शनिवार, 28 नवंबर 2020

उखाड़ दिया

 

"उखाड़ दिया"



बचपन मे जब कभी हम बच्चों का आपस मे झगड़ा हो जाता था तो तमाम वाद-विवाद के बीच जब हमारा पक्ष कमजोर पड़ जाता था तो भाग कर अपने बड़े भाई को बुला अपना रौब झाड़ते थे। छोटी-मोटी गली गलौज के बाद जब विवाद चरम पर होता तो अपना पक्ष मजबूत देख एक डायलोग प्रायः बोला जाता "जो उखाड़ना है उखाड़ लो"। इस वाक्य की भाषा को बड़ा ही निर्लज्ज और ओछा माना जाता था। बाद मे कॉलेज स्तर पर आये तो अपने बचपन की उन बातों को याद कर दोषी और  हीन भावना से ग्रसित महसूस करता रहा। इस निम्न स्तरीय भाषा को जब कुछ दिन पूर्व 10 सित॰ 2020 को इस वाक्य को जब शिवसेना के बड़े नेता संजय राऊत से सुना  तो बचपन के वे विस्मृत  बाते स्वतः ही स्मृति मे आ गई। घोर आश्चर्य और दुःख तो तब हुआ इस वाक्य को उन्होने अपने राष्ट्रीय समाचार पत्र सामना मे मुख्य पृष्ठ पर मोटे-मोटे शीर्षक मे  "उखाड़ दिया" लिख छापा भी, जिसमे वे मुख्य संपादक भी है। उक्त शीर्षक जिस संदर्भ मे छापा गया वो तो और भी शर्मनाक था। "उखाड़ दिया" जैसा  महान कृत उन्होने अपने बल, पौरुष और मर्दानगी पूर्ण  कार्य का प्रदर्शन अभिनेत्री कंगना राऊत के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे पर की गई टिप्पड़ी के विरुद्ध उसके बंगले को गैर कानूनी तरीके से बर्बरता पूर्वक तोड़ कर किया। बृहन्न  मुंबई नगर निगम ने अपनी संवैधानिक शक्तियों का दुर्पयोग कर अपने आकाओं की संतुष्टि हेतु इस निरंकुश तानाशाही पूर्ण कृत को अंजाम दे इस पराक्रम को कार्यान्वित किया।

उक्त शर्मनाक क्रत की आलोचना उस समय भी पूरे देश मे हुई थी। क्या एक प्रदेश के प्रथम नागरिक मुख्यमंत्री पर  अगर कोई अदना व्यक्ति कोई टिप्पड़ी करे तो क्या उस अदने व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही वो भी अवैधनिक  कार्यवाही ने क्या प्रदेश के मुख्यमंत्री के यश कीर्ति मे चार चाँद लगाये? क्या श्री उद्धव ठाकरे के गौरव-गाँ  मे  देश-प्रदेश या आम जनों के बीच कोई बढ़ोतरी हुई? हमे नहीं लगता कि एक मुख्यमंत्री पदासीन व्यक्ति के पद  प्रतिष्ठा एक अदनी अभिनेत्री के सामने पासिंग के बराबर भी हो? जैसा कि कहावत है "कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली"। इसके विपरीत बीएमसी के अधिकारियों और संजय राऊत जैसे चाटुकारों ने अवैध तरीके से कंगना के बंगले को तोड़ कर श्री ऊद्धव ठाकरे एवं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शान मे बट्टा ही लगाया है। जो आज बॉम्बे हाई  कोर्ट के निर्णय से साफ हो गया। जैसा कि आज  28 नव॰ 2020 के समाचार पत्रों मे खबर है कि माननीय न्यायालय ने बीएमसी द्वारा  कंगना के बंगले मे तोड़-फोड़ पर फटकार लगाई एवं मुआवजा भी देने को कहा।

क्या सामना पत्र मे मोटी-मोटी हैड लाइन मे "उखाड़ दिया" लिख अपने को कृत्य-कृत्य मानने वाले संजय राऊत जी "आंखो मे पानी या चुल्लू..." को तो छोड़िए क्या अपने किये पर उक्त शीर्षक के दशवे आकार के शब्दों को सामना मे प्रकाशित कर खेद प्रकट करेंगे??

एक साधारण नागरिक के नाते एक  सलाह माननीय मुख्यमंत्री श्री ऊद्धव ठाकरे जी को भी कि बड़े ही पुण्य कर्मों, ईश्वरीय आशीर्वाद, पूर्वजों के स्नेह एवं बड़े भाग्य से विरले लोगो को ही  मुख्यमंत्री जैसा उत्तरदायित्व प्राप्त होते है। कृपया चाटुकारों को दूर रख प्रदेश के गरीब, असहाय, वंचित, दबे-कुचले परिवारों के लाभार्थ नीतियाँ और कार्यक्रम बनायें ताकि उनके नीरस जीवन मे कुछ खुशियाँ आ सके। नौजवानों के लाभार्थ रोजगार का सृजन करें। आपके दल पर लगे क्षेत्रीयतावाद के ठप्पे को मिटाने एवं आपसी सद्भाव बढ़ाने हेतु कार्य करे अन्यथा फ़क़त मुख्यमंत्री बनने की ही अभिलाषा थी तो वो तो पूरी हो ही गई।    

विजय सहगल


शुक्रवार, 27 नवंबर 2020

हथियार

 

"हथियार"




अभी कुछ माह पूर्व  भारत ने फ्रांस से राफेल लड़ाकू जहाज की खरीद की। जिसके बारे मे दावा है कि इसकी मारक क्षमता दुनियाँ मे सर्वश्रेष्ठ है। इस के आने से देश की रक्षा व्यवस्था बहुत मजबूत हो गई है। इससे ये तो स्पष्ट है कि आधुनिक लड़ाकू विमानों, टैंक और तोपों एवं मशीन गन आदि से देश की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत ही नहीं होती बल्कि शत्रुओं को बगैर लड़े ही ये स्पष्ट संदेश जाता है कि वो अपनी हद मे रहे अन्यथा उसे एक भयंकर विनाशकरी परिणाम भुगतने पड़ेंगे।  ये तो हुई सीमा पर देश के शत्रुओं से लड़ने की रीति नीति।

देश की सीमाओं पर देश की रक्षा की ज़िम्मेदारी जहां सेना और सीमा सुरक्षा दल सहित अन्य सशस्त्र बालों पर है वहीं देश के अंदर देश के नागरिकों की रक्षा-सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था की ज़िम्मेदारी प्रदेशों की पुलिस बलों पर है। देश के सुरक्षा  बलों द्वारा   देश के अंदर सामान्य नागरिकों के शांति पूर्ण जीवन के लिए परिस्थितियों का निर्माण आवश्यक ही नहीं एक कल्याण कारक राष्ट्र की मुख्य नीति भी होती है। पर अपने देश के भीतर ऐसी स्थिति है नहीं? असामाजिक तत्वो, गुंडा तत्वों द्वारा किसी भी शहर मे साधारण नागरिकों के साथ लूटपाट, पर्स,  सोने की चैन, वाहनों की चोरी मोबाइल सहित अन्य कीमती वस्तुओं की छीना झपट्टी और लूटपाट  आये दिन की बात है। असामाजिक तत्वों/गुंडों  द्वारा गैर कानूनी  अवैध असलहों की सहायता से आये दिन लूटपाट, चोरी और डकैती की घटनायें समाचार पत्रों और टीवी चैनल्स पर देखने और सुनने को मिलती है। ये असामाजिक तत्व अच्छी तरह जानते है कि लूटपाट की घटनाओं को अंजाम देते वक्त पीढ़ित/भुक्त-भोगी शत-प्रतिशत मामलों मे प्रतिरोध नहीं करेगा और लुटने-पिटने को अपनी नियति मान कुछ दिन व्यवस्था को कोसने के बाद चुप हो बैठ जायेगा। सुरक्षा बलों द्वारा आम जनों की सुरक्षा मे कोताही वरतने   का  सबसे बड़ा कारण पुलिस विभाग मे व्याप्त भ्रष्टाचार, राजनैतिक हस्तक्षेप, और अपनी ज़िम्मेदारी निभाने मे निष्ठा समर्पण और ईमानदारी का अभाव। प्रदेशों मे तैनात पुलिस कर्मियों द्वारा कानून व्यवस्था को नियंत्रण करने मे कुछ हद तक अक्षमता और काफी हद तक भ्रष्टाचार प्रमुख कारण है।

संगठित गुंडे असामाजिक तत्व भले ही संख्या मे 4-5 हों वे असंगठित चालीस-पचास आम जनों पर भारी पड़ जाते है।  यदि इन असंगठित आम जन के समूह मे  चार-पाँच सौ बुद्धिजीवी, पढे-लिखे और  कानून के जानकार है तो मान कर चले 4-5 गुंडे भी इन पर भारी पड़ेंगे। अपने यहाँ आम लोगो का स्वभाव हो गया है कि दूसरे पर आयी मुसीबत या संकट को मौन रहकर अनदेखा करें? जीवन के किसी भी क्षेत्र मे आप देख ले आततायी, दुष्ट क्रूर व्यक्ति के विरुद्ध शारीरिक प्रतिरोध तो दूर की बात है मौखिक प्रतिवाद भी कोई नहीं करता फिर चाहे कोई विभाग हो, पड़ौस का मामला हो या सड़क चलते कोई या उत्पीढन झगड़ा फसाद? 26/11 के मुंबई मे आतंक वादियों के मामले मे यही हुआ था। अनेक लोगो ने कुछ संदिग्ध, अंजान  लोगो को समुद्र से लगी वस्ती मे  बड़े-बड़े बैग आदि के साथ आते देखा था पर किसी ने भी उनको वहाँ होने पर पूंछ-तांच्छ कर रोका टोका नहीं। एक दो व्यक्ति भी यदि उन्हे टोकते? या शालीनता पूर्वक पूंछते "यहाँ कैसे"? या आप लोग कौन है? कहाँ से आ रहे है? आदि तो  मान कर चले कोई बुरी  नियत या इरादे वाला असामाजिक तत्व पूंछतान्छ से ही वे घबरा जाते है। ऐसा अनेकों वार हुआ है कि मैंने अनियंत्रित वाइक चालकों, ज़ोर से हॉर्न बजने वालों या खाली सड़क पर भी हॉर्न बजाने वालों को ज़ोर से  "ऐइच" कह कर टोका या रोका है। चलती वाइक या वाहनों से थूकने वालों को तो सैकड़ो वार मैंने "ऐ या  "ऐइच" कह टोका!! बसों/रेलों मे बीड़ी सिगरेट वालों को धूम्र पान के लिये रोकना भी इसमे शामिल है।  हमारे देश का आम  स्वभाव हो गया है कि  सार्वजनिक स्थानों, बस या ट्रेन की लाइन को तोड़ने वालों, जगह जगह थूकने वालों, सड़क पर यातायात के नियमों की धज्जियां उड़ाने वालों पर नाराजी जाताना तो दूर शालीनता पूर्वक गलत आचरण रोकने से कभी रोका-टोका नहीं जाता? यदि किसी व्यक्ति ने इन निरंकुश नियम तोड़ने वालों को रोकने या टोकने का प्रयास किया भी तो उपस्थित समुदाय ने उसका  साथ देने या साथ खड़े होने की कभी हिम्मत नहीं दिखाई?

तब समाधान क्या हो यह एक विचारणीय यक्ष प्रश्न है? हमे याद है बचपन मे प्राइवेट सुरक्षा बल कहीं दिखाई नहीं देते थे। लचर कानून व्यवस्था  के अप्रभावी होने के चलते प्राइवेट सुरक्षा बलों के व्यवसाय आज एक बहुत बड़े सेवा दाता उद्योग हो गया है।  बड़े बड़े उद्योग, धंधे, सेवा प्रदाता और धनी मानी लोग और सरकारी गैर सरकारी अधिष्ठान आर्थिक रूप से सक्षम होने के कारण प्राइवेट सुरक्षा बलों की सेवाए ले सकते है पर सामान्य नागरिक छोटे दुकानदार, इंडस्ट्रीज़ इकाइयाँ आज भी पूर्णतायः पुलिस से प्राप्त सुरक्षा पर ही निर्भर है। चूंकि पुलिस अधिकारियों की असामाजिक तत्वों से आम नागरिकों की रक्षा/सुरक्षा मे चूक पर कोई जबाबदारी नहीं है और दुर्भाग्य से इस सुरक्षा की कोई सुनिश्चित गारंटी सरकार, प्रशासन और पुलिस महकमा नहीं देता तब आम जनों की स्थिति "दो पाटन के बीच....." वाली हो जाती है।  

कहने का तात्पर्य है कि समाज के असामाजिक तत्वों, गुंडे, बदमाश, चोर, लुटेरे, डाकुओं से अपने बाल-बच्चों, जान-माल, घर द्वार की रक्षा अपने आप ही करनी होगी या आपको सिर्फ भगवान का ही भरोसा करना होगा? आज के इस व्यक्ति वादी समाज मे टीवी, इंटरनेट, फ़ेस बुक विशेषकर व्हाट्सप्प मे व्यस्त समाज का बुद्धिजीवि वर्ग कदाचित ही परिवार से विलग पड़ौसी, रिशतेदारों, मित्रों से कोई वास्ता या भौतिक संपर्क रखता हो? व्हाट्सप्प विश्विध्यालय के इन तथाकथित  विद्वान, परास्नातकों उपदेशकों, वैज्ञानिकों, चिकित्सकों ने शायद  ही जमीनी स्तर पर  संगठित हो आपसी सुरक्षापर  मिल बैठ कर कभी कोई गंभीर चर्चा या मत-सम्मत रखा हो? इसके विपरीत गुंडे, बदमाश, लुटेरे चोर, डाकूँ और असामाजिक तत्व बहुत ही सीमित संख्या मे एक राय होकर लूट पाट के लिये एकजुट हो इस कुकृत को अंजाम देते है फिर  भले ही हिंसक आपराधिक कृत ही क्यों न करना पड़े। नगरों/महानगरों मे 2-3 असामजिक तत्व अवैध हथियारों के बल पर सैकड़ो लोगो पर भारी पड़ जाते है। जिसकी मुख्य बजह इन तत्वों द्वारा लूटपाट आदि मे अवैध हथियारों जैसे  चाकू, बंदूक, तमंचे, देशी बंब और कट्टों आदि का खुलकर उपयोग है। ये निर्दयी नरपिशाच लूट पाट करते समय आवश्यकता पड़ने पर हत्या करने मे भी नहीं चूकते। वे ये अच्छी तरह समझते है कि पीढ़ित या घटनास्थल पर  उपस्थित लोग शायद ही उनकी लूटपाट का विरोध करें। बदमाश अच्छी तरह जानते है कि देश के 99.99% आम लोग हथियारों या आत्मरक्षा के उपकरणों से सुसज्जित होते? दुर्भाग्य से न्याय मे देरी ने बदमशों के दिल मे कानून के खौफ को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। एक ओर जहां ये गुंडे तत्व लूटपाट करते है वही दूसरी तरफ चंद मामलों को छोड़ पुलिस बल इन तत्वों पर अंकुश लगाने मे पूर्णतय: नाकामयाब है और  ये ही कारण है कि सामान्य शांति प्रिय नागरिक पुलिस और गुंडे रूपी दो पाटों के बीच मे पिसने के लिये मजबूर है? किसी भी बड़े नगर के समाचार पत्र ऐसी घटनाओं से नित भरे पड़े रहते है।  

ऐसा नहीं है कि लुटने-पिटने बाले सारे पीढ़ित  नागरिक भीरु या कायर हों?  चोर बदमाशों से लुटने  को अपनी  नियति मान सहने को मजबूर हों? पुलिस के  ढुलमुल रवैया और अवैध तमंचे, बदूक से युक्त बदमाश से एक निहत्था नागरिक कैसे सामना करे? कदाचित यदि सामान्य नागरिक के पास भी कुछ अस्त्र-शस्त्र हों और लूट करने वालों को आम जनों से प्रतिवाद स्वरूप इन हथियारों के उपयोग की छूट हो, तो बदमाश भी अपने लूट पाट, चोरी, डकैती के कृत करने के पूर्व एक बार अवश्य सोचेगा? मेरा मानना है कि अमेरिका की तरह ही अपने देश के सामान्य नागरिकों को छोटी दूरी की मारक  क्षमता बाले, हल्के मानवीकृत अश्त्र-शस्त्रों, रिवॉल्वर आदि  को आत्मरक्षार्थ रखने/उपयोग करने की छूट मिलनी चाहिये। यदि कुछ वैधानिक आवश्यकता हो तो कम से कम औपचारिकता के साथ छोटे हथियारों की रखने की छूट साधारण नागरिकों को आवश्यक ही मिलनी चाहिये। इस मुद्दे पर विषय विशेषज्ञों द्वारा विस्तृत विचार विमर्श और चर्चा तो की ही जा सकती है।

एक मत ये भी आ सकता है कि इससे तो समाज मे हिंसा और और अराजकता बढ़ेगी? मेरा मानना है, "यूं भी आसामजिक गुंडा तत्व एक तरफा तरीके से सामान्य जनों के साथ छीना  झपट्टी लूट-पाट तो कर ही रहा है"। पुलिस इन घटनाओं को रोकने मे सक्षम नहीं है तो फिर आम नागरिक सुरक्षित तो तब भी नहीं है। असामाजिक तत्वो द्वारा लूटपाट की घटनायेँ आजभी निर्वाध जारी है। यदि छोटे हथियारों की अनुमति सामान्य नागरिकों को होगी तो बदमाश गुंडे तत्वों को कहीं न कहीं ये  भय तो अवश्य  होगा कि उनके लूटपाट का कहीं विरोध भी हो सकता है।  असामाजिक तत्वों को ये संदेश देना आवश्यक है कि उनके  कुत्सित लूटपाट के   एक तरफा अवैध हथियारों का इस्तेमाल को पीढ़ित पक्ष भी हथियार का उपयोग कर चुनौती दे धराशायी कर सकता है? अन्यथा, सालों से ये गुंडे तत्व अवैध हथियारों की दम पर सामान्य शांतिप्रिय नागरिकों के साथ  सिर्फ लूट-पाट ही तो करते आये है।

अपराधियों और असामाजिक तत्वों को तो अवैध असलहे  बड़े आराम से कुछ रुपए खर्चने पर मिल जाते है। कई बार का सजायाफ्ता अपराधी जेल से छूटने के बाद फिर इन्ही अवैध हथियारों की सहायता से पुनः अपराध करता है और 99% शांतिप्रिय नागरिक बारंबार इन आतताइयों का शिकार बनते रहते है। यदि कोई साधारण नागरिक इन की शिकायत पुलिस थाने मे करती है तो अपने आये दिन के अपराधी मेहमानों के प्रति  पुलिस का रवैया नरम रहता है और यहाँ भी आम नागरिक पुलिस की मानसिक यांत्रणा का शिकार होता है।

इसलिये समाज के इन दुर्दांत अपराधियों की नकेल कसने के लिए इनके कुकृत्यों पर काबू पाने के लिये सरकार को  देश के आम नागरिकों को हल्के और कम मारक हथियारों देने/रखने  की नीति बनाना चाहिये ताकि शांति प्रिय नागरिक अपराधियों, असामाजिक तत्वों से प्रतिकार करने मे सक्षम हो सकें और असामाजिक तत्वों, गुंडों, बदमशों को भी ये संदेश दिया जा सके कि अब उनके घृणित कृत के विरुद्ध शासन, प्रशासन एवं आम जन एकजुट है।

विजय सहगल                        

मंगलवार, 24 नवंबर 2020

बुंदेलखंडी राइम्स

 

"बुंदेलखंडी कवितायें"




नोट- ये बुंदेलखंडी लघु कवितायें मुझे बचपन मे "केशर बऊ" ने सुनाई थी कुछ याद रही कुछ स्मृतियों से विस्मृत हो गई। इन पंकियों के लेखक वो स्वयं थी या कोई और मै दावे के साथ नहीं कह सकता। पर इन छोटे  बच्चों की "रायिम्स" को पूरे बुंदेलखंड मे खूब सुना और सुनाया जाता था। लुप्त प्रयाह इन कविताओं को संकलन करने का प्रयास है इसमे अन्य परिजन भी अपना योगदान अपनी बुद्धि विवेक की ऊर्जा से स्मरण कर कर सकते है।  

(1)

मेरे लंबे लंबे सेओ।
जिसकी गरज पड़े तो लेयों॥
पैसा थाली मे रख देओ।
बर्ना तान दुपट्टा सो॥

(2)

पंचकुइयों पै लगा बाज़ार।
मालिन बैठी है दो चार॥
लै लो, लै लो मेरे यार।
ये तो चंपकली का हार॥

(3)

गोली जैनियों ने खाई।
जाकर दुकान खूब चलाई॥
बेंचे जीरों,धनिया राई।
जिसमे नफा चौगनी पाई॥

 

(4) "सर्दी"

वारेन से बोले नईं,
ज्वान हमारे भाई।
बूढैन को छोड़े नईं,
चाहे ओढ़े दस रज़ाई॥

विजय सहगल


शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

गैर निष्पादित परिसंपत्तियाँ

 

"गैर निष्पादित परिसंपत्तियाँ"



मैंने दिल्ली को पदस्थपना या निवास हेतु अपनी प्राथमिकता सूची मे सबसे आखिरी पायदान पर  रखा था। दिल्ली की भीड़भाड़, बेदिल लोग और प्रदूषण की पराकाष्ठा ने हमे यहाँ रहने या वसने के लिये  कभी आकर्षित नहीं किया। पर 2015 मे प्रादेशिक निरीक्षणालय नई दिल्ली की  पदस्थपना से मै बहुत ज्यादा प्रसन्न तो नहीं था पर नौकरी तो नौकरी थी, बैंक का आदेश सिरोधर्य मान मैंने कार्य ग्रहण किया। दिल के किसी  कोने मे थोड़ी बहुत तसल्ली इस बात की थी कि हम जैसे गाँव, कस्वे मे पले  बढे   व्यक्ति  अपनी प्रौढ़ अवस्था मे चका-चौंध वाले दुनियाँ मे प्रसिद्ध कॉनाट प्लेस के हृदय स्थल  जैसे  स्थान पर कार्यरत है।

सेवानिव्रत्ति तक का लगभग तीन साल का दिल्ली प्रवास, कुछ खट्टे मीठे अनुभव मिश्रित रहा, पर देश की राजधानी दिल्ली की अच्छी बुरी कार्य संस्कृति से मेरा परिचय बखूबी हुआ और एक नई कार्य पद्धति को जानने समझने का मौका मिला। इसमे कोई भी संशय नहीं कि आर्थिक रूप से विकसित इस शहर मे बैंकिंग व्यवसाय की असीमित संभावनायेँ इस क्षेत्र मे है जिसका लाभ जहां एक ओर बैंक के व्यवसायगत पक्ष को मजबूत करता है वही दूसरी ओर यहाँ कार्यरत स्टाफ को प्रोन्नति के अनेक अवसरों को भी खोलता है। यदि आपकी तारतम्यता या संवाद  उच्च अधिकारियों से अच्छे से बैठ जाये? तो उच्च और उच्चतम अधिकारियों के संपर्क एवं सानिध्य का लाभ भी गाहे बगाहे यहाँ पदस्थ स्टाफ विशेष कर अधिकारी स्टाफ  को अनेकों बार प्रोन्नति मे स्वाभाविक रूप से सहायक रहा है।  दिल्ली एवं महानगरों मे पदस्थ स्टाफ के मुक़ाबले देश के छोटे और पिछड़े क्षेत्र मे पदस्थ स्टाफ को अपनी कड़ी मेहनत और समर्पण के बावजूद उच्च अधिकारियों के संपर्कों और स्वाभाविक रूप से महानगरों के आर्थिक विकास के अवसरों  के लाभ से वंचित रहना पड़ता है जिससे प्रायः छोटे शहरों मे पदस्थ स्टाफ को प्रोन्नति के अवसरों मे भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। इस असमानता को मैंने अपने दिल्ली कार्यकाल मे नजदीक से देखा और महसूस किया।

एक बड़े आश्चर्य की बात मैंने कार्यालय मे देखी।  एक मुख्य प्रबन्धक पदासीन आकर्षक व्यक्तित्व  जो सुबह-शाम  समय-वेसमय कार्यालय मे अमिताभ बच्चन स्टाइल मे आते। अपनी टेबल कुर्सी पर करीने से विभिन्न दबाइयों को सजा कर नुमाइश लगाते। अधिवार्षिकी के नजदीक पैर मे नसों की खिचाब होने के कारण धीरे-धीरे महानायक की स्टाइल मे चलते। उनकी चलने की स्टाइल पर कुर्बान होने का दिल करता। दिल मे आता अपने पैर को तोड़ कर उनकी चलने की अदा को अपना ले!! पर महानायकों की अदा सबके नसीब मे कहाँ?

उनकी टेबल पर फोन, कम्प्युटर, टेलीफ़ोन, प्रिंटर सब अपनी जगह चुस्त और दुरुस्त। क्या मजाल कहीं कोई कमी बेशी हो। जरा भी साफ सफाई मे कमी होती तो अशोक को बुला सफाई कराते। तत्पश्चात नीचे या कैंटीन मे नाश्ते चाय का आदेश हो जाता। तुर्रा ये कि कार्यालय का काम हो या न हो पर एक सबस्टाफ उनकी सेवा मे चाहिये ही!! ये सब करते कराते ग्यारह साढ़े ग्यारह बज जाता।  रजिस्टर मे उपस्थिती दर्ज कर कॉनाट प्लेस की हर फ्लोर पर स्टाफ से  मिलना जुलना होता। कुछ चर्चा आदि के बाद दोपहर के भोजन का समय हो जाता। लंच मे चार खंड का टिफिन प्लेट, चम्मच आदि उनकी टेबल पर लग जाती। किसी नवागंतुक स्टाफ के प्रथम परिचय मे खुले दिल से स्वागत सत्कार कर आवभगत कर "प्रथम-प्रभाव" डालने मे उन्हे महारथ हासिल थी।  

एक-डेढ़ बजे लंच से फ्री हो यहाँ वहाँ फोन आदि पर जनसम्पर्क। तत्पश्चात जनसुनवाई एवं दिनभर के कार्यकलापों पर उपसंहार पश्चात शाम की चाय पर चर्चा और इस तरह  कार्यालय मे कार्य की समाप्ती की घोषणा। टेबल पर पड़े समान को सलीके से बंद करना उनकी नित्य की दिनचर्या मे समाहित था। इस तरह बैंक के एक कार्य दिवस का अवसान अर्थात दिहाड़ी पक्की। उपस्थिती रजिस्टर मे हस्ताक्षर के बाद शायद ही पेन अगले दिन की उपस्थिती दर्ज़ करने के पूर्व खुले। छुट्टी का कोई समुचित रेकॉर्ड नहीं। लीव लगाना न लगाना उनकी मर्जी पर था।  उक्त आकर्षक व्यक्तित्व मुख्य प्रबन्धक, का ये रूटीन विना किसी विशेष फेर-बदल के उनके सेवानिवृत्ति तक जारी रहा।

जानकार हैरानी होती है देश की राजधानी मे स्थित पूर्व प्रधान कार्यालय परिसर मे एक मुख्य प्रबन्धक पदासीन अधिकारी की दिनचर्या लगभग एक वर्ष मैंने ऐसी ही देखी।  इसके पूर्व के कार्यकाल के कार्यकलापों  का हमे कोई ज्ञान नहीं। लेकिन इस लगभग  एक साल के कार्यकाल के आधार पर विद्वजनों को उनके भूतकाल के कार्यकलापों का अनुमान लगाने मे किंचित भी कठिनाई नहीं होनी चाहिये? सवाल ये नहीं कि हर व्यक्ति मे कार्य के प्रति ज़िम्मेदारी के दायित्व का बोध हो या ये भी नहीं कि कोई व्यक्ति का कार्यव्यवहार अचानक एक दिन मे बदला हो, निश्चित ही ऐसे व्यक्ति पूर्व मे भी अपने ऐसे आचरण के लिये सुविख्यात रहे होंगे? अफसोस इस बात का है कि इस तरह के लोग लगातार स्केल वन से स्केल फोर तक पहुंचे कैसे??  क्या उच्च अधिकारियों ने परितोषित के रूप मे ऐसे व्यक्ति को प्रत्येक स्केल मे  प्रोन्नति दे अपने अधिकारों का दुर्पयोग नहीं किया? या संबन्धित अधिकारियों ने हर स्केल पर  एक अधिक योग्य व्यक्ति/अधिकारी को प्रोन्नति के अधिकार  से वंचित कर उसके प्रति अन्याय और अपराध नहीं किया??  क्या कुशल श्रेष्ठ जनों को इस अन्याय और अपराध के विषय मे चिंतन मनन नहीं करना चाहिये?? क्या ऐसे कृत्य बैंक के समामेलन और बैंक को इतिहास के काल खंड का हिस्सा बनाने के लिये दोषी नहीं है?? क्या इन  सारे पहलूँओं पर चिंतन मनन की आवश्यकता नहीं होनी चाहिये? आइये मंथन करें।

विजय सहगल        

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सोमवार, 16 नवंबर 2020

स्व॰ श्री सतीश चंद्र सेठ

"स्व॰ श्री सतीश चंद्र  सेठ"

(विनम्र श्रद्धांजलि)








मंजिल पर पहुँचना भी, खड़े रहना भी।

बहुत मुश्किल है बड़े होकर भी, बड़े रहना भी॥ 

 

किसी शायर की ये खूबसूरत पंक्तियाँ हर उस सफल व्यक्ति की बुनियाद है जो किसी संकल्प को सेवा भावना से निस्वार्थ और समर्पित भाव से पूरा करने मे जी जान से जुटे रहते है। ऐसे ही एक सच्चे कर्मयोगी मौराँवा के पूर्व तालुकेदार परिवार मे जन्मे श्री सतीश चंद्र सेठ से मेरा परिचय 1980 मे लखनऊ मे  हुआ जो समाज सेवा मे अनासक्त भाव से रत थे। वे एक सामाजिक पत्रिका "खत्री हितैषी" के दशकों तक एक छोटे संपर्क सूत्र मात्र थे लेकिन पर्दे के पीछे  उन्होने पत्रिका के सफल प्रकाशन का श्रेय सदा ही समाज के अपने सम्मानीय अग्रजों और समाज सेवकों को दिया।  बैसे पत्रिका मे कोई ऐसी विशेषता न थी जैसी अन्य प्रचलित साहित्यिक, राजनैतिक, समाचार एवं  व्यापारिक  पत्रिकाओं मे होती है। पत्रिका का मुख्य आकर्षण खत्री समाज मे अपने पुत्र/पुत्रियों के वैवाहिक संबंध हेतु वर/वधू की तलाश मे चिंतातुर संरक्षकों को योग्य बालक/बालिकाओं की सूचना उपलब्ध कराना था। आज की तरह समाचार पत्रों मे मेट्रीमोनियल का चलन भी उन दिनों न था और ऐसे समय  विवाह योग्य युवक युवतियों की सूचनाओं का  पत्रिका मे प्रकाशन की शुरुआत करना उस समाज की उन्नतशील और प्रगतशील सोच को दर्शाता है।   

यूं तो पत्रिका 1936 से लगातार प्रकाशित उक्त पत्रिका का प्रचार वेशक सीमित संख्या मे था पर देश के प्रायः प्रत्येक शहर मे  पत्रिका का प्रसार था जहां खत्री जाति के लोग थोड़े या बहुतायत मे निवासरत थे। 1936 से 70-80 के दशक तक जब सूचना संपर्क के साधन बहुत ही सीमित थे। दूरभाष और दूरसंचार उतना विस्तारित नहीं हुआ था। ऐसे समय वैवाहिक संबंधों  के लिये योग्य वर-बधू की तलाश हर जाति मे एक कठिन पर अति महत्वपूर्ण कार्य होता था। ऐसे समय खत्री जाति के समाज सेवकों और बौद्धजीवियों द्वारा  पत्रिका का प्रकाशन शुरू करना उनकी विकासशील सोच और दूरदृष्टि को जाता है। सौभाग्य से अक्टूबर 1949 एवं 1962 के  अंक जिन्हे  श्री सतीश सेठ और मैंने तालबेहट प्रवास के दौरान 1985 मे स्व॰ श्री दयाली बट्टा जी के परिवार  से प्राप्त किया था के चित्र संलग्न है। सोचिए 70 वर्ष पूर्व  इस पत्रिका मे जिन  विवाह योग्य बालक बालिकाओं की सूचना प्रकाशित हुई होगी उनके संरक्षकों, माता पिताओं  की  सोच कितनी आधुनिक और प्रगतिशील रही होगी।

सामाजिक कार्यों को निष्पादन एवं प्रदर्शन मे आर्थिक पहलू  हमेशा ही एक चुनौती पूर्ण कार्य रहा है, खत्री हितैषी के अक्टूबर 1949 के अंक मे तत्कालीन संपादक श्री लक्ष्मी नारायण टंडन, प्रेमी जी ने अपने संपादकीय मे दर्द व्याँ किया है। ऐसे तमाम कठिनाइयों के बीच 1970-80 के दशक से 2004-05   तक के चार दशकों तक "खत्री हितैषी" के निर्वाध प्रसारण प्रकाशन किसी साधारण व्यक्ति के बूते की बात नहीं थी, ऐसा भागीरथी प्रयास समाज के महमानव श्री सतीश चंद सेठ जैसे समाज सेवी के बूते की ही बात थी। जिन्होने लगभग चार दशक तक समाज के विवाह योग्य बालक बालिकाओं की सूचना मासिक पत्रिका "खत्री हितैषी" मे लगातार निशुल्क    प्रकाशित कर एक बहुत बड़े सामाजिक उत्तरदायित्व को  पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ अनासक्त भाव से निष्पादित किया। हमे अच्छी तरह याद है पत्रिका के आर्थिक पक्ष को मजबूत करने के लिये श्री सेठ जी छोटे बड़े शहरों के भ्रमण मे सामाजिक सदस्यों से संपर्क कर उन शहरों के व्यापारी वर्ग से विज्ञापन प्राप्त कर "एक पंथ दो काज" को चरितार्थ करते।  

मैंने उक्त पत्रिका के बारे मे सुन तो रक्खा था पर प्रबंधन के किसी भी व्यक्ति से मेरा परिचय न था। 1980 मे लखनऊ मे  बैंक सेवा काल मे डाक टिकिट संग्रह के शौक के कारण लखनऊ जीपीओ के बाहर एक पोस्टर पर पत्रिका द्वारा सामाजिक कार्यक्रम की सूचना के आधार पर मेरी मुलाक़ात कार्यक्रम मे श्री सतीश सेठ जी से हुई थी। सामान्य शिष्टाचार और भेंट के बाद उनसे मेरी अनौपचारिक मुलाक़ात उनके निवास राणा प्रताप मार्ग पर स्थित उनके निवास पर हुई जो मेरे कार्यालय नवल किशोर रोड, हज़रत गंज से नजदीक ही था। लखनऊ के प्रवास के दौरान 1984 तक मेरा प्रायः उनसे मिलना जुलना निरंतर जारी रहा।  

सेठ जी से मुलाक़ात के पूर्व तक मेरे दिल मे पत्रिका के प्रकाशन हेतु किसी बड़े कार्यालय और उसमे कार्यरत अनेक कर्मचारियों के कार्य करने की परिकल्पना थी।  प्रकाशन संस्थान की तरह  अलग अलग विभाग आदि के चित्रों की छवि मेरे अंतश्चेतना पटल पर थी जैसे डाक प्राप्ति विभाग, रचनाओं के प्रूफ बनाने और प्रूफ रीडिंग विभाग, हिसाब किताब के लिये अकाउंट, प्रकाशन विभाग और डिस्पैच सेक्शन आदि। लेकिन उनके आवास कम कार्यालय पर उनसे हुई मुलाक़ात के दौरान मै देख के हैरान था कि उनकी एक छोटी सी टेबल ही उनकी मासिक पत्रिका का कार्यालय था। वे ही डाक प्राप्ति कर्मचारी से लेकर प्रेषण विभाग के इनचार्ज थे। गहराई से परिचय उपरांत जानकर मै हतप्रभ था पत्रिका जरूर चौक मे स्थित प्रेस मे छपती थी पर पत्रिका की प्रूफ रीडिंग वे स्वयं ही करते थे। पत्रिका के सदस्यों का रख रखाव एवं  पत्राचार, मौद्रिक  लेखा जोखा, वार्षिक एवं आजीवन सदस्यों का रजिस्टर, विवाह योग्य बालक/बालिकाओं की सूची, अन्य सामाजिक गतिविधियों के समाचार, रचनाओं, बैंक का हिसाब किताब आदि  वे खुद ही देखते थे। सबसे बड़ा कार्य हर माह पत्रिका को प्रेस से ला कर सदस्यों का नाम पता अपने हाथों से लिख कर पुनः समस्त   प्रतियों पर डाक टिकिट चिपका कर  चौक स्थित पोस्ट ऑफिस मे साईकिल पर लाद कर डिस्पैच हेतु  ले जाना कोई साधारण कार्य न था। एक ही व्यक्ति द्वारा उक्त सारे कार्य करना श्री सतीश सेठ  जैसे व्यक्तित्व के बूते की बात थी और कोई ये एक अंक के प्रकाशन या एक माह की बात नहीं थी निरंतर लगभग तीन दशक से अधिक तक अहर्निश पत्रिका का प्रकाशन कर समाज सेवा करना किसी जाति  भूषण का ही कार्य हो सकता था। उन्होने विवाह योग्य बालक/बालिकाओं की अधिक से अधिक सूचना एकत्रित करने हेतु अनेकों छोटे-बड़े शहरों मे सक्रिय समाज सेवी अवैतनिक  संवाददाताओं की नियुक्ति कर उन लोगों का सकारात्मक सहयोग लिया। समाज के अनेक प्रबुद्ध सदस्यों के साथ कुछ वर्ष संवाददाता होने का सौभाग्य मुझे भी मिला था।  उनका व्यक्तित्व एक चलता फिरता सूचना केंद्र था जो समाज की सारी गतिविधियों पर नज़र रख समाज सेवा मे निरंतर रत थे। उनके इस समर्पण और निष्ठा के कारण जब तक मै लखनऊ प्रवास पर रहा मुझ से जो थोड़ा बहुत  बन पड़ा किया।  मैंने पत्रिका के प्रेषण पूर्व सदस्यों का नाम पता लिखने का कार्य कर सहयोग किया। कभी कभी प्रूफ रीडिंग का भी कार्य कर मैंने पत्रिका हेतु किया। मुझे लिखते हुए कोई झिझक और संकोञ्च नहीं कि पत्रिका मे तमाम पदधारियों के नाम व अलंकरण  छापे जाते रहे पर कदाचित ही किसी को मैंने उनके पत्रिका प्रकाशन के कार्य मे सहभागी होते अपने लखनऊ प्रवास के दौरान  देखा।

श्री सतीश  सेठ जी से मिलने स्थानीय एवं लखनऊ से बाहर के अनेकों लोग लड़के लड़कियों के वैवाहिक रिश्तों के सिलसिले मे उनसे मिलने आते थे। सेठ जी के इस परम पुनीत सामाजिक कार्य की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है लेकिन उनके इस समाज सेवा के कार्य को सफलता पूर्वक सम्पादन कर परणती तक पहुँचाने मे अदरणीय भाभी के सहयोग और अतिथि सत्कार के विना कदापि संभव न था। जहां सेठ जी अपने सेवाभावि जुनून के कारण पत्रिका के प्रकाशन मे समर्पित थे वही आदरणीय भाभी जी ने सच्ची जीवन संगनी का दायित्व निभा कर घर परिवार और बच्चों का उत्तरदायित्व पूरी ज़िम्मेदारी के साथ निभाया। उनका यह सहयोग भी पत्रिका के प्रकाशन की सफलता मे एक बहुत बड़ा आधारभूत योगदान की तरह स्मरण किया जाएगा।

आज के इस सूचना तकनीकि काल मे आज की पीढ़ी वेशक उनके योगदान को महसूस न कर सके लेकिन इक्कीश्वी सदी के पूर्व के सामाजिक लोग  उनके सहयोग को भुला न पायेंगे। वे हजारों हज़ार संरक्षक जिनके पुत्र/पौत्रियों के सफल वैवाहिक संबंध खत्री हितैषी पत्रिका के माध्यम से हुए उन्हे याद किये बिना न रहेंगे।

10 नवम्बर 2020 को  उनके देहावसान का अत्यंत दुःखद समाचार प्राप्त हुआ,  सहसा विश्वास नहीं हुआ। अभी पिछले जून 2019 को उनसे उनके लखनऊ स्थित आवास  पर  मुलाक़ात हुई थी। ऐसा नहीं लगता था कि अदरणीय सेठ  साहब का इतनी जल्दी इस तरह विछुड़ना होगा। उनका निधन मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है। मेरा बहुत लंबा और निकटस्थ संबंध उनसे रहा। "खत्री हितैषी" पत्रिका के माध्यम से समाजिक दायित्वों के प्रति पूरी तरह समर्पित ऐसी निष्ठा मैंने किसी मे नहीं देखी। उनके दुःखद निधन की जानकर वेहद दुःख और वेदना हुई। ईश्वर से प्रार्थना है उनको अपने श्री चरणों मे स्थान दे। अदरणीय भाभी जी एवं पूरे सेठ परिवार को इस अपूर्णीय  क्षति को सहन करने की शक्ति दे। स्व॰ श्री सतीश चंद सेठ जी को हम अश्रुपूरित हार्दिक एवं भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते है

विजय सहगल 

शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

रात दीवाली, दिया जलाना

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"रात दीवाली दिया जलाना "



अब कोई रावण न लांघे,
लक्ष्मण रेखा की हद से।
जीते जी न आ पायेगा,
दुश्मन देश की सरहद पे॥
मां को तो मालूम यही है,
खतरों से लड़ना सीखा है।
बचपन मे थे संगी साथी,
पर मुकाबला अब तीखा है।
उसको बस ये बतला देना,
भागा नही, न पीठ दिखाई।
मार के दस, दुश्मन के तब,
लगी गोलियां सीने खाई॥
सोते मे उठ जाती होगी,
थोड़ी सी भी आहट से।
उनको आशा थी, मै करता,
सेवा, बिना थकावट के॥

प्रातः उठ, पूंछे जब बच्चे,
दूर गये कह, टहला देना।
चन्द्र खिलौने हम लाएँगे,
दिखा चाँद को बहला देना॥
"शाला" से बापस जब आयें,
"सीख" सदा हो आगे बढ़ना।
पापा जल्दी ही आयेँगे,
काम उन्हे बहुतेरे करना॥
हों निडर, साहसी दोनों,
डिगे नहीं बाधाओं से।
हर संकट से लड़ना सीखें,
सेना के योद्धाओं से॥

कुछ दिन सखा, सनेही, स्वजन,
बिसरे दिन की याद करेंगे।
हो कृतज्ञ मन, ऋणी सभी का,
सब मिल के संताप हरेंगे॥
घने अंधेरे मे सीमा पर,
"रोशन दिये" याद आयेंगे।
घर, आँगन औ कुटुम कबीला,
दिल ही दिल मे तड़पायेंगे॥
रात सुनहरी सपनों मे तुम,
"दुल्हन रूप" सजा, फिर आना।
अपने घर की दहलीज़ पर,
रात दीवाली, एक दिया जलाना॥
दरबाजे पर खड़ी न रहना,
राह मिलन की मकसद से।
अगर कंही मैं आ न पाऊं
देश की खातिर सरहद से॥

विजय सहगल