"अमझरा
घाटी"
1989-90 मे प्रथम बार सागर (मध्य प्रदेश) मे
अपनी पदस्थपना के दौरान मेरा परिचय अमझरा घाटी स्थित हनुमान मंदिर से हुआ। मेरे
अभिन्न मित्र स्व॰ अनिल समधिया के माता-पिता इस स्थान पर हनुमान मंदिर के
दर्शनार्थ आते रहते थे एवं बड़ी श्रद्धा एवं भक्तिभाव रखते थे। इस मंदिर के मुख्य
पुजारी को उनका संदेश पहुंचाने हेतु मुझे एक बार अपनी सागर बस यात्रा के मध्य अल्प
विराम पर रुकने का मौका मिला। अमझरा,
ललितपुर सागर राष्ट्रीय राजमार्ग 26 के मध्य स्थित है जो ललितपुर से 42 किमी॰ सागर
की तरफ है। मुझे याद है 1989 मे ललितपुर
से सागर 122 किमी॰ की दूरी तय करने मे हमे
बस से 5-6 घंटे लगते थे। सड़क की दशा और बस का हर दो-तीन सौ मीटर पर रुक सवारियों
को उतारना चढ़ाना यात्रा को इतना कष्टप्रद और दुरूह बना देता था जिसका स्मरण आज भी
सिहरन पैदा कर देता है।
पर दिनांक 15 दिसम्बर 2021 को जब अपने भोपाल
प्रवास से बापसी के समय इस राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच 26 पर मध्य प्रदेश और उत्तर
प्रदेश की सीमा के पास स्थित यूपी मे हरे भरे वृक्षों से आच्छादित इस मनोरम घाटी
मे एक आम के वृक्ष के तले बने एक छोटे पर वैभव शाली मंदिर अमझरा मे मुझे आने का
सौभाग्य पुनः प्राप्त हुआ। दोनों प्रदेशों के हजारों-लाखों निवासियों के बीच अमझरा
घाटी के हनुमान मंदिर की बड़ी मान्यता है। मैंने मंदिर मे छोटे जन्मे व्यक्तियों को
मुख्य मंदिर प्रांगड़ मे हनुमान जी के समक्ष पल्ला झुलाते और भगवान से बच्चे के
दीर्घ और स्वस्थ जीवन की कामना करते आज देखा। इस मंदिर मे दूर दूर से श्रद्धालु
अपनी मनौती मांगने अमझरा के हनुमान के दरबार
पर मत्था टेकने और सिर नवाने आते
है।
मंदिर मे श्री हनुमान जी के दर्शन नयनभिराम
थे। मंदिर मे हनुमान जी की बानर सेना जहां तहां मंदिर मे विचरण कर रही थी लेकिन
भक्तों को बिना सताये या दुःखाए!! भक्तगण भी उनके हिस्से का प्रसाद और भोजन बड़ी
श्रद्धा और भक्ति भाव से अर्पित कर रहे थे। मंदिर प्रांगड़ मे ही मंदिर के पुजारी
श्री अजय दुबे से मुलाक़ात हुई। मंदिर के इतिहास के बारे मे उन्होने बताया कि दोनों
प्रदेशों की सीमा पर बनी बिंध्याचल पर्वत श्रंखला की इस घाटी मे आम के पेड़ों की बहुतायत होने और उनके
बीच ही एक छोटे से झरने के कारण इस स्थान को अमझरा घाटी के नाम से जाना और पहचाना जाता
है। मंदिर प्रांगढ़ मे ही माता अंजनी का मंदिर है। मंदिर के प्रवेशद्वार पर पीतल के
दो बड़े सिंह मंदिर की सुंदरता को शोभायमान कर रहे थे। मंदिर के सामने कथा मंडप और
उसके पीछे बड़े टीन शेड के नीचे बने चबूतरे पर धार्मिक संस्कार संपादित किए जा रहे
थे। हरे भरे वृक्षो के प्राकृतिक सौंद्रय के मध्य मंदिर को देखने मे
मन को जो सुकून और संतोष मिला वह अमूल्य था। अपने
भावों के श्रद्धा सुमन श्री हनुमान के चरणों मे समर्पित कर और प्रसाद रूपी
आशीर्वाद को ग्रहण कर अब मै मंदिर के प्रांगढ़ मे स्थित मेले को देखने निकाल
पड़ा।
रक्षाबंधन पर्व पर मंदिर मे एक बहुत बड़ा
आयोजन किया जाता है और बहुत बड़ा मेला लगाया जाता है जिसमे लाखों भक्तजन शामिल होते
है। एक छोटे मेले का रूप तो यहाँ पूरे साल दिखाई देता है जिसे मैंने यहाँ देखा और
अनुभव किया। यूं भी मुझे ग्रामीण मेले और हाट बाज़ार मे घूमना और देखने मे जो आनंद
आता है उसको व्याँ करना कठिन है। आवश्यक वस्तुओं की सारी श्रंखला को आप एक ग्रामीण
दुकान मे एक साथ देख सकते है। मेरी श्रीमती जी ने भी बेसन की पापड़ी बनाने की टिकटी
खरीदी जो महानगरों मे भी उपलब्ध नहीं थी। मंदिर के एक तरफ चाट पकौड़ी के ठेले खड़े
हुए थे उनमे से एक पर पानी पूरी (गोल गप्पे) को देख मुंह मे पानी आ गया पर एक शहरी
और बुद्धिजीवि का मुखैटा चेहरे से न
उतारपाने के कारण इक्क्षा होते हुए भी मन मसूस कर पानी पूरी से वंचित रहना पड़ा।
न जाने क्यों ये शहरी ढकोसले और लबादे हम
छोटे गाँव और कस्बों मे जाकर क्यों नहीं उतार पाते??
एक बेल्ट और चश्मे की दुकान पर मैंने दुकानदार के यहाँ लेदर बेल्ट मे होल करने की मशीन
देख अपने रेमण्ड बेल्ट मे एक दो छेद करने
का निवेदन किया जिसने सहर्ष ही 2-3 छेद कर दिये। जब मैंने शुल्क के बारे मे उस
नौजवान से पूंछा तो उसने कोई भी शुल्क लेने से मना कर दिया!! ऐसी मिलनसारता,
सरलता और अपनत्व शहरी और महनगरीय जीवन शैली मे शायद ही देखने को मिले!! एक राज की
बात सांझा करूँ? कि पिछले 2-3 वर्षों से
जब से मैंने रेमंड का कीमती बेल्ट खरीदा था तो हर दिन मै बेल्ट के अनुसार अपनी
काया (पेट) को समायोजित करता था पर उस दिन
पहली बार अमझरा घाटी मे अपनी काया के
अनुसार बेल्ट को समायोजित कर बांधा। इतना अपनत्व और अच्छा अनुभव लिये मैंने एक बार
पुनः हनुमानजी का स्मरण और नमन कर अपने गंतव्य के लिये प्रस्थान किया।
विजय सहगल