गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

निरक्षण का राग दरबारी

"निरक्षण का राग दरबारी"

 



कुछ दिन पूर्व मैंने अपने ब्लॉग "गैर निष्पादक परिसंपातियाँ" पर बैंक अधिकारी के कार्य प्रणाली पर दृष्टिपात किया था (https://sahgalvk.blogspot.com/2020/11/blog-post_20.html) आज बैंक के निरीक्षण के महत्व पर प्रकाश डालने का प्रयास कर रहा हूँ।  बैंक के निरीक्षण का कार्य कहने सुनने मे तो अति महत्वपूर्ण विभाग और कार्य प्रतीत होता है पर  निरीक्षण के कार्य को शाखाएँ कितने गंभीरता से लेती है उसकी एक बानगी मै आपके साथ सांझा कर रहा हूँ। यूं तो तत्कालीन नवांगंतुक अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक ने निरीक्षण विभाग को बैंक का आँख कान जैसे अलंकारों से नवाज कर इस विभाग की प्रशंसा की थी तब लगा था कि हम भी बैंक के विकास मे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है। पर वास्तविक धरातल पर ऐसा था नहीं। एक समय निरीक्षणालय, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र मे 17-18 निरीक्षकों के अतरिक्त 6 कार्यालीन स्टाफ भी था। कालांतर मे  एक-एक कर उक्त छह स्टाफ मे 2 तो सेवानिवृत हो गए एवं अन्य चार का स्थानंतरण हो गया। काम का सारा वोझ से कार्यलय का कार्य प्रभावित होना स्वाभिक  था। कार्यालय प्रमुख के साथ पदस्थ एक  अतरिक्त एजीएम भी कार्यालय मे पदस्थ थे। उनका अधिकतर प्रवास प्रधान कार्यालय मे वीता था। मैंने प्रमुख सर से कार्य विभाजन कर कुछ काम को उन्हे आवंटन हेतु निवेदन किया। एजीएम साहब का मानना एवं कहना था प्रधान कार्यालय मे एजीएम कार्य नहीं करते अपितु उनके अधीन अधिकारी ही कार्य करते है। छः लोगो के काम को एक अधिकारी द्वारा करने पर मैंने प्रतिवाद किया और जैसे तैसे कार्यालय के कार्य का विभाजन दो लोगो के बीच हो गया।

नियमित निरीक्षण (आरबीआईए) का कार्य हमारे वरिष्ठ एजीएम साथी देख रहे थे पर पूरे डाटा का संकलन हमारे जिम्मे था। इस निरीक्षणालय मे एक चलन था कि निरक्षक शाखा का निरीक्षण समाप्त कर रिपोर्ट के तीन सेट बना शाखा प्रबन्धक के सुपुर्द इस अनुदेश के साथ  कर देते है कि पहली फ़ाइल शाखा अपने पास रख शेष दो फ़ाइल एक प्रादेशिक कार्यालय और दूसरी प्रादेशिक निरीक्षणालय को प्रेषित कर दे तत्पश्चात इंस्पेक्टर वही से किसी अन्य शाखा के निरीक्षण हेतु प्रस्थान कर जाते थे। बैंक की नीति/नियमानुसार शाखा प्रबन्धक से अपेक्षा की जाती थी कि नियमित निरीक्षण रिपोर्ट मे उल्लेखित गंभीर त्रुटियों को 45 दिन मे एवं शेष अन्य त्रुटियों को 90 दिन मे निराकरण फ़ाइल को बंद कराएं।

एक दिन बड़ी आश्चर्य जनक घटना सामने आई। दिसम्बर माह मे कार्यालय प्रमुख की नज़र दो शाखाओं के निरीक्षण रिपोर्ट पर पड़ी। मेरे अनुसार उन दो शाखाओं का निरीक्षण नहीं हुआ था पर उनका कहना था कि उक्त शाखाओं का निरीक्षण हो चुका है। नियमित निरीक्षण का कार्य देख रहे एजीएम साहब से जब चर्चा हुई तो उन्हे भी स्मरण हुआ कि उक्त दोनों शाखाओं का निरक्षण तो हो चुका है। चूंकि निरीक्षण रिपोर्ट की फ़ाइल कार्यालय  मे न आने के कारण निरीक्षण रिपोर्ट का डाटा अपडेट नहीं हुआ था। गहराई से जब उन अधिकारी महोदय ने छान बीन की तो ज्ञात हुआ कि उंक्त शाखाओं का निरीक्षण हुए तो छः माह हो गए!! पर शाखा प्रबन्धकों ने निरीक्षण की उक्त रिपोर्ट न तो प्रादेशिक कार्यालय मे प्रेषित की और न ही दूसरी प्रति प्रादेशिक निरीक्षणालय को प्रेषित की जिसके कारण उक्त फ़ाइल का डाटा रिकॉर्ड मे शामिल ही नहीं हुआ।

जब उन शाखा प्रबन्धकों से इस संबंध मे पूंछ-तांछ की तो पता चला निरीक्षण रिपोर्ट अभी भी उनकी शाखाओं मे पड़ी धूल खा रही है। उक्त शाखाओं के प्रबन्धकों से कारण बताओ नोटिस जारी कर औपचारिकताओं की पूर्ति की गई।

शाखाओं और नियंत्रण कार्यालयों द्वारा निरीक्षण के महत्व को उक्त घटना से देखा और समझा जा सकता है कि जिस निरक्षण फ़ाइल को त्रुटियों का निराकरण कर तीन माह मे बंद किया जाना था उक्त निरीक्षण रिपोर्ट पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया और छः माह तक शाखा मे पड़ी धूल खाती रही। उक्त घटना ने मुझे भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था पर श्री लाल शुक्ल जी द्वारा लिखित उपन्यास "राग दरबारी" की यादें पुनः एक बार ताजा कर दी एवं निरीक्षण के कार्य का बैंक मे महत्व भी परिलक्षित हो गया।

विजय सहगल  

 

1 टिप्पणी:

P.c.saxena ने कहा…

आप व्यवस्था के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं कहना सही है जानते सभी हैं पर सुधार कुछ भी नहीं हो रहा और ना ही होने की संभावना है