शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

कारगिल युद्ध स्मारक

 

"कारगिल युद्ध स्मारक"










24 सितम्बर 2021 का दिन मेरी ज़िंदगी का एक अहम दिन था। इस स्थान पर जाने की तमन्ना मैंने मई 1999 मे की थी जब ऑपरेशन विजय मे भारत की बहादुर सेना ने अपने शौर्य और वीरता का प्रदर्शन कर पाकिस्तान सेना द्वारा पोषित 2700 से अधिक घुसपैठियों को छटी का दूध याद दिला "दोज़ख" की अंतिम यात्रा पर भेज दिया था। इस युद्ध मे 250 से अधिक पाकिस्तानी सैनिक चूहों की तरह दुम दबाकर युद्ध क्षेत्र से भाग खड़े हुए थे। उनकी नरकारोहण की ये यात्रा पाकिस्तान की कायरता, बुज़दिली और धोखा देने की नीति से सारी दुनियाँ को पुनः अवगत करा रही है। इस युद्ध मे हमारे देश के रणबांकुरे ने जिस बहदुरी का परिचय दे अपना बलिदान दिया था तब से मेरी दिली खवाहिश थी कि राष्ट्र के इन नवतीर्थ की यात्रा करूँ। उन दिनों टीवी, समाचार पत्र और रेडियो पर जब युद्ध मे हमारे वीर सैनिकों के साहस और शौर्य की घटनाओं के बारे मे देखता और सुनता था तो बड़ी इक्छा थी कि इस वीरभूमि का चरण वंदन कर सकूँ। आज वो दिन जो आया तो मै अपने भाग्य को सराहता हुआ कारगिल युद्ध स्मारक की उस  वीर भूमि की चरण वंदन से अपने को न रोक सका।

3 मई 1999 से 26 जुलाई 1999 तक चले 18 हज़ार फुट की ऊंचाई पर हुए इस युद्ध मे भारत के 527 वीर योद्धाओं ने अपने प्राणों का उत्सर्ग किया। इन बहादुर सेनानायकों की याद मे इस स्थान को भारतीय सेना ने  भव्य युद्ध स्मारक का रूप दे वीर सैनिकों की याद मे इसका निर्माण किया है जो आधुनिक भारत का एक नवीन और भव्य राष्ट्र-तीर्थ का स्थान ग्रहण कर चुका है। हर भारत वासी का ये राष्ट्र धर्म होना चाहिये कि ज़िंदगी मे कम से कम एक बार अपने देश के लिये इस स्थान पर शहीद वीर सैनिकों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने की इक्छा मन मे रखे और जीवनपर्यंत इस अभिलाषा को पूर्ण करने का प्रयास करता रहे।

कारगिल के भौगोलिक स्थिति के ज्ञान के बारे मे मुझे कुछ गलतफहमी हो गयी जिसका समाधान वहाँ पर यथार्थ देख कर ही हुआ। दरअसल टाइगर हिल, तोलोलिंग एवं अन्य पहाड़ी चोटियों से घिरे इस युद्ध मैदान को ही  मै कारगिल मानकर चल रहा था। पर 23 सितम्बर 2021 को जब हम दोपहर कारगिल पहुंचे तो ये अहसास हुआ कि ये  एक अच्छा खासा शहर था जो "सुरू" और "द्रास" नदियों के संगम पर स्थित लगभग 2 लाख से अधिक आबादी वाला शहर था। जो 1999 के कारगिल युद्ध मे सुर्खियों मे आने के बाद लेह लद्दाख के  एक बड़े  पर्यटक स्थल के रूप मे विकसित हो चुका है। बौद्ध स्तूपों, प्रकृति सौन्दर्य एवं खुमानी जैसे फलों की पैदावार के लिये मशहूर ये जिला  अन्य जिलों की तरह ही एक सामान्य व्यापारिक केंद्र और मध्यम वर्गीय जिला है। लेह-श्रीनगर राष्ट्रीय मार्ग पर स्थित  इस जिला मुख्यालय से कारगिल युद्ध स्मारक की दूरी 60 किमी है।   

प्रातः 9 बजे कारगिल से प्रस्थान के बाद जब हमारे दल के सदस्य कारगिल युद्ध स्मारक पहुंचे तो मानों वरसों की अभिलाषा आज पूरी हो गयी। श्रीनगर लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित स्मारक के  भव्य आकर्षक  प्रवेश द्वार पर  भारतीय नागरिकों/पर्यटकों के चेहरों पर स्मारक मे प्रवेश करने की उत्सुकता एवं उमंग स्पष्ट देखी जा सकती थी। प्रवेश द्वार से "ऑपरेशन विजय के स्तम्भ" एवं "वीर जवान ज्योति" तक के प्लेटफॉर्म को पक्की डम्मर सड़क से जोड़ा गया था। वीर जवान ज्योति की पृष्ठभूमि मे तिरंगे झंडे के साथ तीनों सेनाओं के आधिकारिक ध्वज भी खुले आसमान के नीचे लहरा रहा था। ये ही सड़क पूरे भव्य, आकर्षक एवं हरी-भरी घास से भरपूर मैदानों को दो भागो मे विभक्त करती है। ऊंचे ऊंचे पहाड़ों की घाटियों और युद्ध स्मारक के परिसर के मध्य हरे हरे वृक्ष, स्मारक की सुंदरता मे चार चाँद लगा रहे थे।

ये ऊंची गगनचुंबी चोटियाँ गवाह है उस कारगिल युद्ध मे वीरता दिखाने वाले भारतीय सैनिकों के शौर्य और साहस की जिनके कदमों ने शत्रु को चारों खाने चित्त कर अपनी विजय पताका को फहरा कर कारगिल की  इन चोटियों पर विजय प्राप्त की थी। राजस्थान के गुलाबी पत्थर से बने इस पूरे स्मारक को पर्यटक अपने वीर जवानों के स्मारकों पर अपनी भावांजली के श्रद्धासुमन अर्पित कर रहे थे। परिसर के बायीं तरफ इस युद्ध मे शहीद समस्त सैनिकों की नाम पट्टिका एवं सैनिकों के रेंक एवं नंबर लिखे हुए थे। अर्ध वृत्ताकार मे लगी इन वीर योद्धाओं की  पट्टिकाओं की दो लाइन के बीच फूलों और हरी घास की छोटी छोटी क्यारियों से सजाया गया था। इन पट्टिकाओं के पीछे बनी वो यादगार झांकी याद दिला रही थी वीर जवानों की जो झण्डा लिए विजयी मुद्रा मे खड़े थे। ये चित्र करोड़ो भारतीय के दिलों मे कारगिल विजयी के प्रतीक की  यादगार के रूप मे आज भी जीवंत है।

वीर जवान ज्योति के दाहिने तरफ इस युद्ध उपयोग हुए शस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुओं को सँजोया गया था जिसको देखने हेतु हमारे ग्रुप के पूर्व सैनिक सत्येन्द्र प्रसाद को सम्मान सहित आमंत्रित किया गया। मुख्य मार्ग के दोनों ओर बने बड़े बड़े आयताकार हरे हरे  घास के मैदान एवं फूलों की सुंदर सुंदर वाटिकायेँ बनाई गई थी। भव्य संगमरमर के फब्बारों के मध्य हमारे सेना के वीर शहीद सैनिकों और अधिकारियों की भव्य मूर्तियों को करीने से सजाया गया था। इन मूर्तियों मे स्व॰ कैपटिन विक्रम बत्रा, स्व॰ मेजर विवेक गुप्ता, लेफ़्टि॰ मनोज पांडे एवं अन्य योद्धाओं की मूर्तियाँ थी। इनके बीच ही होविट्जर तोप एवं अन्य तोपों के साथ युद्ध मे शामिल युद्धक विमान को भी प्रतीक के रूप मे शामिल किया गया था।

प्रवेश द्वार के एक ओर युद्ध स्मारिका एवं उनसे जुड़े यादगार उपहारों को पर्यटकों को विक्रय हेतु रखा गया था। जबकि दूसरी तरफ सेना के अधिकारियों के लिए अल्पाहार एवं प्रतीक्षालय बनाया गया था। दूरस्थ कोने मे पर्यटकों की सुविधा हेतु महिला एवं पुरुष प्रसाधन कक्ष की भी व्यवस्था  भी की गयी थी। पूरे परिसर मे भ्रमण के पश्चात एक बात जो सबसे अच्छी लगी कि पूरा परिसर एक दम साफ सुथरा रक्खा गया था। कही कोई भी गंदगी या कचरे का एक टुकड़ा भी दिखाई नहीं दिया। इस हेतु सेना के स्टाफ एवं कर्मचारी बधाई एवं सम्मान के पात्र है।

24 सितम्बर 2021 का दिन मेरी ज़िंदगी का एक अहम एवं महत्वपूर्ण दिन था जब हम अपने राष्ट्र तीर्थ "कारगिल युद्ध स्मारक" मे अपने बीर सैनिकों की शहादत के साक्षी बने, इस गर्व और अभिमान का अनुभव मुझे जीवनपर्यंत रहेगा।

सेना के बीर जवानों को नमन!

भारत माता की जय!!

विजय सहगल

  

       

        

कोई टिप्पणी नहीं: