मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

चाटुकारिता

 "चाटुकारिता"






देश के हर क्षेत्र और हर विभाग मे एक प्रजाति आपको समान रूप से व्याप्त दिखेगी जिसे चापलूस कहते है। चाटुकारिता मे पारंगत ये प्रजाति अपने गुणों और व्यवहार के अनुरूप अपने बॉस या यूं कहे आकाओं से अनेक लाभ पाकर गौरान्वित महसूस करती है जबकि इस "चापलूसी" कला से वंचित लोग प्रायः अपने बॉस की छोटी छोटी बातों मे भी कोप का भाजन बनते है।
उक्त प्रजाति की एक विशेषता ये रहती कि वे प्रायः विभाग प्रमुख अर्थात बॉस के निकटष्थ और मुंह लगे रहते। ऐसी बात नहीं कि ये प्रजाति बैंक मे ही रही हो हर देश काल मे इनका वर्चस्व रहा है। इनकी एक विशेषता ये रहती है कि ये एक दूसरे की पीठ खुजाते हुए एक दूसरे की प्रशंसा करने मे कभी कंजूसी नहीं वर्तते। मुक्त कंठ से झूठी प्रशंसा इनके सद्गुणों मे एक मात्र विशेषता होती है। बचपन मे एक बुंदेलखंडी कहावत सुनी थी कि :-
"जी के राज मे रईये, ऊकी ऊसे कहिये"।
"ऊंट बिल्लाईया ले गई, सो हाँजू-हाँजू कईये"!!
अर्थात जिस बॉस के राज मे रह रहे है उसकी हाँ हाँ मे मिलाईये, यदि बॉस कहता है कि ऊंट को बिल्ली उठा के ले गई तो उसकी हाँ मे हाँ मिलाओ अर्थात एक चापलूस की ये मात्र एक श्रेष्ठ आहर्ता/योग्यता है, ठीक उसी तर्ज़ पर जैसे एक फिल्मी गाना आप सभी ने भी सुना होगा जिसे मैंने बॉस के संदर्भ मे लिया है -:
जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे।
तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे॥ जो तुमको हो..........................
दरअसल मेरी उन दिनों पदस्थपना सहायक महा प्रबन्धक के अधीन नियंत्रण एवं निरीक्षण कार्यालय मे थी। हमारे कार्यालय से लगा हुआ ही प्रादेशिक प्रबन्धक का कार्यालय भी एक ही छत्त के नीचे था,यहाँ तक कि बाहर जाने का रास्ता भी प्रादेशिक कार्यालय से होकर जाता था। शुरुआत मे आपस मे दोनों कार्यालयों का अच्छा ताल-मेल,मेल जोल था। बैंक के कुछ स्वतंत्र आवास भी एक अच्छी कॉलोनी मे थे जहां दोनों ही कार्यालयों के अधिकारी आस-पास ही निवासरत थे। एक बार निरक्षालय प्रमुख के आवास पर कुछ काम को प्रादेशिक प्रमुख द्वारा नियम विरुद्ध होने से स्वीकृति न मिलने के कारण निरीक्षालय प्रमुख कुछ नाराज रहने लगे,जिसके कारण निरीक्षालय प्रमुख मौका-बेमौका अपने कार्यालय की श्रेष्ठता एवं प्रादेशिक कार्यालय को दीन हीन जताने मे कहीं कोई कसर नहीं छोड़ते। हद तो तब हो गई जब उनके आवास पर अतिरिक्त पानी की टंकी/टैंक न रखवाने के कारण निरीक्षालय प्रमुख के इशारे पर छोटी छोटी बातों मे शाखा के निरीक्षण के दौरान स्पेशल रिपोर्ट (जिसका संज्ञान सीधा प्रधान कार्यालय लेता है) बनाई जाने लगी। जो कि कतई उचित नहीं था। निरीक्षणालय के कुछ चापलूस प्रकृति के स्टाफ अपने स्वभाववश अपने बॉस की हाँ मे हाँ मिला आग मे घी डालने से भी नहीं चूके। चूंकि मेरा काफी समय प्रादेशिक कार्यालय एवं उसके अधीन शाखा कार्यालयों मे बीता एवं संगठन से जुड़ा रहने के कारण भी निरीक्षणालय प्रमुख मुझ से कुछ पूर्वाग्रह रखते थे लेकिन खुल कर कहने हमेशा बचते रहे,जिसकी मैंने कभी परवाह नहीं की। क्योंकि वे अच्छी तरह जानते थे कि मै उनके इशारों पर चलने वाला व्यक्ति नहीं हूँ। मै बगैर किसी के प्रति आग्रह,पूर्वाग्रह या दुराग्रह का भाव लिये अनासक्त भाव से अपना कार्य संपादित करता था। खेद का विषय है उक्त निरीक्षालय प्रमुख के रहते प्रादेशिक कार्यालय एवं निरीक्षालय स्टाफ के बीच उन दिनों आपसी सबंध नैतिक गरिमा के निम्नतम स्तर पर थे। निरीक्षणालय एवं प्रादेशिक कार्यालय मे व्यवहार दो दुश्मन देशों के बीच "शीत युद्ध" की स्थिति जैसा था। आपसी अविश्वास और मन भेद की पराकाष्ठा तब हो गई जब बैंक अधिकारियों के लिये निर्मित मकानों के परिसर मे एक अति वरिष्ठ स्टाफ की धर्मपत्नी के आकस्मिक निधन पर भी कुछ लोग अन्त्येष्टि/परवारिक दुःख मे शामिल न हुए?कदाचित ही ऐसी स्थिति मैंने ज़िंदगी मे कभी कहीं देखी हो!!
एक दिन मेरे निरीक्षणालय विभाग प्रमुख किसी विभागीय कार्य हेतु मुख्यालय से बाहर थे। हम, दो-तीन स्टाफ ही कार्यालय मे थे। चूंकि प्रादेशिक कार्यालय भी हमारे कार्यालय से लगा हुआ था। प्रादेशिक प्रबन्धक ने किसी कार्यक्रम के आयोजन मे शामिल होने के लिये हमारे कार्यालय के स्टाफ को भी आमंत्रित किया जैसा कि प्रायः होता रहता था। सौजन्यतावश मै अपने स्टाफ के साथ कार्यक्रम मे शामिल होने चला गया शायद किसी अधिकारी के जन्मदिन का कार्यक्रम था। बमुश्किल दस मिनिट का कार्यक्रम रहा होगा। जैसा कि प्रायः होता है लंच या ऐसे किसी कार्यक्रम मे जाने पर हम लोग कार्यालय मे सब स्टाफ को इस निर्देश के साथ अवशय छोड़ जाते है कि स्टाफ कि अनुपस्थिति मे कार्यालय मे आने वाले सभी फोन कॉल को सुने एवं फोन करने वाले का नाम,संदेश आदि भी नोट करले ताकि बाद मे संबन्धित स्टाफ को अवगत कराये ताकि प्रस्तुत विषय को हल किया जा सके। इसी दौरान हमारे निरीक्षालय प्रमुख का लेंड लाइन पर फोन कार्यालय मे आया जिसे वहाँ उपस्थित सब स्टाफ ने उठा स्टाफ के प्रादेशिक कार्यालय के कार्यक्रम मे शामिल होने की सूचना उनको दी एवं स्टाफ के आते ही बात कराने की सूचना से भी अवगत करा दिया।
सब स्टाफ की सूचना पर मैंने आते ही अपने निरीक्षालय प्रमुख से बात की। मेरे सहित किसी स्टाफ को कार्यालय मे न होने पर पर उन्होने अपनी नाराजी जाहिर की। मैंने जब प्रादेशिक प्रबन्धक के कार्यक्रम मे शामिल होने के संदेश को बताया पर वे अपनी यही बात कहते रहे कि आप किसी को कार्यालय मे रहना चाहिये था। जब मैंने उन्हे दूरभाष पर पूर्व मे भी उन सहित सारे स्टाफ को इस तरह के कार्यक्रम मे शामिल होते रहने के दृष्टांत दिये पर उनको मै संतुष्ट न कर सका। दूसरे दिन कार्यालय मे आते ही उन्होने सुबह सुबह पुनः मेरे सहित शेष स्टाफ को अपनी कैबिन मे बुला कार्यालय के शिष्टाचार,नियम, प्रधान कार्यालय के अधिकारी के फोन आदि के अनेक उदाहरण कह सुनाये। सब स्टाफ के द्वारा फोन पर उच्च अधिकारी से बात को अति गंभीर कृत करार दिया। लगभग एक-डेढ़ घंटे तक इस संबंध मे उपदेश आदि देते रहे। तब मेरे से न रहा गया। मैंने शालीनता पूर्वक लेकिन द्र्ढ़्ता से उनको कहा कि श्रीमान,एक उपमहाप्रबंधक के आग्रह पर हम लोग उनके कार्यक्रम मे गए थे। क्या उनके आदेश की अवाज्ञा करना शिष्टाचार और नैतिकता विरुद्ध न होता??मेरी तो छोड़िए क्या आप भी उनके आमंत्रण को इस तरह अशिष्टता पूर्वक मना कर सकते थे?आप का फोन आया भी था तो तुरंत ही विषय विशेष मे हमने आपको फोन कर सारी स्थिति से अवगत भी कराया था। एक डीजीएम के द्वारा आयोजित कार्यक्रम मे शामिल होने से ऐसा कौन सा अपराध हो गया या पहाड़ टूट गया?फिर भी यदि आप नहीं चाहते है तो भविष्य मे आपकी अनुमति के बिना अब प्रादेशिक कार्यालय के किसी कार्यक्रम मे शामिल नहीं होंगे। एक छोटी सी बात का इतना बढ़ाना,बतंगढ़ बनाना, शिष्टाचार के विरुद्ध बताना कदापि उचित नहीं है?मैंने बोलना जारी रख नम्रता पूर्वक एजीएम साहब से पूंछा, कार्यालय मे शराब पीकर आना किस शिष्टाचार के अंतर्गत आता है??मेरे प्रत्युत्तर पर वे चौंके!! उन्होने पूंछा कौन स्टाफ शराब पीकर कार्यालय मे आता है? जब मैंने उनके कृपा पात्र स्टाफ का नाम बताया जो पूर्व मे भी शराब पीकर ऑफिस के नियमों पर कुठराघात करता रहा था लेकिन बॉस के खास होने का फायदा उठा ऑफिस के कभी किसी अनुशासन एवं शिष्टाचार का पालन नहीं किया। एक अनुशासन हीन अधिकारी शिष्टाचार के विरुद्ध कार्यालय मे शराब पीकर आ सकता है, लेकिन एक डीजीएम के कार्यक्रम मे हम शिष्टाचार और सौजन्यतावश शामिल नहीं हो सकते?ये कहाँ का न्याय है? तब तो उनकी हालत देखने लायक थी। उक्त अधिकारी जो उनके बहुत मुंह लगा था उन्होने उस चापलूस स्टाफ को कैबिन मे बुला क्रोध से पूंछा?कि तुम कल कार्यालय मे शराब पी कर आए थे?उक्त स्टाफ क्षमाप्रार्थी की मुद्रा मे उनके सामने खड़ा था। मैंने पुनः कहा कल की बात छोड़िए इनसे अभी इसी वक्त पूंछिये कि वे अभी यहाँ शराब पिये खड़े है या नहीं?अब तो दोनों की स्थिति बड़ी असहज थी क्योंकि वो चापलूस सेवादार स्टाफ अभी भी शराब पीकर उनके सामने खड़ा था। सोर्री बोलते हुए उसने क्षमा मांगी। लेकिन ऐसे अनेकों चापलूस स्टाफ जो लोगो की जानकारी के बावजूद बेनकाब होने से रह जाते है। लेकिन वही ढांक के तीन पात, कहीं कुछ नहीं बदला और ढर्रा यूं ही चलता रहा। इस तरह इस चापलूस प्रजाति ने भी बैंक के अधोपतन मे नकाबले तारीफ भूमिका अदा की है।

विजय सहगल

3 टिप्‍पणियां:

P.c.saxena ने कहा…

आपने सर्वकालिक ज्वलंत विषय पर बेबाकी से अपने विचार रखे हैं ज्यादातर लोग इस समस्या के भुक्तभोगी हैं बीमारी लाइलाज है इसका इलाज बहुत जरूरी है

azadyogi ने कहा…

चाटुकारिता आज की ज्वलंत समस्या है, यह सुयोग्य को अयोग्य करार देने का वर्तमान में प्राणवायु माना जाता है अतः उच्चाधिकारियों को अपने दिमाग से काम करना चाहिये, चाटुकरियों के प्रभाब में आना ही नहीं चाहिये ।

Surinder Pal Bhatia ने कहा…

इतनी स्पष्टवादिता से और बिना किसी लाग लपेट के वास्तविकता बयान करने के लिए आपको कोटीश सादुवाद