मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

शहरे खांमोंशा

 

"शहरे खांमोंशा"



कुछ दिन पूर्व मैंने एक ब्लॉग लिखा था "टॉइलेट एक अप्रेम कथा (https://sahgalvk.blogspot.com/2020/10/blog-post_16.html) जिसमे बैंक हेतु शाखा परिसर लेते समय टॉइलेट की उपेक्षा के संबंध मे प्रबंधन के रुख के बारे मे लिखा था। इस बार एक ब्रांच के शाखा परिसर के अपने अनुभव के बारे मे विचार सांझा कर रहा हूँ। मुझे प्रबंधन द्वारा शाखा के नवीन परिसर लेने की नीति नियम के अनुसार प्रबंधन भरसक कोशिश करता होगा कि बैंक परिसर की स्थिति ऐसी जगह हों जहां वर्तमान मे व्यवसाय अच्छा मिले और साथ मे भविष्य मे भी व्यापार व्यवसाय की अच्छी संभावना हो।

अपने निरक्षण कार्यालय मे पदस्थपना के दौरान कुछ शाखाओं के परिसर की व्यापारिक दृष्टि से स्थिति या मौके की जगह पर शाखा का खोलना अजीब लगा था। एक शाखा के निरीक्षण के दौरान तो एक अजीब ही घटना घटी। उस  शाखा मे निरीक्षण के दौरान  एक बार लंच पर जाते समय शाखा के कुछ दूरी पर एक सुंदर सी हरे भरे पेड़ो से घिरी एक  खूबसूरत प्रवेश द्वार से बनी निर्माण आकृति के पास से  होकर निकले तो  देखा प्रवेश द्वार बहुत ही अच्छे कीमती पैंट से रंगा हुआ था।  ऐसा प्रतीत होता था अंदर कहीं किसी  बड़े धनाढ्य  आदमी का बंगला हो क्योंकि बाहर से घने पेड़ो के कारण  अंदर कुछ दिखाई नही  देता था। सुंदर प्रवेश द्वार पर स्टील धातु के बड़े  आकार के चमकदार बड़े शब्दों से लिखा था "शहरे खाँमोशा" तब हमे लगा शायद अंदर कोई हाउसिंग सोसाइटी होगी। मैंने जिज्ञासा वश उस  शाखा प्रबन्धक जिनका नाम आज भी याद है "श्री रंगैया बाबू" था से पूंछा?  ये किसी धनाढ्य व्यक्ति का बंगला लगता है? या कोई हाउसिंग सोसाइटी है? तो उन्होने अपनी मधुर मीठी दक्षिण भारतीय (वे आंध्रा के रहने बाले हैं) हिन्दी मे बताया "न सर, ये तो वोहरा मुस्लिम का ग्रेव यार्ड (कब्रिस्तान) है" जहां वे लोग शहर के अपनी कम्यूनिटी के मृतक लोगो को दफनाते है। मै सुनकर आश्चर्य चकित था और अपनी हंसी न रोक सका और सोचा कही खुदा न खास्ता देर रात ब्रांच खुली तो कोई खूबसूरत हूर  के भेष मे कोई भूत प्रेत या प्रेतनी   बैंक मे खाता खुलवाने या जमा/निकासी के लिये न आ जाये, रंगैया! जरा सावधान रहना ?

हो सकता है मै गलत हौऊ या पता नहीं क्यों मुझको लगता है या शायद आपको भी लगता होगा  कि हमारे प्रबंधन को  बैंक परिसर के लिये मुख्य बाज़ार या व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जगह पर कोई परिसर क्यों नहीं मिलते? वही अन्य बैंक या प्राइवेट बैंक को वही उसी शहर मे ही समुचित जगह उपलब्ध कैसे हो जाती है?? जबकि दोनों ही व्यावसायिक संस्थान के नाते ज्यादा से ज्यादा और अच्छे से अच्छा व्यवसाय प्राप्त करना चाहते है। मै जानता और मानता हूँ कि हमारे बैंक के स्टाफ अपनी उत्तम और कुशल ग्राहक सेवा के लिये जाने और माने जाते है पर महज ग्राहक सेवा का महत्व जंगल मे तो नहीं ही आँका जा सकता? इसके लिये व्यवसायिक लोकेशन का अपना अलग महत्व है जिसके कारण हमारे प्रबन्धक वार्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति मे अन्य प्राइवेट बैंकों से  प्रायः पिछड़ जाते है।

 

विजय सहगल

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