सोमवार, 22 नवंबर 2021

रानी कमला पति रेल्वे स्टेशन

 

"रानी कमला पति रेल्वे स्टेशन"







आज मै भोपाल के हबीबगंज स्टेशन के नये नामांतरण आदिवासी रानी "रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन" करने पर रानी द्वारा  अपने सम्मान और स्वाभिमान के रक्षार्थ जलसमाधि लेने के शौर्य की चर्चा नहीं कर रहा अपितु उस दिन के आँखों देखे हाल का व्योरा लिख रहा हूँ।  मै अपने भोपाल स्थित फ्लैट को किराये पर देने के हिसाब से कुछ दिन के प्रवास पर भोपाल मे था। लक्ष्य पूर्ण न होने के कारण 15 नवम्बर 2021 को मुझे हबीबगंज, भोपाल से ग्वालियर यात्रा करनी थी। आरक्षण शताब्दी एक्सप्रेस से था। मै अपने भाग्य को साराह रहा था कि आज 15 नवम्बर को ही हबीबगंज रेल्वे स्टेशन का गौड़ आदिवासी रानी  "रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन" नामांतरण किये जाने  वाली इस अहम घटना का मै साक्षात गवाह होने का सौभाग्य बगैर किसी प्रयास के प्राप्त कर रहा हूँ। इस नामांतरण की महत्वपूर्ण घटना का श्री गणेश भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कर कमलों से होने जो जा रहा था। इस हेतु एक बड़ा कार्यक्रम स्टेशन के प्लैटफ़ार्म नंबर एक  पर रखा गया था, जिसे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करना था।

मुझे अंदेशा था कि सुरक्षा व्यवस्था के चाक-चौबन्द के चलते मुझे गाड़ी के छूटने के तय समय 3.15 दोपहर से कम से कम 2 घंटे पूर्व निकलना चाहिए। चूंकि हमारे घर आकृति ग्रीन सोसाइटी के गेट से ही भोपाल बस के रूट नंबर टीआर1 से शुरू होता है अतः बस आसानी और सहजता से उपलब्ध थी। अतिरिक्त सावधानी के तौर पर मै अपने घर के सोसाइटी से लगभग साढ़े बारह बजे लगभग 3 घंटा पूर्व निकला। पीएम की सुरक्षा व्यवस्था की दृष्टि से बस ने शिवाजी नगर के महावीर द्वार के नजदीक छोड़ दिया। वहाँ बने बैरिकेड पर उपस्थित पुलिस कर्मी को जब मैंने अपना यात्रा टिकिट दिखाया तो उसने कहा आपके पास टिकिट है तो आप पूर्व हबीबगंज रेल्वे स्टेशन अर्थात रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन जा सकते है, पर आपको पैदल ही स्टेशन जाना होगा। मै खुश था और सूटकेस मे लगे पहियों को खींचता हुआ बीजेपी कार्यालय होते हुए लगभग एक किमी दूर स्थित रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन की ओर चल पड़ा। मुख्य सड़क पर आते ही अगले पढ़ाव पर पुलिस अधिकारियों का रुख बदला नज़र आया और उन्होने स्टेशन के प्लेटफ़ार्म नंबर एक पर जाने देने से साफ  इंकार कर दिया कि यहाँ से किसी भी व्यक्ति को प्रवेश की इजाजत नहीं है। उन पुलिस अधिकारियों के समक्ष टिकिट और वरिष्ठ नागरिक होने की सभी दलीले व्यर्थ थी। उन पुलिस अधिकारियों ने प्लैटफ़ार्म नंबर 7 की ओर का रास्ता दिखाया जो सड़क के पार ही था। वहाँ खड़ा पुलिस कर्मचारी कुछ ज्यादा ही मुस्तैद था और उसने आगे बढ्ने की किसी भी अनुमति से इंकार कर दिया यहाँ तक कि मेरे आग्रह पर उसने मेरी बात डीएसपी महोदय से करा मुझे निरुत्तर कर दिया। मैंने वहाँ खड़े मीडिया कर्मियों से भी अपनी आपबीती सुनाई पर पर सत्ता शासन से प्राप्त सुखुपभोग ने उन्हे भी आम आदमियों को होने वाली असुविधा को देखने की रोशनी उनकी आँखों से छीन ली थी।   

अब मै भरी दोपहर की तेज धूप मे, तूफान मे फंसे समुद्री जहाज की तरह यहाँ वहाँ थपेड़े खा रहा था और चारों तरफ अपने कर्तव्य मे मुस्तैद भोपाल  पुलिस कर्मियों के बीच असहाय हो यहाँ वहाँ व्यर्थ प्रयास कर रहा था। झक मार कर जहां पर बस ने छोड़ा था वही पर बापस पैदल आने को मजबूर था। मुझे एक बार फिर माननीय शिवराज सिंह उर्फ मामा जी पर लिखे ब्लॉग "अंधेर नागरी चौपट मामा" की याद हो आई (https://sahgalvk.blogspot.com/2021/02/blog-post_23.html)।  

बमुश्किल आधा किमी के रास्ते मे पुलिस कर्मियों के बीच आपसी संवाद की कमी दुःखद थी जिसमे आम नागरिक दो पाटों के बीच पिसने को मजबूर था। हम प्रधानमंत्री की सुरक्षा-व्यवस्था का सम्मान करते  पर है शासन-प्रशासन को आम नागरिकों की भी न्यूनतम सुविधाओं का भी तो कम से कम ध्यान रखना चाहिए? जिसका आभाव पुलिस प्रशासन के अमानवीय व्यवहार से परिलक्षित हो रहा था। जिस पुलिस अधिकारी, कर्मचारी की जो मर्जी हुई उसने प्रधानमंत्री की सुरक्षा के नाम पर अपने आदेश को लागू कर दिया फिर आम नागरिक या वरिष्ठ नागरिक को कितना भी शारीरिक या मानसिक कष्ट क्यों न हो?

एक युवा छात्र अंकित दुबे की सहायता से जैसे तैसे हम अंबेडकर चौराहा बोर्ड ऑफिस पहुंचे जहां से एक ऑटो पकड़ हम रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन के पाँच नंबर प्लैटफ़ार्म पर पहुंचा  जहां पर जाने की अनुमति सामान्य यात्रियों को थी। छात्र अंकित के अनुरोध पर उनकी स्कूटी का नंबर हमने छुपा दिया।  चारों तरफ सफसफ़ाई की चाक-चौबन्द व्यवस्था थी। यहाँ पर भी एक बार पुनः  पुलिस अधिकारियों मे संवाद की कमी और अमानवीय व्यवहार की झलक दिखाई दी। प्रवेश द्वार पर राज्य पुलिस एवं रेल्वे पुलिस फोर्स के अधिकारी एवं कर्मी सुरक्षा मे तैनात थे, जिनमे अधिकतर व्हाट्सप-व्हाट्सप्प खेल रहे थे। प्रवेश द्वार पर स्टेशन के नाम बदलाव का कार्य संबन्धित रेल स्टाफ द्वारा किया जा रहा था। गेट पर स्थित सुरक्षा कर्मियों ने बताया कि आपकी ट्रेन के निश्चित समय 3.15 बजे से पंद्रह मिनिट पूर्व ही आपको प्लैटफ़ार्म पर जाने की अनुमति होगी तब तक आपको यही इंतजार करना होगा। पुलिस अधिकारियों के आदेश को शिरोधार्य करने के अलावा, खुले आसमान के नीचे तेज धूप मे इंतज़ार के सिवा कोई अन्य विकल्प तो था नहीं!! क्योंकि इस विश्व स्तरीय रेल्वे स्टेशन के पार्किंग स्थल पर कहीं  कोई शेड की व्यवस्था नहीं थी जिसके नीचे छुप धूप या पानी से बचा जा सके।

भला हो उन स्टेशन अधीक्षक महोदय का जो अपनी आधिकारिक यूनीफ़ोर्म मे उसी समय स्टेशन के बाहर आये जिस समय कुछ अन्य यात्री भी पीएम महोदय की सुरक्षा चक्रव्यूह से बचने के लिए घरों से 2 घंटे पूर्व स्टेशन पहुंचे थे। पुलिस ने उन्हे भी गाड़ी के छूटने के पंद्रह मिनिट पूर्व तक खुले आसमान मे इंतजार करने का हुक्म सुना दिया था। लेकिन स्टेशन अधीक्षक महोदय ने हस्तक्षेप कर कन्फ़र्म टिकिट होल्डर को प्लैटफ़ार्म पर जाने की अनुमति दे दी। अपनी आदत के मुताबिक मैंने शालीनता पूर्वक पुलिस अधिकारियों को उनके  आपसी संवाद के आभाव मे यात्रियों को होने वाली परेशानी की ओर ध्यानाकर्षित कराया पर शायद उनके लिये ये कोई नई बात नहीं थी उनके लिये ये आम आदमी की दुःख तकलीफ देखते रहना एक नित्य पृक्रिया थी।

अब तनिक इस विश्व प्रसिद्ध स्टेशन की स्थिति पर  दृष्टिपात कर ले। स्टेशन के दोनों ओर के प्रवेश द्वारों की बनावट जरूर आकर्षक तरीके से हवाई अड्डों की तरह थी पर हबीबगंज उर्फ रानी कमलापति स्टेशन के प्लैटफ़ार्म पूर्व की तरह है बड़े एवं साफ सुथरे थे। पहले इस स्टेशन पर एक प्लैटफ़ार्म से दूसरे पर जाने हेतु बने पुल पर सीढ़ियों की जगह लंबे  रेंप बनाए गए थे जिन पर यात्री बगैर किसी थकावट के आवागमन कर सकता था जिन्हे तोड़ कर अब सीढ़ियों के साथ स्वचालित सीढ़ियाँ अर्थात एस्कलेटर बनाये गए थे। बिजली या किसी तकनीकी खराबी के आभाव मे अब प्लैटफ़ार्म बदलने मे हम जैसे वरिष्ठ नागरिकों को दादा-नाना याद हो आयेंगे? हाँ एक विश्व स्तरीय अतरिक्त भूमिगत पैदल मार्ग का निर्माण भी प्लैटफ़ार्म को जोड़ने के लिये बनाया गया है जो रेल पटरियों के नीचे से यात्रियों को एक प्लैटफ़ार्म से दूसरे पर जाने की सुविधा प्रदान करता है। इस सामान्य क्षैतिज मार्ग पर बाएँ मुड़ कर आप प्लैटफ़ार्म नंबर एक पर जा सकते है एवं दाहिने मुड़ आप पाँच नंबर पर जा सकते थे।  इस तरह की सुविधा मैंने दशकों पूर्व कानपुर सेंट्रल रेल्वे स्टेशन पर देखी थी जो आज भी सुचारु रूप से जारी है सिवाय एक बदलाव के कि कानपुर मे इस सामान्य  क्षैतिज मार्ग को  लोग रात-विरात  इसे  मूत्रालय की तरह उपयोग करते है जो यहाँ अभी इस भूमिगत पैदल मार्ग मे देखने नहीं मिला। जो एक अन्य बदलाव था कि प्लैटफ़ार्म पर बना शेड सीमेंट की शीट की बजाय आधुनिक घुमावदार टीन शेड से बना था। जगह जगह टीवी स्क्रीन पर समय, प्लैटफ़ार्म नंबर, बोगी नंबर दर्शाते स्क्रीन लगे थे जिनमे खाली समय पर बंसल टीवी के विज्ञापन दिखाये जा रहे थे जिसे इस विश्व स्तरीय स्टेशन के रख रखाव का ठेका दिया गया था। मै अपनी भोपाल पदस्थपना के दौरान सैकड़ों बार इस स्टेशन पर आया या गया हूँ, पूर्व की भांति साफ सुथरे बड़े प्लैटफ़ार्म पर  प्रवेश और निकासी द्वार के अतिरिक्त रेल्वे स्टेशन पर ऐसा क्या विश्व स्तरीय बदलाब किया गया मुझे समझ नहीं आया। हाँ प्लैटफ़ार्म नंबर एक पर पार्किंग के बगल मे एक 7-8 मंजिल निर्माणरत बिल्डिंग जरूर नज़र आयी जिस पर  बंसल टीवी का बोर्ड लगा हुआ था (आखिरी चित्र) जो शायद विश्व स्तरीय रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन के  निजीकरण का परितोषिक रहा होगा।

विजय सहगल                          

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