गुरुवार, 29 अक्टूबर 2020

पासपोर्ट मे पुलिस सत्यापन का औचित्य?

 

पासपोर्ट मे पुलिस सत्यापन का औचित्य?

(सतर्कता सप्ताह दिनांक 27 अक्टूबर से 2 नवम्बर 2020 पर विशेष)

 



अदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी,                       29.10.2020

महोदय,

सतर्कता सप्ताह दिनांक 27 ओक्टूबर से 2 नवम्बर 2020 पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध आपके संघर्ष के आवाहन सुना। कहीं न कहीं बहुत चाहते हुए आपके विचारों से सहमति के बावजूद दर्द और वेदना के साथ लिख रहा  हूँ कि  देश के नौजवान जब आपके आवाहन पर आपके विचारों से प्रभावित हो भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष मे जज्बाती हो शामिल होते है और जब उनके इन  जज़्बात को धरातल पर धराशायी होते देखता हूँ तो घोर निराशा और वेदना होती है। महोदय आपसे क्षमाप्रार्थी हो लिखने के लिये बाध्य हूँ कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध मे युवाओं की दुर्गति, तिरस्कार और अपमान  देख बड़ा कष्ट होता है। दुःख और क्षोभ तब और अधिक होता है जब भ्रष्टाचार की शिकायत पर संबन्धित उच्च अधिकारियों द्वारा मामले मे लीपा-पोती कर भ्रष्ट अधिकारियों को साफ-सुथरा, ईमानदार घोषित कर क्लीन-चिट दे दी जाती है तब शिकायतकर्ता और उसके संरक्षकों को आपका "सतर्कता सप्ताह के अंतर्गत भ्रष्टाचार के विरुद्ध  संघर्ष" इन अकर्मण्य अधिकारियों द्वारा एक "कपोल कल्पित औपचारिकता" मात्र तो नहीं बनाया जा रहा है?? कहीं ऐसा तो नहीं कि व्यवस्था को घुन की तरह चाटने बाले ऐसे शासकीय सेवक  कहीं नौजवानों की भावनाओं से खिलवाड़ कर अपने आप को सार्वभौमिक सर्वशक्तिमान मान   जानबूझ कर आपके प्रति क्षोभ और आक्रोश उत्पन्न करा रहे हों??

आपके नीति और कार्यक्रमों को सरकारी सेवक किस तरह  पलीता लगा व्यवस्था को पटरी से उतारने का कुत्सित प्रयास करते है जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते? जिसकी एक बानगी मै यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ।

महोदय लगभग दो माह (अगस्त 2020 मे)  पूर्व मेरे पुत्र ने नोएडा मे पासपोर्ट को रिन्यू कराने हेतु आवेदन किया था। समुचित प्रिक्रिया का अनुपालन करते हुए जब पासपोर्ट आवेदन पुलिस सत्यापन हेतु नोएडा पुलिस के पास आया तो पुलिस महकमे के संबन्धित अधिकारी द्वारा कागजों के साथ थाने मे बुलाया गया। आवश्यक कागज आदि थाने मे संबन्धित अधिकारी को देने के बाद उक्त अधिकारी द्वारा रिश्वत के रूप मे एक हजार रुपए की मांग की गई अन्यथा आवेदन मे एड्वर्स रिमार्क (प्रतिकूल टिप्पड़ी) कर अड़ंगा डालने की बात बेटे से कही गई। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आपके विचारों से प्रभावित होने के कारण उसने रिश्वत देने से इंकार कर दिया।

अवशयक पेपर के बाबजूद इस तरह की रिश्वत की मांग अनुचित थी। पासपोर्ट आवेदन के निरस्तीकरण की शंका-कुशंकाओं  के कारण बेटे ने इस घटना को उसी दिन पुलिस के उच्च अधिकारियों के संज्ञान मे लाने का निश्चय कर घटनाक्रम को पुलिस के उच्च अधिकारियों को ई-मेल के माध्यम से सूचित किया जिसका मुख्य मकसद  सूचना के साथ "सनद रहे तथा वक्त पर काम आवे" का उद्देश्य था।  सजग उच्च अधिकारी से अपेक्षा थी कि शिकायत की गोपनियता बनाये रख शिकायत की जांच कर समुचित कार्यवाही करते परंतु खेद और अफसोस के साथ लिखना पड़ रहा है कि उच्च अधिकारी द्वारा शिकायत की गोपनियता बनाये रख जांच तो  दूर शिकायती को ही शिकायत से अवगत करा गोपनियता को भंग किया गया। फलस्वरूप शिकायती द्वारा बेटे को तुरंत ही  फोन कर उसकी शिकायत उच्च अधिकारियों से करने का प्रतिवाद किया गया एवं  बेटे द्वारा एक हजार रुपए की मांग के  वर्तालाप की कॉल  रिकॉर्डिंग मोबाइल की गयी एवं  उक्त रिकॉर्डिंग को भी बाद मे जांच अधिकारी को डिस्क पर उपलब्ध कराया गया पर व्यर्थ और निरर्थक रहा? और जैसे कि अशांका थी संबन्धित अधिकारी ने "चार वर्ष के नोएडा का सत्यापन तो कर दिया लेकिन पाँचवे  बर्ष के सत्यापन की आवश्यकता" दर्शाने   की प्रतिकूल टिप्पड़ी के कारण  पासपोर्ट रिन्यूल कि प्रिक्रिया मे अवरोध डाल दिया गया।

अफसोस इस बात का नहीं कि रिश्वत की एक हजार रुपए के राशि न देने के कारण प्रतिकूल टिप्पड़ी की बजह से  पासपोर्ट के नवीनीकरण मे अनावश्यक लंबा विलंब अब तक जारी है बल्कि खेद इस बात का है कि सत्यापन अधिकारी द्वारा रिश्वत को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानने बाले अधिकारी को व्यवस्था द्वारा ईमानदार घोषित कर बेटे को शिकायत करने के साहस की  सजा पासपोर्ट के रिन्यूवल मे अड़ंगा डाल कर दी गई। ऐसा प्रतीत होता है मात्र एक हजार रुपए के रिश्वत रूपी राशि "सद्कार्य कोष" मे देने पर  अतिवादी, आतंकवादी, देश द्रोही भी पावन पवित्र वन पासपोर्ट पाने की अर्हता, योग्यता और सुपात्र बन सकते है?? पर रिश्वत न देने वाले लोग व्यवस्था द्वारा प्रताड़ित किये जाते है।  

·        रिश्वत को अपना विशेषाधिकार मानने बाले भ्रष्ट अधिकारी को एक हजार रुपए न देने की चुनौती देना क्या  कोई अपराध था जिसकी सजा अबतक पासपोर्ट से वंचित रख किया जा रहा है?

·        उच्च अधिकारियों को शिकायत करने के बावजूद कार्यवाही न होना "सतर्कता-सप्ताह" के औचित्य पर क्या एक बड़ा सवालिया निशान नहीं है??

·        उच्च अधिकारी द्वारा शिकायत की गोपनियता भंग कर शिकायती को बताना शिकायतकर्ता की सुरक्षा के साथ खिलबाड़ नहीं है???

·        जब पुलिस सत्यापन की प्रिक्रिया पूर्णतया: रिश्वत रूपी भ्रष्टतन्त्र पर ही टिकी है तो क्या इस पुलिस सत्यापन प्रणाली के औचित्य और आवश्यकता  पर सरकार को पुनर्विचार नहीं करना चाहिये????  

·        देश की रक्षा से  जुड़े पासपोर्ट जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ को जारी करने वाले अधिकारी जो चंद रूपये की ख़ातिर  अपना ईमान बेचने मे तत्पर हो देश की सुरक्षा संरक्षा से खिलवाड़ करने वाले अधिकारियों  की निष्ठा और प्रतिवद्धता की  कोई अन्य नवीन प्रणाली का विकास और विस्तार की  आवश्यकता पर  विचार नहीं किया जाना चाहिए????

मेरे बेटे को पासपोर्ट पाने की यात्रा मे और कितना विलंब होगा कह नहीं सकते? पर प्रधानमंत्री महोदय हमे इस बात की बेहद खुशी होगी कि मेरा बेटा आपकी सतर्कता मुहिम के एक सिपाही  के रूप मे आपके "भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष" मे शामिल है।

 

अभिवादन सहित,

 

विजय सहगल   

 

     

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

"टीआरपी" (टेलिविजन रेटिंग पॉइंट) घोटाला

"टीआरपी" (टेलिविजन रेटिंग पॉइंट) घोटाला



दिनांक 19 अक्टूबर 2020 मे श्री विभूति नारायण राय (पूर्व आईपीएस अधिकारी) का लेख "भारत क्यों न जाने टीआरपी घोटाले का सच" नवभारत टाइम्स मे प्रकाशित हुआ था। उस लेख के बारे मे मैंने अपनी प्रतिक्रिया संपादक के नाम  पत्र मे भेजी थी जिसे समाचार पत्र ने  दिनांक 20 अक्टूबर 2020 को रीडर्स मेल मे प्रकाशित किया था लेकिन शायद प्रितक्रिया पत्र बड़ा होने के कारण उसके कुछ ही अंश प्रकाशित हुए। मै अपनी पूर्ण विचार यहाँ आप लोगो के साथ सांझा कर रहा हूँ। हाँ एक बात और आज कल तकनीकि पर निर्भरता इतनी अधिक हो गई है कि इसके बिना एक कदम आगे नहीं बढ़ा जा सकता है ऐसा ही कुछ इस हफ्ते मेरे साथ हुआ कि घर से बाहर लेपटोप के बिना ब्लॉग लेखन/प्रेषण  मे विलंब हुआ।  -विजय सहगल॰  

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मै श्री राय जी के श्री अर्णव गोस्वामी एवं उनके रिपब्लिक टीवी चैनल के बारे मे उनके विचारों से पूर्णत: सहमत हूँ।  न केवल रिपब्लिक टीवी अपितु देश के प्रायः सभी टीवी चैनल्स विशेषतः हिन्दी टीवी चैनल्स की गैर जिम्मेदार व्यवहार व आचरण वास्तव मे "मीडिया जगत को शर्मसार" करने वाला है।

समाचार वाचन और पाठन मे  जब पत्रकार के दिल की भावनाएं उसके चेहरे पर परलक्षित होने लगे तो उसकी पत्रकारिता के प्रति निष्ठा और निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा होता है? उस दिन रिपब्लिक टीवी के विरुद्ध टीआरपी की खबर की प्रतिक्रिया स्वरूप ऐसी ही कुछ रहस्यमय और कुटिल हंसी और मुस्कान देश के सारे मुख्य टीवी चैनल्स के पत्रकारों के चेहरों पर दिखाई दी जिसे सराहा नहीं जा सकता और जो दुःख, चिंता एवं वेदना देने वाली है। श्री अर्णव गोस्वामी के  रिपब्लिक चैनल के टीआरपी कांड मे शामिल होने की खबर के  वाचन मे कुटिल और कपट पूर्ण मुस्कान एनडीटीवी के श्री रवीश कुमार और इंडिया टीवी के श्री रजत शर्मा सहित ज़ी टीवी के श्री चौधरी जी सहित आजतक एवं एबीपी सहित अन्य टीवी चैनल्स पर देखने को मिली जो दुर्भाग्य पूर्ण है। उस दिन और आगे के दिनों मे भी टीवी चैनल्स की टीआरपी पर टीवी चैनल्स की कतर व्योन्त उनके आपस मे गहरे मतभेद के बाबजूद एक स्वर मे रिपब्लिक टीवी के विरुद्ध कूकर थुक्का-फजीती इनके वास्तविक चरित्र को दर्शाती है। श्री रवीश कुमार के चेहरे का विधवा विलाप तो आश्चर्य चकित करने वाला  था। उन्हे दुःख इस बात का नहीं था कि एक टीवी चैनल ने अपनी टीआरपी क्यों बढ़ा ली उन्हे दर्द और चिंता  इस बात की थी कि उनके टीवी चैनल की टीआरपी क्यों और कैसे कम कर दी गई। उनका छद्म रुदन कुछ ऐसे पिता की तरह था जिसे  अपने बेटे के फ़ेल होने की  दुःख  और वेदना नहीं था अपितु कष्ट इस बात का था कि पड़ौसी का बेटा पास क्यों हो गया? टीआरपी मुद्दे पर आर्थिक लाभ के लिए विज्ञापन पाने की होड़  मे एक दूसरे की छीछा-लेदर करना  टीवी चैनल्स के  अंदर के घाव की  पीप और मवाद से भरे नासूर को दर्शाती है। दुर्भाग्य है आज सभी टीवी चैनल्स कहीं न कहीं किसी राजनैतिक दल की विचारधारा और प्रभाव से प्रभावित हो समाचार का प्रसारण कर रहे है। पर खेद और अफसोस तो तब होता है जब कोई चैनल देश का हित और सुरक्षा त्याग कर आस्तीनों के साँप बन द्रोह पर उतारू हो। इनके लिये देश और समाज की प्राथमिकता दूसरी पायदान पर है।

देश की स्वतन्त्रता के पश्चात आईएएस/आईपीएस संवर्ग मे वो माद्दा व ताकत थी और मेरा मानना है कि वह आज भी है, कि वह देश के निरीह, निर्बल एवं वंचित लोगो के उन्नति एवं विकास के लिये काम करते या असामाजिक तत्वों गुंडे बदमशों के अत्याचार, अनाचार से समाज और विशेषकर महिलाओं की रक्षा कर उनसे बचा सकते थे, पर देश का दुर्भाग्य रहा इस काडर के अधिसंख्य लोगो ने अपने निजी स्वार्थों के वशीभूत  "निर्लज्ज राजनैतिकों" के कृपा पात्र बनने   या उनकी "प्रिय कृपा पात्रों की सूची" मे आने की होड़ मे अपने कर्तव्यों को तिलांजलि दी जिसके कारण आज देश के सामने ऐसी अप्रिय स्थिति का निर्माण हुआ। मुंबई पुलिस कमिश्नर श्री परमवीर सिंह जी भी कहीं न कहीं इसी मानसिकता से प्रभावित रहे अन्यथा पटना पुलिस के एसएसपी द्वारा अपने कर्तव्य पालन पर उनके साथ मुंबई पुलिस का इतना निर्लज्ज व्यवहार क्यों होता? कानून को अपना कार्य करने देना चाहिये पर टीआरपी की शिकायत मे रिपब्लिक टीवी के नाम शिकायत मे आने पर  प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उसके विरुद्ध टीका टिप्पड़ी करना एवं देश के एक अन्य ख्याति प्राप्त टीवी चैनल् को बख्श  देने का कदम पूर्वाग्रह से ग्रसित अति उतावलेपन मे उठाया गया प्रतीत होता है जो कतई पक्षपात रहित नहीं कहा जा सकता है।

आज के तकनीकि युग मे जहां हर व्यक्ति के मोबाइल की बातचीत का मिनटों और सेकोण्डों, व्यक्ति, स्थान आदि का एक एक रेकॉर्ड जब उपलब्ध हो वहीं इसके विपरीत  यदि टीआरपी की गणना का निर्धारण गली मुहल्ले के कुछ छुटभैयों द्वारा टीआरपी गणना बॉक्स कुछ लोगो के घर पर लगा कर गणना मे हेरफेर-चालबाजी किसी चैनल्स को टीवी पर 24 घंटे चालू रख किया जाता हो  तब ऐसी टीआरपी प्रणाली को कचरे के डिब्बे मे डालना ही श्रेयस्कर है। बड़ा ही हास्यास्पद एवं आश्चर्यजनक  विषय है कि ऐसी सड़ी-गली प्रणाली के आधार पर लाखों करोड़ो रूपये  के टीवी विज्ञापन व्यापार का निर्धारण होता है? घोर आश्चर्य!!!!      

देश के राजनैतिक परिदृश्य के अधोपतन के बीच आज भी देश की जनता को न्याय पालिका के बाद सिर्फ आईएएस/आईपीएस संवर्ग से ही अब ऐसी अपेक्षा है कि वे निष्पक्ष, निर्भीक, निडरता एवं ईमानदारी से यदि अपने कार्य एवं कर्तव्यों को निष्पादन और पालन करते  तो देश का कदाचित ही ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से गुजरना पड़ता?

 

विजय सहगल          

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2020

नया दौर

"नया दौर"





दस्तक सुनहरी है,उजला सबेरा।
भटक रही आँधी ने नैया को घेरा॥
सितम आंधियों के अब न सहेंगे।
जुल्म ज़ालिमों के,अब न डरेंगे॥
कदम मंजिलों पर बढ़ते रहेंगे।
भले पथ मे कांटे सलते रहेंगे॥
सागर बीच कश्ती घना है अंधेरा ।
दस्तक सुनहरी है,उजला सबेरा।
भटक रही आँधी ने नैया को घेरा॥
फुदके गौरैया,चहक रहे बच्चे,
टूटे घरौंदों मे काया से कच्चे॥
बिजलियाँ घरोंदे क्या गिराती रहेंगी?
तिनके घरोंदे जलाते रहेंगी?
दमन बिजलियों,बादलों के सितम।
चलेगा न ये, जीवन हर दम॥
नया दौर है ये,वक्त का है फेरा,
निर्बल "चिरैया" को वक्त ने उबेरा।
दस्तक सुनहरी है,उजला सबेरा।
भटक रही आँधी ने नैया को घेरा॥
आंधियां अंधेरों मे,पथ से जो भटकें।
बातियाँ "दीये" की खड़ी हो के डटके॥
झंझावातों को दिशा मार्ग देंगी।
अज्ञानता का,"हर" ज्ञान लेंगी॥
हौंसले दियों के अब कम न होंगे।
खुले आसमानों मे तूंफा लड़ेंगे।
चमक रोशनी की अविचल अड़ी है।
लौ जो दिये की,"तम" से बड़ी है॥
मिटेगा तमस,पड़े रश्मियों का डेरा,
दस्तक सुनहरी है,उजला सबेरा।
भटक रही आँधी ने नैया को घेरा॥

विजय सहगल


शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

टॉइलेट एक (अ)प्रेम कथा

 

"टॉइलेट एक (अ)प्रेम कथा"





आप कल्पना करें यदि आप अपने परिवार के लिये कोई मकान अपनी रिहाइश के लिये किराये से ले रहे हों, मकान की लोकेशन अच्छी हो किराया कम हो तो निश्चित ही आप ऐसी जगह पर मकान लेना पसंद करेंगे। लेकिन किराएनामे के पहले आपको बताया जाये कि टॉइलेट के लिये आप और आपके परिवार को सड़क पार नगर पालिका के टॉइलेट मे जाना होगा, तो निश्चित ही आप मुफ्त मे भी उस मकान मे रहना पसंद न करें। यदि यही स्थिति बैंक शाखा के मामले मे हो तब  हम क्यों इस अति आवश्यक सुविधा के बिना शाखा परिसर मे  बैंक खोलने हेतु  चयन कर लेते है? बैंक एक व्यवसायिक संस्थान के नाते टॉइलेट की सुविधा न केवल स्टाफ बल्कि ग्राहकों की सुविधा की द्रष्टि से भी आवश्यक है। वैधानिक एवं मानवाधिकार के रूप से भी टॉइलेट की सुविधा के बिना शाखा खोलना क्या सामाजिक बुराई नहीं है? प्रादेशिक निरीक्षालय मे कार्य करने के दौरान लगभग चार साल तक विभिन्न शाखाओं मे जाने एवं निरीक्षण करने का सुयोग बना। इस दौरान निरीक्षण के दौरान जानकार हैरानी और आश्चर्य हुआ कि लगभग सात या आठ शाखा परिसर ऐसे थे जिनको किराये पर लेते समय उनमे टॉइलेट का प्रावधान ही नहीं था। इनमे से कई शाखाओं मे महिला स्टाफ भी पदस्थ थे। कई बारी शाखाओं के त्वरित खोलने के कारण अस्थाई रूप से टॉइलेट का कुछ समय के लिये न बन पाने के कारण टॉइलेट का  अस्थाई स्थगन तो समझ आता है। सरकारी और अर्ध सरकारी कार्यालयों मे स्थित शाखा  परिसर की स्थिति को तो फिर भी स्वीकार किया जा सकता है जहाँ विभाग के अन्य कर्मचारियों के लिये निर्मित टॉइलेट का  सांझा करने पड़े। पर मकान मालिक के निजी टॉइलेट को बैंक के स्टाफ के साथ सांझा करने का कोई कारण समझ से परे थे। शाखा के परिसर के निर्धारण के लिये बाकायदा एक समिति का गठन किया जाता है ताकि बैंक के अच्छे  व्यवसाय हेतु शाखा परिसर व्यवसायिक दृष्टि से अच्छी लोकेशन और समस्त सुविधाओं से परिपूर्ण हो पर अन्य बाते छोड़ भी दे तो कम से कम जीवन के लिये  अत्यावश्यक   टॉइलेट सुविधा को    कैसे      नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।  

फ़र्निचर, टेबल, कुर्सी, लॉकर, सेफ आदि के बारे मे बैंक के स्पष्ट मानक तय है। फ़र्निचर आदि मे व्यय एवं शाखा के उदघाटन आदि मे कई लाख रूपये खर्चने के बावजूद कुछ चंद हज़ार रूपये टॉइलेट के लिये भी शामिल करने मे बैंक को भला क्या आपत्ति हो सकती थी? पर कई बार कुछ अधिकारी अपने प्रभाव का अतिक्रमण कर उपलब्ध सुविधाओं मे कटौती कर देते है जैसा कि एक शाखा मे मेरे साथ हुआ था, (देखे ब्लॉग- घूमने बाली कुर्सी (https://sahgalvk.blogspot.com/2020/04/blog-post_11.html )।  कठिन से कठिन परिस्थितियों के बावजूद काम चलाऊ टॉइलेट बहुत ही कम खर्च मे कैसे भी परिसर मे चंद दिनों मे ही निर्मित कराई  जा सकता है।  लेकिन खेद और अफसोस है कि संबन्धित  अधिकारियों की इक्छा  शक्ति के अभाव मे  शाखा मे पदस्थ दूसरे स्टाफ के दुःख दर्द से अनिभिज्ञ इन अधिकारियों के व्यवहार के कारण कुछ शाखाओं मे सालों-साल  तक टॉइलेट का निर्माण नहीं कराने का दोष  इनकी लचर सोच का  ही नतीजा माना जा सकता है।  इन शाखाओं के नियमित निरीक्षण मे भी इस समस्या को उल्लेख करने  के बाबजूद समस्या का  निराकरण सालों तक न होना अपने आप मे हमारी कार्यशैली पर एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है??

इस संबंध  मे बैरागढ़ से चंद किमी दूर स्थित ग्रामीण  शाखा बरखेड़ा  के निरीक्षण अपने आप मे एक अनूठा अनुभव था। निरीक्षण के समय 4-5 दिन उक्त शाखा मे जाना हुआ। टॉइलेट जाने के लिये मकान मालिक के घर के अंदर स्थित उनके निजी टॉइलेट का इस्तेमाल करना होता था। ग्रामीण मकान बहुत बड़े अहाते मे बना था।  शुरू मे तो एक दो दिन शाखा के सब स्टाफ को लेकर गये। बड़े से मकान मे दो बड़े बड़े आँगन को पार करने के बाद सबसे आखिर मे टॉइलेट बना था। मुख्य द्वार से टॉइलेट की दूरी लगभग दो सौ फीट होगी। दुर्भाग्य से टॉइलेट कम संडास मे दरवाजा तो था पर उसकी कुंडी नहीं लगती थी। पानी के लिये फ्लैश भी न था। टॉइलेट के बाहर रखे वर्तनों से पानी भरकर डालना होता था।  एक बार टॉइलेट मे पानी डालने पर पानी ही बापस उछल कपड़ों पर आ गिरा।  जब कभी सब स्टाफ के न होने पर अकेले जाना होता तो बड़ी झिझक होती। टॉइलेट करते समय लगातार खाँसना और खखारना पड़ता क्योंकि कुंडी न लगने  की समस्या थी लगातार डर बना रहता कहीं कोई अन्य व्यक्ति टॉइलेट के इस्तेमाल के लिये न आ जाये। एक बार जब गये तो टॉइलेट के बाहर ही मकान मालिक का कपड़े धोने का स्थान था और कोई महिला कपड़ा धो रही थी। बड़ी अजीब स्थिति थी जब तक टॉइलेट हो कर बापस न निकल गये एक तरह का मानसिक बोझ ही दिमाक मे बना रहा। जब लघु शंका के निवृत्ति मे इतना कष्ट हो और यदि दीर्घ शंका का समाधान करना पड़े  तो इसकी कल्पना ही की जा सकती है।   इस तरह की समस्याओं के बीच प्रति दिन बैंक स्टाफ कैसे समस्याओं का  सामना करता होगा जबकि उक्त शाखा मे एक महिला स्टाफ की पदस्थपना थी तब नित्य ही वह इस समस्या का सामना कैसे करती होगी शायद हम पुरुष उसको नहीं समझ सकते।  

सागर कैंट शाखा की स्थिति तो और भी गई बीती थी जो सालो साल बनी रही। टॉइलेट तो दूर शाखा मे स्टाफ को भी बैठने के लिये आवश्यक जगह न थी। मुश्किल से 12X20 फीट की जगह। उसी मे मैनेजर, ऑफिसर, क्लर्क, कैश कैबिन, कैश सेफ, रिकॉर्ड रूम और ग्राहकों के मात्र खड़े होने भर  की ही जगह हो तो फिर टॉइलेट तो भूल ही जाओ? बगल मे ही शाखा और   चर्च की बाउंड्री वाल के बीच मात्र एक व्यक्ति के खड़े होने की छोटी सी  जगह को लोग टॉइलेट की तरह प्रयोग करते। धार्मिक जगह के बाहर की जगह को टॉइलेट की तरह इस्तेमाल करना हमे कतई रास न आया। शाखा के सामने सड़क के उस पार सैनिकों की बैरक मे बनी टॉइलेट प्रयोग कभी-कभी कर लिया करते लेकिन एक अंदेशा बना रहता कोई टोक न दे। इसके दीगर दूर दूर तक कैंट एरिया मे टॉइलेट करने कहीं भी खड़े होने पर सेना पुलिस का भी डर बना रहता कही पकड़े गये तो इज्जत का पलीता लगना निश्चित था। दो-तीन बार शाखा मे जाना हुआ कई बार टॉइलेट करने को अपनी सहन शक्ति तक रोके रखना ज्यादा आसान लगता। जब पुरुष स्टाफ का ये हाल था तो इस शाखा मे पदस्थ महिला स्टाफ के बारे मे सोच कर ही सिहरन होती है। आज की स्थिति क्या है मै अवगत नहीं हूँ? 

एक अन्य शाखा बालोद मे भी शाखा अच्छी लोकेशन पर स्थित थी पर टॉइलेट के लिये शाखा से बाहर निकल गली मे 40-50 कदम चल कर मकान मालिक के घर मे बने बरामदे से होकर सीढ़ियों से चढ़ पहली मंजिल पर जाना पड़ता था। मकान मालिक की निजी टॉइलेट का इस्तेमाल करना होता था। हर बार ही सुनसान निवास मे इस तरह प्रवेश करना कई बार इस आशंका को जन्म देता था कि कहीं अचानक कोई आ गया तो चोर होने का आरोप लगा कर देखते ही चिल्लाना शुरू न कर दे।

मेरी पदस्थपना कल्लेक्ट्रेट रायपुर मे नवीन शाखा खोलने से शुरू हुई थी। अस्थाई परिसर को तुरंत शाखा खोलने के लिये निश्चित कर कुछ दिनों मे ही शाखा को खोला जाना था। छोटा परिसर था शाखा मे  टॉइलेट नहीं थी लेकिन कल्लेक्ट्रेट परिसर मे अन्य स्टाफ के लिये निर्मित टॉइलेट का इस्तेमाल हम लोग कर लेते थे। लेकिन जैसे ही हमे स्थाई परिसर प्राप्त हुआ ठेकेदार से अनुमानित व्यय और प्रस्ताव के पचड़े मे न उलझ मैंने सामान्य व्यय मे से ही बमुश्किल दो ढाई हजार के व्यय से शाखा मे पीछे बने एक कमरे मे चार-चार इंच की दो दीवारों के बीच टॉइलेट का निर्माण दो दिन मे  करा लिया था।

लेकिन टॉइलेट से जुड़ी उपरयुक्त समस्याओं की कल्पना उन नीति निर्धारकों के संज्ञान मे शाखा परिसर को बैंक हेतु लेने के पूर्व क्यों कर नहीं आयी ये विचारणीय प्रश्न है?? निरीक्षण के दौरान मै ऐसी सात-आठ  शाखाओं मे गया जहां टॉइलेट की स्थाई/अस्थाई व्यवस्था न थी।  बैंक एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान है जिनको प्राइवेट बैंकों की ही तरह हमारी शाखाओं का चयन उपयुक्त व्यापारिक केंद्र के ही नजदीक होना चाहिये।  शाखाओं की मूलभूत सुविधाओं मे कुछ कमी कर या व्यापारिक एवं व्यवसायिक केंद्र से दूर किसी अव्यवसायिक स्थल पर शाखा के स्थान का चयन कर किराये के रूप मे कुछ हजार रुपयों की बचत से क्या हम जाने अनजाने  बैंक को  बहुत बड़े व्यवसायिक लाभ  से वंचित करने का अपराध नहीं करते? यह एक विचारणीय प्रश्न है? अन्य शाखाओं मे जहां टॉइलेट की सुविधा उपलब्ध न रही हो और जहां पर मै  निरीक्षण के लिये न जा सका वहाँ के टॉइलेट की प्रेम कथा मै नहीं लिख सका। 

विजय सहगल

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2020

चाह मिलन की

"चाह मिलन की"








सूरज ढलने पर तुम आये,
तो क्या आये?
बहती धारा मे आते,
नदी नीर जब सिंधु समाये,
तो क्या आये?
आज तुम्हारा घर पे आना।
बिसरे दिनों की याद दिलाना॥
विस्मृत क्षण सब हरे हो गये।
स्वप्न, स्वर्ण से खरे हो गये॥
पर आने मे देर बहुत की।
बाट जोहते रहे, श्रवण की॥
कुछ और अधिक पहले तुम आते,
तुम कुछ कहते, सुन हम पाते॥
अब गहन नींद न,
शोर सुनाये।
सूरज ढलने पर तुम आये,
तो क्या आये?
बहती धारा मे आते,
नदी नीर जब सिंधु समाये,
तो क्या आये?

चाह मिलन की, थी तुमको भी,
वही चाह थी, मुझको भी॥
दुनियाँ देखे, मिलन हमारा,
तुमने पुष्प दिया था प्यारा॥
पर तुम सहज भले मे आते?
भले लता-पुष्प न लाते॥
मै भी देख,
तुम्हें खुश होता।
अब क्या होता?,
जब उड़ा पखेरू, छोड़ के सोता?
सूनी आँखों,
"न" सुमन सुहाये।
सूरज ढलने पर तुम आये,
तो क्या आये?
बहती धारा मे आते,
नदी नीर जब सिंधु समाये,
तो क्या आये?

मैले-वस्त्र, स्वच्छ कम थे,
पर रिश्तों, मे अहम न थे।
धवल अँगौछा, पहनाकर।
प्रबल प्रेम मुझ पे दर्शाकर॥
पर, असर अँगौछा,
न कर पाया।
महज,
पिण्ड को ही ढँक पाया॥
"सर्द" सुनहरी पर जो लाते।
देख नयन हर्षित हो जाते॥
असर "ऊन" का,
अब न सुहाये।
सूरज ढलने पर तुम आये,
तो क्या आये?
बहती धारा मे आते,
नदी नीर जब सिंधु समाये,
तो क्या आये?

विजय सहगल

 

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

पहली समुद्र यात्रा

 


                       "पहली समुद्र यात्रा"





अक्टूबर 1983 की बात थी बैंक की पहली एलएफ़सी मे हम अपने अन्य दो साथियों अनिल रस्तोगी एवं संजीव टंडन के साथ लखनऊ से गोवा वाया मुंबई घूमने का प्लान बनाया। हम लोगो की योजना कि इस एलएफ़सी मे जल, थल एवं नभ की यात्रा को भी शामिल किया जाये और ऐसा हम लोग कर भी पाये। रेल की यात्रा तो प्रायः अनेकों बार सभी कर चुके थे इसलिये रेल यात्रा मे वो रोमांच और उत्सुकता न थी, हवाई यात्रा का ज्यादा अनुभव न होने से गोवा से बापसी मे मुंबई यात्रा का रोमांच रहस्य, उत्सुकता इसलिये गायब हो गई कि एयर बस की 3x4x3 अर्थात दायें तरफ की खिड़की से बायें तरफ की  खिड़की के बीच दस यात्रियों की लाइन मे खिड़की की सीट से हम सभी वंचित रहे और मन मारकर बीच की चार सीटों मे हम तीनों मित्रों को जगह मिली। इसलिये पहली हवाई  यात्रा का वो उत्साह उमंग खिड़की से बहार खुले आसमान और नीचे जमीन को तांक-झांक न कर सके। आसमान से जमीन पर खेत खलिहान, झोपड़ी मकान, झील तालाब आधी देखने की मन मे बनाई कल्पनाओं और कहानियों के सुख से वंचित जो रहे। इसलिए इस यात्रा का रोमांच और खुशी का सपना  खिड़की की सीट न मिलने के कारण आधा अधूरा रहा अर्थात धरा का धरा रह गया। पर इस यात्रा मे पानी के जहाज की मुंबई से गोवा की समुद्री यात्रा यादगार यात्रा बन गई।

उन दिनों सूचना तकनीकि इतनी प्रोन्नत नहीं थी। मुंबई मे अनेकों लोगो से पूंछ-तांच्छ कर पानी के जहाज का टिकिट बुक करायी। बुकिंग कार्यालय से सूचना से पता चला कि तीन श्रेणियों का टिकिट उपलब्ध था। नीचे दर्जे का टिकिट शायद 20-30 रूपये का था जिसे लोअर डेक कहते दूसरी श्रेणी अपर डेक की थी शायद 100 के आस पास की थी। तीसरी और विलसता से परिपूर्ण प्रथम श्रेणी मे कैबिन थी जिसका किराया हवाई टिकिट  से भी ज्यादा था सही सही याद तो नहीं पर  कीमत शायद 400 रूपये के उपर थी। मित्रों ने आपस मे तय कर अप्पर डेक का  टिकिट कटाया। पूर्व मे हम लोगो को  इन तीनों श्रेणी की बहुत अधिक जानकारी न थी।

यात्रा वाले दिन तय समय और स्थान पर हम लोग निश्चित समय से पूर्व बंदरगाह पर पहुँच गये। समुद्र जहाज की यात्रा सुबह 7-8 बजे प्रस्थान होनी थी। बंदरगाह पर  एक बड़े हाल मे धीरे धीरे समुद्री यात्रा के यात्री आने शुरू हो गये। पता किया तो बताया गया बंदरगाह का गेट निश्चित समय पर खुलेगा तभी यात्रियों का समुदी जहाज पर  प्रवेश प्रारम्भ होगा। जो अनुभवी यात्री थे वे पहले आगे लाइन मे खड़े हो गये। कुछ यात्री जिनपर सामान ज्यादा था रेल्वे स्टेशन की तरह बंदरगाह पर उपलब्ध कुलियों की सेवा ले खाली हाथ लाइन मे खड़े हो गये। हम तीनों मित्रों को समुद्री यात्रा का कोई पूर्व अनुभव न था इसलिये आराम से मस्ती मे पीछे खड़े थे। लोअर डेक के यात्रियों का प्रवेश द्वार अलग था। अप्पर डेक और कैबिन के यात्रियों के लिए एक अलग प्रवेश द्वार था। निश्चित समय पर जैसे ही प्रवेश द्वार खुला 4-5 सौ यात्रियों की भीड़ एक दम से लकड़ी के काफी चौड़े तख्ते से जहाज पर चढ़ने के लिये दौड़ी। हम तीनों तो इस दौड़ की जानकारी न होने के कारण पीछे खड़े भीड़ छँटने का इंतजार कर रहे थे। व्यवस्था से परिचित न होने के कारण रेल्वे स्टेशन के चालाक कुलियों की तरह ही बंदरगाह के कुलियों ने अपने अपने यात्रियों के लिये मौके की छाया दार शेड के नीचे की जगह चादर विछा कर घेर ली। तभी हमे समझ आया कि अपर डेक पूरे का पूरा अनारक्षित जगह है। जिसको जहां जगह मिले घेर कर अपना सामान या चादर विछा कर अपने कब्जे मे ले सकता है। तभी मैंने अपने मित्र अनिल को साथ ले सामान के साथ संजीव को नीचे छोड़ कुछ सामान आदि हाथ मे ले  पानी के जहाज पर दौड़ा और मुख्य प्रवेश द्वार के बाएँ तरफ जगह पाने के लिये पहुंचा। वहाँ थोड़ी सी जगह पाकर सहयात्रियों/कुलीओं  से थोड़ा कहा सुनी कर फैल कर बैठ गया। पूरा नज़ारा अनारक्षित रेल मे सीटों के लिये मारामारी की तरह ही था।  मैंने उक्त जगह की रक्षा और कब्जा दोनों मित्रों के सामान सहित  आने तक उसी तरह बनाये रखा जैसे बचपन मे राम लीला देखने के लिये सबसे आगे की जगह घेरने के लिये दरी, फट्टी विछा कर करता था।

तब तक दोनों मित्र भी सामान के साथ ऊपरी डेक पर आ गये थे। हम लोगो ने अपने अपने सूटकेस से चादर निकाल विछा अपना कब्जा पक्का कर लिया था। जगह की तरफ से अब हम लोग निश्चिंत थे। तभी हम लोगो ने पता किया कि सीमित संख्या मे किराये पर मोटे रबर फ़ोम के गद्दे तीस रुपए के किराये पर उपलब्ध है। हम लोगो ने तुरंत ही किराया दे कर तीन गद्दों को किराये पर ले लिया जो एक अच्छा निर्णय था। आराम दायक गद्दों की बजह से लकड़ी के डेक पर सोने के कष्ट से हम लोग बच गये थे।

इसी बीच हम दो लोग शिप के भ्रमण हेतु अपने एक मित्र को सामान के देख भाल हेतु छोड़ चल दिये। रेल की तरह सीमित संख्या मे टॉइलेट उपलब्ध थे। चूंकि यात्रा की शुरुआत थी अतः संडास साफ सुथरे थे। लोअर डेक मे किचिन थी। पूर्व भुगतान पर रात का खाना बुक कराने पर   उपलब्ध था। जिसका लाभ हम लोगो ने उठाया। लोअर डेक मे भीड़ ज्यादा थी कुछ लोग बकरियों को लेकर जा रहे थे। लोग काफी सामान के साथ थे। प्राकर्तिक रोशनी उपर दीख रहे रोशन दान से आ रही थी। भीड़-भाड़ यहाँ ज्यादा थी। अधिकतर यात्री आर्थिक रूप से कमजोर श्रेणी के लग रहे थे।  एक सिरे से अंडरग्राउंड तल जो समुद्र से नीचे था और जिस पर बड़े बड़े इंजिन जेनरटर चल रहे थे, तीव्र शोर के  कारण आपस मे बातचीत भी संभव न थी।

तेज धूप के कारण हम लोगो को शेड के नीचे ठंडी समुद्री हवाओं के कारण चैन से बैठने का भरपूर सुख मिल रहा था। इसी बीच जैसे रेल मे चाय, स्नैक्स, बिस्कुट, नमकीन मे बेचने बाले होते है बिलकुल उसी तर्ज़ पर कुछ बेंडर जहाज पर सामान बेच रहे थे। इसी बीच रेल टिकिट चैकर की तरह सफ़ेद शर्ट और काली पेंट मे यहाँ भी टिकिट निरीक्षक से सामना हुआ। अपना टिकिट चैक करा हमने जिज्ञासा बस बगैर टिकिट यात्रा की जहाज पर गुंजाईस के  बारे मे पूंछा? मुस्करा के बोला दिल्ली की तरह यहाँ  बगैर टिकिट यात्री नगण्य संख्या मे होते है! जैसे जैसे सूरज ढल रहा था उपर डेक पर यात्रियों की चहल-पहल बढ़ गई। चोरी चपाटी आदि का डर न महसूस होने के कारण हम तीनों  भी अपर डेक पर भ्रमण के लिये पीछे के एक छोर से भ्रमण हेतु रवाना हुए। पीछे का हिस्सा जो आगे के नुकीले हिस्से से कई गुना लगभग 100 फीट से ज्यादा रहा होगा। इंजिन से निकलने बाले पानी और जहाज द्वारा अपनी तेज गति से दोनों ओर हटाये जा रही पानी की  विशाल जलराशि से उत्पन्न होने बाली आवाज से गुंजायमान था। जहाज के आखिरी हिस्से मे तेज गति से बढ़ते जहाज को देखना अपने आप मे एक अद्भुद रोमांच था कुछ कुछ बैसा ही जैसा हमने एक बार मालगाड़ी के आखिरी गार्ड के डिब्बे मे यात्रा का रोमांच को महसूस किया था। (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/09/blog-post_44.html)॰ लोग ढलते सूरज की तस्वीरे लेने के लिये अपना स्थान ढूंढते नज़र आए। अबतक मस्त ठंडी हवाओं के आगोश मे लोगो के चेहरे पर एक अलग खुशी का अहसास था। कुछ विदेशी अपने साथी महिला मित्रों के साथ प्रेमालाप मे मग्न थे जिनको हम देशी "बेचूलर" कौतूहल और उत्सुकता लिये कभी कभी तिरछी निगाहों से देखने के मोह से पीछे नहीं रहे। अधिसंख्य यात्री पर्यटक ही थे कुछ परिवारों के साथ और कुछ हम लोगो कि तरह क्षणे-छाँटे।

पानी के जहाज का अगला हिस्सा कुछ डरावना, भय उत्पन्न  कर देने वाला था। जहाज का तेज गति से समुद्री लहरों को चीर कर आगे बढ़ना रहस्य और भय मिश्रित रोमांच को पैदा कर देने वाला था। जहाज के अग्रतम हिस्से से तीस-चालीस फुट नीचे समुद्री लहरों को चीरने की आवाज हृदय विदीर्ण करने वाली थी। जहाज की तीव्र गति डर और दहशत पैदा करने वाली थी। कदाचित ही कोई कमजोर दिल वाला आदमी जहाज के  अग्रभाग के  सिरे पर ज्यादा देर ठहर सके? धीरे धीरे सूर्य भी अस्ताञ्चल मे छुपने की तैयारी मे था और दूसरी तरह जहाज पर लोगो के घूम-घूम कर वातावरण से उत्पन्न  आनंद और उल्लास को अनुभव करने का चरमोत्कर्ष।

अब तक अंधेरा घिरने लगा था। दूर दूर तक जहाज के एक ओर घोर स्याह अंधेरा जो अनंत व्याप्त था और दूसरी तरफ देश के पश्चिमी समुद्री तट के किनारे पर बसे घरों से तारों की तरह निकलने वाला टिमटिमाता मद्धिम प्रकाश और अँधेरों के बीच  पहाड़ों तथा समुद्री  किनारों पर  लगे नारियल के पेड़ों  का आभास देती आकृतियाँ। रात के आठ-नौ बजे के बीच लोअर डेक मे स्थित किचिन मे रात्रि भोजन ठीक-ठाक ही था पर गरम और ताज़ा। कुछ और देर भ्रमण पश्चात जब मोटे रबर फ़ोम के गद्दों पर आराम हेतु पहुंचे तो सारी थकान तिरोहित हो चुकी थी। रात मे कुछ सर्दी भी बढ़ गई थी लेकिन हम लोगो के पास आवश्यक कपड़ो के इंतजाम के कारण यात्रा और भी सुखद और आनंद देने वाली हो गई। रात मे एकाध जगह शायद जहाज किसी स्टेशन अर्थात शहर मे रुका था लेकिन अर्ध-चेतन मन पर  गहरी नींद के प्रभाव के  कारण उसका भान न हुआ। सुबह के सात बजे के लगभग हम लोग गोवा के बन्दरगाह पर थे। जहाज बन्दरगाह पर लगाने के लिये बड़े बड़े लोहे के लंगर डाले जा रहे थे बन्दरगाह पर लोहे की  रैलिंग के पर सैकड़ों की संख्या मे लोग जो शायद पर्यटन से जुड़े होटल वाले, साइट सीइंग वाले, कुछ कुली और शायद कुछ गोवा के मूल निवासियों को लेने आने बाले मेजबान दिखाई दे रहे थे।

इस तरह हमारी पहली समुद्री यात्रा  हवाई यात्रा के मुक़ाबले  ज्यादा  सुखद, रुचिकर, आनंददायक और यादगार रही।

विजय सहगल