शनिवार, 31 जुलाई 2021

पशुओं के साथ नैतिक व्यवहार (PETA)

 

"पशुओं के साथ नैतिक व्यवहार (PETA)"





महानगरों की ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं मे  रहने वाले नागरिकों से ये अपेक्षा थी कि उनकी सोच भी इन ऊंची गगनचुम्बी इमारतों की सी होगी। इनमे रह रहे लोगो के दिल मे गरीब और निर्बल वर्गों के लिये सहृदयता होगी। इन ऊंची ऊंची बिल्डिंग मे सभी भाषा, प्रांत और समाज के प्रबुद्ध वर्ग के "मानव" तो निवासरत थे लेकिन "मानवता" कहीं  दूर दूर तक दिखाई न देती। पिछले दिनों नगर निगम के पार्क मे शाम को खेलने जा रहे सोसाइटी के एक बच्चे को एक स्ट्रीट डॉग ने काट लिया। पंद्रह वर्षीय राजू को आठ टांके लगे थे। हाथ पैरों मे जगह जगह कुत्ते के काटे के निशान थे जिनसे खून रिस रहा था।  ये तो भला हो आसपास घूम रहे लोगो का जो उस समय घूमने जा रहे थे। लोगो ने कुत्तों को डंडे और पत्थरों से मार कर पीछे भगा बच्चे को बचाया।

गनीमत थी हालत कोई गंभीर तो नहीं थे  पर गली के इन आवारा कुत्तों ने सोसाइटी के चिंतातुर नागरिकों के बीच  एक गंभीर चर्चा का विषय तो बना ही दिया था। उसकी सोसाइटी सहित आसपास की सोसाइटी मे रह रहे निवासियों के बीच बड़ा हँगामा मचा था। दर असल कुछ पशु प्रेमी गली के आवारा कुत्तों को रोज जगह-जगह खाना, बिस्कुट और भोजन खिलाते थे। महानगर की एक पशु प्रेमी संस्था तो सुबह और शाम अपने कर्मचारी के माध्यम से इन स्ट्रीट डॉग को ताजी और स्वादिष्ट बिरयानी खिलाती थी। उस कर्मचारी को देख सारे आवारा कुत्ते उसके इर्द गिर्द पूंछ हिलाते, गुरगुराते उसको  चारों ओर से बिरयानी की चाह मे घेर खड़े हो जाते। वह कर्मचारी कागज विछा, बिरयानी के छोटे छोटे ढेर लगा सड़क के दोनों ओर अलग अलग फैला देता। उस समय सड़क के दोनों ओर दूर दूर तक कुत्तों को भोजन  करते लाइन मे देखा जा सकता था। इसी दौरान रहवासी जो वहाँ से निकल रहे होते, कुत्तों को  लगता कि राहगीर उनको उनके भोजन से वंचित करना चाहते है अतः स्ट्रीट डॉग गुजर रहे लोगो पर  भौंकते थे। इसके अतिरिक्त कुछ धर्म प्रेमी, पशु प्रेमी नागरिक भी पूरे दिन इन आवारा कुत्तों को रोटी, चावल, भोजन बिस्कुट आदि भी खिलते रहते थे जिससे भी इन जानवरों के स्वभाव मे परिवर्तन आ चुका था और जिसके कारण इनकी आक्रामकता बढ़ती जा रही थी। आस पास की सोसाइटी के बहुतायत निवासियों को इन आवारा पशुओं को भोजन खिलाने पर आपत्ति रहती थी  और कभी कभी आपस मे कहा सुनी हो जाती। क्योंकि इन आवारा कुत्तों को बगैर किसी मेहनत के मिल रहे स्वादिष्ट खाने ने इन्हे खूंखार भी बना दिया था। गाहे बगाहे ये निरंकुश पशु कभी कभी सड़क पर चल रहे नागरिकों, बूढ़े और बच्चों पर आक्रामक हो काट भी लेते थे, पर  आज तो हद हो गई थी।

सभी सोसाइटी के लोगों ने एकत्रित होकर  इन आवारा पशु प्रेमियों के विरुद्ध मोर्चा खोल इन गली के कुत्तों को बिरयानी परोसने वाली संस्था के कर्मचारियों को घेर लिया। उसके इस तरह आवारा कुत्तों को भोजन खिलाने पर आपत्ति की। स्वाभाविक था इन्ही सोसाइटी मे रह रहे पशु प्रेमी भी हल्ला गुल्ला सुन उस संस्था के कर्मचारी के पक्ष मे खड़े हो गये। "पशु के साथ नैतिक व्यवहार" कानून "पेटा"  के पक्षधर लोगो ने न्यायालय एवं "पेटा"  (प्युपल  फॉर द एथिकल ट्रीटमंट ऑफ एनिमल) कानून का हवाल दे अपने अधिकार के पक्ष मे आवाज उठाई और घर से लाये बिस्कुट, रोटी और कुत्तों को खिलाने वाले बिस्कुट के साथ आमने सामने हो गये। पशु प्रेमी संस्था के कर्मचारी की बाइक पर रक्खी  बिरयानी की खुशबू सूंघ आवारा कुत्ते भी उसके आसपास एकत्रित हों बिरयानी की चाह मे भौंक रहे थे मानो भोजन के अधिकार के लिए अपनी आवाज बुलंद कर रहे हों। इन आवारा कुत्तों की आक्रामकता से तंग आये लोगो ने कर्मचारी को कुत्तों को खाना खिलाने से रोका। कहा सुनी बढ़ती जा रही थी। कोरोना काल मे इस तरह हुल्लड़ मचाती भीड़ को देख किसी ने पुलिस को हंगामे की सूचना दी। इस कहासुनी के बीच 40-50 लोगो के एकत्रित होने की सूचना पर पुलिस तुरंत हरकत मे आयी और स्थिति का जायजा लिया। लेकिन आज तो लोग कुत्तों की इस आवारागर्दी पर कुछ स्थायी समाधान करने के मूड मे थे।

सड़क पर चल रहे इस हंगामे को नंदू भी अपनी झुग्गी से देख रहा था जो घटना स्थल के  निकट ही थी। निपट निरक्षर, नंदू और उसकी घरवाली, "छोटी" अपने बच्चों  के साथ इन्ही सोसाइटी मे लोगो के घरो पर वर्तन धोने और घरेलू काम कर अपना गुजर बसर करते थे। पिछले लगभग एक साल से उनके हालत कोरोना की बजह से ठीक न थे। लोगो ने कोरोना फैलने के डर से घरों मे काम कराना बंद कर दिया था। किसी तरह मांग-चूंग कर गुजर-बसर हो रही थी।  कभी कभी भूखे  रह फाँके करने की नौबत भी आ जाती थी। नोएडा जैसे नगर मे बिना  काम-धंधे के जीवन यापन कठिन था फिर इस कोरोना ने तो उनकी कमर ही तोड़ दी। यातायात के सभी बंद साधनों ने उन्हे कहीं का नहीं छोड़ा था। सरकार के "आश्वासनों" से तो उनकी झुग्गी मे धन्य-धान के पर्याप्त भंडार भरे थे पर यथार्थ के धरातल पर उनको खाने के लाले पड़े थे। मई-जून की भरी दोपहरी मे चाह कर भी छोटे बच्चे के साथ वह अपने गाँव को पलायन की हिम्मत न दिखा सका और अनुकूल समय के आने का इंतज़ार कर रहा था। नंदू ने अपने गाँव मे कुत्तों के लिये आदमियों के बीच ऐसी कहासुनी कभी नहीं देखी  थी। सूखी रोटी दे उसने कुत्तों को पूरी बफदारी के साथ गाँव की चौकीदारी करते देखा था। इन आवारा कुत्तों को सुबह-शाम बिरयानी खाता देख उसे ईर्ष्या होती कि काश उसे भी कभी थोड़ी बिरयानी मिल जाती!! मन मे चल रही इसी ऊहा-पोह की अकुलाहट मे अचानक ऊंची आवाज के हो हल्ले ने उसका ध्यान भंग कर दिया।

उसका ध्यान पुनः भीड़ की ओर गया। नंदू बैसे था तो निपट कुपढ़ और निरक्षर पर  रहवासियों, पुलिस और लोगो के एक एक कदम को बड़े गौर से देख और सुन रहा था।  पुलिस के अनुरोध के बावजूद दोनों पक्ष मानने के तैयार नहीं थे। कुछ "पेटा" कानून का बार बार हवाला दे पक्ष मे खड़े थे तो कुछ आये कुत्तों द्वारा बच्चों, बुजुर्गों को काटने से तंग इन आवारा कुत्तों का भोजन खिलाने का विरोध  कर रहे थे।  मामला कुछ गंभीर हो गया था। अंततः अचानक पुलिस शांति बनाए रखने दोनों पक्षो के कुछ लोगो और पशु प्रेमी संस्था के कारिंदे  को भी  गाड़ी मे बैठा थाने ले गयी और दूसरे रहवासियों को लाठी फटकार अपने अपने घरों मे बापस भेज दिया।  लठियों की आवाजों के बीच कुत्ते भी नदारद थे पर बिरयानी का थैला बाइक पर यथास्थिति लटका हुआ था। नंदू ने भी लोगो की निगाहों से बचते बचाते झुग्गी से निकल संस्था के कर्मचारी की बाइक पर टंगे बिरयानी के झोले को चुपके से निकाल  झुग्गी की ओर लपका।

बिन मांगे "बिरयानी" की आज उसकी मुराद जो पूरी हुई थी। सारे परिवार के साथ उस रात जम कर  बिरयानी का रसास्वादन करते हुए दावत उड़ाई। बैसे राजू था तो कूपढ़ पर भीड़ मे बार-बार जब पशु प्रेमी प्रभावशाली ढंग से "पेटा" कानून  का हवाला दे विरोधियों पर आक्रामक तरीके से अपनी बात कहते सुना तो उसके मन मे "पेटा" के प्रति सम्मान और सकारात्मक भाव की  छवि  थी। "पेटा" के बारे मे बहुत ज्यादा कुछ पल्ले न पड़ने के बावजूद  उसने  अपना निष्कर्ष पत्नी से यूं कहा, "भली मानुष" देख, "कचहरी (कानून) हम गरीबों का कितना ध्यान रखती है"। वो क्या कहते है "पेटा", हाँ, "पेटा" कानून यदि कचहरी न बनायी  होती  तो आज स्वादिष्ट  बिरयानी खाने को न मिलती!! पेटा तो हम गरीबों की सुधि लेने के लिये ही बना अन्यथा हम लोगो को कौन पूंछने वाला था।

अनजाने मे ही सही नंदू ने महानगरों के रहवासियों से "पशुओं के साथ सा "नैतिक व्यवहार" की अपेक्षा गरीबों के साथ भी करने का संदेश तो दिया ही  थी।                

विजय सहगल

बुधवार, 28 जुलाई 2021

मीडिया समूह पर आयकर की छापेमारी

 

"मीडिया समूह पर आयकर की छापेमारी"





दिनांक 23 जुलाई को देश के जाने माने समाचार पत्र "दैनिक भास्कर" समूह के कई प्रतिष्ठानों और उसके अनुसंगी टीवी चैनल "भारत समाचार"  पर आयकर विभाग ने छापे मारी की। छापे मारी के समाचार से देश और दुनियाँ के तमाम मीडिया संगठनों ने इस छापेमारी को "प्रेस की आज़ादी" पर हमला बताया। एक समाचार संगठन (कहाँ का है पता नहीं) "रिपोर्ट विदाउट वर्ड्स" ने भारत मे इस तरह की कार्यवाही तुरंत रुकनी चाहिए"। क्यों रुकनी  चाहिये? का कोई जबाब नहीं। अमेरिका स्थिति एक मीडिया समिति ने इस कृत्य की आलोचना की। "कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स" ने भी कहा "इन जाँचों को बंद करना चाहिये"। "इंडियन विमिन्स प्रेस कॉर्प्स" ने भी "आईटी छापों की निंदा की!! एडिटर गिल्ड ऑफ इंडिया" ने तो चिंता जता "स्वतंत्र पत्रिकारिता को दबाने के लिये सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल दबाब बनाने के हथकंडे के रूप मे किया जा रहा है" जैसे शब्दों मे सरकार की निंदा की। इन सारे अदृश्य मीडिया संगठनों ने एक दूसरे की "पीठ खुजा" एक स्वर मे मीडिया पर छापे की निंदा के समाचार को  देश के सभी समाचार पत्रों मे मोटी मोटी हैड लाइंस मे प्रकाशित किया।

एक बात समझ से परे है कि समाचार माध्यमों पर उनके अनैतिक कृतों पर क्यों छापे मारी नहीं करनी चाहिये?  क्या मीडिया समूह और टीवी चैनल देश के सविधान और कानून से उपर है? किस संवैधानिक विशेषाधिकार के तहत इन समाचार समूहों को उनके  अनैतिक कार्यों मे लिप्त होने के बावजूद इनके विरुद्ध छापेमारी की छूट  मिलनी चाहिये? क्योंकि ये समाचार संस्थान चलाते है? विदेश समाचार संस्थानों का तो नहीं पता पर भारत मे समाचार संस्थान के मालिक तो बहुत बड़ी बात है, मीडिया समूह का अदना कर्मचारी भी अपने दो पहिया/चार पहिया वाहनों मे "प्रेस" लिख अपने आपको कलेक्टर से भी ऊंचा मानता है!! ये पुलिस विभाग, व्यापारी, नौकरशाह और आम लोगो के बीच अपने को मीडिया कर्मी बता धौंस जमाने की कोशिश करते हुए समाज मे "विशेष महत्व" की अपेक्षा रखते है। शायद ही विदेशी-दुनियाँ मे ऐसी हथकंडे  मीडिया से जुड़े पत्रकार और संवाद दाता करते हों!! मीडिया समूह के ये तथाकथित पत्रकार, प्रशासनिक अधिकारियों, अपराधियों  से अदलतों/न्यायधीशों की तरह ऐसे  सवाल जबाब करते है जैसे कोई क्लास टीचर अपने छात्रों से सवाल करता है और सवाल का मनमाफिक उत्तर न मिलने पर हथेली पर पाँच डंडे मार तुरंत सजा भी देना चाहता है। फिर ये छापे मारी तो समाचार समूह के मालिकों पर की गयी थी पत्रकारों की रिपोर्टिंग से इसका क्या लेना देना।

मध्य प्रदेश मे दैनिक भास्कर समूह की  सरकार से मिलिभगत कर अपने व्यवसायिक हित लाभ लेने की कारगुजारियों से प्रदेश के सभी नागरिक भलीभाँति परिचित है। मध्य प्रदेश के इंदौर, जबलपुर और अन्य शहरों का तो ज्ञात नहीं पर  इस समूह ने भोपाल और ग्वालियर मे मौके की सरकारी जमीन राजनैतिज्ञों से मिलीभगत और सांठगांठ कर अपने हित साधे है जिन्हे यहाँ के लोगो के साथ मैंने भी स्वयं देखा है।  भोपाल के मुख्य केंद्र "बोर्ड ऑफिस चौराहे" पर स्थित बहुमूल्य भूमि पर निर्मित व्यावसायिक डीबी मॉल  के इतिहास से कौन परिचित नहीं है? बोर्ड ऑफिस चौराहे पर स्थित इस विशाल मॉल पर कुछ साल पहले तक हमने अपनी आंखो से झुग्गी बस्ती वसी देखी थी। किस तरह राजनैतिक नेताओं के मेल-जोल  और मिलीभगत से इस बस्ती को बलपूर्वक खाली करा इस पर भव्य, आलीशान व्यवसायिक मॉल बनाया गया जो पूरे मध्य प्रदेश मे अपनी विशालता और भव्यता के लिये प्रसिद्ध है। प्रैस कॉम्प्लेक्स मे स्थित इनके विशाल और भव्य कार्यालय की अलग ही पहचान तो  है ही।

ग्वालियर मे रेल्वे स्टेशन के सामने दशकों तक लोगो ने मध्य प्रदेश राज्य परिवहन निगम का वर्कशॉप को कार्यरत होते देखा। स्टेशन के सामने स्थित इस वर्कशॉप मे परिवहन निगम की सैकड़ों बसे प्रदेश के दूर दराज शहरों से यात्रियों को लाने-लेजाने के बाद मरम्मत और रख रखाब के लिये आती थी। सैकड़ों मिस्त्री, हेल्पर और मेकेनिक इस वर्क शॉप मे कार्य कर अपनी रोजी रोटी कमाते थे। सालों तक अपने सरकारी कुप्रबंधन से परिवहन निगम कालांतर मे जब एक सफ़ेद हाथी की तरह कार्य करता रहा और जिसे इन्ही राजनैतिक आकाओं ने इस संस्थान को मरणासन्न हालत मे ला "लाश" के रूप मे परिवर्तित कर इसका सौदा दुर्दांत भेड़ियों से कर दिया। सरकार की लाल फीताशाही और ढुलमुल रवैये से न केवल वर्क शॉप बल्कि राज्य परिवहन निगम भी अपनी पहचान गँवा इतिहास के कालखंड का हिस्सा बना दिया। परिवहन निगम के हजारों कर्मचारी आज भी अपने वेतन, भत्तों, भविष्य निधि फंड्ज के लिये कोर्ट कचहरी के चक्कर लगा अपने भाग्य पर आँसू बहा रहे है उनमे बहुत से कर्मचारी तो वेतन भत्तों की आश मे इस "फ़ानी दुनियाँ" से ही कूच कर गये।

ग्वालियर स्टेशन के सामने मध्य प्रदेश परिवहन निगम के दो तरफ सन्मुख वाले इस बहुमूल्य विशाल भूखंड पर भी एक भव्य व्यावसायिक मॉल का निर्माण किया गया है। आपको आश्चर्य होगा कि  इस विशाल मॉल पर भी मालिकाना हक और कब्जा दैनिक भास्कर समूह का ही है। सिटी सेंटर स्थित अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान, होटल भी इस समूह के पास है।

जिस तेजी से  कुछ सालों मे  इस समूह ने व्यापार, व्यवसाय और परिसंपातियाँ अर्जित की है वो संदेह पैदा करती है। शायद ही किसी अन्य व्यावसायिक संस्थान ने इतने कम समय मे मध्य प्रदेश मे इतनी संपत्ति अर्जित की हो!! जो राजनैतिक नायकों और व्यवसायिक संस्थान की मिलीभगत के बिना संभव नहीं? अगर सरकार का आयकर विभाग इस मीडिया समूह की आय की जांच करती ही तो किसी को क्या? और क्यों? संदेह या आपत्ति होना चाहिये?

अगर हर व्यापारिक, मीडिया, ऊधयोगपति और राजनैतिक दलों से जुड़े लोग इसी तरह छापे मारी की आड़ से बचते रहे और यही इल्जाम सरकार पर लगते रहे कि ये कार्यवाही या ये  छापे "राजनैतिक दुर्भावना", "बदले की कार्यवाही", "ईर्ष्या" और "दुश्मनी" से प्रेरित है और अपने बचाव का इस्तेमाल करते रहे। तो क्या ये माना जाये की देश का कानून सिर्फ गरीब और निरीह साधारण लोगो  के लिये ही है?? या जिनका कोई धनी-धोरी (माई-बाप) नहीं है????            

विजय सहगल                

शनिवार, 24 जुलाई 2021

कुचेसर का किला

 

"कुचेसर का किला"









कभी कभी किसी शहर या कस्बे की छवि अपने किसी प्रिय जनों या विश्वस्त साथियों के साथ घटित  अप्रिय घटना के कारण नकारात्मक छवि की तरह आपके मन मे बन जाती है। उस स्थान के लोगो के बारे मे भी कमोवेश आपके मन मे छवि सकारात्मक नहीं रहती। ऐसे ही कुछ छवि हमारे एक अभिन्न साथी श्री विपिन गर्ग जी की एक शाखा मे प्रबन्धक रहते उनकी शाखा मे घटित डकैती की घटना के कारण उस कस्बे की बनी। 1984 तक मै श्री गर्ग के साथ हज़रत गंज लखनऊ शाखा मे कार्यरत था। लखनऊ से मेरे स्थानांतरण के बाद श्री विपिन गर्ग जी  के साथ दुबारा तो नहीं रहा पर उनसे सतत संपर्क बना रहा। कुछ समय अंतराल के बाद वे भी जिला बुलंदशहर मे कुचेसर शाखा के प्रबन्धक के पद पर स्थान्तरित हो लखनऊ से चले गये। उन दिनों आज की तरह फोन आदि की इतनी आम सुलभ सुविधाएं न थी। चिट्ठी पत्री के माध्यम से  कभी कभी संपर्क हो राजी खुशी के संदेश आते जाते मिलते रहे थे।

एक बार उन्होने सन् 1988 (साल के बारे मे सुनिश्चित नहीं कुछ आगे पीछे भी हो सकता है) पत्र के माध्यम से कुचेसर के एक छोटे लेकिन समृद्धशाली  कस्बे के रूप मे जिक्र किया था। लेकिन एक दिन उन्होने पत्र के माध्यम से अपनी शाखा मे पड़ी डकैती की चर्चा करते हुए पत्र लिखा था कि कैसे कुछ बदमाश शाखा मे आये और बैंक से नगदी की लूटपाट कर घटना को अंजाम दिया गया था। उन्होने जब लिखा कि उन्होने बदमाशो को घटना के अंजाम देने के पश्चात बापसी मे भागते समय एक गुंडे को स्टूल फेंक कर मारा था, जिसके जबाब मे उसने क्रोधित हो उन पर गोली चला दी थी। उस गोली की घटना मे वे बाल बाल बच गये। उन्होने लिखा था गोली उनके कंधे को छूती हुई निकल गयी थी। गर्ग साहब के निडर स्वभाव से मै हजरतगंज शाखा से ही परिचित था जहां वे सेकंड मैन के रूप मे पदस्थ थे। शाखा मे भी प्रायः उनकी एक यूनियन नेता जी से काम की बजह से कहा सुनी हो जाती थी। वे नेताजी के द्वारा काम मे कोताही वर्तने पर उनको अपना काम पूरा किये बिना न जाने की नसीहत दे अक्सर टोक दिया करते थे, जिसके कारण नेताजी को बुरा लगता था। बगैर आगा पीछा सोचे अन्याय के विरुद्ध भिड़ पड़ना उनका स्वभाव था। उनके इस व्यवहार के कारण ही हमारी पाँच लोगो की मित्र मंडली मे हम लोग हमेशा  उन्हे आदर और सम्मान की दृष्टि से देखते भी थे और बैसी ही श्रद्धा और सत्कार भी करते थे। डकैती की घटना मे कितनी धनराशि आदि लूटी गई थी अभी तो स्मरण नहीं।  इस घटना के बाद उनका स्थानांतरण मेरठ हुआ था जहां उनके घर एक दिन के आथितित्य पर मै परिवार सहित उनके घर मेरठ भी गया था। वहां पर हमने गर्ग साहब को पुनः ऐसे किसी भी दुस्साहस को न करने का अनुरोध भी किया था। बाद मे उक्त बदमाश उनके द्वारा बताये हुलिये के कारण पकड़े भी गये थे।  

तभी से कुचेसर कस्बे के बारे मे मेरी मन मे एक नकारात्मक छवि बन गई थी। कुछ ऐसा संयोग बना कि फरबरी 2018  मे बैंक के कार्यवश मुझे दिल्ली से दो दिन  कुचेसर शाखा मे जाने का सुयोग बना। शहर/कस्बे के नाम से तो मै परिचित था ही लोगो के बारे मे भी कोई सकरत्मक अच्छी राय न थी। लंच के बाद यूं ही कुछ चहल कदमी के इरादे से शाखा के बाहर स्थित सड़क पर एक दिशा मे उद्देश्यहीन  टहलता रह। छोटा सा  कस्बा जो हापुड़ रोड से दाहिने सैदपुर मार्ग पर स्थित था। मुख्य सड़क के दोनों ओर बमुश्किल आधा-एक किमी॰ मे  बसाहट थी लेकिन इस छोटे से कस्बे मे स्थित दुकानों और दूर दूर तक फैले हरियाली से परिपूर्ण खेतों को देख कस्बे और क्षेत्र की संपन्नता का अहसास करना कठिन न था। शाखा के बगल मे ही एक छोटे रास्ते के मुहाने पर "राव राज विलास" का सूचना पट दिखाई दिया। शाखा प्रबन्धक ने बताया कि रास्ते के अंदर ही कुचेसर फोर्ट है। जिसे देखने की जिज्ञासा मन मे रही। दूसरे दिन पुनः लंच मे जब अंदर जाकर  देखा तो सहसा विश्वास नहीं हुआ कि इस साधारण से गाँव मे इस  जगह पर इतना पुराना और वैभव समेटे कोई आलीशान किला भी इस कस्बे मे हो सकता है। प्रबन्धक महोदय ने उस किले की देख भाल करने बाले आकर्षक व्यक्तित्व बाले सज्जन जिनका नाम मै भूल रहा हूँ को भी बुला लिया। किले के मुख्य हाल के बाहर बने गोलाकार सफ़ेद खंबों की बनावट  न्यू दिल्ली मे  कॉनाट प्लेस के इन्नर सर्कल मे बने बरामदे के खंबों जैसी दिखाई दे रही थी।   किले के अंदर एक बहुत ही सुंदर महल जो अपने आप मे वास्तु का उत्क्रष्ट नमूना लिये आकर्षक मेहराव,  शानदार दरबाजे एवं खूबसूरत फ़र्निचर के सुंदर रख रखाव के साथ प्रदर्शित किया गया था। महल रूपी किले के बाहर सुंदर ढंग से बाग बगीचे को रख-रखाब  किया गया था जो किले की सुन्दरता मे चार चाँद लगा रहा था। भारतीय परंपरा मे  बने मुख्य खुले आँगन के केंद्र मे भव्य फब्बारे किले की वैभवता की कहानी ब्याँ कर रहे थे। आँगन के चारों ओर बने मेहरावदार वृहद बरामदे के बाद कमरे बने हुए थे। एक खुले बड़े से आँगन मे स्विमिंग पूल बना हुआ था। जिसके चारों ओर बैठने के लिये बेंचे पड़ी थी। कुल मिला कर ये कहना मुश्किल था कि बाहर से दीख रहे एक साधारण से कस्बे मे इतना आकर्षक और वैभवपूर्ण वास्तु और आकर्षक  स्थापत्य कला  से निर्मित एक सुंदर शानदार  किला  भी हो सकता है। किले के उन सज्जन ने बताया कि किले को एक पुरानी विरासत रूपी होटल (heritage होटल)  मे तब्दील किया गया है जो समस्त सुविधाओं से युक्त है। जिसमे कि प्रायः जर्मनी, फ्रांस एवं अन्य पश्चिमी देशो के पर्यटक ऑन लाइन बुकिंग करा कर ग्रुप मे यहाँ आते है। कुचेसर रियासत स्थित इस किले के वंशज और वारिसान दिल्ली और मेरठ मे निवासरत् है।

करीब 35 वर्ष पूर्व हमारे मित्र गर्ग साहब के साथ बैंक मे घटी अप्रिय डकैती घटना के कारण मेरे मन मे कुचेसर के बारे मे स्वतः निर्मित पूर्वधारणा को कुचेसर और वहाँ के वासिन्दों ने गलत साबित कर दिया था।

विजय सहगल

 

 

बुधवार, 21 जुलाई 2021

खिलौने वाला

 

"खिलौने वाला"






आज भी रोज की तरह प्रोफेसर साहब कॉलेज के दैनिक रूटीन से निवृत्त होकर रेल्वे स्टेशन पहुँच गए। उनकी रिहाइश डबरा मे थी। ग्वालियर से दैनिक आवागमन कर सुबह की गाड़ी पकड़ ग्वालियर पहुँचते एवं शाम की गाड़ी से बापस चालीस किमी॰ की यात्रा कर डबरा पहुँच जाते। ये ही उनकी दिनचर्या थी। 

सभी दैनिक यात्री स्टेशन से रोज आते रहने के कारण मांगने वाले, खोमचे वाले, दुकानदार और ट्रेन मे चलने वाले अन्य अधिकृत और अनधिकृत बेन्डर से  जान पहचान न होने के बावजूद भी उनके व्यवसाय और शक्ल-सूरत से सभी आपस मे एक दूसरे से  परिचित हो ही जाते है। इन तमाम अनधिकृत बेन्डर मे एक खिलौने बेचने वाला बच्चा भी था। प्रोफेसर साहब इस मेहनती बच्चे के स्वभाव और स्वाभिमान से अच्छे खासे प्रभावित थे।  उस अभागे बारह बर्षीय बच्चे का नाम राजू था। घर मे  माँ के अलावा एक छोटा भाई और छोटी बहिन थी उसके परिवार मे। बारह वर्षीय राजू ही इस परिवार का मुखिया था। पिता का देहांत सात वर्ष पूर्व एक दुर्घटना मे हो गया था। उसके अवचेतन मन मे पिता की शक्ल के साथ कुछ कुछ स्मृतियाँ शेष थी। उसका  स्कूल मे  दाखिला हो गया था। उस अभागे दिन उसके पिता साइकल पर बैठा, उसकी स्कूल यूनिफ़ोर्म दिलाने जा रहे थे। तभी एक कार ने उनकी साइकल मे पीछे से ज़ोर दर टक्कर मारी थी। उस मनहूस दिन मानो उसके उपर मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा। उसके उपर परिवार की ज़िम्मेदारियों का बोझ जो आन पड़ा था। माँ ने मजबूरी वश लोगो के घरों मे काम करना शुरू किया था पर इन दिनों बुखार से ग्रस्त हो चारपाई पर पड़ी थी। परिवार का वोझ ढोने के लिये उसके कंधे यद्यपि इतने मजबूत न थे लेकिन पुरुष प्रधान समाज मे घर का मुखिया होने के नाते परिवार माँ, भाई, बहिन की सारी ज़िम्मेदारी राजू के कंधों पर ही थी। राजू को खिलौनों से प्यार था पर  जिन खिलौनों से उसे खेलना था दुर्भाग्य ने उसे  खिलौने तो दिये पर खेलने के लिये नहीं, बेचने के लिये!! एक परिचित ने रेल्वे स्टेशन पर खिलौने बेचने वाले ठेकेदार से कह उसको स्टेशन पर ट्रेनों मे खिलौने के डिब्बे बेचने के लिये लगवा दिया। एक सौ रूपये का डिब्बा बेचने पर उसे प्रति डिब्बा दस रूपये कमिशन मिल जाता। राजू खुश था दिन भर खिलौनों को जी भर कर देख संतुष्ट हो लेता  और प्रति डिब्बा दस रूपये की मुनाफा भी हो जाती जिस की सहायता से घर खर्च मे भी वो हिस्सा बंटा लेता।  

अपनी दिनचर्या के अनुरूप प्रोफेसर साहब डबरा घर बापसी मे आज भी एक डिब्बे मे कुछ जगह खाली देख बैठ गये।  कुछ कॉलेज के नौजवान भी उसी डिब्बे मे पीछे से शायद दिल्ली से आ रहे थे। उनकी आपसी बात चीत से लगा शायद उन्हे इसी उत्कल एक्सप्रेस से सागर जाना था। बातचीत का सिलसिला जारी था। उनमे से एक युवा ने कहा स्टेशन पर सामान बेचने वाले ये वेंडर  बड़े बदमाश होते है, ट्रेन के प्लेट फोरम से शुरू होने पर ये  लोगो से पैसे लेकर गाड़ी चलने पर यात्रियों को वस्तु नहीं देते या पैसे बापसी का नाटक कर पैसे बापस नहीं करते। ऐसा!! दूसरे साथियों ने एक स्वर से कहा। चलो आज इन्हे मजा चखाया जाये। गाड़ी के चलने का समय हो चुका था। हरे रंग के  सिंगनल ने  गाड़ी के चलने का संकेत दे दिया था। अचानक उस  खिलौना बेचने वाले को देख इन नौजवानों ने आवाज देकर बुलाया। आवाज सुन, खिलौने बेचने की चाह ने उसके चहेरे पर एक अलग ही चमक और रौनक ला दी। वो सहज भाव से उन यात्रियों की तरफ लपका। नौजवान यात्रियों ने डिब्बे मे रक्खे छोटे छोटे खिलौनों की कीमत पूंछी। उसने बड़े उत्साह और उमंग से बताया। "नमस्ते", सर!! "केवल सौ रूपय", "बहुत अच्छे खिलौने है सर"!  उसके चहरे पर खुशी दुगनी हो गई जब उन यात्रियों ने खिलौनों के दो डिब्बा लेने की बात कही। उसने हाथ मे लिये एक डिब्बे को उनकी ओर बढ़ाते हुए दूसरा डिब्बा लाने की कह, पीछे भागा। अचानक गाड़ी प्लेट फोरम से रेंगने लगी। बच्चे के लिये ये कोई नई बात नहीं थी, ऐसी परिस्थिति तो रोज बनती थी। वो भाग कर अपने बैग से दूसरा डिब्बा लेने दौड़ा और कुछ ही समय भागते भागते दूसरा डिब्बा भी लाकर उन नौजवानो की ओर बढ़ा दिया। नौजवानों ने पाँच सौ का नोट दिखा तीन सौ रुपए बापस मांगे। बच्चे के लिये स्थिति अब विकट होने वाली थी। जेब मे पैसे नहीं थे। युवा यात्रियों ने पर्स से खुले पैसे निकालने का बहाना बना कभी इस जेब से उस जेब मे तलाशी शुरू की, तभी दूसरे साथियों ने भी जेब टटोलने का कामयाब अभिनय दिखाते रूपये तलाशे, तब तक गाड़ी की गति तेज हो चुकी थी। बच्चा पीछे और पीछे छूटता गया और कुछ ही पलों मे आँखों से ओझल हो गया।  

अब उन नौजवनों के चेहरे पर मक्कारी मिश्रित हँसी थी। आपस मे बात कर उनका मनहूस हंसी से  हंस-हंस कर बुरा हाल था। वे अपनी धूर्त, कपटपूर्ण और चालबाजी पर खुश हो रहे थे। डिब्बे के खिलौने देख उन्हे अपनी होशियारी पर गरुर जो था। एक बोला, "क्या सबक सिखाया"!! इन बदमाशों को! दूसरा बोला,  आज इन लोगो को पता चलेगा कि शेर को सवा शेर मिला!! अब इनको अपनी औकात पता चलेगी, भोले भाले यात्रियों को लूटते थे! भले घर के दीख रहे इन नौजवानों के इस हैरत भरे व्यवहार पर प्रोफेसर भी हैरान, चकित और हतप्रभ थे। कैसे ये युवा एक नन्हें बच्चे के साथ धोखा-धड़ी कर खुश थे!!

प्रोफेसर अपने गंतव्य "डबरा" मे उतर कर घर चले गये, पर प्रोफेसर साहब को उस सारी रात नींद नहीं आयी। उन्हे  रह रह कर राजू के साथ हुई ज्यादती और जुल्म की वो घटना बार बार आँखों के सामने कौंध जाती। उन्हे उन उद्दंड नौजवानों की मूर्खता और दुर्बुद्धि पर तरस तो आ ही रहा था। रह रह कर प्रोफेसर साहब बच्चे के साथ उस शाम दो सौ रुपए के नुकसान से चेहरे पर उपजी चिंता की लकीरों और दुःख की वेदना को उनके चेहरे पर स्पष्ट देखा जा सकता थे। सुबह जल्दी से तैयार होकर ग्वालियर जाने के लिए दिन की पहली गाड़ी पकड़ने, वे घर से निकल पड़े। सुबह की पहली गाड़ी होने से पैसेंजर मे ज्यादा भीड़ नहीं थी। क्योंकि लोगो के पास बुंदेलखंड एक्सप्रेस और उत्कल एक्सप्रेस के भी विकल्प थे।  प्रोफेसर की चिंता और बेचैनी उन्हे जल्दी से जल्दि ग्वालियर पहुँचने के लिये बेकरार कर रही थी। ग्वालियर मे पहुँचते ही प्रोफेसर की निगाहे प्लेटफॉर्म के एक सिरे से दूसरे सिरे तक राजू को ढूंढने के लिये व्याकुल थी। प्लेटफॉर्म नंबर 2-3 पर तलाशी के बाद उन्होने प्लैटफ़ार्म नंबर एक की ओर रुख किया। सौभाग्य से प्लैटफ़ार्म के आखिरी सिरे पर नल के नीचे राजू उनींदा लेटा पड़ा था शायद कोई गाड़ी इस प्लैटफ़ार्म पर आने वाली थी।  

"हे राजू कैसे हो"?, प्रोफेसर ने आवाज लगाई!

सहसा राजू भय और डर से हड़-बड़ा कर जाग पड़ा, उसे लगा शायद ठेकेदार पैसे के लिये उसे ढूँढता हुआ यहाँ आ पहुंचा। पर प्रोफेसर को देख उसे तसल्ली हुई कि ठेकेदार के आने की जिस कुशंका से वह भयग्रस्त था वास्तव मे ऐसा नहीं था।

"बाबूजी आप"!! राजू ने कुछ चैन की सांस लेते हुए कहा!

"हाँ राजू", क्या तुम आज घर नहीं गये? प्रोफेसर ने पूंछा।

"कैसे जाता"?, राजू बोला। "कल बहुत ही मनहूस दिन था", "साहब"! शाम को उत्कल एक्सप्रेस पर मै खुश था कि एक के बजाय दो डिब्बे खिलौने बिक रहे है। मेरे पास खुल्ले पैसे नहीं थे। उन लड़कों ने मुझे धोखा दे, दो डिब्बे खिलौने के ले लिये। "बाबूजी जी", "सारी रात आँखों मे आँसू लिये रोता रहा मै"!!, मुझे रह रह कर अपने आप पर क्रोध आ रहा था, दो सौ रूपये का नुकसान जो हो गया था! मै छोटा हूँ न, क्या कर सकता था"। इतना कह वह फिर सुबकने लगा था।

"अब इस खामियाजे की सजा तो मुझे भुगतनी ही थी", राजू बोला।  घर जाता तो ठेकेदार गलियाँ दे पैसे की मांग कर झूठा और बेईमान कहता!! इस सबसे बचने के लिये ही मै घर नहीं गया। हर खिलौने के डिब्बे पर मिलने वाले दस रुपए के कमीशन से जब तक बीस डिब्बे नहीं बेंच लेता तब तक दो सौ रुपए नुकसान की भरपाई कैसे होती?

"बो तो ठीक है", "लेकिन तुम्हारी माँ और भाई बहिन भी सारी रात तुम्हारे न आने पर चिंतित और परेशान नहीं हुए होंगे"? प्रोफेसर ने कहा।  

ठेकेदार का हिसाब कैसे करता बाबूजी आप ही बताइए!! उसकी आवाज मे नुकसान से ज्यादा अपने स्वाभिमान की चिंता थी। कैसे भी ठेकेदार को उसकी पूरी कीमत दे दूँ भले ही इस सौदे मे उसे एक पैसे भी न मिला हो! उसने उत्साहित हो कहा, "सारी रात जाग कर मैंने सोलह डिब्बे बेच लिये", "अभी मात्र चार डिब्बे बेचना बाकी है"!! "जब तक चार डिब्बे और नहीं बेंच लेता तब तक घर नहीं जाऊंगा", उसकी आँखों मे एक दृढ़ निश्चय दिखाई दे रहा था।  "माँ, भाई बहिन परेशान तो हुए होंगे पर ठेकेदार की निगाह मे मै बेईमान कहलाने से तो  बच जाऊँगा"? ऐसा कहते हुए उसने प्रोफेसर को कल की पूरी घटना कह सुनाई। 

सारी बाते सुन प्रोफेसर ने कहा, "हाँ, मुझे मालूम है"!!

राजू ने आश्चर्य चकित हो पूंछा, " कै....कै...., कैसे, बाबूजी"!

"अरे! राजू कल मै उसी डिब्बे मे बैठा था जिस मे वे युवा लड़के यात्रा कर रहे थे। तुम्हारे खिलौने देख मै समझ गया था कि तुम्ही होगे जिसके साथ ये घटना हुई। जब मैंने उन युवा यात्रियों को बताया कि मै यहाँ से दैनिक आवा-गमन करता हूँ और मै उस खिलौने वाले बच्चे को जानता हूँ! इतना सुनते ही उन यात्रियों ने खिलौने के डिब्बों की वो कीमत दो सौ रूपये मुझे दे दी!!

इतना सुनते ही राजू के चेहरे पर खुशी की सुनहरी चमक आ गयी, और बरवश ही उसके मुंह से निकला, "सच मे बाबूजी"?

प्रोफेसर ने अपनी जेब से दो सौ रूपये निकाल कर राजू के हाथ मे देते हुए कहा "हाँ राजू", "सच"!         

उसकी आँखों मे आँसू आ गये, मै नाहक ही उनको भला-बुरा कह रहा था, वे तो  "बड़े भले लोग थे", उसे अब अपनी अधम सोच पर पश्चाताप हो रहा था।  "आज के जमाने मे ऐसे लोग कहाँ मिलते है", "बाबू जी"। "भगवान उनको खुश रक्खे"!! "गलती मेरी ही थी, मुझे आगे से और सावधान होना होगा"। राजू ने निश्छलता से कहा। उसने आभार जताते हुए कहा, "बाबूजी यदि आप न होते तो इस नुकसान की भरपाई कभी न होती"।

राजू की आँखों मे चमक थी। अब उसे ठेकेदार से झिड़की नहीं सुननी पड़ेगी। उसने जल्दी जल्दी अपना चेहरा साफ किया और बैग को बंद कर जल्दी से झुग्गी की ओर  भागा जहां उसकी व्याकुल माँ, अपने दोनों बच्चों के साथ सारी रात जाग राजू का इंतजार कर रही थी। राजू को झुग्गी की ओर भागता देख, प्रोफेसर की आँखों के कोने मे खुशी और संतोष के आँसू की एक बूंद झलक आयी।

विजय सहगल    





शनिवार, 17 जुलाई 2021

पहली हवाई यात्रा

"पहली हवाई यात्रा"





1986 मार्च या अप्रैल की बात थी।  मै उन दिनों ग्वालियर शाखा मे पदस्थ था। प्रोन्नति हेतु दिल्ली मे टेस्ट होना था। ग्वालियर शाखा से मै और मेरे मित्र श्री अजय गुप्ता को टेस्ट मे शामिल होना था। उन दिनों ग्वालियर से एयर इंडिया की एक फ्लाइट ग्वालियर से दिल्ली जाती थी। हम दोनों ने तय किया कि क्यों ने दिल्ली तक की यात्रा हवाई जहाज से की जाये। सरकारी यात्रा थी किराया तो ट्रेन के प्रथम श्रेणी का ही मिलना था, यही सोच कर कि अब तक हवाई जहाज से कभी  यात्रा नहीं कि तो क्यों न कुछ पैसा जेब से लगा यात्रा का आनंद लिया जाये? इसी विचार के साथ पढ़ाव स्थित एयर इंडिया के कार्यालय से हवाई जहाज का टिकिट कटा लिया गया।

नियत तिथि पर हम लोग ग्वालियर के हवाई अड्डे पर पहुंचे। ज्यादा हवाई यात्रा के नियम कानून की जानकारी तो थी नहीं। सुरक्षा जांच और सामान आदि की जांच के बाद बोर्डिंग पास भी बन गया। जानकारी के आभाव और  अपने श्रेष्ठता भाव की ऐंठ मे यात्रियों की लाइन मे सबसे पीछे हो लिये। जब हवाई जहाज मे प्रवेश किया तो मामला बिलकुल ही अलग था। हम और हमारे मित्र श्री अजय गुप्ता जी सबसे अंत मे आये तो सीट तो दो खाली थी लेकिन दोनों ही अलग अलग काफी लाइन के अंतर पर थी। खिड़की और सीट के बीच की दूरी आज के कोरोना महामारी की तरह दो गज की  दूरी!! अब तो बड़ी कोफ्त हुई। हमने तो  सोचा था पहली हवाई यात्रा है खिड़की वाली सीट मिल जायेगी पर यहाँ तो लाइन मे सबसे पीछे आने के कारण खिड़की तो दूर अगल बगल की सीट भी न मिली। रेल यात्रा की बड़ी याद आयी  कि धक्का मुक्की या खिड़की से रुमाल, अखबार, बैग आदि खिड़की से फेंक कर ही सीट पक्की हो जाती थी। वाह रे हवाई यात्रा ट्रेन से चौगुना किराए के बाबजूद दोनों मित्र अलग अलग बैठे थे। मालूम  होता ऐसी हवाई यात्रा होगी   तो लाइन मे सबसे आगे न चलते? और झपट कर ट्रेन की तरह खिड़की वाली सीट न ले लेते? चूंकि आखिरी गंतव्य की यात्रा थी जो यात्री ग्वालियर उतरे उनकी अनुकूलतम सीटों पर पूर्व मे ही यात्रा कर रहे यात्रियों ने अपने मन माकिफ सीट ले ली और जो बची थी उन पर भी लाइन मे पहले चल रहे यात्रियों ने कब्जा कर लिया था।  मन मार कर दोनों मित्र अलग अलग बीच बाली सीटों मे दो यात्रियों के बीच मन मार कर बैठ गये। पैरा शूट, ओक्सिजन मास्क, आपात स्थिति मे पानी मे फिसल कर उतरने के निर्देश की औपचारिकता ने तो डरा ही दिया मानों जहाज पानी मे ही उतारने का निर्णय कर चुका हो। खिड़की की सीट न मिलने के कारण मन तो खिन्न था ही इतने मे विमान परचारिका ने कुछ टॉफी रुई आदि प्रस्तुत की उनके ग्रहण करते ही मैंने अपने मन की भड़ास निकाल ही दी और कहा "मैडम, सिनेमा हाल मे फ़र्स्ट क्लास का 3 रूपये का  टिकिट भी लो तो मन पसंद सीट न मिले पर साथ साथ बैठने को तो मिल ही जाता है पर यहाँ तो चार सौ खर्चने के बाद भी हम दोनों मित्रों को आप लोग खिड़की की सीट तो छोड़िये अगल बगल की सीट भी न दिला पाये?        

जैसे तैसे मन को ढांढस बंधाई। और दोनों यात्रियों के बीच ऐसे बैठा जैसे कबीर दस जी ने अपने दोहे मे उल्लेख किया था "दो पाटन के बीच मे ......."। हमे याद है दैनिक आवागमन मे हमारे एक मित्र डेढ़-दो रूपये का अङ्ग्रेज़ी अखबार महज इसलिये खरीदते थे कि अखबार के पन्ने सीट साफ करने, अखबार बिछा कर खाना खाने  आदि के उपयोग करने या गाड़ी के इंतज़ार मे  प्लेट फॉर्म पर अखबार विछा सोने के काम के साथ पैसेंजर ट्रेन मे यात्रा करने पर 25-30% यात्री अङ्ग्रेज़ी अखबार देख सीट खाली कर बैठने दे देते थे, अखबार-वखबार तो किसे पढ़ना होता!! यहाँ हवाई जहाज मे भी  रास्ते के किनारे की सीट वाले से तो क्या सारोकार पर खिड़की की सीट वाला सहयात्री तो और महान निकला यात्रा शुरू होते ही मुफ्त मे मिले अँग्रेजी अखबार को  फैला कर पढ़ने बैठ गया और मेरी खिड़की से बाहर देखने की रई-सई कसर भी  अखबार को खिड़की के सामने पसार कर पढ़ने से जाती रही। अब तो खिड़की से बाहर का दृश्य न देख पाने से अपना भी सब्र जाता रहा और आखिर उन सह यात्री महोदय से हमने कह ही दिया "श्रीमान मै पहली बार हवाई यात्रा कर रहा हूँ कृपया या तो आप अखबार खिड़की के सामने से हटा ले अन्यथा आप कृपया बीच वाली सीट पर स्थान ग्रहण कर अपने अखबार पठन-पाठन का शौक पूरा कर ले? लेकिन सहयात्री भी कम घाघ नहीं था उसने अखबार को तो खिड़की से हटा लिया पर खिड़की छोड़ने की औपचारिकता तो दूर चेहरे पर खिड़की छोड़ने के भाव भी न आने दिये। बाद मे मुझे लगा शायद मेरी तरह वह भी पहली बार खिड़की चापने की लालसा से ही हवाई यात्रा कर रहा हो? और दिखावे के लिये अखबार पढ़ने का अभिनय कर अपने आपको संयत कर रहा हो?

बैंक की सर्विस के 2-4 साल ही हुए थे। मन ही मन पहले तो 20-25 मिनिट इंतजार किया कि शायद कुछ सौजन्यता या मानवता वश वह हमे खिड़की की सीट ऑफर कर देगा पर ऑफर करना तो दूर बीच बीच मे पुनः अखबार पढ़ कर या आँखें बंद कर झपकी मार खिड़की झपटने के अपने वीरोचित कृत पर, इतरा कर मानो हमे चुनौती दे  रहा हो? मै भी अपनी पहली हवाई यात्रा को इस तरह निष्फल होते देख मन ही मन कुढ़ रहा था। हमे खिड़की वाली सीट न ऑफर करने के कारण सहयात्री का ये व्यवहार दुनियाँ का सबसे निर्लज्ज व्यक्ति का अहसास करा रहा था और मानवाधिकार के हनन का सबसे बड़ा उदाहरण सामने घटित प्रतीत हो रहा था। आदमी अपने स्वार्थ और ईर्ष्या मे कितनी ओछे विचार रख सकता है कुछ ऐसी ही दिशा-दशा हमारी  भी हो रही थी उस समय!! बड़ी पढैया-की-पूंछ बन रहा है कही खुदा-न-खास्ता हवाई जहाज उपर नीचे हो गया तो उपर-ही-उपर निकल लेगा, खिड़की से। यहीं-की-यहीं धरी रह जायेगी खिड़की और अखबार की पढ़ाई?

उन्ही दिनों खालिस्तान अतिवादी आंदोलन पंजाब मे व्याप्त था। एक हवाई जहाज का अपहरण हो चुका था। डर लगा कही कोई आतंकवादी इसका भी अपहरण न कर ले? फिर सोचा, "अगर कर भी ले तो अफगानिस्तान जैसे सड़े-भुसे देश मे न ले जाये"? ले भी जाये तो पेरिस, लंदन जैसा कोई सपनों का शहर तो हो? अगर कोई मौका आमने सामने का पड़ा भी तो दो-दो हाथ की तैयारी भी कर लेंगे? ऐसे ऊँह-पोंह मे  कब चालीस मिनिट निकल गये और पता भी न चला। लेकिन पहली हवाई यात्रा यादगार तो रही लेकिन यादें अप्रिय, अवांछित, अप्रसन्नता दायी रही थी। आनंद दायक हवाई यात्रा वृतांत फिर कभी।

विजय सहगल       

      

 


बुधवार, 14 जुलाई 2021

देशी और बाहरी

                                                                 "देशी और बाहरी"



प्रादेशिक कार्यालय मे कार्य करने का मेरा पहला अनुभव था। जब मेरी पोस्टिंग प्रादेशिक कार्यालय, भोपाल  मे हुई तब  तत्कालीन प्रादेशिक प्रबन्धक ने हम जैसे नौसिखिये को भी कार्य करने के लिये उत्साहित और प्रोत्साहित किया। मेरे ट्रान्सफर लेटर मे मेरी पोस्टिंग विशेष तौर पर सामान्य प्रशासन विभाग मे हुई जिसका कारण मैं स्वयं आज तक नहीं समझ पाया। लेकिन शायद प्रादेशिक कार्यालय के सामान्य प्रशासन विभाग मे मेरा काम करने को कुछ लोगो के वर्चस्व को तोड़ना की तरह लगा था और जिन्हे  ये पसंद नहीं था अतः कुछ ही दिनों मे ऑफिस ऑर्डर के माध्यम से मेरी सेवाये निरीक्षण एवं  नियंत्रण विभाग मे कर दी गई। यूं भी मेरे को लगने लगा था कि मेरा स्वभाव  प्रादेशिक कार्यालय के माहौल  मे कार्य करने के लिये उपयुक्त नहीं हैं। मेरा मानना हैं प्रादेशिक कार्यालय मे कार्य करने के लिये आपकी योग्यता से ज्यादा आपको अपने "हाकिम" की खुशामद करने की क्षमता पर निर्भर करता हैं। कुछ माह बाद नए प्रादेशिक प्रमुख ने कार्य ग्रहण किया। उन दिनों प्रादेशिक कार्यालय मे कुछ इस तरह का दौर था कि हर वर्ष प्रादेशिक प्रबन्धकों का तबादला हो जाता। प्रतिवर्ष तबादलों का ये सिलसिला लगभग दस व र्ष चला होगा। शायद ही किसी स्टाफ को पिछले दस प्रादेशिक प्रमुखों के नाम याद हों?

उन दिनों भोपाल एवं छत्तीसगढ़, भोपाल प्रादेशिक कार्यालय के अंतर्गत ही आते थे जहां  अधिकारी और कर्मचारियों का आपसी सद्भाव, मेल मिलाप बेमिसाल था, इस एक बहुत बड़ी खूबी के कारण   भोपाल रीज़न को देश के अन्य रीज़न से अलग रखा जाता रहा था। जिसकी मुख्य बजह अधिकारी-कर्मचारी संगठन के नेतृत्व कारी साथियों  का आपसी समन्वय, सद्भाव और उनकी टीम भावना थी जो कुछ कमियों के बावजूद  अपने शानदार कार्यकलापों और अधिकारी कर्मचारी संगठनों मे सामंजस्य रख परस्पर आपसी सहयोग और सौहार्द को बनाने मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती थी। 

उन दिनों हर साल बदल रहे प्रादेशिक प्रबन्धकों के बीच एक ऐसा दौर भी आया जब एक प्रमुख और कुछ अन्य अधिकारियों के आने पर कार्यालय के आपसी सद्भाव के माहौल मे अचानक परिवर्तन आया। उस दौरान प्रबंधन और अधिकारी-कर्मचारी संगठन के आपसी सद्भाव और समबन्ध पिछले दौर के सबसे निम्नतम  स्तर पर थे। कार्यालय मे एक वर्ग चापलूसी और जी हजूरी की दौड़ मे अव्वल आने और उच्च अधिकारियों की कृपा पात्र सूची मे शामिल होने के लिए लालायित था। एक मुख्य प्रबन्धक वर्ग का अधिकारी जिसे बैंक के अपना  ई-मेल खोलना भी गवारा न था। हजारों बिना पढे ई-मेल उसके इन-बॉक्स मे पड़े रहते। इसके विपरीत उस मुख्य प्रबन्धक ने बैंक के कार्यों के इत्तर अपने आधिकारिक ई-मेल का उपयोग वैमनस्य, गुटबाजी फैलाने, यूनियन के विरुद्ध विष वमन करने मे किया। प्रादेशिक प्रमुख की शह पर उस "महापुरुष"  ने पूर्वस्थापित आपसी सद्भाव को तोड़ने मे कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। हालत इतने खराब हो गए  कि उन दिनों "मूल" निवासी बनाम  "बाहरी" स्टाफ के बीच शीत युद्ध शुरू हो गया। विना सिर-पैर की बातों मे अधिकारी-कर्मचारी के नेताओं की छद्म शिकायते प्रेषित की जाने लगी। इस परीक्षा की घड़ी मे तमाम ऐसे अधिकारी जो कल तक अधिकारी यूनियन मे सक्रिय थे बदले हालात मे पाला बदल तत्कालीन प्रबंधन को शष्टांग दंडवत कर उनकी शरण मे चले गये ताकि सालों से राजधानी मे जमे होने के अधिकार से वंचित न होना पड़े। उन दिनों ऐसे निर्लज्ज रंग बदलने वालों की पहचान संभव हो सकी।

प्रबंधन के दहशत पूर्ण माहौल के चलते चुन चुन कर ऐसे लोगों को  जो तत्कालीन समय मे संगठन मे थे या उच्च पद प्रितिष्ठा से वंचित थे अर्थात ऐसी कमजोर कड़ियों की पहचान कर अकारण दूर दूर स्थानांतरण किए गये। ऐसा शायद  संगठन के बल पौरुष और ताकत को परखने के लिए किया गया था। सांगठनिक स्तर पर कोई छोटी बड़ी प्रितिक्रिया न होने पर प्रदेश मे निरंकुश शासन हो गया। मैंने अपने 39 वर्ष के कार्यकाल एक प्रादेशिक प्रमुख द्वारा दुर्भावना के साथ  ऐसा स्वच्छंद मनमर्जी पूर्ण आचरण नहीं देखा जिसने अपने अहम की छद्म तुष्टि  हेतु अधिकारियों को चुन चुन कर प्रताड़ित किया गया हो। उन कुछ पीढ़ित अधिकारियों मे से एक मै भी था जिसका ट्रान्सफर प्रादेशिक कार्यालय से निरीक्षालय कर दिया गया था।

मुझे लिखते हुए कोई संशय, शक या संकोच नहीं कि ऐसे उच्छृंखल, निरंकुश माहौल बनाने की आड़ मे ऐसे पतित, पथभ्रष्ट अधिकारी अपने  व्यक्तिगत स्वार्थ, आत्महित और भ्रष्ट आचरण निर्मित करना ही जिनका मुख्य उद्देश्य होता है और ऐसा ही उन दिनों हुआ भी था। उन दिनों भ्रष्टाचार की बाते पहली बार प्रादेशिक कार्यालय मे सुनी। चंबल क्षेत्र की एक शाखा मे निरीक्षण के दौरान छह सोने की गिन्नी देने की बात को खुद अपने कानों, एक ऋणी से कहते हुए सुना जब वह मेरे परिचय से  अंजान  प्रबन्धक के कक्ष मे उनके साथ बैठा था। उन दिनों मार्केटिंग मे लगे अधिकारियों को उच्च प्रबन्धक के लिए गिलासों का इंतजाम करने  और उन गिलासों मे पानी भरने का कार्य ही उनकी मुख्य सेवा शर्तों मे समाहित था। प्रबंधन के  कुत्सित कार्यों मे निरंकुश आचरण शायद   संगठन के उच्च पदासीन लोगो को एक चेतावनी भरा संदेश था!! संगठन के नेतृत्वकारी साथियों के बचाव की भूमिका मे आने और कोई प्रतिरोध न करने के कारण उन दिनों रीजन मे स्वछंद एवं स्वेच्छाचारिता की चरमसीमा निर्मित हो गयी थी।

स्थानातरण पर प्रबंधन का विवेकाधिकार होने के कारण  यध्यपि मुझे  अपने ट्रान्सफर को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। पर स्थानांतरण सहित अनधिकृत कार्यों पर संगठन का प्रतिरोध न होने पर सदस्यों मे मतभेद थे। मेरा मत था कि यूनियन और संगठनों को भी अनैतिक कार्यों का विरोध, प्रतिरोध समय समय पर करते रहना चाहिये।

मेरा मानना है कि जो सेनाएँ शांतिकाल मे भी युद्धाभ्यास करती है वे सेनाएँ ही युद्ध काल मे विजयी होती है। कदाचित उन दिनों भी  हमारे संगठन और यूनियन ने भी इसी नीति का पालन अनुपालन किया होता?? संगठन को प्रबंधन से हमेशा एक तय दूरी बना कर रखना चाहिए ताकि सदस्यों को ऐसा न प्रतीत हो कि संगठन और प्रबंधन एक ही सिक्के के दो पहलू है। 

मेरा मानना है कि कदाचित उच्च प्रबंधन के ऐसे अधिकारियों द्वारा अपने दंभ और अहंकार की छद्म पूर्ति मे जो ऊर्जा का अपव्यय किया वह ऊर्जा यदि बैंक के विकास मे व्यय की होती तो शायद बैंक का ये हश्र न हुआ होता।

विजय सहगल