मंगलवार, 18 मई 2021

संकट मे खोता सदाचार

 

"संकट मे खोता सदाचार"






सामान्य स्थितियों मे हम भारतवासी समाजिकता, धार्मिकता मानवता और देश प्रेम का  ऐसा प्रदर्शन करेंगे कि शायद ही किसी देश और दुनियाँ मे देखने को मिले। तीज़-त्योहार, राष्ट्रीय पर्व, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खेलों मे किसी भारतीय का  प्रदर्शन, विशेषकर क्रिकेट मे भारतीय टीम के प्रदर्शन मे आम भारतियों को  राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत देखा जा सकता है, पर न जाने क्यों देश का बड़ा दुर्भाग्य है कि संकट के समय आपदा  से जुड़े विषय, व्यापार और  सेवाओं मे लगे लोग मानवता से परे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और लाभ के लिये नैतिक रूप से इतने गिर जाते है कि उन पर घिन आती है। आज कोरोना महामारी से देश बुरी तरह पीढ़ित है। पर चिकित्सा व्यवसाय, दवाई और अन्य सेवाओं मे जुड़े कुछ लोगो मानवता को शर्मसार कर रहे है। ओक्सीमीटर को  काला बाजारी मे 6-7 सौ की जगह 2-3 हज़ार मे बेचा जा रहा है।  इस बीमारी मे लगने वाले इंजेकशन रेमडिसिवीर की काला बाजारी ने सारी हदे पार कर दी। सेवा और मानवता को दरकिनार कर 3-4 हज़ार के इंजेकशन को 20-25 हज़ार मे बेचा गया। काला बाजारी को दरकिनार भी कर दे, पर इंसानियत के दुश्मन नकली इंजेकशन मे पानी भर कर मानव हत्या करने मे भी गुरेज नहीं कर रहे। इन नराधमों और  नरपिशाचों की निंदा, तिरिस्कार और लानत-मलामत  के लिये शब्द भी नहीं है। हदें तो तब पार हो गयी जब प्राइवेट और सरकारी अस्पतालों मे भर्ती मरीजों के मोबाइल, और पहने हुए गहने भी चोरी किये जाने की घटनायें सामने आई। कुछ सेवभावी चिकित्सकों को यदि छोड़ दे तो अधिकतर प्राइवेट हॉस्पिटल मरीजों से अनाप सनाप बिल बसूल कर करोना रूपी महामारी से उनकी मजबूरी का फायदा उठा रहे है और सरकारी अस्पतालों मे सेवा का अभाव और अमानवीय व्यवहार से लोग हताश और निराश है।  ये  अधम कीट-पतंगों रूपी नरभक्षी येन केन प्रकारेण पैसे कमाने मे अपनी हद से इतने नीचे गिर जायेंगे सहज विश्वास नहीं होता। एक दिन मे मालामाल होने की हवश मे इन्हे  निरीह दुःखी, पीढ़ित रोगियों की हत्या करने मे संकोच नहीं। क्या ये ही संस्कार, शिक्षा और चरित्र हमारी संस्कृति और सभ्यता ने हमे शिखाए?? दुःख और अफसोस इस बात का है इस मानवता को कलंकित करने वाले कृत मे नैतिकता के परे  सारे धर्म-संप्रदाय, प्रांत और भाषा के सभी व्यक्ति समान रूप से भागीदार है।   

अस्पतालों मे इस्तेमाल होने वाले हैंड ग्लब्स (दस्तानों) की रिपोर्ट आप सभी ने कुछ दिन पूर्व टीवी पर जरूर देखी होगी। कैसे समाज और देश के दुश्मनों ने हॉस्पिटल मे उपयोग मे आ चुके  हैंड ग्लब्स को कबाड़ मे से उठा कर धो और पोंछ  कर पुनः पैक कर बापस बाज़ारों मे सस्ते दाम पर बेचा जा रहा है।  ऐसे दस्ताने जिनमे कोरोना सहित अन्य बीमारी का संक्रामण हो, सिर्फ पैसे की लालच मे मरीजों की जान से खिलवाड़ कर पुनः बाज़ार मे बेचा जा रहा है। कहाँ मर गई इनकी मानवता और नैतिकता? एक पल के लिए भी इन्हे शर्म नहीं आई कि उपयोग मे आ चुके हैंड ग्लब्स से  संक्रामण फैल लोगो की जान भी जा सकती है पर दुर्भाग्य से, लक्ष्य यहाँ भी त्वरित पैसा कमा, कम समय मे करोड़पति बनने की चाह समाहित है।

ऑक्सीज़न सिलेंडर की कालाबाजारी, धोखा धड़ी किसी से छिपी नहीं है। मरीजों के परिजन दिन-दिन भर यहाँ वहाँ भटकने, लाइन मे खड़े होने के बावजूद एक अदद ऑक्सीजन सिलिंडर को तरस रहे ताकि अपने परिजनों की जान ऑक्सीजन रूपी प्राणवायु के अभाव मे न चली जाये। रक्त, रक्त-प्लासमा का लेन देन बगैर काली कमाई के संभव नहीं। कालाबाजारी मे सिलेंडर के दाम मे अनाप सनाप पैसों की बसूली गरीब, लाचार मरीजों के परिजनों से लूट खसूट और हराम की कमायी से कमाये गये पैसों से  घर मे मे  शरीफज़ादों की उपस्थिती शायद ही हो,   हाँ हरामज़ादों  की उत्पत्ति से कतई इंकार नहीं किया जा सकता।

संकट के समय हम नैतिकता, ईमानदारी और समर्पण से सेवा और व्यापार करने के विपरीत हमारे आचरण मे  कितनी  गिरावट आ गई की हम निर्लज्जता और वेशर्मी की सभी हदे पार कर गये। पिछले दिनों कोविड महामारी के आपातकाल स्थितियों मे मृतकों के सम्मान की लोकलाज, सामाजिक और धार्मिक परंपरा के निर्वहन मे शव को अर्पित किये जाने वाले शाल और साड़ी रूपी कफन को भी शमशान घाट से उठा कर धो और पोंछ कर, प्रेस आदि कर पुनः आकर्षक पैकिंग और ब्रांडेड कंपनी के लेबेल लगा कर बाज़ार मे बेचने से भी गुरेज नहीं करते। घोर अमानवीय और अनैतिकता के इस व्यापार  मे समाज के श्रेष्ठी वर्ग शामिल हो औने-पौने दामों मे बेच कर धनोपार्जन कर रहे है। कुछ टीवी चैनलों पर कफन के इस काला बाज़ार को दर्शाया गया। येन केन प्रकारेण धन अर्जन की इस कुत्सित करतूत के बाद अब समय आ गया है ऐसी प्रथा, रीतिरिवाज और परंपरा मे बदलाव पर  क्यों न गहन विचार करें??

क्या संकट, कष्ट और दुःख की इस घड़ी मे हम अपनी कुत्सित, अशुद्ध और अपवित्र ईक्षाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते? क्या सेवा संस्कार और नैतिक संस्कारों को अपनी विचार, बुद्धि और मानसिक सोच मे प्रभावशील स्थान दे सेवाभाव से वाणिज्य और  व्यापार नहीं कर सकते? अवश्य हो सकता है, पर इसकी शुरुआत हमे खुद से ही करनी होगी। ऐसे समय मुझे गायत्री परिवार के परमपूज्य आचार्या श्री राम शर्मा की शिक्षा और सुंक्तियाँ याद आ रही है जिसके मूल मे दिये संदेश को देखे:-

·         "अपना अपना करो सुधार, तभी मिटेगा भ्रष्टाचार॥"

·         "हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा।  हम बदलेंगे, युग बदलेगा॥"

·         "अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।"

·         "दूसरों के साथ वह व्यवहार न करे जो हमे अपने लिये पसंद न हो॥"

·         "उन्हे मत सराहों जिनने अनीति पूर्वक सफलता पाई और संपत्ति कमाई॥"

·         "विपरीत परिस्थितियों मे भी जो ईमान, साहस और धैर्य को कायम रख सके वस्तुतः वही सच्चा शूरवीर है॥"

·         "जो बच्चो को सीखते है, उनपर बड़े खुद अमल करें, तो ये संसार स्वर्ग बन जाये॥"

समस्या गंभीर है, संकट गहन है, आपदा विकट  है आइये कठिनाई, विपत्ति और जोखिम की इस कठिन घड़ी मे संगठित हो कर चिंतन मनन करते हुए कोरोना रूपी इस महामारी से  मुक़ाबला करे।

विजय सहगल                     

4 टिप्‍पणियां:

Deepti Datta ने कहा…

अति उत्तम!

N K Dhawan ने कहा…

बहुत सुंदर । सहगल साहब आपकी लेखनी हर लेख के साथ नयी उचाई छू रही है। यह भ्रष्टाचार की ख़बरें नित्य अख़बारों में आ रही है हो सकता है इन्हें करने वाले दानव दूसरों के संदर्भ में इसे घृणित बताते हो पर जब खुद मौक़ा मिलता है तो इसी दानवी कृत्य को अवसर मानकर दोहन करने से नहीं चूकते ।

N K Dhawan ने कहा…

बहुत सुंदर । सहगल साहब आपकी लेखनी हर लेख के साथ नयी उचाई छू रही है। यह भ्रष्टाचार की ख़बरें नित्य अख़बारों में आ रही है हो सकता है इन्हें करने वाले दानव दूसरों के संदर्भ में इसे घृणित बताते हो पर जब खुद मौक़ा मिलता है तो इसी दानवी कृत्य को अवसर मानकर दोहन करने से नहीं चूकते ।

Bhakti Pradeep ने कहा…

सामयिक व कटु सत्य। किन्तु सरकारी तन्त्र की निष्क्रियता का द्योतक भी।