रविवार, 19 दिसंबर 2021

अधूरा विजय दिवस

"अधूरा विजय दिवस"






अभी पिछले दिनों भारतीय सेना द्वारा विजय दिवस की स्वर्णिम जयंती मनाई गयी। पाकिस्तान की सेना को परास्त कर बांग्लादेश के  स्वतन्त्र अस्तित्व  पर 16 दिसम्बर 1971 हिंदुस्तान के स्वर्णिम इतिहास मे एक मील का पत्थर था, इस दिन भारतीय सैनिकों के शौर्य, साहस और वीरता को हमेशा याद किया जाएगा जब भारतीय सैनिकों ने अपनी बहदुरी और अदम्य साहस का प्रदर्शन कर पूर्वी पाकिस्तान को पाकिस्तान से अलग कर  एक नये देश "बंगला देश" के रूप मे स्थापित किया। भारतीय सैनिकों का इतिहास रहा है कि हथियारों की कमी एवं संसाधनों के अभाव के बावजूद अपने हौसलों और हिम्मत के बल पर दुश्मनों के दांत खट्टे करने मे सक्षम, समर्थ और निपुण रही है, जिसकी बानगी 1962 के भारत-चीन के बीच हुए युद्ध मे देश और दुनियाँ ने देखा था।

इसमे कोई भी शक नहीं है कि सन् 1971 तत्कालीन राजनैतिक नेतृत्व के दूरदृष्टि और साहस पूर्ण निर्णय ने इस युद्ध मे महत्वपूर्ण योगदान किया था जिसके विना उक्त ऐतिहासिक घटना संभव नहीं हो सकती थी। इसमे कोई विसंगति नहीं कि देश के स्वाभिमान और सम्मान के रक्षार्थ भारतीय सेना किसी भी बलिदान और आत्मोसर्ग से पीछे हटने वाली नहीं है। फिर चाहें वो 1962 का चीन से युद्ध हो या 1965, 1971 का पाकिस्तान से युद्ध हो या फिर 1999 मे पाकिस्तान द्वारा पोषित कारगिल पर उग्रवादी हमला। आज तो भारतीय सेना आधुनिकतम  हथियारों और तकनीकि से युक्त किसी भी चुनौती का सामना करने मे सक्षम है। जिसका जीता जागता उदाहरण 28-29 सितम्बर 2016 भारतीय सेना के वीर योद्धाओं ने पाकिस्तान के विरुद्ध सर्जिकल स्ट्राइक मे भारत पाक नियंत्रण रेखा को लांघ पाक अधिकृत कश्मीर मे आतंकवादियों के ट्रेनिंग कैंपों पर हमले कर उन्हे नष्ट किया और उन मे शामिल आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया। ऐसा ही कुछ दिनांक 26 फरवरी  2019 मे जब भारतीय सेना एवं वायु सेना  ने पाक अधिकृत कश्मीर के बालाकोट मे जेसे मोहम्मद  आतंकवादियों के प्रशिक्षण कैंप एवं उसके उद्गम स्थल पर न केवल हवाई हमले किये बल्कि उन्हे नेस्तनाबूद कर सैकड़ो आतंकवादियों का नरकारोहण कर  सीधे बहत्तर हूरों के पास भेज, दुनियाँ को आगाह किया कि भारत की सीमाओं पर अपनी बुरी नज़र डालने के परिणाम घातक होंगे।  सेना द्वारा इस तरह के साहस पूर्ण कदमों से न केवल सेना बल्कि  देश और देशवासियों का मनोबल और हौसला मजबूत होता है बल्कि दुनियाँ को ये संदेश भी जाता है कि भारत अपनी सरहदों की रक्षा करने मे पूर्णतः सक्षम है।

मुझे याद है 16 दिसम्बर 1971 को कुछ ऐसा ही मनोबल देशवासियों का जब बढ़ा था जब भारतीय सेना के तीनों अंगों अर्थात जल, थल एवं नभ सेना ने अपने संयुक्त पराक्रम से  पाकिस्तान के दो टुकड़े कर एक नये देश बंगला देश का उदय किया था। मै उस समय कक्षा सातवीं का छात्र था। पूर्वी पाकिस्तान सेना के प्रमुख एएके नियाज़ी ने 16 दिसम्बर 1971 को अपने व्यक्तिगत आर्म्स भारतीय सेना के जांबाज अधिकारी श्री जेएस अरोरा के समक्ष रख पाकिस्तान के लगभग एक लाख सैनिकों के साथ समर्पण किया था। उन दिनों नियाज़ी के समर्पण पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए तस्वीर समाचार पत्रों मे खूब प्रचारित प्रसारित हुई थी। दूरदर्शन उन दिनों नहीं था, उन दिनों समाचार पत्रों और विविध भारती पर हम लोग हर रोज  बंगला देश विजय के समाचार पढ़ा और सुना करते थे। दोपहर मे किसी समय आकाशवाणी से आत्म समर्पित कायर पाकिस्तानी सिपाहियों के खैरियत संदेश प्रसारित किये जाते थे जिन्हे पाकिस्तान मे उनके परिवार और रिश्तेदार सुनने को लालायित रहते। संदेश कुछ   इस तरह प्रसारित किए जाते थे, "मै जावेद मियां, लाहौर का रहने वाला हूँ, मेरा रेंक फलां-फलां है, मै यहाँ हिंदुस्तान मे खैरियत से हूँ, किसी भी तरह की कोई तकलीफ नहीं है। या मै आसिफ मोहम्मद सेना मे हवलदार हूँ, करांची का रहने वाला हूँ, अम्मी अब्बा किसी बात की फिक्र न करें मै यहाँ खैरियत से हूँ.........। उन दिनों पाकिस्तान के इन एक लाख समर्पित सैनिकों को अच्छे से अच्छा भोजन पानी दिया जाता था पाकिस्तानी सैनिकों के  मनोरंजनार्थ उनकी फरमाइश पर "पाकीजा" फिल्म का प्रदर्शन भी किया गया था।

दुनियाँ के इतिहास मे एक लाख पाकिस्तानी सैनिकों का युद्ध मे समर्पण अपने आप मे इकलौती घटना थी!! इन एक लाख आत्म समर्पित सैनिकों के साथ करोड़ो बंगलादेशी नागरिक शरणार्थी के रूप मे हमारे देश मे शरणागत थे। इन शरणार्थियों पर होने वाले व्यय को देश के समस्त नागरिक "शरणार्थी टैक्स" के रूप मे भुगतान करने को बाध्य थे। उन दिनों संचार और सूचना के आदान प्रदान का एक मात्र आम सुलभ और सस्ता माध्यम डाक तार विभाग ही था। चिट्ठियों का आदान प्रदान पोस्ट कार्ड, अंतेर्देशी एवं लिफाफे के माध्यम से होता था। बंगला देश विजय के बाद  भारत का हर नागरिक प्रत्येक  पोस्ट कार्ड, अंतेर्देशी या लिफाफे पर पाँच पैसे एवं रसीदी टिकिट पर 10 पैसे का शरणार्थी साहायता का बोझ वहन कर रहा था। जो उस समय काफी मायने रखता था। इन सब मुसीबतों और कष्टों के बावजूद भारत का हर नागरिक तत्कालीन राजनैतिक नेतृत्व के साथ खड़ा था।       

सेना के शौर्य और साहस के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व॰ इंद्रा गांधी की इस अभूतपूर्व कार्य हेतु जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है। निश्चित ही उक्त समय के राजनैतिक नेतृत्व का देश सदा ऋणी रहेगा।

लेकिन मेरा मानना है पाकिस्तान के दो टुकड़े से उपजे बंगला देश के उदय के साथ दिसम्बर 1971 के इस युद्ध मे पाकिस्तानी सेना के जिन लगभग एक लाख सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने समर्पण किया था, तत्कालीन राजनैतिक नेतृत्व को अपनी कूटनीतिक दबाव बना  कर  इस सुनहरे अवसर का अतरिक्त लाभ पाक अधिकृत कश्मीर को बापस लेने के रूप मे भी किया जा सकता था और 1947 मे दोहरायी  गयी इस भयंकर गलती मे सुधार किया जा सकता था। इस युद्ध के पश्चात बहुत से सेना अधिकारियों का मत था कि यदि तत्कालीन राजनैतिक नेतृत्व कुछ और साहस और हिम्मत दिखा युद्ध विराम न स्वीकार कर  कुछ और दिन युद्ध चलाता तो पाकिस्तान के चार टुकड़े किये जा सकते थे। हमारी सेनाएँ पाकिस्तान के लाहौर पर भी कब्जा करने मे सक्षम थी क्योंकि पाकिस्तानी सरकार एवं पाकिस्तानी सैनिक अपने एक लाख जवानों के युद्ध मे समर्पण से सकते मे थी। पाकिस्तानी सेना की  सारी बहादुरी  और हेकड़ी धरी की धरी रह गयी क्योंकि डरपोंक पाकिस्तानी सैनिक पूरी तरह से हतोत्साहित हो अपना मनोबल खो चुके थे और हालात ने उन्हे घुटनों के बल चलने को मजबूर कर दिया था। भारतीय सैनिकों के साहस और शौर्य और युद्ध रणनीति की इन परिस्थितियों मे पाकिस्तान सरकार को बड़ी आसानी से  अपनी शर्तों को मनवा सकती थी, बस थोड़ा और साहस, और हौसला, और पराक्रम  उस समय के राजनैतिक नेतृत्व को दिखाना था और इस तरह 1947 से चली आ रही कश्मीर समस्या का सदा सर्वदा के लिए अंत हो जाता। पता नहीं क्यों तत्कालीन सरकार इन  कूटनीतिक अवसरों   का उपयोग बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग करने के साथ, एक कदम और आगे जा कर पाक अधिकृत कश्मीर को भी पाकिस्तान के चंगुल से मुक्त कराने के अवसर से चूक गयी??

विजय सहगल                      


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