत्पादन करने वाले कारखानों के रूप मे उभरी। इन
फ़ैक्टरियों मे अंग्रेजों कों उनकी शासन और सत्ता के रूप मे सहायक,
नौकर शाहों का उत्पादन लगातार होता रहा जो थोड़े बहुत बदलाव के साथ आज तक निरंतर
जारी है। इस प्रणाली मे भारत देश की
प्राचीन ऋषि-मुनियों और गुरुजनों द्वारा हजारों वर्षों पूर्व संस्कृत के वेद,
उपवेद, उपनिषद,
सहिंताओं, श्रीमद्भग्वत गीता आदि पवित्र
ग्रन्थों मे उल्लेखित अध्यात्म विध्या कों कोई स्थान नहीं
दिया गया। इस प्रणाली मे नैतिक शिक्षा और चरित्र निर्माण का पूर्णतः आभाव रहा
जिसके कुप्रभाव वर्तमान मे आम जनों की सेवा मे रत मैकाले की शिक्षा प्रणाली से
निकले अधिकारियों और नौकरशाहों के चाल,
चरित्र और चेहरे मे आज भी स्पष्ट देखा जा सकती है।
जब उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा
संस्कृत के प्रचार प्रसार के अभियान के बारे मे समाचार पत्र मे पढ़ा तो सुखद आश्चर्य होना स्वाभाविक था। मै माफी
सहित लिखना चाहता हूँ कि प्रायः इस तरह के संस्थान सफ़ेद हाथी की माफिक रहे है
जिनका सरोकार कदाचित ही संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार को सामान्य जनों तक जोड़ने के प्रयास करते हों। मैंने पहली बार इस
अभियान के माध्यम से आम जनों कों संस्कृत शिक्षा से जोड़ने के प्रयास कों देखा अतः
मै श्री वाचस्पति मिश्रा सहित उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के श्री नागेश दुबे जी
सहित अन्य आचार्यों की इस प्रयास मे सहभागी होने पर उनकी सराहना और प्रशंसा करता
हूँ।
मुझे यह लिखते बेहद खुशी है कि आज मेरी
कक्षा का दसवां दिवस है। आचार्या श्री नागेश जी के अध्यापन मे संचालित इस ऑन लाइन
कक्षा का मेरा अब तक का अनुभव भी सुखद एवं यादगार रहा। एक ओर जहां जितनी तन्मयता,
समर्पण और निष्ठा के साथ आचार्या जी कक्षा मे हमारी भूली बिसरी यादों कों व्याकरण
और प्राथमिक शब्दों के माध्यम से पुनः जीवंत और जागरण कर रहे थे वही दूसरी ओर
आभासी विध्यार्थियों कों संस्कृत सीखने की ललक और लालसा भी हमारे इस विचार कों दृढ़
कर रही थी कि देश के आम जनों के संस्कृत सीखने की उत्कंठा कितनी प्रबल है! हर उम्र
और वर्ग के आभासी शिक्षार्थियों का ऑन लाइन शिक्षा ग्रहण करने की अभिलाषा कों देख
लगता है कि यदि शासन और सरकार ईमानदारी और सकारात्मक भाव से प्रयास करते रहें तो लोग संस्कृत सीखने के अभियान मे निश्चित ही
बढ़ चढ़ कर शामिल होंगे। जहां मेरे सहित श्री लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी,
ललिता तिवारी, डॉ जागृति देसाई जैसे
वरिष्ठ भवान् और भवत्या विध्यार्थी के रूप मे सहभागी है वही विनय,
विकास, सुप्रिया,
वैष्णवी जैसे युवा और किशोर विध्यार्थी भी जिनकी अच्छी ख़ासी संख्या इस संस्कृत
सीखने के अभियान मे शामिल है उपस्थित है।
ऑनलाइन संस्कृत शिक्षा अभियान मे जहां एक ओर
आचार्य श्री नागेश जी का संस्कृत भाषा मे प्रभावपूर्ण प्रवीढ्ता परिलक्षित हो रही
थे वही स्लाइडस एवं पावर प्रेजेंटेशन के
माध्यम से हर रोज भरपूर पठनीय सामाग्री सॉफ्ट कॉपी के रूप मे उपलब्ध कराई गयी वही
दूसरी ओर सारे प्रतिभागियों को भौतिक रूप से अभ्यास मे शामिल कराने के कारण विषय मे रोचकता और
निरंतरता बनी रही। हर रोज क्लास के प्रारम्भ मे भिन्न भिन्न विध्यार्थियों से गणेश
वंदना एवं संस्कृत ध्येय मंत्र का पाठन कराने से उनमे संस्कृत वाचन के प्रति आत्मविश्वास
का संचार हुआ। आज मै इसी आत्मविश्वास और साहस के साथ कह सकता हूँ कि बेशक मुझे
संस्कृत लेखन एवं व्याकरण मे उतनी प्रवीढ्ता न प्राप्त हुई हो पर मै संस्कृत लिखित
संभाषण मे तो सिद्धहस्त हो गया हूँ।
डॉ वाचस्पति मिश्रा और नागेश जी जैसे
आचार्यों और उनकी टीम के इस संस्कृत महाभियान कों देख कर और देश के हर प्रांत,
भाषा, उम्र,
वर्ग, और लिंग भेद के परे संस्कृत सीखने के
अभियान मे शामिल इन विध्यार्थियों कों देख लगता है कि संस्कृत भाषा का भविष्य आज
की नौजवान पीढ़ी के हाथ मे ज्यादा सुरक्षित और उज्ज्वल है। उत्तर प्रदेश संस्कृत
संस्थान के ऐसे सद्प्रयस संस्थान की सार्थकता कों सिद्ध करेंगे। संस्थान सफलता के
नये आयाम प्राप्त करे इन्ही शुभकनाओं के
साथ।
विजय सहगल




2 टिप्पणियां:
विजय सहगल जी महोदय: नमः संस्कृताय 🙏, भवत: संस्कृत सम्भाषण कक्षाया: अनुभवं पठितवती अहं,भवान् सत्यं सुस्पष्टं वार्तां उद्धृतवान् {कथितवान्} सर्वासां भाषाया: जननी अस्माकं संस्कृत भाषास्ति एतस्या निरन्तरम् अध्ययन अध्यापनेव प्रत्येकजनानां जिह्वोपरि विद्यमाना भविष्यति।अतएव अस्माकं तु एतां प्रति दायित्वमपि अस्ति,यत् सर्वान् मनुष्यान् वाग्देवी {संस्कृत} मातु: रक्षां करणीयम्। संस्कृतमातरं प्रति निष्ठा,समर्पण, स्नेह, भक्तिभाव, अवश्यमेव दर्शनीयम्।मम मनसा राष्ट्रहिताय
"संस्कृत सम्भाषण-कक्षाया:" सञ्चालनं भवति,अधुना बहु आवश्यकीऽपि अस्ति।
नागेश: आचार्यात् तु पूर्वं अहमपि संस्कृत सम्भाषण पठितवती, महोदय:तु बहु बहु सम्यक् पाठयति, तर्हि तु अहमपि किञ्चित्-२ संस्कृतं वदामि,तथापि किञ्चित् अपि न जानामि संस्कृतं किमर्थम् इतोऽपि ज्ञानाय अपेक्षते,इतोऽपि इदानीमपि शेष: अस्ति।
लेखने कोऽपि त्रुटि: अस्ति चेत् क्षमा इच्छामि 🙏🙏
संस्कृताभिलाषी
__ रेखा_____
प्रणमाम्यहम्
🙏🙏🙏 जयतु संस्कृतं जयतु भारतम्
सहगल महोदय,भवान आत्मकथा रोचक अस्ति।शब्द सामर्थ्य वाक्यरचना च प्रशंसनीय अस्ति ।नमस्कार में
एक टिप्पणी भेजें