बुधवार, 29 दिसंबर 2021

अमझरा घाटी के हनुमान

                      "अमझरा घाटी"






1989-90 मे प्रथम बार सागर (मध्य प्रदेश) मे अपनी पदस्थपना के दौरान मेरा परिचय अमझरा घाटी स्थित हनुमान मंदिर से हुआ। मेरे अभिन्न मित्र स्व॰ अनिल समधिया के माता-पिता इस स्थान पर हनुमान मंदिर के दर्शनार्थ आते रहते थे एवं बड़ी श्रद्धा एवं भक्तिभाव रखते थे। इस मंदिर के मुख्य पुजारी को उनका संदेश पहुंचाने हेतु मुझे एक बार अपनी सागर बस यात्रा के मध्य अल्प विराम पर रुकने का मौका मिला। अमझरा, ललितपुर सागर राष्ट्रीय राजमार्ग 26 के मध्य स्थित है जो ललितपुर से 42 किमी॰ सागर की तरफ है। मुझे याद है 1989 मे  ललितपुर से सागर 122 किमी॰ की दूरी तय  करने मे हमे बस से 5-6 घंटे लगते थे। सड़क की दशा और बस का हर दो-तीन सौ मीटर पर रुक सवारियों को उतारना चढ़ाना यात्रा को इतना कष्टप्रद और दुरूह बना देता था जिसका स्मरण आज भी सिहरन पैदा कर देता है।

पर दिनांक 15 दिसम्बर 2021 को जब अपने भोपाल प्रवास से बापसी के समय इस राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच 26 पर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा के पास स्थित यूपी मे हरे भरे वृक्षों से आच्छादित इस मनोरम घाटी मे एक आम के वृक्ष के तले बने एक छोटे पर वैभव शाली मंदिर अमझरा मे मुझे आने का सौभाग्य पुनः प्राप्त हुआ। दोनों प्रदेशों के हजारों-लाखों निवासियों के बीच अमझरा घाटी के हनुमान मंदिर की बड़ी मान्यता है। मैंने मंदिर मे छोटे जन्मे व्यक्तियों को मुख्य मंदिर प्रांगड़ मे हनुमान जी के समक्ष पल्ला झुलाते और भगवान से बच्चे के दीर्घ और स्वस्थ जीवन की कामना करते आज देखा। इस मंदिर मे दूर दूर से श्रद्धालु अपनी मनौती मांगने अमझरा के हनुमान के दरबार  पर मत्था टेकने  और सिर नवाने आते है।

मंदिर मे श्री हनुमान जी के दर्शन नयनभिराम थे। मंदिर मे हनुमान जी की बानर सेना जहां तहां मंदिर मे विचरण कर रही थी लेकिन भक्तों को बिना सताये या दुःखाए!! भक्तगण भी उनके हिस्से का प्रसाद और भोजन बड़ी श्रद्धा और भक्ति भाव से अर्पित कर रहे थे। मंदिर प्रांगड़ मे ही मंदिर के पुजारी श्री अजय दुबे से मुलाक़ात हुई। मंदिर के इतिहास के बारे मे उन्होने बताया कि दोनों प्रदेशों की सीमा पर बनी बिंध्याचल पर्वत श्रंखला की  इस घाटी मे आम के पेड़ों की बहुतायत होने और उनके बीच ही एक छोटे से झरने के कारण इस स्थान को अमझरा घाटी के नाम से जाना और पहचाना जाता है। मंदिर प्रांगढ़ मे ही माता अंजनी का मंदिर है। मंदिर के प्रवेशद्वार पर पीतल के दो बड़े सिंह मंदिर की सुंदरता को शोभायमान कर रहे थे। मंदिर के सामने कथा मंडप और उसके पीछे बड़े टीन शेड के नीचे बने चबूतरे पर धार्मिक संस्कार संपादित किए जा रहे थे।  हरे भरे वृक्षो के  प्राकृतिक सौंद्रय के मध्य मंदिर को देखने मे मन को जो सुकून और संतोष मिला वह अमूल्य था। अपने  भावों के श्रद्धा सुमन श्री हनुमान के चरणों मे समर्पित कर और प्रसाद रूपी आशीर्वाद को ग्रहण कर अब मै मंदिर के प्रांगढ़ मे स्थित मेले को देखने निकाल पड़ा। 

रक्षाबंधन पर्व पर मंदिर मे एक बहुत बड़ा आयोजन किया जाता है और बहुत बड़ा मेला लगाया जाता है जिसमे लाखों भक्तजन शामिल होते है। एक छोटे मेले का रूप तो यहाँ पूरे साल दिखाई देता है जिसे मैंने यहाँ देखा और अनुभव किया। यूं भी मुझे ग्रामीण मेले और हाट बाज़ार मे घूमना और देखने मे जो आनंद आता है उसको व्याँ करना कठिन है। आवश्यक वस्तुओं की सारी श्रंखला को आप एक ग्रामीण दुकान मे एक साथ देख सकते है। मेरी श्रीमती जी ने भी बेसन की पापड़ी बनाने की टिकटी खरीदी जो महानगरों मे भी उपलब्ध नहीं थी। मंदिर के एक तरफ चाट पकौड़ी के ठेले खड़े हुए थे उनमे से एक पर पानी पूरी (गोल गप्पे) को देख मुंह मे पानी आ गया पर एक शहरी और बुद्धिजीवि का मुखैटा चेहरे से न  उतारपाने के कारण इक्क्षा होते हुए भी मन मसूस कर पानी पूरी से वंचित रहना पड़ा। न जाने क्यों ये शहरी ढकोसले और लबादे  हम छोटे गाँव और कस्बों मे जाकर क्यों नहीं उतार पाते?? एक बेल्ट और चश्मे की दुकान पर मैंने दुकानदार के यहाँ लेदर बेल्ट मे होल करने की मशीन देख  अपने रेमण्ड बेल्ट मे एक दो छेद करने का निवेदन किया जिसने सहर्ष ही 2-3 छेद कर दिये। जब मैंने शुल्क के बारे मे उस नौजवान से पूंछा तो उसने कोई भी शुल्क लेने से मना कर दिया!! ऐसी मिलनसारता, सरलता और अपनत्व शहरी और महनगरीय जीवन शैली मे शायद ही देखने को मिले!! एक राज की बात सांझा करूँ? कि पिछले 2-3 वर्षों से जब से मैंने रेमंड का कीमती बेल्ट खरीदा था तो हर दिन मै बेल्ट के अनुसार अपनी काया (पेट) को समायोजित करता था पर  उस दिन पहली बार अमझरा घाटी  मे अपनी काया के अनुसार बेल्ट को समायोजित कर बांधा। इतना अपनत्व और अच्छा अनुभव लिये मैंने एक बार पुनः हनुमानजी का स्मरण और नमन कर अपने गंतव्य के लिये प्रस्थान किया।     

विजय सहगल

  

 


शनिवार, 25 दिसंबर 2021

निरंकुश ठेकेदार

 

"ठेकेदार की मन मानी"








आपके पढे लिखे होने का तब कोई औचित्य नहीं रह जाता जब एक अनपढ़ और गंवार, निर्लज्ज व्यक्ति अपने बेहूदा व्यवहार और आधारहीन कुतर्कों से आपको चुनौती दे। तब उस हठी और धूर्त व्यक्ति को शालीन तरीके से प्रचलित विधि और नियमों का ज्ञान देना आवश्यक हो जाता है। 

ऐसा ही कुछ मेरे साथ दिनांक 06.12.2021 को रेल्वे स्टेशन ग्वालियर मे घटित हुआ। जब मुझे  ग्वालियर रेल्वे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 1 की  कार पार्किंग के ठेकेदार के कर्मचारियों  की गुंडागर्दी और मनमानी से रु-ब-रु होना पड़ा। आज जब मै प्रातः लगभग 8.50 बजे माता-पिता को शताब्दी एक्सप्रेस पर छोड़ने आया था, मैंने अपनी कार MP-07/xx-8150 प्लेटफॉर्म संख्या 1 की पार्किंग मे पार्क की जिसका टिकिट क्रमांक 12155 मुझे दिया गया (फोटो संलग्न) जिस पर कार पार्किंग शुल्क की राशि या नियमों का कोई उल्लेख  नहीं था। शताब्दी के प्रस्थान के बाद जब मै 9.40 बजे लगभग अपनी कार लेने के लिए पहुंचा तो कार पार्किंग पर उपस्थित ठेकेदार के कर्मचारियों ने पार्किंग शुल्क के रूप मे  रुपए 30/- की मांग की जिसका मैंने भुगतान कर दिया। मेरा  उस व्यक्ति से आग्रह था कि आपने कार पार्किंग शुल्क के रेट का कोई इश्तहार या सूचना कहीं नहीं लगा रक्खी है जिसको आपको प्रदर्शित करना चाहिये ताकि शुल्क देने मे पारदर्शिता हो और मुझे भी संतुष्टि हो कि मुझसे सही शुल्क लिया गया है। संबन्धित कर्मचारी ने अनाकानी करते हुए टालामटोली का रुख अख़्तियार कर बेरुखी का व्यवहार किया। जब मैंने उक्त तीस रुपए के एवज मे उक्त टिकिट या बिल देने को कहा तो उसके व्यवहार मे आक्रामक रुख रखते हुए कहा कि रेल्वे का ये ही नियम है कि कार का टिकिट हमारे ही पास रहेगा और कोई बिल नहीं दिया जायगा।

जब मैंने इस संबंध मे मामले को  स्टेशन अधीक्षक के समक्ष ले जाने और शिकायत करने की धमकी दी तो दोनों कर्मियों का आक्रामक रुख रहा और  बड़े बेरुखी और अक्खड़ पन से कहा, "कुछ नहीं होगा आप खुद 2 घंटे बाद लौट के यही आएंगे, अधिकारी हमारा कुछ नहीं कर सकते"। एक अनपढ़ और निर्लज्ज व्यक्ति जब ऐसा व्यवहार करे, तो अपने पढे  लिखे होने पर जिस आत्मग्लानि और हीन भावना का सामना करना पड़े उसकी  कल्पना ही की जा सकती है?  उस कर्मचारी के फूहड़ पने व्यवहार पर सिर्फ मन मसोस कर रह जाना पड़ा? कुछ ऐसी ही  परिस्थिति का सामना मुझे उस दिन करना पड़ा।

स्टेशन पर श्री तिवारी, उप कमर्शियल मैनेजर से जब इस संबंध मे शिकायत का निवेदन किया तो उक्त अधिकारी का रुख सकारात्मक था। उन्होने कार पार्किंग ठेकेदार श्री जय भान के संज्ञान  इस घटना को ला शिकायत फॉर्म भरने मे हमारी समुचित सहायता की। मैंने शिकायत क्रमांक  128097 के माध्यम से संक्षिप्त शिकायत उनके समक्ष दर्ज कराई।  बाद मे हमे ज्ञात हुआ कि पार्किंग के ठेकेदार द्वारा  जान बूझ कर वाहन शुल्क की  दरों  के सूचना बोर्ड को न लगाने के कारण कार पार्किंग के लिये निर्धारित शुल्क रुपए 25/- के विरुद्ध 30/- रूपये बसूल किये जा रहे थे। ये तो अच्छा रहा प्लेटफॉर्म टिकिट गेट पर जमा नहीं हुआ था अन्यथा प्लेटफॉर्म टिकिट क्रमांक 75899343 के आभाव मे पार्किंग व्यवस्था की शिकायत करना असंभव हो जाता, क्योंकि शिकायत के लिये वैधानिक टिकिट आवश्यक है।

मैंने अपने साथ घटित उक्त घटना की शिकायत को ट्वीट और मेल के माध्यम से रेल बोर्ड के चेयरमेन, महाप्रबंधक, मण्डल रेल प्रबन्धक जैसे उच्च अधिकारियों एवं  "रेल मदद" की साइट पर की जिस पर त्वरित कार्यवाही होती तो प्रतीत हुई पर कामचोर  अधिकारियों द्वारा दी गयी जानकारी महज खनपूर्ति और लीपा पोती ही नज़र आयी जब झाँसी से रेल विभाग के एक अधिकारी श्री मनोज एवं ग्वालियर के मुख्य वाणिज्य प्रबन्धक श्री दिनेश का दिनांक 7 दिसम्बर को सायंकाल फोन आया और घटना पर अफसोस एवं खेद प्रकट करते हुए सूचित किया कि ठेकेदार के उस कर्मचारी को सेवा से हटा दिया गया है मानो वह दिहाड़ी मजदूर सरकारी पे रोल पर  पदासीन कोई स्थायी कर्मचारी हो? और इस तरह इन कर्तव्यनिष्ठ एवं सेवाभावि अधिकारियों ने दुनियाँ की तीव्रतम कार्यवाही कर दस मिनिट के अंदर उपभोक्ता का तिरिस्कार करते एवं ठेकेदार की  मदद करके "रेल मदद" ने  सरकारी ढर्रे के अनुरूप शिकायत को त्वरित कार्यवाही कर बंद कर दिया!!  ठेकेदार या रेल विभाग के किसी कर्मचारी का कोई बाल भी बांका न होना इस बात का सबूत है और ये दर्शाता है कि राग दरबारी अब भी बदस्तूर जारी है। कोई बड़ी बात नहीं कि इन सब आपसी मिलीभगत मे मण्डल रेल प्रबन्धक तक के अधिकारी कर्मचारी शामिल हों।

जब मैंने इन दोनों अधिकारी महोदय को कहा कि आप स्वयं से या खुफिया तौर पर  औचक निरक्षण के माध्यम से कार पार्किंग के क्रियाकलापों की जांच क्यों नहीं करते कि व्यवस्था कैसी चल रही है? तो उनका जबाब सुन बड़ा आश्चर्य हुआ कि "जैसे ही आप की शिकायत आयी हम लोगो ने त्वरित कार्यवाही की"। तब मेरा कहना था कि यदि  शिकायत न होती तो इसका मतलब आपने ये मान लिया  कि  व्यवस्था मे सब कुछ ठीक ठाक है? इन निम्न अधिकारियों ने आशानुरूप लीपापोती कर कार्यवाही समाप्त कर दी पर देंखे महाप्रबंधक इलाहाबाद, मण्डल रेल प्रबन्धक झाँसी एवं अन्य उच्चाधिकारी इस संबंध मे क्या कार्यवाही करते है?

हमारे नीतिनियंताओं  और सरकारों को लगता था कि साइकल स्टैंड या अन्य संस्थानों का निजीकरण होने से आम जनता को अच्छी और उत्तम सेवाओं के साथ सरकारी भ्रष्टाचार और लूट खसूट से छुटकारा मिलेगा, लेकिन ये देश का दुर्भाग्य रहा कि न तो निजिकरण ने और न ही राष्ट्रीकरण से आम जनता को इस भ्रष्ट, लूट-खसूट व्यवस्था से छुटकारा मिल सका, सेवा तो कहाँ मिलनी थी? क्योंकि हमारी दो सौ साल की गुलामी ने हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था की रगों मे कूट कूट कर बेईमानी और भ्रष्टाचार का लहू भर दिया है कि जिसको जहां मौका मिलता है बेईमानी या भ्रष्टाचार करने मे नहीं चूकता फिर चाहें वो निजी संस्थान हो या सरकारी?  भगवान जाने भ्रष्टाचार रूपी इस दानव से देश और आम जनता को कब और कैसे छुटकारा मिलेगा?

मेरा मानना है कि भारत मे एक साधारण व्यक्ति का इस भ्रष्ट और संगठित लूट  व्यवस्था मे जीवन बहुत कठिन है जिसे मै बचपन से देखते, सुनते और भोगते मे अनुभव किया है। या तो आप उस भ्रष्ट व्यवस्था के बहाव की मुख्य धारा मे बहते हुए उसको स्वीकार कर आगे बढ़ते रहे या उनकी अनाधिकृत नियमों एवं क्रियाकलापों का विरोध कर उनसे संघर्ष के लिये तत्पर रहे। लेकिन जब आप विरोध का रास्ता चुनते है तो आप को कदम कदम पर हताशा, निराशा और हतोत्साहित करने के प्रयास किये जाते है। इस भ्रष्ट व्यवस्था की जड़े इतनी गहरी है कि आम लोगो की जागरूकता के आभाव मे इस व्यूह को भेदना कठिन तो है पर असंभव नहीं? पर इससे लड़ने और लोहा लेने के लिये आपको धैर्य, सहनशीलता के साथ अनंत अक्षय ऊर्जा का भंडारण अपने पास रखना होगा। लेकिन ये देख दुःख और क्षोभ होता है कि  जब  उच्च शिक्षित व्यक्ति को ऐसा सब झेलना और भुगतना पड़ता है तो तनिक कल्पना करें कि इस देश के अधिकांश अशिक्षितों और समाज के निर्धन और दबे कुचले वर्ग के व्यक्तियों के साथ क्या और कैसा  व्यवहार होता होगा? 

विजय सहगल

रविवार, 19 दिसंबर 2021

अधूरा विजय दिवस

"अधूरा विजय दिवस"






अभी पिछले दिनों भारतीय सेना द्वारा विजय दिवस की स्वर्णिम जयंती मनाई गयी। पाकिस्तान की सेना को परास्त कर बांग्लादेश के  स्वतन्त्र अस्तित्व  पर 16 दिसम्बर 1971 हिंदुस्तान के स्वर्णिम इतिहास मे एक मील का पत्थर था, इस दिन भारतीय सैनिकों के शौर्य, साहस और वीरता को हमेशा याद किया जाएगा जब भारतीय सैनिकों ने अपनी बहदुरी और अदम्य साहस का प्रदर्शन कर पूर्वी पाकिस्तान को पाकिस्तान से अलग कर  एक नये देश "बंगला देश" के रूप मे स्थापित किया। भारतीय सैनिकों का इतिहास रहा है कि हथियारों की कमी एवं संसाधनों के अभाव के बावजूद अपने हौसलों और हिम्मत के बल पर दुश्मनों के दांत खट्टे करने मे सक्षम, समर्थ और निपुण रही है, जिसकी बानगी 1962 के भारत-चीन के बीच हुए युद्ध मे देश और दुनियाँ ने देखा था।

इसमे कोई भी शक नहीं है कि सन् 1971 तत्कालीन राजनैतिक नेतृत्व के दूरदृष्टि और साहस पूर्ण निर्णय ने इस युद्ध मे महत्वपूर्ण योगदान किया था जिसके विना उक्त ऐतिहासिक घटना संभव नहीं हो सकती थी। इसमे कोई विसंगति नहीं कि देश के स्वाभिमान और सम्मान के रक्षार्थ भारतीय सेना किसी भी बलिदान और आत्मोसर्ग से पीछे हटने वाली नहीं है। फिर चाहें वो 1962 का चीन से युद्ध हो या 1965, 1971 का पाकिस्तान से युद्ध हो या फिर 1999 मे पाकिस्तान द्वारा पोषित कारगिल पर उग्रवादी हमला। आज तो भारतीय सेना आधुनिकतम  हथियारों और तकनीकि से युक्त किसी भी चुनौती का सामना करने मे सक्षम है। जिसका जीता जागता उदाहरण 28-29 सितम्बर 2016 भारतीय सेना के वीर योद्धाओं ने पाकिस्तान के विरुद्ध सर्जिकल स्ट्राइक मे भारत पाक नियंत्रण रेखा को लांघ पाक अधिकृत कश्मीर मे आतंकवादियों के ट्रेनिंग कैंपों पर हमले कर उन्हे नष्ट किया और उन मे शामिल आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया। ऐसा ही कुछ दिनांक 26 फरवरी  2019 मे जब भारतीय सेना एवं वायु सेना  ने पाक अधिकृत कश्मीर के बालाकोट मे जेसे मोहम्मद  आतंकवादियों के प्रशिक्षण कैंप एवं उसके उद्गम स्थल पर न केवल हवाई हमले किये बल्कि उन्हे नेस्तनाबूद कर सैकड़ो आतंकवादियों का नरकारोहण कर  सीधे बहत्तर हूरों के पास भेज, दुनियाँ को आगाह किया कि भारत की सीमाओं पर अपनी बुरी नज़र डालने के परिणाम घातक होंगे।  सेना द्वारा इस तरह के साहस पूर्ण कदमों से न केवल सेना बल्कि  देश और देशवासियों का मनोबल और हौसला मजबूत होता है बल्कि दुनियाँ को ये संदेश भी जाता है कि भारत अपनी सरहदों की रक्षा करने मे पूर्णतः सक्षम है।

मुझे याद है 16 दिसम्बर 1971 को कुछ ऐसा ही मनोबल देशवासियों का जब बढ़ा था जब भारतीय सेना के तीनों अंगों अर्थात जल, थल एवं नभ सेना ने अपने संयुक्त पराक्रम से  पाकिस्तान के दो टुकड़े कर एक नये देश बंगला देश का उदय किया था। मै उस समय कक्षा सातवीं का छात्र था। पूर्वी पाकिस्तान सेना के प्रमुख एएके नियाज़ी ने 16 दिसम्बर 1971 को अपने व्यक्तिगत आर्म्स भारतीय सेना के जांबाज अधिकारी श्री जेएस अरोरा के समक्ष रख पाकिस्तान के लगभग एक लाख सैनिकों के साथ समर्पण किया था। उन दिनों नियाज़ी के समर्पण पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए तस्वीर समाचार पत्रों मे खूब प्रचारित प्रसारित हुई थी। दूरदर्शन उन दिनों नहीं था, उन दिनों समाचार पत्रों और विविध भारती पर हम लोग हर रोज  बंगला देश विजय के समाचार पढ़ा और सुना करते थे। दोपहर मे किसी समय आकाशवाणी से आत्म समर्पित कायर पाकिस्तानी सिपाहियों के खैरियत संदेश प्रसारित किये जाते थे जिन्हे पाकिस्तान मे उनके परिवार और रिश्तेदार सुनने को लालायित रहते। संदेश कुछ   इस तरह प्रसारित किए जाते थे, "मै जावेद मियां, लाहौर का रहने वाला हूँ, मेरा रेंक फलां-फलां है, मै यहाँ हिंदुस्तान मे खैरियत से हूँ, किसी भी तरह की कोई तकलीफ नहीं है। या मै आसिफ मोहम्मद सेना मे हवलदार हूँ, करांची का रहने वाला हूँ, अम्मी अब्बा किसी बात की फिक्र न करें मै यहाँ खैरियत से हूँ.........। उन दिनों पाकिस्तान के इन एक लाख समर्पित सैनिकों को अच्छे से अच्छा भोजन पानी दिया जाता था पाकिस्तानी सैनिकों के  मनोरंजनार्थ उनकी फरमाइश पर "पाकीजा" फिल्म का प्रदर्शन भी किया गया था।

दुनियाँ के इतिहास मे एक लाख पाकिस्तानी सैनिकों का युद्ध मे समर्पण अपने आप मे इकलौती घटना थी!! इन एक लाख आत्म समर्पित सैनिकों के साथ करोड़ो बंगलादेशी नागरिक शरणार्थी के रूप मे हमारे देश मे शरणागत थे। इन शरणार्थियों पर होने वाले व्यय को देश के समस्त नागरिक "शरणार्थी टैक्स" के रूप मे भुगतान करने को बाध्य थे। उन दिनों संचार और सूचना के आदान प्रदान का एक मात्र आम सुलभ और सस्ता माध्यम डाक तार विभाग ही था। चिट्ठियों का आदान प्रदान पोस्ट कार्ड, अंतेर्देशी एवं लिफाफे के माध्यम से होता था। बंगला देश विजय के बाद  भारत का हर नागरिक प्रत्येक  पोस्ट कार्ड, अंतेर्देशी या लिफाफे पर पाँच पैसे एवं रसीदी टिकिट पर 10 पैसे का शरणार्थी साहायता का बोझ वहन कर रहा था। जो उस समय काफी मायने रखता था। इन सब मुसीबतों और कष्टों के बावजूद भारत का हर नागरिक तत्कालीन राजनैतिक नेतृत्व के साथ खड़ा था।       

सेना के शौर्य और साहस के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व॰ इंद्रा गांधी की इस अभूतपूर्व कार्य हेतु जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है। निश्चित ही उक्त समय के राजनैतिक नेतृत्व का देश सदा ऋणी रहेगा।

लेकिन मेरा मानना है पाकिस्तान के दो टुकड़े से उपजे बंगला देश के उदय के साथ दिसम्बर 1971 के इस युद्ध मे पाकिस्तानी सेना के जिन लगभग एक लाख सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने समर्पण किया था, तत्कालीन राजनैतिक नेतृत्व को अपनी कूटनीतिक दबाव बना  कर  इस सुनहरे अवसर का अतरिक्त लाभ पाक अधिकृत कश्मीर को बापस लेने के रूप मे भी किया जा सकता था और 1947 मे दोहरायी  गयी इस भयंकर गलती मे सुधार किया जा सकता था। इस युद्ध के पश्चात बहुत से सेना अधिकारियों का मत था कि यदि तत्कालीन राजनैतिक नेतृत्व कुछ और साहस और हिम्मत दिखा युद्ध विराम न स्वीकार कर  कुछ और दिन युद्ध चलाता तो पाकिस्तान के चार टुकड़े किये जा सकते थे। हमारी सेनाएँ पाकिस्तान के लाहौर पर भी कब्जा करने मे सक्षम थी क्योंकि पाकिस्तानी सरकार एवं पाकिस्तानी सैनिक अपने एक लाख जवानों के युद्ध मे समर्पण से सकते मे थी। पाकिस्तानी सेना की  सारी बहादुरी  और हेकड़ी धरी की धरी रह गयी क्योंकि डरपोंक पाकिस्तानी सैनिक पूरी तरह से हतोत्साहित हो अपना मनोबल खो चुके थे और हालात ने उन्हे घुटनों के बल चलने को मजबूर कर दिया था। भारतीय सैनिकों के साहस और शौर्य और युद्ध रणनीति की इन परिस्थितियों मे पाकिस्तान सरकार को बड़ी आसानी से  अपनी शर्तों को मनवा सकती थी, बस थोड़ा और साहस, और हौसला, और पराक्रम  उस समय के राजनैतिक नेतृत्व को दिखाना था और इस तरह 1947 से चली आ रही कश्मीर समस्या का सदा सर्वदा के लिए अंत हो जाता। पता नहीं क्यों तत्कालीन सरकार इन  कूटनीतिक अवसरों   का उपयोग बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग करने के साथ, एक कदम और आगे जा कर पाक अधिकृत कश्मीर को भी पाकिस्तान के चंगुल से मुक्त कराने के अवसर से चूक गयी??

विजय सहगल                      


गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

पिछौरा (कहानी)

 

"पिछौरा" (कहानी)

"लक्ष्मी" बनाम मुंशी मणिशंकर हाजिर हो!! अदालत के अर्दली ने जैसे ही आवाज लगाई मऊवारी उर्फ लक्ष्मी डरी सहमी सी लोगो की नज़रों से बचती हुई  अदालत के कमरे मे दाखिल हुई। उसे डर था कि कहीं कोई जानने वाला या रिश्तेदार उसे कचहरी मे देख न ले। जिस महिला ने ज़िंदगी मे कभी घर की देहरी न लांघी हो आज मजबूरन उसे भरी  कचहरी की चौखट पर खड़े होना पड़ रहा था। यध्यपि मऊ वारी उर्फ लक्ष्मी के पति का नाम नारायण दास था फिर भी लक्ष्मी की कृपा उन पर न थी। सारी उम्र अभावों और कष्टों मे व्यतीत की बस एक बात की खुशी थी कि पूर्वजों ने सिर छुपाने हेतु गुजरबसर के लिए छत्त छोड़ रक्खी थी। पर कुछ ज्यादा की चाह ने इस जायदाद  पर  भी उसके देवर श्री मणिशंकर ने अपनी गिद्ध  दृष्टि गड़ा रक्खी थी जो कचहरी मे मुंशी थे। लक्ष्मी जब से व्याह कर  इस घर मे आयी थी अभावों के सिवा शायद ही कभी कोई सुख भोगा हो। संयुक्त परिवार मे देवर-देवरानी, नन्द, सास-ससुर सभी थे पर लक्ष्मी पर लक्ष्मी की कृपा न होने के कारण सारे रिश्ते होते हुए भी न के बराबर थे।

अचानक एक दिन एक पुलिस का आदमी घर की कुंडी खटखटा कर अदालत का गैर जमानती वारंट ले आ धमका और लक्ष्मी उर्फ मऊ वारी को पूंछने लगा। वो तो अच्छा था घर के और मर्दों ने पुलिस वाले से मुकदमे के संबंध मे पूंछ-तांच्छ  की तो पता चला कि मुंशी मणिशंकर ने उनके ऊपर, पौर मे बने कमरे मे जाते समय  "छुरे से हमले का प्रयास" और "मारपीट" के एक मामले मे मऊ वारी के विरुद्ध अदालत मे मुकदमा कायम किया था। जिसकी सुनवाई मे पेश न होने के कारण अदालत ने उनके विरुद्ध गैर जमानती वारंट पर गिरफ्तारी के आदेश दिये है। घटना मे पौर के जिस कमरे का उल्लेख किया था वह वास्तव मे मऊ वारी के हिस्से मे ही था और जिसे बलपूर्वक मुंशी मणि शंकर ने अपने कब्जे मे ले अपना ताला डाल दिया था और अपने भाई श्री नारायण दास के परिवार को परेशान करने की नियत से एक झूंठा मुकदमा अपनी भौजाई के विरुद्ध कायम करा दिया था। संयुक्त परिवार के घर मे अब तो कोहराम मच गया। बच्चे बडों का चिंतित होना स्वाभाविक था मऊ वारी का डर और दहशत के मारे बुरा हाल हो गया। दरवाजे पर पुलिस द्वारा गिरफ्तारी की सुन उनको गश्त आ गये और मूर्छित होकर वह जमीन पर गिर पड़ी। आज से पूर्व घर मे क्या आस पड़ौस मे रह रहे कुटुंबियों मे कभी घर की औरतों को कोर्ट कचहरी मे घसीटने की कभी कोई घटना सुनी या देखी  नहीं गयी थी।  घर के लोगो ने मऊ वारी के घर पर न होने का बहाना और पुलिस की सेवा पानी कर वारंट की मुसीबत से जैसे तैसे ले-देकर छुटकारा पाया पर उसी घर मे रह रहे मुंशी मणिशंकर के चहरे पर कहीं कोई शिकन न थी मानों इस पूरी घटना से वह अनिभिज्ञ हों।  इससे पूर्व मुकदमे के संबंध मे कभी भी कोई सूचना अदालत से नहीं आयी थी। इस पूरे घटनाक्रम को देख सुनकर कोर्ट कचहरी मे मुंशी मणिशंकर की पहुँच और प्रभाव का अंदाज़ सहज ही लगाया जा सकता था।       

पिछले दो साल की तरह आज भी कचहरी मे पेशी  थी। हर बार की तरह पेशी पर अपने नाम की  पुकार अदालत मे सुनवाई के दिन का  सुनते ही मऊ वारी के प्राण आफत मे पड़ जाते। सुबह से ही मन मे डर, बेचैनी और घबड़ाहट होने लगती। कभी कोर्ट कचहरी तो क्या घर परिवार के भी मर्दों के सामने वह कभी खड़ी न हुई थी। पिछौरा ओढ़ के वह कचहरी के खुलने के पूर्व एक कौने मे खड़े हो एक टक अर्दली की आवाज पर कान धरे रहती कहीं ऐसा न हो कि अपना नाम सुनने से चूक जाये और जज साहब उसे सजा सुना जेल भेज दे। जेल जाने के इस अदृश्य भय के कारण पेशी वाले दिन उसकी रात की  नींद हराम और दिन का चैन गायब हो जाता। अब तो ये हर पेशी वाले दिन का नित्य क्रम बन गया था कि मऊ वारी पेशी वाले दिन पिछौरा ओढ़ कचहरी के लिये पैदल पैदल  प्रस्थान करती और सांझ ढले तक ही घर पहुँच पाती। घबड़ाहट और डर का ये आलम रहता कि पेशी वाले दिन खाने के ग्रास को तो छोड़िए पानी की एक बूंद भी उसके गले को नसीब न होती।

पुराने समय मे बुंदेलखंड मे प्रचलित परंपरा मे महिलाएं अपने पारंपरिक परिधान के बाद एक पीछे ओढ़ने वाले वस्त्र को जिसे   "पिछौरा" कहा जाता था। महिलाएं आवश्यक रूप से घर के बाहर प्रस्थान के समय "पिछौरा" ओढ़ कर चलती थी जो प्रायः सफ़ेद रंग की पृष्ठभूमि लिये होता था। पिछौरा महिला और उसके पारवारिक मान प्रतिष्ठा का प्रतीक होता था। आज की पेशी पर मऊ वारी न जाने किस अदृश्य चिंता और डर से ग्रसित थी। आज मुकदमे के फैसले का दिन जो था। जल्दीबाजी मे आज मऊ वारी अपना पिछौरा भूल अदालत की ओर तेज कदमों से चल दी थी। मुकदमे के निर्णय के बारे मे तो मुंशी मणिशंकर भी अच्छी तरह जानते थे लेकिन मुंशी जी का मकसद तो मुकदमे के फैंसले से इतर अपनी माँ समान भाभी और उसके  परिवार को परेशान करना था जिसमे वह पिछले दो साल मे पूरी तरह कामयाब रहे थे पर मऊ वारी एक साधारण परिवार की पृष्ठभूमि से आती थी सीधी-सादी, सरल व्यक्तित्व की स्वाभिमानी महिला जो थी। इस दो साल मे उन्होने जो ज़लालत और तिरस्कार अदलतों के चक्कर लगाते झेली थी वह उनके स्वभाव के विपरीत थी। कोई गैर इस तरह का व्यवहार करता तो शायद नियति मान स्वीकार कर लेती पर अपने ही परिवार के भाई समान रिश्तों को कलंकित करने की इस घटना ने उन्हे निराश किया था। इस अपमान और शर्मिंदगी ने उन्हे अंदर ही अंदर तोड़ दिया था। आज मुकदमे के फैंसले ने एक बार उनको पुनः हीनता और डर की भावना से ग्रसित जो किया था। उपर से आज पिछौरा न ओढ़ पाने की भूल ने उन्हे कुछ अपसकुन और अनहोनी की चिंता से भी ग्रसित कर दिया था। कचहरी के दरवाजे के एक कोने मे बैठ अपनी पुकार का इंतजार करने लगी।

अचानक अदालत के अर्दली ने आवाज लगाई लक्ष्मी उर्फ मऊ वारी हाजिर हो!! अर्दली की आवाज ने मुकदमे के फैसले की कुशंका और डर ने दिल मे बेचैनी जो बढा दी थी। घबड़ाहट और व्याकुलता के कारण मऊ वारी मूर्छित होकर कोने मे एक ओर लुढ़क गयी। अदालत के दरवाजे पर हल्ला गुल्ला मच गया, लोगो की भीड़-भाड़ इकट्ठी हो गयी। आनन फानन मे अदालत के दरवाजे पर किसी महिला के बेहोश हो गिरने की घटना की सूचना जज साहब तक भी पहुंची। उन्होने पुलिस को निर्देशित किया कि महिला के साथ आये व्यक्ति को सूचना और साथ ले चिकित्सा सेवा हेतु हॉस्पिटल मे तुरंत भर्ती कराया जाय। मूर्छित पड़ी महिला के चारों ओर देखने वालों का मजमा लग गया, उन तमाशवीन लोगो की भीड़ मे मुंशी मणिशंकर भी थे!  पुलिस ने महिला के रिश्तेदार को खोजने का प्रयास किया।  किसी के न मिल पाने के कारण महिला को लावारिस मान  अस्पताल ले जाने की प्रक्रिया शुरू कर पुलिस, महिला को अस्पताल ले कर चली गयी।

अदालत की कार्यवाही क्षणिक व्यवधान के पश्चात दुःख और संताप के विना अनिर्लिप्त भाव के जारी रही। यहाँ जज साहब ने मऊ वारी बनाम मुंशी मणिशंकर केस मे अपने निर्णय देते हुए प्रतिवादी महिला मऊ वारी को बाइज्जत बरी कर दिया और वहाँ महिला मऊ वारी अस्पताल मे जीवन मरण के इस चक्र से सदा सर्वदा के लिए मुक्त हो परलोकगमन कर गयी ..........। मऊ वारी की आत्मा क्लेश और पीढ़ा की इस घड़ी मे मान प्रतिष्ठिता रूपी पिछौरा उसकी इस अंतिम घड़ी मे उसके साथ न था।

विजय सहगल   

             


शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

कारगिल युद्ध स्मारक

 

"कारगिल युद्ध स्मारक"










24 सितम्बर 2021 का दिन मेरी ज़िंदगी का एक अहम दिन था। इस स्थान पर जाने की तमन्ना मैंने मई 1999 मे की थी जब ऑपरेशन विजय मे भारत की बहादुर सेना ने अपने शौर्य और वीरता का प्रदर्शन कर पाकिस्तान सेना द्वारा पोषित 2700 से अधिक घुसपैठियों को छटी का दूध याद दिला "दोज़ख" की अंतिम यात्रा पर भेज दिया था। इस युद्ध मे 250 से अधिक पाकिस्तानी सैनिक चूहों की तरह दुम दबाकर युद्ध क्षेत्र से भाग खड़े हुए थे। उनकी नरकारोहण की ये यात्रा पाकिस्तान की कायरता, बुज़दिली और धोखा देने की नीति से सारी दुनियाँ को पुनः अवगत करा रही है। इस युद्ध मे हमारे देश के रणबांकुरे ने जिस बहदुरी का परिचय दे अपना बलिदान दिया था तब से मेरी दिली खवाहिश थी कि राष्ट्र के इन नवतीर्थ की यात्रा करूँ। उन दिनों टीवी, समाचार पत्र और रेडियो पर जब युद्ध मे हमारे वीर सैनिकों के साहस और शौर्य की घटनाओं के बारे मे देखता और सुनता था तो बड़ी इक्छा थी कि इस वीरभूमि का चरण वंदन कर सकूँ। आज वो दिन जो आया तो मै अपने भाग्य को सराहता हुआ कारगिल युद्ध स्मारक की उस  वीर भूमि की चरण वंदन से अपने को न रोक सका।

3 मई 1999 से 26 जुलाई 1999 तक चले 18 हज़ार फुट की ऊंचाई पर हुए इस युद्ध मे भारत के 527 वीर योद्धाओं ने अपने प्राणों का उत्सर्ग किया। इन बहादुर सेनानायकों की याद मे इस स्थान को भारतीय सेना ने  भव्य युद्ध स्मारक का रूप दे वीर सैनिकों की याद मे इसका निर्माण किया है जो आधुनिक भारत का एक नवीन और भव्य राष्ट्र-तीर्थ का स्थान ग्रहण कर चुका है। हर भारत वासी का ये राष्ट्र धर्म होना चाहिये कि ज़िंदगी मे कम से कम एक बार अपने देश के लिये इस स्थान पर शहीद वीर सैनिकों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने की इक्छा मन मे रखे और जीवनपर्यंत इस अभिलाषा को पूर्ण करने का प्रयास करता रहे।

कारगिल के भौगोलिक स्थिति के ज्ञान के बारे मे मुझे कुछ गलतफहमी हो गयी जिसका समाधान वहाँ पर यथार्थ देख कर ही हुआ। दरअसल टाइगर हिल, तोलोलिंग एवं अन्य पहाड़ी चोटियों से घिरे इस युद्ध मैदान को ही  मै कारगिल मानकर चल रहा था। पर 23 सितम्बर 2021 को जब हम दोपहर कारगिल पहुंचे तो ये अहसास हुआ कि ये  एक अच्छा खासा शहर था जो "सुरू" और "द्रास" नदियों के संगम पर स्थित लगभग 2 लाख से अधिक आबादी वाला शहर था। जो 1999 के कारगिल युद्ध मे सुर्खियों मे आने के बाद लेह लद्दाख के  एक बड़े  पर्यटक स्थल के रूप मे विकसित हो चुका है। बौद्ध स्तूपों, प्रकृति सौन्दर्य एवं खुमानी जैसे फलों की पैदावार के लिये मशहूर ये जिला  अन्य जिलों की तरह ही एक सामान्य व्यापारिक केंद्र और मध्यम वर्गीय जिला है। लेह-श्रीनगर राष्ट्रीय मार्ग पर स्थित  इस जिला मुख्यालय से कारगिल युद्ध स्मारक की दूरी 60 किमी है।   

प्रातः 9 बजे कारगिल से प्रस्थान के बाद जब हमारे दल के सदस्य कारगिल युद्ध स्मारक पहुंचे तो मानों वरसों की अभिलाषा आज पूरी हो गयी। श्रीनगर लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित स्मारक के  भव्य आकर्षक  प्रवेश द्वार पर  भारतीय नागरिकों/पर्यटकों के चेहरों पर स्मारक मे प्रवेश करने की उत्सुकता एवं उमंग स्पष्ट देखी जा सकती थी। प्रवेश द्वार से "ऑपरेशन विजय के स्तम्भ" एवं "वीर जवान ज्योति" तक के प्लेटफॉर्म को पक्की डम्मर सड़क से जोड़ा गया था। वीर जवान ज्योति की पृष्ठभूमि मे तिरंगे झंडे के साथ तीनों सेनाओं के आधिकारिक ध्वज भी खुले आसमान के नीचे लहरा रहा था। ये ही सड़क पूरे भव्य, आकर्षक एवं हरी-भरी घास से भरपूर मैदानों को दो भागो मे विभक्त करती है। ऊंचे ऊंचे पहाड़ों की घाटियों और युद्ध स्मारक के परिसर के मध्य हरे हरे वृक्ष, स्मारक की सुंदरता मे चार चाँद लगा रहे थे।

ये ऊंची गगनचुंबी चोटियाँ गवाह है उस कारगिल युद्ध मे वीरता दिखाने वाले भारतीय सैनिकों के शौर्य और साहस की जिनके कदमों ने शत्रु को चारों खाने चित्त कर अपनी विजय पताका को फहरा कर कारगिल की  इन चोटियों पर विजय प्राप्त की थी। राजस्थान के गुलाबी पत्थर से बने इस पूरे स्मारक को पर्यटक अपने वीर जवानों के स्मारकों पर अपनी भावांजली के श्रद्धासुमन अर्पित कर रहे थे। परिसर के बायीं तरफ इस युद्ध मे शहीद समस्त सैनिकों की नाम पट्टिका एवं सैनिकों के रेंक एवं नंबर लिखे हुए थे। अर्ध वृत्ताकार मे लगी इन वीर योद्धाओं की  पट्टिकाओं की दो लाइन के बीच फूलों और हरी घास की छोटी छोटी क्यारियों से सजाया गया था। इन पट्टिकाओं के पीछे बनी वो यादगार झांकी याद दिला रही थी वीर जवानों की जो झण्डा लिए विजयी मुद्रा मे खड़े थे। ये चित्र करोड़ो भारतीय के दिलों मे कारगिल विजयी के प्रतीक की  यादगार के रूप मे आज भी जीवंत है।

वीर जवान ज्योति के दाहिने तरफ इस युद्ध उपयोग हुए शस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुओं को सँजोया गया था जिसको देखने हेतु हमारे ग्रुप के पूर्व सैनिक सत्येन्द्र प्रसाद को सम्मान सहित आमंत्रित किया गया। मुख्य मार्ग के दोनों ओर बने बड़े बड़े आयताकार हरे हरे  घास के मैदान एवं फूलों की सुंदर सुंदर वाटिकायेँ बनाई गई थी। भव्य संगमरमर के फब्बारों के मध्य हमारे सेना के वीर शहीद सैनिकों और अधिकारियों की भव्य मूर्तियों को करीने से सजाया गया था। इन मूर्तियों मे स्व॰ कैपटिन विक्रम बत्रा, स्व॰ मेजर विवेक गुप्ता, लेफ़्टि॰ मनोज पांडे एवं अन्य योद्धाओं की मूर्तियाँ थी। इनके बीच ही होविट्जर तोप एवं अन्य तोपों के साथ युद्ध मे शामिल युद्धक विमान को भी प्रतीक के रूप मे शामिल किया गया था।

प्रवेश द्वार के एक ओर युद्ध स्मारिका एवं उनसे जुड़े यादगार उपहारों को पर्यटकों को विक्रय हेतु रखा गया था। जबकि दूसरी तरफ सेना के अधिकारियों के लिए अल्पाहार एवं प्रतीक्षालय बनाया गया था। दूरस्थ कोने मे पर्यटकों की सुविधा हेतु महिला एवं पुरुष प्रसाधन कक्ष की भी व्यवस्था  भी की गयी थी। पूरे परिसर मे भ्रमण के पश्चात एक बात जो सबसे अच्छी लगी कि पूरा परिसर एक दम साफ सुथरा रक्खा गया था। कही कोई भी गंदगी या कचरे का एक टुकड़ा भी दिखाई नहीं दिया। इस हेतु सेना के स्टाफ एवं कर्मचारी बधाई एवं सम्मान के पात्र है।

24 सितम्बर 2021 का दिन मेरी ज़िंदगी का एक अहम एवं महत्वपूर्ण दिन था जब हम अपने राष्ट्र तीर्थ "कारगिल युद्ध स्मारक" मे अपने बीर सैनिकों की शहादत के साक्षी बने, इस गर्व और अभिमान का अनुभव मुझे जीवनपर्यंत रहेगा।

सेना के बीर जवानों को नमन!

भारत माता की जय!!

विजय सहगल

  

       

        

शनिवार, 27 नवंबर 2021

चंद्रभान यादव

 

"चंद्रभान यादव"






क्या आप चन्द्र भान से बाकिफ है? शायद नहीं। परिचित तो मै भी नहीं था। पर उस दिन दिनांक 14 नवम्बर 2021 को जब अपने भोपाल प्रवास पर मै अपने मित्र श्री अश्वनी मिश्रा का स्कूटर लेकर बावड़ियाँ चौराहे से अपने घर की तरफ जा रहा था। सड़क से जाने वाले अपने सहयात्रियों के बीच पहली नज़र मे एक मोटरसाइकल को नज़रअंदाज़ कर मै आगे बढ़ गया, पर अचानक  मोटर साइकल के पीछे लगी छोटी सी ट्रॉली ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। मैंने आगे खड़े होकर एक  क्षण पुनः गौर से जा रही मोटर साइकल पर लगी लोहे की जाली से बनी ट्रॉली को देखा जिसने मुझे प्रभावित किया। उस पात्र के बारे मे  कुछ और अधिक जानने के पूर्व मेरे दिल मे आया क्यों ने कुछ सेकेंड्स का एक स्वाभिक विडियो उस व्यक्ति  का मोटरसाइकल से ट्रॉली को ले जाते हुए बनाया जाये! इस हेतु मैंने उस मोटर साइकल से आगे निकल मोबाइल से वीडियो बनाने हेतु पोजिशन ले खड़ा हो गया पर दुर्भाग्य!,  शायद पान के शौकीन उस मोटरसाइकल चालक ने बावड़ियाँ चौराहे से यू टर्न लेकर अपनी ट्रॉली एक पान की दुकान पर खड़ी कर दी और मै उस घटना का विडियो बनाने से वंचित बापस उस पान की दुकान पर उस मोटरसाइकल चालक के बारे मे जानने की उत्सुकता से उसके पास पहुँचा।बातचीत के दौरान उस युवा ने अपना नाम चंद्रभान यादव बताया। मैंने बड़ी जिज्ञासा और उत्कंठा पूर्वक उस मोटरसाइकल का निरीक्षण किया। एक सामान्य मोटरसाइकल को पीछे से  एक कीले के लीवर के माध्यम से लोहे की जाली से बनी पहिये की ट्रॉली से जोड़ा गया था। ट्रॉली मे तरीके से बनी अलमीरा मे बच्चों के लिये बने ऊनी वस्त्र एवं महिलाओं के दैनंदनी आवश्यकताओं की कुछ वस्तुओं को विक्रय हेतु रखा था। आज के इस दौर मे जब युवाओं मे उपलब्ध अवसरों के बावजूद हताशा निराशा के लक्षण दिखाई देते हों। तमाम युवा रोजगार के लिये संसाधनों की कमी के बहाने एवं शासन प्रशासन को कोसते नज़र आते हों, इन अभावों के बीच चन्द्र्भान यादव जैसे युवा एक दिशा देने वाला दिखाई दिया। जो रोजगार के नए नए साधन और माध्यमों के साथ अपनी जीविका उपार्जन कर रहा था।  

नाम की औपचारिकता के बाद जब मैंने चंद्र्भान से उसके व्यवसाय एवं उसकी इस विशेष ट्रॉली गाड़ी के बारे मे पूंछा तो उसने बताया कि पहले वह गाड़ी चलाता था तब उसने पंजाब मे किसानों द्वारा दूध की सप्लाइ हेतु इस तरह की गाड़ी देखी थी। अपने खुद के व्यवसाय के शुरू करने के लिए उसने पंजाब के आईडिया मे कुछ बदलाब के साथ इस ट्रॉली गाड़ी का उपयोग चलती फिरती दुकान के रूप मे किया। जब मैंने चंद्रभान से उसकी शैक्षिक योग्यता के बारे मे पूंछा तो मुझे लगा कि शायद मैंने उसको हीन भावना से ग्रसित कर दिया। मैंने उसका उत्साह वर्धन के आशय से कहा चंद्रभान तुमने वो कम किया है जिसे बड़े से बड़े इंजीन्यरिंग के छात्र नहीं कर सकते। तुम्हारी मेहनत और रोजगार करने की चाह प्रशंसनीय है। मैंने चंद्रभान की मोटर साइकल की कुछ फोटो उसकी ट्रॉली के साथ खींची। चद्र्भान ने ट्रॉली मे विनमय हेतु  रखे सामान से मुझे अवगत कराया।

श्री चंद्रभान के एक बात जिसने हमे और भी ज्यादा प्रभावित किया वो ये थी कि चंद्रभान भोपाल मे निर्माणाधीन इमारतों मे कार्यरत मजदूरों के मध्य ही अपना व्यापार करते है। उनका कहना था कि ये मजदूर शहर के बाज़ारों मे जा कर खरीद फरोख्त करने मे सक्षम नहीं। सर्दी के मौसम की शुरुआत हो चुकी है। उनकी ट्रॉली के पहुँचते ही मजदूर अपने लिए और अपने बच्चों के लिये ऊनी कपड़े क्रय करने पहुँच जाते है। जब कभी मजदूर कपड़ो की कीमत ज्यादा होने के कारण संकोञ्च करता है तो चंद्रभान अपने लाभ के हिस्से को कम कर मजदूर को वह कपड़ा कम कीमत पर भी बेच देते है और कभी कभी बिना लाभ के भी कपड़े मजदूर की मालीहालत और हैसियत देख बेच देते है। कपड़ो की कीमत कम करने की  ये नीति वह ग्राहक के रहन सहन और हैसियत देख कर ही करते है जिनमे मुख्यतः मजदूर ही होते है। अच्छी आर्थिक हैसियत के लोगो से वे तय लाभ के मार्जिन पर ही व्यापार करते है।

किसी गरीब मजदूर के प्रति उनकी हमदर्दी और सहानुभूति की  उनकी इस व्यावसायिक सोच की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है। एक ओर जहां पढे लिखे इंजीनियर, स्नातक और अन्य युवा रोजगार हेतु शिकवे शिकायत करते है वही  चंद्रभान जैसे कम पढे लिखे नौजवान बेरोजगारी को  अपने स्वयं के रोजगार के माध्यम से  अपनी नयी बाइक ट्रॉली के आविष्कार के साथ चुनौती स्वीकार कर अपना रोजगार सफलता पूर्वक चला रहे है तो उनके इस कार्य की तारीफ तो होनी ही चाहिये। जब मैंने पूंछा कि उनके रोजगार से उनके परिवार का जीवन यापन कैसा चल रहा है? तो चंद्रभान ने ईश्वर के प्रति आदर और सम्मान मे हाथ जोड़ कर धन्यवाद दिया। उन्होने बताया हमारी अवश्यकताओं की पूर्ति उनके इस व्यवसाय से हो जाती है। बच्चे स्कूल मे पढ़ने जाते है। नजदीक के गाँव मे ही छोटा सा मकान है और वे परिवार के साथ सुख पूर्वक सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर रहे है। अंबानी, अदानी जैसे धनाढ्य व्यक्ति को देख लगता है कि जीवन मे आर्थिक उपलब्धि प्राप्त करने की कोई सीमा नहीं पर संतुष्टि का जो स्तर  एवं सुख का जो अनुभव मैंने  चंद्रभान जैसे युवा के चेहरे पर देखा, शायद ही इन धनाढ्यों को नसीब होता होगा? इस युवा को देख  अत्यंत प्रसन्नता हुई, ईश्वर से उनके सुखी एवं स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करते हुए मैंने बावड़ियाँ चौराहे से अपने घर की ओर प्रस्थान किया।

विजय सहगल                         

सोमवार, 22 नवंबर 2021

रानी कमला पति रेल्वे स्टेशन

 

"रानी कमला पति रेल्वे स्टेशन"







आज मै भोपाल के हबीबगंज स्टेशन के नये नामांतरण आदिवासी रानी "रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन" करने पर रानी द्वारा  अपने सम्मान और स्वाभिमान के रक्षार्थ जलसमाधि लेने के शौर्य की चर्चा नहीं कर रहा अपितु उस दिन के आँखों देखे हाल का व्योरा लिख रहा हूँ।  मै अपने भोपाल स्थित फ्लैट को किराये पर देने के हिसाब से कुछ दिन के प्रवास पर भोपाल मे था। लक्ष्य पूर्ण न होने के कारण 15 नवम्बर 2021 को मुझे हबीबगंज, भोपाल से ग्वालियर यात्रा करनी थी। आरक्षण शताब्दी एक्सप्रेस से था। मै अपने भाग्य को साराह रहा था कि आज 15 नवम्बर को ही हबीबगंज रेल्वे स्टेशन का गौड़ आदिवासी रानी  "रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन" नामांतरण किये जाने  वाली इस अहम घटना का मै साक्षात गवाह होने का सौभाग्य बगैर किसी प्रयास के प्राप्त कर रहा हूँ। इस नामांतरण की महत्वपूर्ण घटना का श्री गणेश भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कर कमलों से होने जो जा रहा था। इस हेतु एक बड़ा कार्यक्रम स्टेशन के प्लैटफ़ार्म नंबर एक  पर रखा गया था, जिसे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करना था।

मुझे अंदेशा था कि सुरक्षा व्यवस्था के चाक-चौबन्द के चलते मुझे गाड़ी के छूटने के तय समय 3.15 दोपहर से कम से कम 2 घंटे पूर्व निकलना चाहिए। चूंकि हमारे घर आकृति ग्रीन सोसाइटी के गेट से ही भोपाल बस के रूट नंबर टीआर1 से शुरू होता है अतः बस आसानी और सहजता से उपलब्ध थी। अतिरिक्त सावधानी के तौर पर मै अपने घर के सोसाइटी से लगभग साढ़े बारह बजे लगभग 3 घंटा पूर्व निकला। पीएम की सुरक्षा व्यवस्था की दृष्टि से बस ने शिवाजी नगर के महावीर द्वार के नजदीक छोड़ दिया। वहाँ बने बैरिकेड पर उपस्थित पुलिस कर्मी को जब मैंने अपना यात्रा टिकिट दिखाया तो उसने कहा आपके पास टिकिट है तो आप पूर्व हबीबगंज रेल्वे स्टेशन अर्थात रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन जा सकते है, पर आपको पैदल ही स्टेशन जाना होगा। मै खुश था और सूटकेस मे लगे पहियों को खींचता हुआ बीजेपी कार्यालय होते हुए लगभग एक किमी दूर स्थित रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन की ओर चल पड़ा। मुख्य सड़क पर आते ही अगले पढ़ाव पर पुलिस अधिकारियों का रुख बदला नज़र आया और उन्होने स्टेशन के प्लेटफ़ार्म नंबर एक पर जाने देने से साफ  इंकार कर दिया कि यहाँ से किसी भी व्यक्ति को प्रवेश की इजाजत नहीं है। उन पुलिस अधिकारियों के समक्ष टिकिट और वरिष्ठ नागरिक होने की सभी दलीले व्यर्थ थी। उन पुलिस अधिकारियों ने प्लैटफ़ार्म नंबर 7 की ओर का रास्ता दिखाया जो सड़क के पार ही था। वहाँ खड़ा पुलिस कर्मचारी कुछ ज्यादा ही मुस्तैद था और उसने आगे बढ्ने की किसी भी अनुमति से इंकार कर दिया यहाँ तक कि मेरे आग्रह पर उसने मेरी बात डीएसपी महोदय से करा मुझे निरुत्तर कर दिया। मैंने वहाँ खड़े मीडिया कर्मियों से भी अपनी आपबीती सुनाई पर पर सत्ता शासन से प्राप्त सुखुपभोग ने उन्हे भी आम आदमियों को होने वाली असुविधा को देखने की रोशनी उनकी आँखों से छीन ली थी।   

अब मै भरी दोपहर की तेज धूप मे, तूफान मे फंसे समुद्री जहाज की तरह यहाँ वहाँ थपेड़े खा रहा था और चारों तरफ अपने कर्तव्य मे मुस्तैद भोपाल  पुलिस कर्मियों के बीच असहाय हो यहाँ वहाँ व्यर्थ प्रयास कर रहा था। झक मार कर जहां पर बस ने छोड़ा था वही पर बापस पैदल आने को मजबूर था। मुझे एक बार फिर माननीय शिवराज सिंह उर्फ मामा जी पर लिखे ब्लॉग "अंधेर नागरी चौपट मामा" की याद हो आई (https://sahgalvk.blogspot.com/2021/02/blog-post_23.html)।  

बमुश्किल आधा किमी के रास्ते मे पुलिस कर्मियों के बीच आपसी संवाद की कमी दुःखद थी जिसमे आम नागरिक दो पाटों के बीच पिसने को मजबूर था। हम प्रधानमंत्री की सुरक्षा-व्यवस्था का सम्मान करते  पर है शासन-प्रशासन को आम नागरिकों की भी न्यूनतम सुविधाओं का भी तो कम से कम ध्यान रखना चाहिए? जिसका आभाव पुलिस प्रशासन के अमानवीय व्यवहार से परिलक्षित हो रहा था। जिस पुलिस अधिकारी, कर्मचारी की जो मर्जी हुई उसने प्रधानमंत्री की सुरक्षा के नाम पर अपने आदेश को लागू कर दिया फिर आम नागरिक या वरिष्ठ नागरिक को कितना भी शारीरिक या मानसिक कष्ट क्यों न हो?

एक युवा छात्र अंकित दुबे की सहायता से जैसे तैसे हम अंबेडकर चौराहा बोर्ड ऑफिस पहुंचे जहां से एक ऑटो पकड़ हम रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन के पाँच नंबर प्लैटफ़ार्म पर पहुंचा  जहां पर जाने की अनुमति सामान्य यात्रियों को थी। छात्र अंकित के अनुरोध पर उनकी स्कूटी का नंबर हमने छुपा दिया।  चारों तरफ सफसफ़ाई की चाक-चौबन्द व्यवस्था थी। यहाँ पर भी एक बार पुनः  पुलिस अधिकारियों मे संवाद की कमी और अमानवीय व्यवहार की झलक दिखाई दी। प्रवेश द्वार पर राज्य पुलिस एवं रेल्वे पुलिस फोर्स के अधिकारी एवं कर्मी सुरक्षा मे तैनात थे, जिनमे अधिकतर व्हाट्सप-व्हाट्सप्प खेल रहे थे। प्रवेश द्वार पर स्टेशन के नाम बदलाव का कार्य संबन्धित रेल स्टाफ द्वारा किया जा रहा था। गेट पर स्थित सुरक्षा कर्मियों ने बताया कि आपकी ट्रेन के निश्चित समय 3.15 बजे से पंद्रह मिनिट पूर्व ही आपको प्लैटफ़ार्म पर जाने की अनुमति होगी तब तक आपको यही इंतजार करना होगा। पुलिस अधिकारियों के आदेश को शिरोधार्य करने के अलावा, खुले आसमान के नीचे तेज धूप मे इंतज़ार के सिवा कोई अन्य विकल्प तो था नहीं!! क्योंकि इस विश्व स्तरीय रेल्वे स्टेशन के पार्किंग स्थल पर कहीं  कोई शेड की व्यवस्था नहीं थी जिसके नीचे छुप धूप या पानी से बचा जा सके।

भला हो उन स्टेशन अधीक्षक महोदय का जो अपनी आधिकारिक यूनीफ़ोर्म मे उसी समय स्टेशन के बाहर आये जिस समय कुछ अन्य यात्री भी पीएम महोदय की सुरक्षा चक्रव्यूह से बचने के लिए घरों से 2 घंटे पूर्व स्टेशन पहुंचे थे। पुलिस ने उन्हे भी गाड़ी के छूटने के पंद्रह मिनिट पूर्व तक खुले आसमान मे इंतजार करने का हुक्म सुना दिया था। लेकिन स्टेशन अधीक्षक महोदय ने हस्तक्षेप कर कन्फ़र्म टिकिट होल्डर को प्लैटफ़ार्म पर जाने की अनुमति दे दी। अपनी आदत के मुताबिक मैंने शालीनता पूर्वक पुलिस अधिकारियों को उनके  आपसी संवाद के आभाव मे यात्रियों को होने वाली परेशानी की ओर ध्यानाकर्षित कराया पर शायद उनके लिये ये कोई नई बात नहीं थी उनके लिये ये आम आदमी की दुःख तकलीफ देखते रहना एक नित्य पृक्रिया थी।

अब तनिक इस विश्व प्रसिद्ध स्टेशन की स्थिति पर  दृष्टिपात कर ले। स्टेशन के दोनों ओर के प्रवेश द्वारों की बनावट जरूर आकर्षक तरीके से हवाई अड्डों की तरह थी पर हबीबगंज उर्फ रानी कमलापति स्टेशन के प्लैटफ़ार्म पूर्व की तरह है बड़े एवं साफ सुथरे थे। पहले इस स्टेशन पर एक प्लैटफ़ार्म से दूसरे पर जाने हेतु बने पुल पर सीढ़ियों की जगह लंबे  रेंप बनाए गए थे जिन पर यात्री बगैर किसी थकावट के आवागमन कर सकता था जिन्हे तोड़ कर अब सीढ़ियों के साथ स्वचालित सीढ़ियाँ अर्थात एस्कलेटर बनाये गए थे। बिजली या किसी तकनीकी खराबी के आभाव मे अब प्लैटफ़ार्म बदलने मे हम जैसे वरिष्ठ नागरिकों को दादा-नाना याद हो आयेंगे? हाँ एक विश्व स्तरीय अतरिक्त भूमिगत पैदल मार्ग का निर्माण भी प्लैटफ़ार्म को जोड़ने के लिये बनाया गया है जो रेल पटरियों के नीचे से यात्रियों को एक प्लैटफ़ार्म से दूसरे पर जाने की सुविधा प्रदान करता है। इस सामान्य क्षैतिज मार्ग पर बाएँ मुड़ कर आप प्लैटफ़ार्म नंबर एक पर जा सकते है एवं दाहिने मुड़ आप पाँच नंबर पर जा सकते थे।  इस तरह की सुविधा मैंने दशकों पूर्व कानपुर सेंट्रल रेल्वे स्टेशन पर देखी थी जो आज भी सुचारु रूप से जारी है सिवाय एक बदलाव के कि कानपुर मे इस सामान्य  क्षैतिज मार्ग को  लोग रात-विरात  इसे  मूत्रालय की तरह उपयोग करते है जो यहाँ अभी इस भूमिगत पैदल मार्ग मे देखने नहीं मिला। जो एक अन्य बदलाव था कि प्लैटफ़ार्म पर बना शेड सीमेंट की शीट की बजाय आधुनिक घुमावदार टीन शेड से बना था। जगह जगह टीवी स्क्रीन पर समय, प्लैटफ़ार्म नंबर, बोगी नंबर दर्शाते स्क्रीन लगे थे जिनमे खाली समय पर बंसल टीवी के विज्ञापन दिखाये जा रहे थे जिसे इस विश्व स्तरीय स्टेशन के रख रखाव का ठेका दिया गया था। मै अपनी भोपाल पदस्थपना के दौरान सैकड़ों बार इस स्टेशन पर आया या गया हूँ, पूर्व की भांति साफ सुथरे बड़े प्लैटफ़ार्म पर  प्रवेश और निकासी द्वार के अतिरिक्त रेल्वे स्टेशन पर ऐसा क्या विश्व स्तरीय बदलाब किया गया मुझे समझ नहीं आया। हाँ प्लैटफ़ार्म नंबर एक पर पार्किंग के बगल मे एक 7-8 मंजिल निर्माणरत बिल्डिंग जरूर नज़र आयी जिस पर  बंसल टीवी का बोर्ड लगा हुआ था (आखिरी चित्र) जो शायद विश्व स्तरीय रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन के  निजीकरण का परितोषिक रहा होगा।

विजय सहगल