"मुख्य
मंत्री केजरीवाल की नज़रबंदी"
कल टीवी पर 08 दिसम्बर के टीवी मीडिया और आज 09 दिसम्बर के समाचार पत्रों की उस न्यूज़ ने लोगो को चौंका
दिया जिसमे कल के विपक्षी राजनैतिक दलों द्वारा किसानों के समर्थन
मे बुलाये गये अखिल भारतीय बंद मे शामिल
होने के पहले दिल्ली के मुख्य मंत्री
माननीय अनिल केजरीवाल को दिल्ली पुलिस ने
घर मे नज़रबंद कर उन्हे दिल्ली के सिंधु बार्डर पर जाने से रोक दिया। खबर आश्चर्य चकित करने वाली थी। किसी साधारण सड़क छाप आदमी को तो पुलिस कहीं भी
कभी भी नजरबंद क्या जेल बंद कर सकती है,
पर कैसे एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था मे देश की राजधानी दिल्ली के मुख्यमंत्री को दिन
दहाड़े नज़रबंद किया जा सकता है? खबर हैरत और चौंकाने
वाली थी। विरोधी दलों ने संयुक्त रूप से बंद का आवाहन के कारण विपक्षी राजनैतिक दल
भी एकजुट थे, लेकिन केजरीवाल जी की
नजरबंदी पर उतनी कड़ी प्रितिक्रिया किसानों सहित अन्य विरोधी दलों मे नहीं दिखी। इसका मुख्य कारण श्री
केजरीवाल की सभी दलों और आम जनों मे विश्वसनीयता की कमी दिखाती है,
क्योंकि श्री केजरीवाल की राजनैतिक
बुनियाद ही श्री अन्ना हज़ारे के लोकपाल की मांग के आंदोलन मे उनके
मौकापरस्ती के रूप मे लोग पहले ही देख चुके थे। यही कारण है उनके आवाहन या सनसनी खेज
वक्तव्यों और मांगों को कोई गंभीरता से
नहीं लेता।
केजरीवाल जी के नजरबंदी की न्यूज़ पर,
समाचार पत्रों मे मुख्यमंत्री के ब्यान सहित सभी संबन्धित दलों और पुलिस
महकमे ने अपने अपने पक्षों को प्रस्तुत
किया। "आप पार्टी" ने जहां इसे बंद की सफलता के कारण केंद्र सरकार का "डर"
बता मुख्यमंत्री के नजरबंदी के इस कृत को आलोकतांत्रिक कदम बताया। इसके विपरीत बीजेपी ने केजरीवाल के "भारत
बंद की नकामयाबी" से उपजी निराशा के कारण,
"हाउस अरैस्ट" को "हाउस रेस्ट" ड्रामा बताया। स्वाभाविक था
पुलिस ने भी इस संबंध मे नज़रबंदी को असत्य
कह पल्ला झाड़ लिया। फिर सवाल उठता है कि एक मुख्य मंत्री को इस तरह घर मे नजरबंदी
की वास्तविकता क्या थी? क्या नजरबंदी का
सच आम जनता के समक्ष नहीं आना चाहिए?
क्या लोंकतांत्रिक व्यवस्था मे दिल्ली प्रदेश के मुख्यमंत्री को कोई पुलिस अफसर इस
तरह मनमाने एवं गैरकानूनी तरीके से लोकतन्त्र का "बलात हरण" कर नज़रबंद
कर सकता है?? क्या इस "हाउस
अरैस्ट" या "हाउस रेस्ट" की वास्तविकता की जांच नहीं होनी चाहिये?
बड़ा विचारणीय प्रश्न है?
सवाल उठता है कि यदि दिल्ली पुलिस ने
नजरबंदी के कोई लिखित आदेश दिये थे तो माननीय केजरीवाल जी को उन आदेशों की "प्रति"
को जनता के समक्ष रखना चाहिये?
लेकिन श्री केजरीवाल ने ऐसा कोई आदेश
प्रस्तुत नहीं किया। इसका तात्पर्य क्या ये माना जाये कि पुलिस ने तानाशाही से बल पूर्वक
मौखिक आदेश के फलस्वरूप केजरीवाल जी को घर मे नजरबंद कर दिया?
तब प्रति प्रश्न ये है कि श्री केजरीवाल ने पुलिस के उस मौखिक आदेश का विरोध क्यों
नहीं किया? क्या उन्हे स्वतंत्र
रूप से किसान आंदोलन मे भाग लेने जाने के लिये घर से बाहर निकलने के प्रयास नहीं करने
चाहिये थे। यदि इस प्रयास मे पुलिस ने
किसी भी तरह का नैतिक, अनैतिक बल
प्रयोग किया था या मौखिक आदेशात्मक वक्तव्य के तहत नजरबंद किया था तो ये घटना मुख्यमंत्री
के आवास पर लगे सीसीटीवी/खुफिया टीवी पर रिकॉर्ड नहीं हुई होगी?
पुलिस की इस निषधात्मक कार्यवाही का विडियो/ऑडियो उन्होने क्यों नहीं बनाया?
आपको याद होगा रिपब्लिक टीवी के श्री अर्णव गोस्वामी को जब महाराष्ट्र पुलिस
गिरफ्तार करने उनके निजी आवास मे पहुंची थी तो उनके घर सिर्फ उनकी पत्नी और बेटा
था। अर्णव गोस्वामी एवं महाराष्ट्र पुलिस के एक एक कारनामे एवं एक एक पल की घंटों
की विडियो रिकॉर्डिंग उनकी पत्नी और बेटे ने बनाई थी। उस वीडियो को देश के करोडों
लोगो ने देखा था। हम अर्णव के प्रति सही-गलत,
आसक्ति-विरक्ति, अनुराग-द्वेष से परे
सिर्फ इतना कहना चाहते है इन विडियो के कारण वे महाराष्ट्र पुलिस के अन्याय का न केवल विरोध कर
पाये बल्कि उस अन्याय को सबूत के तौर पर न्यायालय मे प्रस्तुत कर महाराष्ट्र
पुलिस की नकारात्मक छवि को पूरे देश मे मे दिखा तूफान खड़ा करने मे भी कामयाब रहे?
अर्णव गोस्वामी ने देश की किसी विधायिका
या वैधानिक पद पर रहे बिना साधारण नागरिक के रूप मे महाराष्ट्र पुलिस के अन्याय को मौखिक/भौतिक
विरोध करने मे कामयाब रहे और उनके परिवार ने इसका विडियो भी बनाया तब माननीय
केजरीवाल तो लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी गई दिल्ली की दो करोड़ जनता के प्रतिनिधि थे,
उन्होने घर मे नजरबंदी के विरुद्ध दिल्ली
पुलिस के मौखिक या बलात प्रयोग का ऑडियो/विडियो क्यों नहीं बनाया?
अर्णव गोस्वामी या उनके परिवार की तरह
क्यों नहीं उनके परिवार के सदस्यों या सेवकों ने किसान आंदोलन मे जाने से रोकने का
ऑडियो/विडियो नहीं बनाया? तकनीकि आज इतनी प्रभावी
एवं आसान सुलभ हो गई कि एक साधारण मनुष्य भी
किसी भी घटना का ऑडियो/विडियो बना सकता है तो माननीय केजरीवाल इसमे कैसे चूक गये??
दिल्ली पुलिस के रोके जाने/नजरबंदी के बावजूद
घर से बाहर जाने पर दिल्ली पुलिस उनको
कैसे बलपूर्वक रोक सकती थी? हो सकता है उनके
विरुद्ध हिंसा या बल प्रयोग करती जो सीसीटीवी मे रेकॉर्ड अवश्य होता?
एक जनप्रतिनिधि के नाते देश के आम जनता या किसानों के प्रति अपनी निष्ठा और
विश्वास प्रकट करने के लिये क्या केजरीवाल जी पुलिस की इतनी हिंसा या बल को बर्दाश्त
नहीं कर सकते थे?
जनता या किसानों के लिये जीने मरने की सौगंधे खाने बाले केजरीवाल जी दिल्ली पुलिस
के हिंसा या बल से इतना डर गये??? "या" कहीं ऐसा तो नहीं दिल्ली पुलिस की तथाकथित नजरबंदी
की आड़ मे अन्य ड्रामों की तरह माननीय श्री
केजरीवाल का ये भी एक नाटक था?
विजय सहगल




1 टिप्पणी:
केजरीवाल बहुत बड़े नौटंकी बाज है। उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटने के पश्चात नौटंकी को एक व्यवसाय के रूप में अपना लेना चाहिए ।
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