शनिवार, 19 दिसंबर 2020

नगदी प्रेषण

 

"नगदी प्रेषण"




उन दिनों (सन् 1993) मेरी पोस्टिंग मध्य प्रदेश राज्य के पोरसा शाखा मे थी जो मुरैना   जिले की के तहसील थी। पोरसा एक नगदी फसल सरसों के उत्पादन का एक बड़ा केंद्र आज भी है। इसकी भौगोलिक स्थिति मध्यप्रदेश के दो सबसे ज्यादा  दस्यु  प्रभावित जिले भिंड और मुरैना  के बीच मे स्थित है। डाकू मान सिंह, पुतली बाई, मोहर सिंह, माधव सिंह, पान सिंह तोमर सभी दस्यु सम्राटों की यही कर्म स्थली रही थी और वे सभी इसी क्षेत्र के रहवासी थे। यध्यपि उन दिनों उतनी संगीन स्थिति डाकुओं की नहीं थी लेकिन  उन दिनों डाकू चैन सिंह का आतंक था जिसे चैना या चैना डाँकू भी कहते थे। उन दिनों पोरसा के नजदीक ही एक अन्य शाखा नगरा थी जो शायद पोरसा से 12-15 किमी दूर थी। हमारे एक मित्र श्री एम॰सी॰ जैन, श्री हरज्ञान सिंह सिशोधिया  नगरा के प्रबन्धक पद से कार्यमुक्त हो जा चुके थे और नवागांतुक श्री पी॰के जैन ने नया नया कार्य भर ग्रहण किया ही था। उन दिनों स्टाफ के बीच ये राय थी कि पोरसा, किरियांच एवं नगरा ब्रांच की पदस्थापना सजा पोस्टिंग है। एक रोज उन्हे डाकू चैना का एक फिरौती पत्र मिला। फिरौती की  धनराशि तो ठीक से  ध्यान नहीं शायद पाँच लाख की मांग की गई थी अन्यथा बैंक आते-जाते  अपहरण करने की धमकी दी गई थी। बेचारे प्रकरण को प्रादेशिक कार्यालय को सूचित कर एक महीने की छुट्टी पर चले गये थे पर दुर्भाग्य, किसी भी तरह का सहयोग उन्हे न मिला।  

कहने का तात्पर्य उन दिनों भी समान्य कानून व्यवस्था की स्थिति प्रशंसनीय नहीं कही जा सकती थी विशेषतः बैंकिंग व्यवसाय के संबंध मे जहां सिर्फ और सिर्फ  नगदी के लेन-देन का  कार्य था। पोरसा मे उन दिनों दो ही राष्ट्रीयकृत बैंक थे और पोरसा के  सरसों के व्यापारियों का अधिकतर व्यापार पश्चिमी बंगाल के व्यापारियों से था जो सरसों की पूर्ति का भुगतान ड्राफ्ट के माध्यम से मुरैना स्थित बैंकों पर देय ड्राफ्ट्स के माध्यम से करते थे। पोरसा मे एक तकनीकि समस्या उन दिनों और थी, आज की तरह आरटीजीएस या एनईएफ़टी की सुविधा न थी। यदि व्यापारी ड्राफ्ट हमारे पोरसा स्थित  बैंक मे भुगतान प्राप्ति हेतु जमा करते थे तो उन्हे दो तरह से नुकसान होता था। एक तो समाशोधन के माध्यम से भुगतान प्राप्ति मे दो तीन दिन लगते थे और दूसरा कमिशन की भरी भरकम राशि भी देनी पड़ती थी। हमारे बैंक द्वारा  कमीशन आधा किया जाना  भी व्यापारियों को आकर्षित न कर सका।  इसलिये अधिकतर व्यापारियों ने अपने खाते मुरैना की बैंकों मे भी खोल लिये थे। क्योंकि  व्यापारी बस से 40-45 किमी दूर दस रुपए मे मुरैना का टिकिट कटा सुबह सुबह ड्राफ्ट अपने मुरैना बैंक मे जमा कर देते थे, और दोपहर तक जिला मुख्यालय के  अपने और पड़ौसियों के काम निपटा बैंक से ड्राफ्ट का भुगतान जो औसतन रु 2-3 लाख का होता था प्राप्त कर झोले मे डाल मैली कुचैली कुर्ता धोती या शर्ट पहन शाम तक पोरसा बापस आ जाते थे। इस तरह कमीशन के रूप मे 4-5 सौ की बचत हो जाती थी। ये मैले कुचैले कपड़ों का पहनावा व्यापारी जानबूझ कर इस लिये पहनते थे ताकि उनपर बदमाश गुंडे या अन्य असामाजिक तत्व  ध्यान न दे। जब व्यापारी मात्र 20-30 रुपए खर्च कर उसी दिन अपने बैंक के ड्राफ्ट का भुगतान प्राप्त कर लेता है तब कौन सा व्यापारी  बैंक के कमीशन के चार-पाँच सौ कमीशन देने और चार दिन बाद बैंक से भुगतान प्राप्त करने की मूर्खता करेगा?

इस एक तरफा बैंक व्यापार के कारण हमारी शाखा मे नगदी एकत्रित होने की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई। दुर्भाग्य से करेंसी चेस्ट भी नजदीकी बड़े शहर ग्वालियर मे स्थापित नहीं हुआ था। इस तरह लगभग हर हफ्ते या कभी कभी फसल के समय हफ्ते मे दो-तीन  बार "नगदी" पोरसा से अपनी मुख्य शाखा मुरैना मे प्रेषण कराना पड़ता था, इसके उलट मुख्यालय मुरैना  मे स्थित बैंकों को नगदी की गंभीर कमी का सामना करना पड़ता था। फसल के समय स्टेट  बैंक इस आशय का पत्र बैंकों को जारी करता था कि नगदी की मांग न करें। नगदी प्रेषण के समय जिले मे कानून व्यवस्था की दयनीय  स्थिति हमेशा नगदी को मुरैना प्रेषण चिंता एवं भय की स्थिति निर्मित करती थी। प्रशासन मे लाल फीताशाही का ऐसा आलम था कि  बैंक के नाम से बंदूक का लाइसेन्स जिला कलेक्टर को लगभग 200 चिट्ठियाँ लिखने के बावजूद मेरे  साढ़े चार साल के प्रवास मे भी स्वीकृत न हो सका था। उन दिनों मोबाइल फोन जैसी सुविधायें भी नहीं थी। एसटीडी सेवा चालू तो हो गई थी पर बैंक की नीति नियमनुसार ये सुविधा शाखा मे उपलब्ध न थी। इसलिये नगदी का प्रेषण हमेशा एक चुनौती बना रहता। सुरक्षा अधिकारी के निर्देशानुसार हम नगदी का प्रेषण बगैर किसी पूर्व नियोजित सूचना या कार्यक्रम के मुरैना भेजते रहते ताकि सुरक्षा का मुद्दा न  आढ़े आये।

लेकिन जैसा कि अपने बैंक के कुछ उच्च अधिकारियों का कार्यव्यवहार और रवैया बैंक के सामान्य कामकाज मे भी ऐसा रहता है कि वे अपने अधीनस्थ अधिकारियों और  कर्मचारियों से सामान्य शिष्टाचार से अलग ये अपेक्षा रखते है जैसा पुराने राजाओं के दरबार मे होता था।  वे कुछ लोग, राज दरबारियों/राग दरबारियों की तरह ये भी अपेक्षा रखतेहै  कि उनके अधीनस्थ अधिकारी उनकी "जय जुहार" या "हुकुम सरकार" या ऐसे ही आचरण जैसे चापलूसी वाक्यों और व्यवहार से उनकी प्रशंसा करें, उनके यश गुणगान करें। एक दिन मुख्यालय स्थित शाखा के प्रबन्धक ने काफी बड़ी राशि के "कैश रैमिटेंस" को इस विना पर लेने से इंकार कर वापस कर दिया कि आपने पूर्व सूचना नहीं दी। मैंने उन्हे आग्रह भी किया कि शाखा मे एसटीडी सुविधा नहीं है ताकि आपको पूर्व सूचना दे सके और एसटीडी बूथ से फोन कर सूचना देना सुरक्षा से खिलवाड़ करना होता। पर उन्होने अनसुनी कर बड़ी मात्रा का नगदी प्रेषण वापस कर दिया। मैंने भी इसे अन्यथा नहीं लिया बस इस आशय का एक पत्र प्रादेशिक कार्यालय को लिख दिया।

कुछ दिन बाद प्रादेशिक प्रबन्धक महोदय का फोन आया, आवाज की मुद्रा कुछ क्रोधावेश की थी। उन्होने कहा "तुम बहुत कानून बाजी दिखाते हो", आपने "कैश रैमिटेंस" वापसी का पत्र यहाँ प्रादेशिक कार्यालय को  क्यों लिखा? मैंने बताया कि "श्रीमान, आपके कार्यालय को इस आशय की सूचना देना आवश्यक समझ ये पत्र सूचनार्थ प्रेषित किया था। उन्होने फिर पूंछा आपने नगदी प्रेषण की पूर्व सूचना जिला मुख्यालय की शाखा को क्यों नहीं दी? मैंने कहा "सर" शाखा मे एसटीडी न होने के कारण सुरक्षा की द्रष्टि से सूचना एसटीडी, पीसीओ के माध्यम से शाखा को देना मैंने उचित नहीं समझा क्योंकि सार्वजनिक स्थान पर इस तरह की बातचीत बैंक और स्टाफ के हित मे नहीं थी और बैसे भी इस शहर की सामान्य कानून व्यवस्था ठीक नहीं रहती है, अब तक बैंक को गन लाइसेन्स भी नहीं मिला जिसकी लगातार सूचना से आपके कार्यालय को भी अवगत कराया जाता रहा। तब उन्होने फिर कहा सप्ताह का कोई दिन निश्चित कर नगदी का प्रेषण किया जा सकता है। मैंने विनम्रता से इस पर भी असहमति जतलाते हुए पुनः एक निश्चित दिन प्राइवेट जीप/टैक्सी से "कैश रैमिटेंस" मे सुरक्षा का मुद्दा बतलाया कि सप्ताह के एक निश्चित दिन लगातार नगदी का भेजना सुरक्षा की दृष्टि से उचित न होगा? तब प्रादेशिक प्रबन्धक ने जो कहा, सुनकर मै आश्चर्य चकित था। उन्होने कहा कि "फिर आप उनसे अपने संबंध ऐसे बनाइये कि उन्हे "कैश रैमिटेंस" लेने मे समस्या या शिकायत न हो।

मै सुनकर हैरान था कि एक रीज़न का मुखिया समस्या का बिना कोई समाधान निकाले हिदायत दे रहा है कि संबंध बनाईये? जैसे बैंक नहीं गोया कोई प्राइवेट संस्थान हो?  सामान्य शिष्टाचार के बाद बैंक के कार्य हेतु उनकी चरण वंदना तो होने से रही? तब शाखा मे नगदी शेष हमारी अनुमत्य सीमा से 40-50 गुना एकत्रित हो गयी।  बैंक को भी इस बजह से काफी आर्थिक हानि होती रही पर कुछ समाधान न निकला। तब एक दिन  मुरैना शाखा के प्रबन्धक ने फोन कर कैश उनकी शाखा मे प्रेषित  कराने को कहा। इस तरह अनियमित अंतराल पर नगदी प्रेषण की सुरक्षा नीति का ही अनुपालन किया गया।

ईश्वर प्रदत्त अनुग्रह और आशीर्वाद से बैंक के उच्च पदों तक पहुँचने बाले लोग विरले ही होते है। वे और भी सौभाग्यशाली होते है जो उच्च से भी उच्चतम पदों तक पहुँचते है। पर इन पदों पर आसीन कुछ लोग ये भूल जाते है कि "दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार न करे जो आपको अपने लिये पसंद न हो" या "दूसरों के साथ बैसी ही उदारता बरते जैसी ईश्वर ने तुम्हारे साथ बरती"।  

विजय सहगल

3 टिप्‍पणियां:

P.c.saxena ने कहा…

आप सामान भाषा में लोगों की दुखती रग पर हाथ रख देते हैं जिसे शायद लोग पसंद नहीं करते हैं अच्छा है आप यूं ही लिखते रहिए🙏🙏🙏🙏🙏

P.c.saxena ने कहा…

आप सामान्य भाषा में लोगों की दुखती रग पर हाथ रख देते हैं जिसे शायद लोग पसंद नहीं करते हैं आप यूं ही लिखते रहें अच्छा लगता है🙏🙏🙏🙏🙏

azadyogi ने कहा…

ऐसी जानकारियां जरूर उच्चाधिकारियों को अवश्य देना चाहिए, ताकि उन्हें अपने किये कारगुजारियों का बहस हो सके --- खत्री योगेन्द्र आजाद, पटना ।