"उन्नाव
बालाजी"
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ओक्टूबर 2020 को अपने गृह नगर झाँसी से यूं तो प्रायः करारी, दतिया
वाया डबरा होकर ग्वालियर जाना होता पर इस बार सोचा क्यों न उन्नाव बालाजी मंदिर मे सूर्य भगवान के दर्शन कर दतिया होकर शेष उसी
मार्ग का अनुसरण कर ग्वालियर पहुंचू। कानपुर वायपास से ग्वालियर मार्ग के पूर्व मैने
कार की दिशा उन्नाव बालाजी मार्ग पर मोड़ दी। लगभग एक दशक बाद आज पुनः इस मार्ग पर
यात्रा कर रहा था। सुखद अनुभव हुआ। रोड अच्छी थी। जिस रास्ते पहले कभी निकलना टूटी
फूटी सड़क से संघर्ष कर यात्रा करना था, आज पक्की सड़क के दोनों
ओर ग्रामीण क्षेत्रों का विकास देख सुख की अनुभूति हो रही थी। बचपन मे प्रायः
उन्नाव बालाजी शहर से न जाकर मंदिर के
नीचे बह रही पहूज नदी के दूसरी ओर रेत के मैदानों मे साइकल, बैल गाड़ी और कभी कभी तांगा से जाना हुआ था। विशेष
तौर पर संक्राति वाले दिन 14 जनवरी को। गज़ब की भीड़ होती थी। नदी के रेत के मैदान
मे मीलों दूर तक बैल गाड़ियों बैलों या
तांगे से घोड़े को ढील दे आराम के लिए छोड़ दिया जाता। रेत के मैदानों मे घोड़ो को
रेत मे लोट लगते देखना सुखद लगता था। ग्रामीण महिलाएं सिर पर टोकरी कर अमरूद बेचा
करती थी। मंदिर मे सूर्य देव को अर्घ समर्पिण के लिए लोटा भर जल एवं हरे पत्तों के बीच मे दो
चार गेंदें के फूल गुत्थी माला जगह जगह
बेची जाती थे। किले नुमा गढ़ी मे नदी के पाट से मंदिर का दृश्य बहुत ही सुहावना नज़र
आता। नदी से लोटे मे जल लेकर मंदिर के
मुख्य प्रवेश द्वार होकर ऊंची ऊंची सीढ़ियों से चढ़ कर जाना सुखद अनुभव देता। ऐसी
मन्यता है कि त्वचा रोग से संबन्धित बीमारियों मे नदी के स्नान पश्चात मंदिर मे
सूर्य देवता को जलार्पण से रोग ठीक होते है। एक और मन्यता के अंतर्गत बच्चों का मुंडन
संस्कार भी मंदिर के प्रांगण मे किया
जाता। उक्त मान्यताओं मे निष्ठा और विश्वास आज भी मंदिर परिसर मे देखा जा सकता है। मेरे परिवार मे भी छोटे
बच्चों का मुंडन संस्कार उन्नाव बालाजी मंदिर मे ही होता है।
मंदिर
का खुला एवं अत्यधिक बड़े प्रांगण मे दर्शनार्थियों का दर्शन के पूर्व एवं पश्चात
किये जाने वाले धार्मिक रिवाजों को बड़े ही श्रद्धा एवं भक्ति भावना से लोग वहाँ के
पुरोहितों के माध्यम से सम्पन्न कराये जा रहे थे। मेले के से दृश्य का अवलोकन बड़ा
ही मनोहारी प्रतीत होता। आज भी मंदिर मे जल अर्पण करते समय मंदिर के दर्शन लाभ लेते समय बचपन के दृश्य चल
चित्र की तरह मन मस्तिष्क पर पुनः उभर आए।
मेरे
गृह नगर झाँसी से उत्तर दिशा मे 16-18 किमी पर ये उन्नाव बालाजी स्थित था जो
मध्यप्रदेश मे स्थित है जबकि दक्षिण मे इतने ही किमी दूर ओरछा स्थित है।
मध्यप्रदेश मे स्थित दोनों ही स्थल ओरछा भी उन्नाव बालाजी की तरह बुंदेलखंड का एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है पर
कालांतर मे जो विकास ओरछा का हुआ वो उन्नाव बालाजी का न हो पाया जबकि उन्नाव
बालाजी के जिला मुख्यालय दतिया से मध्य प्रदेश के वर्तमान गृहमंत्री दतिया का ही
प्रतिनिधित्व करते है। नदी और मंदिर परिसर की सफाई व्यवस्था मे और सुधार से मंदिर के
आकर्षण को और भी भव्य रूप दिया जा सकता है।
इस
यात्रा का एक थोड़ा दुःखद एवं अप्रिय पहलू मध्य प्रदेश पुलिस के व्यवहार से मिला
जिसने इस धार्मिक यात्रा के पूर्व ही व्यवधान तो डाला पर कभी कभी देश काल मे रहने की
कीमत तो चुकनी ही पड़ती है। मध्य प्रदेश की
सीमा मे प्रवेश करते ही बैरियर पर पुलिस कर्मियों का कार को रोक भूंखे भेड़ियों की तरह झपटना एवं सवालों के पहाड़ खड़ा
करना असहज करने वाला था। मानों कोई कमर्शियल ट्रक या मेटाडोर कोई अवैध माल असवाव
लेकर उनकी सीमा मे प्रवेश कर रहा हो?? कहाँ से आ रहे है, कहाँ जाना है, गाड़ी किनारे लगा दो, डिक्की चैक कराओ, सूटकेस खोलो सामान चैक करना है
फिर इसके बाद गाड़ी के कागज और इन्स्योरेंस लाइसेंसे तो चैक करना लाजिमी है। मुझे
याद नहीं 26 साल की कार ड्राइविंग के दौरान देश के दूर दराज की यात्रा के दौरान
ऐसे अनुभव से गुजरा। दुर्भाग्य ये इन मे
से अधिकतर पुलिस कर्मी कोरोना महामारी के बीच बगैर मास्क लगाये हुए थे और किसी भी कर्मी ने वर्दी पर अपने नाम की प्लेट नहीं
लगा रखी थी। दुख तब और हुआ कि दतिया के एसपी को मेल करने के बावजूद भी कोई
कार्यवाही नहीं हुई। इस तरह की घटनाएँ न केवल धार्मिक पर्यटकों को कटु अनुभवों से
गुजारकर यात्रा के लिए हतोत्साहित करती है बल्कि पुलिस महकमे की छवि भी खराब करती
है। परिवार सहित वरिष्ठ नागरिक के रूप मे पुलिस का यह व्यवहार असहज करने वाला था। क्या शासन/प्रशासन से कुछ अपकेक्षा की जा सकती है??
विजय
सहगल






2 टिप्पणियां:
उन्नाव बालाजी की जय हो बचपन से हम भी dasak में एक दो बार जाते रहे हैं
जहाँ बेल गाड़ी और तांगे की बात कर रहे Car देख कर जैसे पहले लोगों को लगता था देखने को मिलती थी
वेसे ही कोई तो फसा वाली बात हुई आपके साथ खेर आप थे तो विशेष हानि नहीं हुई होगी और कोई होता तो..
वैसे चार साल पूर्व में भी गया था अपनी car से तब किसी ने नहीं रोका था व रतन गढ़ पिताम्म्बरा व ओरछा सभी जगह होकर आया था
धन्यवाद आपने उन्नाव बालाजी के दर्शन कराये
अच्छी और सच्ची वाक्या, ऐसे मामलों को पुलिस के उच्चाधिकारियों को तुरानी संज्ञान में लेना चाहिए ।
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