"ठेकेदार की मन मानी"
आपके पढे लिखे होने का तब कोई औचित्य नहीं रह जाता जब एक अनपढ़ और गंवार, निर्लज्ज व्यक्ति अपने बेहूदा व्यवहार और आधारहीन कुतर्कों से आपको चुनौती दे। तब उस हठी और धूर्त व्यक्ति को शालीन तरीके से प्रचलित विधि और नियमों का ज्ञान देना आवश्यक हो जाता है।
ऐसा ही कुछ मेरे साथ
दिनांक 06.12.2021 को रेल्वे स्टेशन ग्वालियर मे घटित हुआ। जब मुझे ग्वालियर रेल्वे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 1
की कार पार्किंग के ठेकेदार के
कर्मचारियों की गुंडागर्दी और मनमानी से
रु-ब-रु होना पड़ा।
आज जब मै प्रातः लगभग 8.50 बजे माता-पिता को
शताब्दी एक्सप्रेस पर छोड़ने आया था,
मैंने अपनी कार MP-07/xx-8150 प्लेटफॉर्म
संख्या 1 की पार्किंग मे पार्क की जिसका टिकिट क्रमांक 12155 मुझे दिया गया (फोटो
संलग्न) जिस पर कार पार्किंग शुल्क की राशि या नियमों का कोई उल्लेख नहीं था। शताब्दी के प्रस्थान के बाद जब मै
9.40 बजे लगभग अपनी कार लेने के लिए पहुंचा तो कार पार्किंग पर उपस्थित ठेकेदार के
कर्मचारियों ने पार्किंग शुल्क के रूप मे
रुपए 30/- की मांग की जिसका मैंने भुगतान कर दिया। मेरा उस व्यक्ति से आग्रह था कि आपने कार पार्किंग
शुल्क के रेट का कोई इश्तहार या सूचना कहीं नहीं लगा रक्खी है जिसको आपको
प्रदर्शित करना चाहिये ताकि शुल्क देने मे पारदर्शिता हो और मुझे भी संतुष्टि हो
कि मुझसे सही शुल्क लिया गया है। संबन्धित कर्मचारी ने अनाकानी करते हुए टालामटोली
का रुख अख़्तियार कर बेरुखी का व्यवहार किया। जब मैंने उक्त तीस रुपए के एवज मे
उक्त टिकिट या बिल देने को कहा तो उसके व्यवहार मे आक्रामक रुख रखते हुए कहा कि
रेल्वे का ये ही नियम है कि कार का टिकिट हमारे ही पास रहेगा और कोई बिल नहीं दिया
जायगा।
जब मैंने इस संबंध मे मामले को स्टेशन अधीक्षक के समक्ष ले जाने और शिकायत करने की धमकी दी तो दोनों कर्मियों का आक्रामक रुख रहा और बड़े बेरुखी और अक्खड़ पन से कहा, "कुछ नहीं होगा आप खुद 2 घंटे बाद लौट के यही आएंगे, अधिकारी हमारा कुछ नहीं कर सकते"। एक अनपढ़ और निर्लज्ज व्यक्ति जब ऐसा व्यवहार करे, तो अपने पढे लिखे होने पर जिस आत्मग्लानि और हीन भावना का सामना करना पड़े उसकी कल्पना ही की जा सकती है? उस कर्मचारी के फूहड़ पने व्यवहार पर सिर्फ मन मसोस कर रह जाना पड़ा? कुछ ऐसी ही परिस्थिति का सामना मुझे उस दिन करना पड़ा।
स्टेशन
पर श्री तिवारी, उप कमर्शियल मैनेजर से
जब इस संबंध मे शिकायत का निवेदन किया तो उक्त अधिकारी का रुख सकारात्मक था।
उन्होने कार पार्किंग ठेकेदार श्री जय भान के संज्ञान इस घटना को ला शिकायत फॉर्म भरने मे हमारी
समुचित सहायता की। मैंने शिकायत क्रमांक
128097 के माध्यम से संक्षिप्त शिकायत उनके समक्ष दर्ज कराई। बाद मे हमे ज्ञात हुआ कि पार्किंग के ठेकेदार
द्वारा जान बूझ कर वाहन शुल्क की दरों
के सूचना बोर्ड को न लगाने के कारण कार पार्किंग के लिये निर्धारित शुल्क
रुपए 25/- के विरुद्ध 30/- रूपये बसूल किये जा रहे थे। ये
तो अच्छा रहा प्लेटफॉर्म टिकिट गेट पर जमा नहीं हुआ था अन्यथा प्लेटफॉर्म टिकिट
क्रमांक 75899343 के आभाव मे पार्किंग व्यवस्था की शिकायत करना असंभव हो जाता,
क्योंकि शिकायत के लिये वैधानिक टिकिट आवश्यक है।
मैंने अपने साथ घटित उक्त घटना की शिकायत को ट्वीट और मेल के माध्यम से रेल बोर्ड के चेयरमेन, महाप्रबंधक, मण्डल रेल प्रबन्धक जैसे उच्च अधिकारियों एवं "रेल मदद" की साइट पर की जिस पर त्वरित कार्यवाही होती तो प्रतीत हुई पर कामचोर अधिकारियों द्वारा दी गयी जानकारी महज खनपूर्ति और लीपा पोती ही नज़र आयी जब झाँसी से रेल विभाग के एक अधिकारी श्री मनोज एवं ग्वालियर के मुख्य वाणिज्य प्रबन्धक श्री दिनेश का दिनांक 7 दिसम्बर को सायंकाल फोन आया और घटना पर अफसोस एवं खेद प्रकट करते हुए सूचित किया कि ठेकेदार के उस कर्मचारी को सेवा से हटा दिया गया है मानो वह दिहाड़ी मजदूर सरकारी पे रोल पर पदासीन कोई स्थायी कर्मचारी हो? और इस तरह इन कर्तव्यनिष्ठ एवं सेवाभावि अधिकारियों ने दुनियाँ की तीव्रतम कार्यवाही कर दस मिनिट के अंदर उपभोक्ता का तिरिस्कार करते एवं ठेकेदार की मदद करके "रेल मदद" ने सरकारी ढर्रे के अनुरूप शिकायत को त्वरित कार्यवाही कर बंद कर दिया!! ठेकेदार या रेल विभाग के किसी कर्मचारी का कोई बाल भी बांका न होना इस बात का सबूत है और ये दर्शाता है कि राग दरबारी अब भी बदस्तूर जारी है। कोई बड़ी बात नहीं कि इन सब आपसी मिलीभगत मे मण्डल रेल प्रबन्धक तक के अधिकारी कर्मचारी शामिल हों।
जब मैंने इन दोनों अधिकारी महोदय को कहा कि आप स्वयं से या खुफिया तौर पर औचक निरक्षण के माध्यम से कार पार्किंग के क्रियाकलापों की जांच क्यों नहीं करते कि व्यवस्था कैसी चल रही है? तो उनका जबाब सुन बड़ा आश्चर्य हुआ कि "जैसे ही आप की शिकायत आयी हम लोगो ने त्वरित कार्यवाही की"। तब मेरा कहना था कि यदि शिकायत न होती तो इसका मतलब आपने ये मान लिया कि व्यवस्था मे सब कुछ ठीक ठाक है? इन निम्न अधिकारियों ने आशानुरूप लीपापोती कर कार्यवाही समाप्त कर दी पर देंखे महाप्रबंधक इलाहाबाद, मण्डल रेल प्रबन्धक झाँसी एवं अन्य उच्चाधिकारी इस संबंध मे क्या कार्यवाही करते है?
हमारे नीतिनियंताओं और सरकारों को लगता था कि साइकल स्टैंड या अन्य संस्थानों का निजीकरण होने से आम जनता को अच्छी और उत्तम सेवाओं के साथ सरकारी भ्रष्टाचार और लूट खसूट से छुटकारा मिलेगा, लेकिन ये देश का दुर्भाग्य रहा कि न तो निजिकरण ने और न ही राष्ट्रीकरण से आम जनता को इस भ्रष्ट, लूट-खसूट व्यवस्था से छुटकारा मिल सका, सेवा तो कहाँ मिलनी थी? क्योंकि हमारी दो सौ साल की गुलामी ने हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था की रगों मे कूट कूट कर बेईमानी और भ्रष्टाचार का लहू भर दिया है कि जिसको जहां मौका मिलता है बेईमानी या भ्रष्टाचार करने मे नहीं चूकता फिर चाहें वो निजी संस्थान हो या सरकारी? भगवान जाने भ्रष्टाचार रूपी इस दानव से देश और आम जनता को कब और कैसे छुटकारा मिलेगा?
मेरा मानना है कि भारत मे एक साधारण व्यक्ति का इस भ्रष्ट और संगठित लूट व्यवस्था मे जीवन बहुत कठिन है जिसे मै बचपन से देखते, सुनते और भोगते मे अनुभव किया है। या तो आप उस भ्रष्ट व्यवस्था के बहाव की मुख्य धारा मे बहते हुए उसको स्वीकार कर आगे बढ़ते रहे या उनकी अनाधिकृत नियमों एवं क्रियाकलापों का विरोध कर उनसे संघर्ष के लिये तत्पर रहे। लेकिन जब आप विरोध का रास्ता चुनते है तो आप को कदम कदम पर हताशा, निराशा और हतोत्साहित करने के प्रयास किये जाते है। इस भ्रष्ट व्यवस्था की जड़े इतनी गहरी है कि आम लोगो की जागरूकता के आभाव मे इस व्यूह को भेदना कठिन तो है पर असंभव नहीं? पर इससे लड़ने और लोहा लेने के लिये आपको धैर्य, सहनशीलता के साथ अनंत अक्षय ऊर्जा का भंडारण अपने पास रखना होगा। लेकिन ये देख दुःख और क्षोभ होता है कि जब उच्च शिक्षित व्यक्ति को ऐसा सब झेलना और भुगतना पड़ता है तो तनिक कल्पना करें कि इस देश के अधिकांश अशिक्षितों और समाज के निर्धन और दबे कुचले वर्ग के व्यक्तियों के साथ क्या और कैसा व्यवहार होता होगा?
विजय सहगल
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