"हथियार"
अभी कुछ माह पूर्व भारत ने फ्रांस से राफेल लड़ाकू जहाज की खरीद की।
जिसके बारे मे दावा है कि इसकी मारक क्षमता दुनियाँ मे सर्वश्रेष्ठ है। इस के आने
से देश की रक्षा व्यवस्था बहुत मजबूत हो गई है। इससे ये तो स्पष्ट है कि आधुनिक
लड़ाकू विमानों, टैंक और तोपों एवं मशीन
गन आदि से देश की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत ही नहीं होती बल्कि शत्रुओं को बगैर लड़े
ही ये स्पष्ट संदेश जाता है कि वो अपनी हद मे रहे अन्यथा उसे एक भयंकर विनाशकरी परिणाम
भुगतने पड़ेंगे। ये तो हुई सीमा पर देश के
शत्रुओं से लड़ने की रीति नीति।
देश की सीमाओं पर देश की रक्षा की
ज़िम्मेदारी जहां सेना और सीमा सुरक्षा दल सहित अन्य सशस्त्र बालों पर है वहीं देश
के अंदर देश के नागरिकों की रक्षा-सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था की ज़िम्मेदारी प्रदेशों
की पुलिस बलों पर है। देश के सुरक्षा बलों
द्वारा देश के अंदर सामान्य नागरिकों के शांति पूर्ण
जीवन के लिए परिस्थितियों का निर्माण आवश्यक ही नहीं एक कल्याण कारक राष्ट्र की
मुख्य नीति भी होती है। पर अपने देश के भीतर ऐसी स्थिति है नहीं?
असामाजिक तत्वो, गुंडा तत्वों द्वारा
किसी भी शहर मे साधारण नागरिकों के साथ लूटपाट,
पर्स, सोने की चैन,
वाहनों की चोरी मोबाइल सहित अन्य कीमती वस्तुओं की छीना झपट्टी और लूटपाट आये दिन की बात है। असामाजिक तत्वों/गुंडों द्वारा गैर कानूनी अवैध असलहों की
सहायता से आये दिन लूटपाट, चोरी और डकैती
की घटनायें समाचार पत्रों और टीवी चैनल्स पर देखने और सुनने को मिलती है। ये
असामाजिक तत्व अच्छी तरह जानते है कि लूटपाट की घटनाओं को अंजाम देते वक्त पीढ़ित/भुक्त-भोगी
शत-प्रतिशत मामलों मे प्रतिरोध नहीं करेगा और लुटने-पिटने को अपनी नियति मान कुछ
दिन व्यवस्था को कोसने के बाद चुप हो बैठ जायेगा। सुरक्षा बलों द्वारा आम जनों की
सुरक्षा मे कोताही वरतने का सबसे
बड़ा कारण पुलिस विभाग मे व्याप्त भ्रष्टाचार,
राजनैतिक हस्तक्षेप, और अपनी ज़िम्मेदारी
निभाने मे निष्ठा समर्पण और ईमानदारी का अभाव। प्रदेशों मे तैनात पुलिस कर्मियों
द्वारा कानून व्यवस्था को नियंत्रण करने मे कुछ हद तक अक्षमता
और काफी हद तक भ्रष्टाचार प्रमुख कारण है।
संगठित गुंडे असामाजिक तत्व भले ही संख्या
मे 4-5 हों वे असंगठित चालीस-पचास आम जनों पर भारी पड़ जाते है। यदि इन असंगठित आम जन के समूह मे चार-पाँच सौ बुद्धिजीवी,
पढे-लिखे और कानून के जानकार है तो मान कर
चले 4-5 गुंडे भी इन पर भारी पड़ेंगे। अपने यहाँ आम
लोगो का स्वभाव हो गया है कि दूसरे पर आयी मुसीबत या संकट को मौन रहकर अनदेखा करें?
जीवन के किसी भी क्षेत्र मे आप देख ले आततायी,
दुष्ट क्रूर व्यक्ति के विरुद्ध शारीरिक प्रतिरोध तो दूर की बात है मौखिक प्रतिवाद
भी कोई नहीं करता फिर चाहे कोई विभाग हो,
पड़ौस का मामला हो या सड़क चलते कोई या उत्पीढन झगड़ा फसाद?
26/11 के मुंबई मे आतंक वादियों के मामले मे यही हुआ था। अनेक लोगो ने कुछ संदिग्ध,
अंजान लोगो को समुद्र से लगी वस्ती मे बड़े-बड़े बैग आदि के साथ आते देखा था पर किसी ने भी
उनको वहाँ होने पर पूंछ-तांच्छ कर रोका टोका नहीं। एक दो व्यक्ति भी यदि उन्हे
टोकते? या शालीनता पूर्वक पूंछते "यहाँ
कैसे"? या आप लोग कौन है?
कहाँ से आ रहे है? आदि तो मान कर चले कोई बुरी नियत या इरादे वाला असामाजिक तत्व पूंछतान्छ से
ही वे घबरा जाते है। ऐसा अनेकों वार हुआ है कि मैंने अनियंत्रित वाइक चालकों,
ज़ोर से हॉर्न बजने वालों या खाली सड़क पर भी हॉर्न बजाने वालों को ज़ोर से "ऐइच" कह कर टोका या रोका है। चलती
वाइक या वाहनों से थूकने वालों को तो सैकड़ो वार मैंने "ऐ या "ऐइच" कह टोका!! बसों/रेलों मे बीड़ी
सिगरेट वालों को धूम्र पान के लिये रोकना भी इसमे शामिल है। हमारे देश का आम स्वभाव हो गया है कि सार्वजनिक स्थानों,
बस या ट्रेन की लाइन को तोड़ने वालों,
जगह जगह थूकने वालों, सड़क पर यातायात
के नियमों की धज्जियां उड़ाने वालों पर नाराजी जाताना तो दूर शालीनता पूर्वक गलत
आचरण रोकने से कभी रोका-टोका नहीं जाता?
यदि किसी व्यक्ति ने इन निरंकुश नियम तोड़ने वालों को रोकने या टोकने का प्रयास किया
भी तो उपस्थित समुदाय ने उसका साथ देने या
साथ खड़े होने की कभी हिम्मत नहीं दिखाई?
तब समाधान क्या हो यह एक विचारणीय यक्ष
प्रश्न है? हमे याद है बचपन मे
प्राइवेट सुरक्षा बल कहीं दिखाई नहीं देते थे। लचर कानून व्यवस्था के अप्रभावी होने के चलते प्राइवेट सुरक्षा
बलों के व्यवसाय आज एक बहुत बड़े सेवा दाता उद्योग हो गया है। बड़े बड़े उद्योग,
धंधे, सेवा प्रदाता और धनी मानी लोग और सरकारी
गैर सरकारी अधिष्ठान आर्थिक रूप से सक्षम होने के कारण प्राइवेट सुरक्षा बलों की
सेवाए ले सकते है पर सामान्य नागरिक छोटे दुकानदार,
इंडस्ट्रीज़ इकाइयाँ आज भी पूर्णतायः पुलिस से प्राप्त सुरक्षा पर ही निर्भर है।
चूंकि पुलिस अधिकारियों की असामाजिक तत्वों से आम नागरिकों की रक्षा/सुरक्षा मे
चूक पर कोई जबाबदारी नहीं है और दुर्भाग्य से इस सुरक्षा की कोई सुनिश्चित गारंटी
सरकार, प्रशासन और पुलिस महकमा नहीं देता तब आम
जनों की स्थिति "दो पाटन के बीच....." वाली हो जाती है।
कहने का तात्पर्य है कि समाज के असामाजिक
तत्वों, गुंडे,
बदमाश, चोर,
लुटेरे, डाकुओं से अपने बाल-बच्चों,
जान-माल, घर द्वार की रक्षा अपने
आप ही करनी होगी या आपको सिर्फ भगवान का ही भरोसा करना होगा?
आज के इस व्यक्ति वादी समाज मे टीवी,
इंटरनेट, फ़ेस बुक विशेषकर
व्हाट्सप्प मे व्यस्त समाज का बुद्धिजीवि वर्ग कदाचित ही परिवार से विलग पड़ौसी,
रिशतेदारों, मित्रों से कोई वास्ता
या भौतिक संपर्क रखता हो? व्हाट्सप्प
विश्विध्यालय के इन तथाकथित विद्वान,
परास्नातकों उपदेशकों, वैज्ञानिकों,
चिकित्सकों ने शायद ही जमीनी स्तर पर संगठित हो आपसी सुरक्षापर मिल बैठ कर कभी कोई गंभीर चर्चा या मत-सम्मत रखा
हो? इसके विपरीत गुंडे,
बदमाश, लुटेरे चोर,
डाकूँ और असामाजिक तत्व बहुत ही सीमित संख्या मे एक राय होकर लूट पाट के लिये
एकजुट हो इस कुकृत को अंजाम देते है फिर भले ही हिंसक आपराधिक कृत ही क्यों न करना पड़े। नगरों/महानगरों
मे 2-3 असामजिक तत्व अवैध हथियारों के बल पर सैकड़ो लोगो पर भारी पड़ जाते है। जिसकी
मुख्य बजह इन तत्वों द्वारा लूटपाट आदि मे अवैध हथियारों जैसे चाकू,
बंदूक, तमंचे,
देशी बंब और कट्टों आदि का खुलकर उपयोग है। ये निर्दयी नरपिशाच लूट पाट करते समय
आवश्यकता पड़ने पर हत्या करने मे भी नहीं चूकते। वे ये अच्छी तरह समझते है कि पीढ़ित
या घटनास्थल पर उपस्थित लोग शायद ही उनकी
लूटपाट का विरोध करें। बदमाश अच्छी तरह जानते है कि देश के 99.99% आम लोग हथियारों
या आत्मरक्षा के उपकरणों से सुसज्जित होते?
दुर्भाग्य से न्याय मे देरी ने बदमशों के दिल मे कानून के खौफ को पूरी तरह समाप्त
कर दिया है। एक ओर जहां ये गुंडे तत्व लूटपाट करते है वही दूसरी तरफ चंद मामलों को
छोड़ पुलिस बल इन तत्वों पर अंकुश लगाने मे पूर्णतय: नाकामयाब है और ये ही कारण है कि सामान्य शांति प्रिय नागरिक पुलिस
और गुंडे रूपी दो पाटों के बीच मे पिसने के लिये मजबूर है?
किसी भी बड़े नगर के समाचार पत्र ऐसी घटनाओं से नित भरे पड़े रहते है।
ऐसा नहीं है कि लुटने-पिटने बाले सारे पीढ़ित नागरिक भीरु या कायर हों?
चोर बदमाशों से लुटने को अपनी
नियति मान सहने को मजबूर हों?
पुलिस के ढुलमुल रवैया और अवैध तमंचे,
बदूक से युक्त बदमाश से एक निहत्था नागरिक कैसे सामना करे?
कदाचित यदि सामान्य नागरिक के पास भी कुछ अस्त्र-शस्त्र हों और लूट करने वालों को
आम जनों से प्रतिवाद स्वरूप इन हथियारों के उपयोग की छूट हो,
तो बदमाश भी अपने लूट पाट, चोरी,
डकैती के कृत करने के पूर्व एक बार अवश्य सोचेगा?
मेरा मानना है कि अमेरिका की तरह ही अपने देश के सामान्य नागरिकों को छोटी दूरी की
मारक क्षमता बाले,
हल्के मानवीकृत अश्त्र-शस्त्रों, रिवॉल्वर आदि को आत्मरक्षार्थ रखने/उपयोग करने की छूट मिलनी
चाहिये। यदि कुछ वैधानिक आवश्यकता हो तो कम से कम औपचारिकता के साथ छोटे हथियारों
की रखने की छूट साधारण नागरिकों को आवश्यक ही मिलनी चाहिये। इस मुद्दे पर विषय
विशेषज्ञों द्वारा विस्तृत विचार विमर्श और चर्चा तो की ही जा सकती है।
एक मत ये भी आ सकता है कि इससे तो समाज मे
हिंसा और और अराजकता बढ़ेगी? मेरा मानना है,
"यूं भी आसामजिक गुंडा तत्व एक तरफा तरीके से सामान्य जनों के साथ छीना झपट्टी लूट-पाट तो कर ही रहा है"। पुलिस इन
घटनाओं को रोकने मे सक्षम नहीं है तो फिर आम नागरिक सुरक्षित तो तब भी नहीं है।
असामाजिक तत्वो द्वारा लूटपाट की घटनायेँ आजभी निर्वाध जारी है। यदि छोटे हथियारों
की अनुमति सामान्य नागरिकों को होगी तो बदमाश गुंडे तत्वों को कहीं न कहीं ये भय तो अवश्य होगा कि उनके लूटपाट का कहीं विरोध भी हो सकता
है। असामाजिक तत्वों को ये संदेश देना
आवश्यक है कि उनके कुत्सित लूटपाट के एक तरफा अवैध हथियारों का इस्तेमाल को पीढ़ित
पक्ष भी हथियार का उपयोग कर चुनौती दे धराशायी कर सकता है?
अन्यथा, सालों से ये गुंडे तत्व
अवैध हथियारों की दम पर सामान्य शांतिप्रिय नागरिकों के साथ सिर्फ लूट-पाट ही तो करते आये है।
अपराधियों और असामाजिक तत्वों को तो अवैध
असलहे बड़े आराम से कुछ रुपए खर्चने पर मिल
जाते है। कई बार का सजायाफ्ता अपराधी जेल से छूटने के बाद फिर इन्ही अवैध हथियारों
की सहायता से पुनः अपराध करता है और 99% शांतिप्रिय नागरिक बारंबार इन आतताइयों का
शिकार बनते रहते है। यदि कोई साधारण नागरिक इन की शिकायत पुलिस थाने मे करती है तो
अपने आये दिन के अपराधी मेहमानों के प्रति
पुलिस का रवैया नरम रहता है और यहाँ भी आम नागरिक पुलिस की मानसिक यांत्रणा
का शिकार होता है।
इसलिये समाज के इन दुर्दांत अपराधियों की
नकेल कसने के लिए इनके कुकृत्यों पर काबू पाने के लिये सरकार को देश के आम नागरिकों को हल्के और कम मारक
हथियारों देने/रखने की नीति बनाना चाहिये
ताकि शांति प्रिय नागरिक अपराधियों,
असामाजिक तत्वों से प्रतिकार करने मे सक्षम हो सकें और असामाजिक तत्वों,
गुंडों, बदमशों को भी ये संदेश
दिया जा सके कि अब उनके घृणित कृत के विरुद्ध शासन,
प्रशासन एवं आम जन एकजुट है।
विजय सहगल