"ओबीसी-अवसान"
मेरे
जैसे हजारों साथियों का पूर्ववर्ती ओबीसी, ज़िंदगी का एक हिस्सा हुआ करता था।
मुझे याद है अस्सी के दशक मे मेरे जैसे अनेक युवा ओबीसी परिवार का हिस्सा बने थे।
बैंकिंग उद्धयोग मे एक अलग ही सांस्कृतिक पहचान थी ओबीसी की जिसे "ओबीसी
कल्चर" के नाम से पहचान मिली। लेकिन कलांतर मे सरकार और सरकारी नीतियों के
कारण पीएनबी के साथ समामेलन पश्चात अपने अस्तित्व को खो बैठा। मुझे याद है 1980 के
दशक मे जब कभी संगठन के नेतृत्वकारी साथी बैंक के इतिहास के उस नाजुक और बुरे दौर
की चर्चा करते थे जब बैंक प्रबंधन ने बैंक को बेचे जाने का निर्णय लिया था और कैसे
संगठन ने उस बुरे दौर से बैंक को निकाल उसके अस्तित्व को बचाया था। बड़े-बड़े ओजस्वी वक्ता अपनी धाराप्रवाह भाषणों मे हम
जैसे नवयुवाओं को प्रभावित करते थे।
उस
दौर मे प्रबंधन और संगठन के बीच एक सम्मान जनक रेखा खींची हुई थी। एक दूसरे के
अधिकार क्षेत्रों मे दखल या अतिक्रमण न करने का एक अलिखित सम्झौता था जो लंबे समय
तक निभाया जाता रहा। कर्मचारियों अधिकारियों के प्रोन्नति,
स्थानांतरण जैसे मुद्दे आपसी सहमति और समंजस्य से हल किये जाते रहे। इसका सबसे बड़ा
कारण सामान्य कर्मचारी/अधिकारियों का साधारण बैंक स्टाफ के बीच से ही निकल उच्च प्रबंधन मे पहुँचना था।
बेशक बुरे दौर मे प्रबंधन और संगठन ने ओबीसी के अस्तित्व को बचाया हो लेकिन
कालांतर मे संगठन और प्रबंधन के बीच एक बहुत ही झीना सा या यूं कहे न दिखाई देने
वाला पारदर्शी पर्दा शेष रहा था। पारदर्शी पर्दा प्रबंधन और सगठन को दो भागों मे
विभक्त करता था जो संस्थान के विकास और स्वस्थ रिश्तों की दृष्टि से आवश्यक था। लेकिन जब विभक्त करने
वाला पर्दा इतना झीना हो जाये की दोनों पहलू एक नज़र आने लगे तो समस्या की शुरुआत
होने लगी। इस व्यवस्था मे एक बहुत बड़ी खामी भी नोट की गई कि यदि कोई
अधिकारी/कर्मचारी अपने मतैक्य या मतभिन्नता के चलते प्रबंधन या संगठन मे किसी एक
से भी असहमत होता तो दूसरे का स्वतः ही दुश्मन हो जाता। जिसके चलते बैंक के आंतरिक
ताने-बाने को काफी नुकसान पहुंचा। जिसके
कारण प्रोन्नति ट्रान्सफर आदि मे स्टाफ के
बीच धीरे धीरे असंतोष भी पनपने लगा। इसका एक नकारात्मक पहलू यह भी था कि तत्कालीन
प्रबंधन और संगठन के कुछ सदस्यों के मधुर रिश्तों ने अपने स्वार्थपूर्ति हेतु एक
दूसरे के स्याह कृतों को नज़रअंदाज़ कर
अनदेखी करनी शुरू कर दिया। एक तरफ कुछ उच्च प्रबंधन अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर
अपनी रीति नीति के चलते मन का धन किया वहीं संगठन के कुछ उच्च नेतृत्व कारी
साथियों ने प्रबंधन के साथ मिलीभगत कर पिछले दरवाजे से अपने नज़दीकि रिशतेदारों
(भाई-भतीजों, बेटे-बेटियों) एवं नज़दीकि के नज़दीकि रिशतेदारों
(मामा, फूफा, मौसा के भी मामा, फूफा मौसा के बच्चों) के सबस्टाफ
के रूप मे नियुक्तियाँ बैंक मे कराई और कुछ समयोपरांत वे क्लर्क, अफसर और मैनेजर के रूप मे बैंक मे पदस्थ दिखाई देने लगे, तब कैसे और किस मुंह से वे संगठन के पदाधिकारी अपने सामान्य कर्मचारी और अधिकारियों के मौलिक अधिकारों
के लिये प्रबंधन से लड़ेते?? उच्च प्रबंधन के कुछ अधिकारियों ने
इस बैक डोर भर्ती मे थोड़ी मर्यादा का पालन किया। उन्होने रिश्तेदारों को तो भर्ती नहीं
किया लेकिन अपने घर के खानसामा-कुक, घर के नौकर, धोबी, कपड़े धोने, माली, ड्राईवर आदि की निर्वाध भर्ती की। मुझे लखनऊ की वो घटना याद है जब हम जैसे युवाओं
ने हाल ही मे बैंक जॉइन किया था। एक साधारण सी घटना मे शाखा के एक सब स्टाफ ने एक
लिपिक स्टाफ के साथ झूमा झटकी करदी। हाल ही के दिनों मे कॉलेज से निकले युवा जोश
ने उच्च प्रबंधन से शिकायत की। लेकिन लीपा-पोती कर संबन्धित स्टाफ ने माफी मांग कर
मामले को रफा दफा कर दिया। तब हमे ज्ञात हुआ कि स्थानिय नेता जी के बैंक मे 50-60 या
इससे अधिक सदस्य बैंक मे सब स्टाफ के पदों
पर भर्ती है और उनका डर और दहशत मुहल्ले के स्थानीय "शोहदे" से कम नहीं थी।
ऐसा नहीं था कि उक्त बैक डोर एंट्री केंद्रीकृत थी अपितु ये बीमारी देश के सभी
प्रान्तों मे पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण एक समान रूप से व्याप्त थी और
बदस्तूर समामेलन तक जारी रही। जिस नेता का जो क्षेत्राधिकार था उसने अपने क्षेत्र
मे इस पिछले दरबाजे की भर्ती का बड़ी
निर्लज्जता से भरपूर दोहन किया। जिन लोगो
ने तत्कालीन बैंक के आढ़े समय मे बैंक को बचाने
मे परिस्थिति जन्य संघर्ष किया था दुर्भाग्य से उन्ही लोगो मे से कुछ ने बाद मे
बैंक के अच्छे समय मे दुधारू गाय की तरह बैंक का भरपूर दोहन किया।
दुर्भाग्य
से हम जैसे अधिकारी/कर्मचारी इन नेताओं के
तालुओं के रसास्वादन की सूची मे नहीं थे अर्थात जिनका कोई माई-बाप प्रबंधन या
संगठन मे नहीं था वे "मधुर स्वाद", "कृपा पात्र" से वंचित रह
और सदैव ही "बैंक की नीति, नियमानुसार" ही प्रोन्नति/ट्रान्सफर/पोस्टिंग से संचालित होते रहे, कभी भी प्राथमिकता की सूची मे न आ सके।
जैसे
जैसे बैंक का विस्तार हुआ कम्प्युटर सेवी, श्रेष्ठ योग्य नई युवा पीढ़ी ओबीसी परिवार मे शामिल होने लगी, कर्मचारी संगठन के कुछ मुख्य क्षत्रपों मे आपसी स्वार्थ, अहम और अहंकार के टकराव के कारण वे सभी अपनी स्थिति को स्थिर बनाये न रख
सके और ईर्ष्या, वैमनस्य के चलते अपनी स्थिति से गिर गये।
अपने वर्चस्व और दंभ के कारण आपसी विखराव स्पष्ट दिखाई देने लगा। प्रबंधन के आश्रय
और पोषण के चलते, ओबीसी के कर्मचारी और अधिकारी संगठनों मे
पाँच सितारा सांस्कृति के कारण संगठन के पुरोधाओं ने कभी दूसरी लाइन की नेतृत्व को
पनपने ही नहीं दिया। संगठन की सुख सुविधाओं के उपयोग और उपभोग की स्वार्थसिद्धि के
चलते सेवानिवृत्ति के बावजूद जीवनपर्यंत
संगठन छोड़ने को तैयार न थे, कुछ तो मृत्यपर्यंत संगठन के
सर्वोच्च पदों को सुशोभित करते रहे। इसकी
एक बानगी का उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग मजबूत हाथ (https://sahgalvk.blogspot.com/2021/01/blog-post_16.html) मे
किया था। उनकी इस ऐश्वर्य पूर्ण जीवन पद्धति के चलते उनको न केवल संगठन के मूल
उद्देश्यों से भटका दिया बल्कि मजदूर संगठनों के बीच उनको "शाही श्रमिक संगठन"
के रूप मे कुख्यात!! कर दिया। इस तरह एक संगठन के नाम पर
चाटुकारों का समूह खड़ा हो गया। सिर्फ संगठन की अगुआई करने वाले नेताओं का यशोगान करने वाले भाट,
चारण और दरबारी कवि ही संगठन से लाभान्वित होने लगे, इनके
दीगर अन्य सामान्य युवा अधिकारियों और कर्मचारियो ने जिनका संगठन मे कोई धनी-धोरी नहीं था, संगठन से किनारा करना शुरू कर
दिया जिसकी परिणाम बैंक के मर्जर पश्चात बड़ी संख्या मे कर्मचारी अधिकारियों का
अपने पैतृक संगठन एआईबीईए/एआईबीओए को छोड़ अन्य संगठन मे जाने के रूप मे स्पष्ट
देखा जा सकता है। देख कर दुःख तो तब और ज्यादा हुआ कि संगठन के इन तथाकथित त्याग
और बलिदान करने वाले नेताओं ने अधिकारियों के इस पलायन मे अपनी आँख और कान बंद कर
महाभारत मे भीष्म पितामह की तरह अन्याय पर मौन रहे।
सामान्यतः
श्रम संगठन की रीढ़ उसके सामान्य सदस्य होते है। विशेषतौर पर बैंकों मे कर्मचारी एवं अधिकारी संगठन का आपसी तालमेल, एक दूसरे
के प्रति समर्पण और विश्वास उसकी मजबूती को दर्शाता है। अधिकारी संगठन को पद और
सुख सुविधाओं मे बड़े होने के बावजूद कर्मचारी संगठन को ही "बड़े भाई" की
भूमिका से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है। दशकों तक इन नेताओं ने अपनी निजी दंभ, अहं और घमंड की पूर्ति हेतु एक दूसरे को नीचा दिखाने मे कोई कोर कसर बाकी
नहीं छोड़ी। यहाँ तक रिश्तों मे इतनी गहरी खाई खुद गई कि अपनी छद्म महत्वाकांक्षा
और ईगो एवं बच्चों से भी गिरी सोच के चलते अपने सम्मेलनों और कार्यक्रमों मे एक
दूसरे के पदाधिकारियों और सदस्यों को आमंत्रित करना भी समाप्त कर दिया। सामान्य
शिष्टाचार के अभाव एवं श्रमिक संगठनों के बीच ऐसे कटु रिश्ते शायद ही किसी अन्य
बैंक या संस्थान मे देखने को मिले। ऐसी ही
एक कटुता और ईर्ष्या पूर्ण एक सम्मेलन का
मै गवाह रहा जब भोपाल मे कर्मचारियों के चल रहे एक महा सम्मेलन मे अधिकारी
संगठन के सदस्य सम्मेलन स्थल से चंद मीटर
की दूरी पर सड़क के दूसरी ओर होटल मे बैठे रहे। दुर्भाग्य से ओबीसी मे इन दोनों
संगठनों की नेताओं की अहं और अहंकार रुपि अधोपतन कारी सोच ने दशकों तक अधिकारियों/कर्मचारियों का बड़ा अहित किया है जिसका भरपूर फायदा प्रबंधन
ने बांटो और राज करो की नीति अपना कर चरितार्थ किया।
यूनियन
की विलासता पूर्ण शैली एवं प्रबंधन के राज्याश्रय के चलते संगठन के संघर्ष का
जज्बा पूर्णतः समाप्त कर दिया। एक कहावत
है कि कदाचित "वो सेना ही युद्ध मे विजयी होती है जो शांति काल मे भी युद्ध
का अभ्यास करती है"। इस कहावत को सच मे परिवर्तित करने के सभी तत्वों के आभाव
के चलते बैंक यूनियन/संगठन निरापद न रह सके। श्रम संगठन के आभूषण रूपी साहस, हिम्मत और
अन्याय के विरुद्ध आंदोलन के आभाव के चलते
एक भली तरह चल रहे रीजन के प्रमुख द्वारा अपने निरंकुश शासन को मेरे सहित
अनेक सदस्यों द्वारा देखा और भोगा गया।
संगठन द्वारा अनीति के विरुद्ध प्रतिकार की कमजोरी के चलते उन उच्च पदस्थ अधिकारी
ने भ्रष्टाचार की सारी हदे पार होते दिखी और जो तत्कालीन समय सर्वविदित थी किन्तु
संगठन मे पराक्रम के आभाव के चलते वे अपना कदाचार और अनाचार रूपी उल्लू सीधा करने
मे कामयाब रहे।
ये सच है कि ओबीसी के सभी साथी चाहे वे उच्च प्रबंधन मे हों या अधिकारी/कर्मचारी रहे, अधिकतर साथियों ने ईमानदारी और मेहनत से ओबीसी परिवार की सांस्कृति को पोषित किया। आपसी भाईचारे के साथ बैंक के विकास मे अपना सर्वोच्च परिणाम दिया लेकिन कुछ नेताओं और प्रबंधन के कुछ लोगो के कारण बैंक की छवि धूमिल हुई। आज का दिन आत्मनिरीक्षण और आत्ममंथन का है कि कैसे एक श्रेष्ठ संस्थान का अवसान हुआ और जो धीरे धीरे दुनियाँ के पटल से ओझल हो इतिहास की घटना के रूप मे जाने जाते के निकट है। बैंक के मर्जर का ठीकरा सरकार और सरकारी नीतियों पर फूटने के कारण अच्छा ही हुआ कि बैंक के अवसान के लिये वास्तविक रूप से जिम्मेदार उन प्रबंधन और संगठन के तथाकथित नेताओं की शाख को बट्टा लगाने से बचा लिया।
विजय
सहगल


6 टिप्पणियां:
आपकी सच्ची बातें कुछ लोगों को हजम होने वाली नहीं है हकीकत यही है जानते सभी हैं बोलने की हिम्मत शायद कुछ ही लोग कर पाते हैं जिनका खामियाजा उन्हें भुगतना ही पड़ता है
प्रिय विजय सहगल, आपने प्रबंधन एवं यूनियन को एक एक वस्त्र उतार कर जिस तरह से नंगा किया है वह वास्तविकता है ओर आपका प्रस्तुतीकरण प्रशंसनीय है। 👏👏👏👏
प्रिय विजय सहगल, आपने प्रबंधन एवं यूनियन को एक एक वस्त्र उतार कर जिस तरह से नंगा किया है वह वास्तविकता है ओर आपका प्रस्तुतीकरण प्रशंसनीय है। 👏👏👏👏
मान्यवर सहगल जी, बैंक के इतिहास और उसके बाद की वास्तविकता को एक सूचीबद्ध क्रम में आपने जिस प्रकार से प्रस्तुत किया है वास्तव में ही सराहनीय है! पूरी सच्चाई सबके सामने लाने के लिए आपको साधुवाद!🙏
जितना बड़ा काम हमारे बैंक के कर्मठ कर्मचारियों ने किया है, वो अपने आप में एक मिसाल है. यूनियन नेताओं ने बहुत अर्से तक बहुत अच्छा काम किया. पिछले कुछ सालों में इन नेताओं ने अपने निजी स्वार्थों के कारण, आम कर्मचारियों के हितों की उपेक्षा की और मैनेजमेंट की चमचागीरी करते-करते बैंक को ही खत्म करवा दिया. यूनियन फंड का भरपूर दुरुपयोग किया. किसी नेता के घर में शादी आदि कोई भी फंक्शन होता, तो वहां पर सेंट्रल कमेटी की मीटिंग रख देते हैं, ता कि सभी नेता यूनियन फंड से वहां आने जाने वा रहने का खर्चा करते हैं. इन नेताओं के रिटायरमेंट की विशाल पार्टियों पर भरपूर यूनियन फंड से खर्चा करते हैं और आम लोगों की रिटायरमेंट पर ये लोग टेलीफोन पर भी बात नहीं करते.
धन्यवाद विजय सहगलजी, आपने कड़वी बातों को बिना किसी का नाम लेते हुए लिखा है। आप बधाई के पात्र है। आपकी बातें इतनी सच्ची लग रही है कि जैसे यह सब कुछ मैंने ही बैंक में किया है।
पुनः बहुत बहुत बधाई।
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