"पिछौरा" (कहानी)
"लक्ष्मी" बनाम मुंशी मणिशंकर हाजिर हो!! अदालत के अर्दली ने जैसे ही आवाज लगाई मऊवारी उर्फ लक्ष्मी डरी सहमी सी लोगो की नज़रों से बचती हुई अदालत के कमरे मे दाखिल हुई। उसे डर था कि कहीं कोई जानने वाला या रिश्तेदार उसे कचहरी मे देख न ले। जिस महिला ने ज़िंदगी मे कभी घर की देहरी न लांघी हो आज मजबूरन उसे भरी कचहरी की चौखट पर खड़े होना पड़ रहा था। यध्यपि मऊ वारी उर्फ लक्ष्मी के पति का नाम नारायण दास था फिर भी लक्ष्मी की कृपा उन पर न थी। सारी उम्र अभावों और कष्टों मे व्यतीत की बस एक बात की खुशी थी कि पूर्वजों ने सिर छुपाने हेतु गुजरबसर के लिए छत्त छोड़ रक्खी थी। पर कुछ ज्यादा की चाह ने इस जायदाद पर भी उसके देवर श्री मणिशंकर ने अपनी गिद्ध दृष्टि गड़ा रक्खी थी जो कचहरी मे मुंशी थे। लक्ष्मी जब से व्याह कर इस घर मे आयी थी अभावों के सिवा शायद ही कभी कोई सुख भोगा हो। संयुक्त परिवार मे देवर-देवरानी, नन्द, सास-ससुर सभी थे पर लक्ष्मी पर लक्ष्मी की कृपा न होने के कारण सारे रिश्ते होते हुए भी न के बराबर थे।
अचानक एक दिन एक पुलिस का आदमी घर की कुंडी
खटखटा कर अदालत का गैर जमानती वारंट ले आ धमका और लक्ष्मी उर्फ मऊ वारी को पूंछने
लगा। वो तो अच्छा था घर के और मर्दों ने पुलिस वाले से मुकदमे के संबंध मे
पूंछ-तांच्छ की तो पता चला कि मुंशी
मणिशंकर ने उनके ऊपर, पौर मे बने कमरे
मे जाते समय "छुरे से हमले का
प्रयास" और "मारपीट" के एक मामले मे मऊ वारी के विरुद्ध अदालत मे
मुकदमा कायम किया था। जिसकी सुनवाई मे पेश न होने के कारण अदालत ने उनके विरुद्ध
गैर जमानती वारंट पर गिरफ्तारी के आदेश दिये है। घटना मे पौर के जिस कमरे का
उल्लेख किया था वह वास्तव मे मऊ वारी के हिस्से मे ही था और जिसे बलपूर्वक मुंशी
मणि शंकर ने अपने कब्जे मे ले अपना ताला डाल दिया था और अपने भाई श्री नारायण दास
के परिवार को परेशान करने की नियत से एक झूंठा मुकदमा अपनी भौजाई के विरुद्ध कायम
करा दिया था। संयुक्त परिवार के घर मे अब तो कोहराम मच गया। बच्चे बडों का चिंतित
होना स्वाभाविक था मऊ वारी का डर और दहशत के मारे बुरा हाल हो गया। दरवाजे पर
पुलिस द्वारा गिरफ्तारी की सुन उनको गश्त आ गये और मूर्छित होकर वह जमीन पर गिर
पड़ी। आज से पूर्व घर मे क्या आस पड़ौस मे रह रहे कुटुंबियों मे कभी घर की औरतों को
कोर्ट कचहरी मे घसीटने की कभी कोई घटना सुनी या देखी नहीं गयी थी।
घर के लोगो ने मऊ वारी के घर पर न होने का बहाना और पुलिस की सेवा पानी कर
वारंट की मुसीबत से जैसे तैसे ले-देकर छुटकारा पाया पर उसी घर मे रह रहे मुंशी
मणिशंकर के चहरे पर कहीं कोई शिकन न थी मानों इस पूरी घटना से वह अनिभिज्ञ हों। इससे पूर्व मुकदमे के संबंध मे कभी भी कोई सूचना
अदालत से नहीं आयी थी। इस पूरे घटनाक्रम को देख सुनकर कोर्ट कचहरी मे मुंशी
मणिशंकर की पहुँच और प्रभाव का अंदाज़ सहज ही लगाया जा सकता था।
पिछले दो साल की तरह आज भी कचहरी मे पेशी थी। हर बार की तरह पेशी पर अपने नाम की पुकार अदालत मे सुनवाई के दिन का सुनते ही मऊ वारी के प्राण आफत मे पड़ जाते।
सुबह से ही मन मे डर, बेचैनी और
घबड़ाहट होने लगती। कभी कोर्ट कचहरी तो क्या घर परिवार के भी मर्दों के सामने वह
कभी खड़ी न हुई थी। पिछौरा ओढ़ के वह कचहरी के खुलने के पूर्व एक कौने मे खड़े हो एक
टक अर्दली की आवाज पर कान धरे रहती कहीं ऐसा न हो कि अपना नाम सुनने से चूक जाये
और जज साहब उसे सजा सुना जेल भेज दे। जेल जाने के इस अदृश्य भय के कारण पेशी वाले
दिन उसकी रात की नींद हराम और दिन का चैन
गायब हो जाता। अब तो ये हर पेशी वाले दिन का नित्य क्रम बन गया था कि मऊ वारी पेशी
वाले दिन पिछौरा ओढ़ कचहरी के लिये पैदल पैदल
प्रस्थान करती और सांझ ढले तक ही घर पहुँच पाती। घबड़ाहट और डर का ये आलम
रहता कि पेशी वाले दिन खाने के ग्रास को तो छोड़िए पानी की एक बूंद भी उसके गले को
नसीब न होती।
पुराने समय मे बुंदेलखंड मे प्रचलित परंपरा
मे महिलाएं अपने पारंपरिक परिधान के बाद एक पीछे ओढ़ने वाले वस्त्र को जिसे "पिछौरा" कहा जाता था। महिलाएं आवश्यक
रूप से घर के बाहर प्रस्थान के समय "पिछौरा" ओढ़ कर चलती थी जो प्रायः
सफ़ेद रंग की पृष्ठभूमि लिये होता था। पिछौरा महिला और उसके पारवारिक मान प्रतिष्ठा
का प्रतीक होता था। आज की पेशी पर मऊ वारी न जाने किस अदृश्य चिंता और डर से
ग्रसित थी। आज मुकदमे के फैसले का दिन जो था। जल्दीबाजी मे आज मऊ वारी अपना पिछौरा
भूल अदालत की ओर तेज कदमों से चल दी थी। मुकदमे के निर्णय के बारे मे तो मुंशी
मणिशंकर भी अच्छी तरह जानते थे लेकिन मुंशी जी का मकसद तो मुकदमे के फैंसले से इतर
अपनी माँ समान भाभी और उसके परिवार को
परेशान करना था जिसमे वह पिछले दो साल मे पूरी तरह कामयाब रहे थे पर मऊ वारी एक
साधारण परिवार की पृष्ठभूमि से आती थी सीधी-सादी,
सरल व्यक्तित्व की स्वाभिमानी महिला जो थी। इस दो साल मे उन्होने जो ज़लालत और
तिरस्कार अदलतों के चक्कर लगाते झेली थी वह उनके स्वभाव के विपरीत थी। कोई गैर इस
तरह का व्यवहार करता तो शायद नियति मान स्वीकार कर लेती पर अपने ही परिवार के भाई
समान रिश्तों को कलंकित करने की इस घटना ने उन्हे निराश किया था। इस अपमान और
शर्मिंदगी ने उन्हे अंदर ही अंदर तोड़ दिया था। आज मुकदमे के फैंसले ने एक बार उनको
पुनः हीनता और डर की भावना से ग्रसित जो किया था। उपर से आज पिछौरा न ओढ़ पाने की
भूल ने उन्हे कुछ अपसकुन और अनहोनी की चिंता से भी ग्रसित कर दिया था। कचहरी के
दरवाजे के एक कोने मे बैठ अपनी पुकार का इंतजार करने लगी।
अचानक अदालत के अर्दली ने आवाज लगाई लक्ष्मी
उर्फ मऊ वारी हाजिर हो!! अर्दली की आवाज ने मुकदमे के फैसले की कुशंका और डर ने
दिल मे बेचैनी जो बढा दी थी। घबड़ाहट और व्याकुलता के कारण मऊ वारी मूर्छित होकर
कोने मे एक ओर लुढ़क गयी। अदालत के दरवाजे पर हल्ला गुल्ला मच गया,
लोगो की भीड़-भाड़ इकट्ठी हो गयी। आनन फानन मे अदालत के दरवाजे पर किसी महिला के
बेहोश हो गिरने की घटना की सूचना जज साहब तक भी पहुंची। उन्होने पुलिस को
निर्देशित किया कि महिला के साथ आये व्यक्ति को सूचना और साथ ले चिकित्सा सेवा
हेतु हॉस्पिटल मे तुरंत भर्ती कराया जाय। मूर्छित पड़ी महिला के चारों ओर देखने वालों
का मजमा लग गया, उन तमाशवीन लोगो की भीड़
मे मुंशी मणिशंकर भी थे! पुलिस ने महिला
के रिश्तेदार को खोजने का प्रयास किया।
किसी के न मिल पाने के कारण महिला को लावारिस मान अस्पताल ले जाने की प्रक्रिया शुरू कर पुलिस,
महिला को अस्पताल ले कर चली गयी।
अदालत की कार्यवाही क्षणिक व्यवधान के
पश्चात दुःख और संताप के विना अनिर्लिप्त भाव के जारी रही। यहाँ जज साहब ने मऊ
वारी बनाम मुंशी मणिशंकर केस मे अपने निर्णय देते हुए प्रतिवादी महिला मऊ वारी को
बाइज्जत बरी कर दिया और वहाँ महिला मऊ वारी अस्पताल मे जीवन मरण के इस चक्र से सदा
सर्वदा के लिए मुक्त हो परलोकगमन कर गयी ..........। मऊ वारी की आत्मा क्लेश और
पीढ़ा की इस घड़ी मे मान प्रतिष्ठिता रूपी पिछौरा उसकी इस अंतिम घड़ी मे उसके साथ न
था।
विजय सहगल
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